रचना दीक्षित की रचनाएँ

बतकही

घर की छत पर रखे
अचार, पापड़ और बड़ियाँ
मायूस थे
पास की छत पर पसरी
ओढ़नी और अम्मा की साड़ी
धीमे धीमे बतिया रहे थे
इतनी देर हो गयी,
कहाँ रह गयी वो?
आचार, पापड़ और बड़ियों ने
अपनी अनभिज्ञता जताई,
पडोसी छत से गुहार लगाई
रुमाल ने छोटे शरीर की दुहाई दी
तो अम्मा की साड़ी ने
बढती उम्र की
आखिर निकलना ही पड़ा ओढ़नी को
कुछ दूर ही उड़ी
एक पेड़ की डाल पे,
बादल की छाँव में
एक सफ़ेद सुनहरा देहावरण झूलता पाया
कुछ अनहोनी की आशंका से दिल धड़का
अगले ही पल
पास के पहाड़ की ओट से
आती कुछ आवाजें
जाकर देखा
अपने स्वभाव के विपरीत
रुपहले गोटे वाले मटमैले घाघरे
तिस पर
काले काँच सी पारदर्शी चुनर में उसे
लौट आई ओढ़नी
चेहरे पे शरारत देख
खीजी और बोल उठी साड़ी
अरे! ऐसा क्या देख आई
दोनों हाथों से चेहरा छुपा के वो बोली
आज मैंने सांवले,
मजबूत कद काठी वाले
बलिष्ठ पहाड़ की बाँहों में
लिपट लिपट कर
धूप जीजी को नहाते देखा है,
सो आज न आयेंगी जीजी

साथ 

 

बहुत दिनों बाद
बगीचे की सैर को पहुँची
मुझे देख
वहाँ के दरख़्त, पेड़, झाड़ियाँ
और यहाँ तक कि टूटे पत्ते भी
मुस्कुराये, खिलखिलाए, तालियाँ बजाईं
ठंडी हवा खिलखिलाई, खुशबू महकाई
तारो ताजा हो उठी मैं,
फिर उठी और चल पड़ी
तभी बुजुर्ग दरख़्त की
एक डाली लटकी, लचकी और
मेरे पास आई
और कानों में बोली
कभी आ जाया करो यहाँ भी
अच्छा लगता है

पहली तारीख

“खुश है जमाना आज पहली तारीख है
मीठा है खाना आज पहली तारीख है”
जाने क्यों मेरे जीवन में,
कोई पहली और आखिरी तारीख नहीं होती
तुम्हारा घर, तुम्हारे बच्चे तुम्हारी दुनिया
संभालती हूँ
बस शायद इसलिए
मैं भी उठाना चाहती हूँ
पहली तारीख का सुख
महीने के तीसों दिन
नहीं जानती
इसके लिए हामी भरना या न भरना
कितना मुश्किल होगा
तुम्हारे लिए
पर तुम्हारे आगे ये बात रखना
बेहद मुश्किल है मेरे लिए
अरे तुम तो पसीने से तर बतर हो गए
डरो नहीं
मैं कोई केकई नहीं
जो मांग लूंगी राज पाट
और तुम भी तो
कोई दशरथ नहीं जो
दे ही डालोगे सब कुछ
मैं चाहती हूँ हर दिन
बस कुछ पल कुछ घंटों का एकांत
जहाँ बस मैं मैं और मैं रहूँ
न कोई याद, न कोई रिश्ता, न कोई चाह
ताकि छूं सकूँ, अपने आपको,
झाँकूँ अपने भीतर
महसूस करूँ अपने आपको
और सुनिश्चित करूँ कि
मैं आज भी
इस दुनिया का हिस्सा हूँ

धागे

बाखबर से बेखबर होती रही,
समय की गठरी पलटती रही
रातों को उठकर जाने क्यों,
मैं अपनी ही चादर सीती रही
संस्कारों की कतरनें जोड़ी बहुत थीं,
फिर भी सीवन दिखती रही
अपनों की झालर बनाई सही थी,
जाने किसमें तुरपती रही
बातें चुन्नटों में बांधी बहुत थीं,
न जाने कैसे निकलती रहीं
ख़ुशी औ ग़म के सलमे सितारों में,
मैं ही जब तब टंकती रही
मिलाना चाहा रिश्तों को जब भी,
अपनी ही बखिया उधडती रही,
बेखबर से बाखबर होना जो चाहा,
रातों में समय को पिरोती रही
हाथों को मैंने बचाया बहुत,
पर अंगुश्तानो से सिसकी निकलती रही
सुराखों से छलनी हुई इस तरह,
आँखों में सुई सी चुभती रही
जितना भी चाहा बाहर निकलना,
धागों में उतना उलझती रही

पतन 

सुना है गिरना बुरा है
देखती हूँ आसपास
कहीं न कहीं,
कुछ न कुछ
गिरता है हर रोज़
कभी साख गिरना
कभी इंसान का गिरना
इंसानियत का गिरना
मूल्यों का गिरना
स्तर गिरना
कभी गिरी हुई मानसिकता
गिरी हुई प्रवृत्तियां
अपराध का स्तर गिरना
नज़रों से गिरना
और कभी
रुपये का गिरना
सोने का गिरना
बाज़ार का गिरना
सेंसेक्स गिरना
और यहाँ तक
कि कभी तो
सरकार का गिरना
समझ नहीं पाती
ये इनकी चरित्रहीनता है
या
गुरुत्वाकर्षण

याददाश्त

मैं कुंठित हूँ,
व्यथित हूँ,
क्षुब्ध हूँ,
क्या हृदय ही जीवन है?
मैं भी तो हृदय की खुशी में खुश
उसके दुख,
असफलता,
दर्द, पीड़ा में
उसके साथ ही
ये सब अनुभव करता हूँ
फिर हृदय ही क्यों
क्या सही रक्तचाप,
हृदय गति
रक्त विश्लेषण
और
धमनियों में वसा
न जमने देना ही
जीवन है
जब भी हृदय होता है
क्षुब्ध, कुंठित,
मैं सहमता हूँ,
सिकुड़ता हूँ
अवसादग्रस्त होता हूँ,
भूल बैठता हूँ,
अपने आप को
धीरे धीरे देता हूँ
शरीर को
भूलने की बीमारी
मैं, हाँ! मैं
मस्तिष्क का
उपेक्षित हिस्सा
अध:श्चेतक (हाइपोथेलेमस) हूँ
जब भी किसी
अनहोनी के बाद
आता है चिकित्सक
जांचता है,
देता है,
दवाइयां जाने किसकी
नहीं सोचता, है तो,
मेरे बारे में

जीत 

तुम्हारी वो
जीतने की,
शीर्ष पर रहने की,
सदैव अव्वल आने की जिद,
हर छोटी होती लकीर के आगे
बड़ी लकीर खींचते रहना
छोटी लकीरों को
पीछे छोड़ते रहना
मात्र बड़ी लकीरों में जीना,
सदैव जीतते रहना
और मैं
तुम्हारी छोड़ी हर लकीर में
जीती रही,
जीवंत होती रही,
जीतती रही
कभी जब तुम
अपनी इस जीतने की जिद से
उकता जाना,
थक जाना,
कुछ नया करने की सोचना
कोशिश करना याद करने की
हर उस छोटी लकीर को
जिसने तुम्हें शीर्ष पर पहुंचाया
और मैं एक बार फिर
जीत लूँगी,
जी लूँगी,
जीवंत हो उठूँगी

इत्मिनान है कि वो खुश हैं

चलती हूँ जब भी,
उतरती चढ़ती हूँ सीढ़ियाँ,
आती हैं अजब सी आवाज़े,
घुटनों में हड्डियों से,
कभी कड़कड़ाती, खड़खड़ाती,
कभी कंपकपाती
गुस्से में लाल पीला होते तो सुना था,
यहाँ तो नीली हो जाती हैं नसें
दबोचती हैं हड्डियाँ उन्हें जब
कभी खींचती हैं माँस,
कभी बनाती हैं माँस का लोथड़ा
दर्द से सराबोर
न कोई हँसी,
ना खिलखिलाहट,
ना लोच
कुछ भी तो नहीं रहा अब यहाँ
मनाती हूँ नसों को,
दिखाती हूँ लेप का डर
नहीं मानती वो
कभी छुप जाती हैं,
हड्डियों के नीचे, कभी माँस के नीचे
होती है सारी रात लुका छिपी,
इनकी मेरी नींद से
खुश होती हैं वो कहती हैं
कभी तुम थे, हम नहीं,
अब हम हैं तुम नहीं

महाभारत

जब देखो जहाँ देखो
दिखाई सुनाई पड़ती
महाभारत
पिता-पुत्र द्वन्द
मेरा घर भी
नहीं है अछूता
न चाहते हुए भी
सारा दिन हर पल
होता है यहाँ भी
पिता पुत्र द्वन्द
और कोई नहीं
ये हैं अर्जुन अभिमन्यु
अर्जुन सदैव तत्पर
त्वरित धीर गंभीर
ऑंखें स्थिर
अपने लक्ष्य पर
माँ की कोख से
सीख कर आया
अभिमन्यु
कभी शांत
कभी सौम्य
कभी उत्पाती
चक्रव्यूह में
फंसता, निकलता
हारता, बैठता
पर हार कर भी जीतता
अर्जुन मस्तिष्क है मेरा
जो जीत कर भी हारा
अभिमन्यु दिल है मेरा
जो हार कर भी जीता
जब भी मरा है कोई
अश्वत्थामा की मौत
तो बस मेरा मन

भविष्य

हर दिन सुबह सवेरे
बनाती हूँ जब चाय
देखती हूँ गर्म पानी के इशारे पे नाचती
चाय की पत्ती
उसका दिल जीतने का
हर संभव प्रयास करती
इतराती, इठलाती, बलखाती,
झूम झूम जाती
तब तक
जब तक बंद नहीं कर देती मैं आंच
जब तक खो नहीं जाता
उसका रूप, रंग, यौवन
सुडौल सुन्दर दानों की जगह
बेडौल थुल थुल काया
फिर बैठ जाता है
पत्तियों का झुण्ड
बर्तन की तली पर
थका, हारा, हताश,
फिर भी शांत
दूर कर देती हूँ फिर मैं
पत्ती को उसी के पानी से
सोचती हूँ कहीं
स्त्रीलिंग होने मात्र से
उसका भाग्य स्त्रियों से
जुड़ तो नहीं जाता
नहीं चाहती हूँ उसे
उसी की किस्मत पे छोड़ना
कूड़े के ढेर पर पड़े पड़े खत्म होना
उठाती हूँ बड़े जतन से उसे
ले जाती हूँ अपने सबसे प्यारे
और दुर्बल पौधे के पास
मिलाती हूँ उसकी
सख्त मिटटी में इसे
खिल उठती है वो मिटटी
भुर भुरी हो उठती है
आश्वस्त हूँ अब
जी उठेगा मेरा पौधा
जाते जाते कोई
जीवन दान जो दे गया है उसे

आत्महत्या 

व्यथित होती हूँ
जब पढ़ती हूँ
समाज में व्याप्त व्यभिचार
तनाव, बेचैनी, हताशा
भाग दौड में जीवन हारते लोग
हर रोज कितनी ही आत्महत्याएं
पुलिस, तहकीकात, शोक सभाएं
मेरे घर में भी हुईं
कल कुछ आत्महत्याएं
हैरान हूँ, शोकाकुल हूँ
असमंजस में हूँ
बन जाती हूँ
कभी पुलिस,
कभी फोरेंसिक एक्सपर्ट,
कभी फोटोग्राफर
देखती हूँ हर कोने से
उठाती हूँ खून के नमूने
सहेजती हूँ बिखरे अवशेषों को
नहीं जानती कोई कारण इसका
मेरी बेरुखीअनदेखी
या व्यस्तता
पर हां ये सच है
मेरे दिल में रची बसी
मेरी करीबी कुछ किताबों ने
मेरी ही अलमारी की
तीसरी मंजिल से कूद कर
आत्म हत्या कर ली

मसीहा

किसी की मनःस्थिति,
सुकोमल भावनाएं,
मर्यादा, सीमा,
लक्ष्मण रेखा लांघना
न सोचते हैं, न देखते हैं
ये शील हरने वाले
जानते और सोचते हैं तो बस
सीमा रेखा लांघना,
कुचलना, रौंदना और दर्द देना
कल ही की तो बात है
जमाने के बाद
कई लेप लगाए थे
भरपूर श्रृंगार किया था
मेरे घर से हो कर गुजरने वाली सड़क ने
नज़र न लग जाये किसी की
सो आनन फानन में
ओढ़ ली डामर की काली चमकीली ओढ़नी
फिर क्या था
बिना रुके, अटके, बडबडाये,
शरू हो गयी वाहनों की दौड़ और होड़
उस पल वो
सकुचाई, शर्माई, इतराई, लजाई
अपनी किस्मत पर
अगले ही दिन
डाल दिया जल निगम वालों ने अपना डेरा
तार तार कर दी
नई काली चमकदार डामर की ओढ़नी
छिन्न भिन्न कर डाले अंग
टुकड़ा टुकड़ा देह और बस एक टीला भर
धूल माटी में चेहरा छुपाए
सबकी नज़र बचाए
दुबक गयी बेचारी सडक
क्या हमारी ही तरह वो भी
प्रतीक्षा कर रही है
किसी मसीहे का
कभी तो होगा कोई
जो बचा लेगा
उसकी ओढ़नी तार तार होने से

तन्हाई 

कभी फुर्सत में देखती हूँ
अपने घर से
पीछे वाले घर की
एक विधवा दीवार
तनहा
अधमरा पलस्तर
दरकिनार हो चुका उससे
शांत, उदास, मायूस
अपने साथ जुड़े घर की तरह
मिलने जुलने वालों में,
दुख बाँटने वालों में
बची है तो बस
एक हवा और धूप
देखती हूँ
अचानक बरसात के बाद
घर का तो पता नहीं
पर दीवार बहुत खुश है
नए मेहमान जो आये हैं
कुछ नन्ही पीपल की कोपलें,
नन्ही मखमली काई
और फिर
उनसे मिलने वाले नए आगंतुक
तितली, चींटीं, कीड़े, मकोड़े,
कुछ उनके अतिथि
गौरय्या, कबूतर
और न जाने कौन कौन
खूब चहल पहल है
घर का तो पता नहीं
पर हाँ! दीवार बहुत खुश है
सोचती हूँ
पर कितने दिन

सम-विषम

जब भी छा जाता है
जीवन में अन्धकार
शून्य सी हो जाती हूँ
मिटाने को अकेलापन
लगाती हूँ
हम प्याले, हम निवाले,
हम साये, हम शक्ल से
कुछ अंक,
शून्य से पहले
और हमेशा ही घटती
और विभजित होती हूँ
सम संख्याओं की तरह
कुछ इस तरह की
कुछ भी बचा नहीं पाती अपने लिए
मात्र एक शून्य के
विषमताओं से सीखा है
शून्य से परे कुछ अंक लगाना
घटती और विभाजित तो होती हूँ आज भी
इसके बाद भी बचा ही लेती हूँ अक्सर
कुछ अंक अपनी मुट्ठी में
विषम संख्याओं की तरह
निकलने लगी हूँ अब
सम संख्याओं के जाल से
पहचान जो लेती हूँ
अनेकों सम में छुपे कुछ विषम चेहरे
यूँ बच जाती हूँ
कई बार शून्य होने से
शून्य से अंकों तक
और अंको से शून्य तक
जी लेती हूँ एक सम्पूर्ण जीवन

वियोग

काया पूरी सिहर उठी,
हुई उष्ण रश्मि बरसात
अघात वर्धिनी बातों ने,
था तोड़ा उर का द्वार
सांसें सिमट गयीं सिसकी में,
आया ऐसा ज्वार
हुआ रोम रोम मूर्छित,
धमनी में वेदना संचार
पलक संपुटों में उलझे बिंदु,
गिर गिर लेने लगे शून्य आकार
मैं खोल व्यथा की गांठ उजवती,
बिछोह का रो रो त्योहार
वो जाने कैसा पल था,
जब बही वियोग बयार

आगोश

रात के आगोश से सवेरा निकल गया,
समंदर को छोड़ कर किनारा निकल गया

रेत की सेज पे चांदनी रोया करी,
छोड़ कर दरिया उसे, बेसहारा निकल गया

सोई रही जमी, आसमाँ सोया रहा,
चाँद तारों का सारा नज़ारा निकल गया

ठूंठ पर यूँ ही धूप ठिठकी सुलगती रही,
साया किसी का थका हारा निकल गया

गूंगे दर की मेरे सांकल बजा के रात,
कुदरत का कोई इशारा निकल गया

घुलती रही मिसरी कानों में सारी रात,
हुई सुबह तो वो आवारा बंजारा निकल गया

बाँहों में उसकी आऊँ, पिघल जाऊँ,
ख्वाब ये मेरा कंवारा निकल गया

मेरी तस्वीर पे अपने लब रख कर,
मेरे इश्क का वो मारा निकल गया

गिद्ध

आज कल एक अजीब सी बीमारी से ग्रसित हूँ
जिधर देखो गिद्ध ही नज़र आते हैं
सुना था मृत शरीर को नोचते हैं ये
पर
ये तो जीवित को ही
कभी मृत समझ बैठते हैं
कभी मृतप्राय बना देते हैं
नोचते हैं देह
गिद्धों की प्रजाति के
हर आकार प्रकार को साकार करते
कुछ बीमार से लगते हैं
पाचन तंत्र अपने चरम पर है पर
भोजन नलिका का मुंह संकरा हो चला है
छोटी से छोटी फाइल अटक जाती है
इलाज के लिए
खाते हैं वो कुछ रंग बिरंगी
आयुर्वेदिक लाल, हरी, नीली, पीली पत्तियां,
और फिर जी उठते हैं
पर्यावरणविद् कहते हैं
लुप्त हो रहे हैं गिद्ध
आज एक बार फिर
न्यूटन ने अपने आप को सत्यापित किया है
उर्जा का ह्रास नहीं होता,
वो एक से दूसरे में परिवर्तित होती है
पेड़ पर गिद्ध भले ही लुप्त हो रहे हों,
पर उनकी उर्जा,
धरती के गिद्धों को
लगातार स्थानांतरित हो रही है

मेरा शहर

मेरे शहर को सुरक्षित,
चाक चौबंद रखने को
गली, चौराहों, मॉल, सडकों,
रेलवे स्टेशन, एअर पोर्ट,
हर जगह लगे हैं,
सी सी टी वी कैमरे
अचानक
जब कभी घटती है,
कोई घटना या दुर्घटना
खंगाले जाते है ये सभी
उनमें से अधिकांश,
नहीं उतर पाते खरे
अपनी ही कसौटी पर
और
ठगे जाते हैं हम
मेरे शहर में और भी,
कई जगहों पर हैं
ऐसे ही कैमरे,
चेंजिंग रूम, बाथ रूम
गर्ल्स होस्टल, होटल रूम
यहाँ तक कि
घर के बेड रूम
ये अपनी कसौटी पर
उतरते हैं खरे
वो भी शत प्रतिशत
यहाँ भी एक बार
फिर ठगे जाते हैं हम

आरम्भ 

सुना है
सदियों, सदियों, सदियों पहले
धरा पर कुछ था
तो था
विस्फोट, आग, धुआँ
तपिश और जलन
कहते हैं
शायद वही आरंभ था
जीवन का
आज भी
धरा पर कुछ है तो
विस्फोट, आग, धुआँ,
तपिश और जलन
कहीं ये फिर आरम्भ तो नहीं
किसी अंत का?

बाज़ार

आज इतवार की सुबह
जाग उठी हूँ
रेहड़ी वालों के अजीब शोर से
सालों से अदृश्य आत्माहीन शरीर
आज अचानक दृश्यमान हुए हैं
अलग तरह की रेहडियां
अलग सामान
कहीं समाजवाद,कहीं लोकतंत्र
कहीं धर्मनिरपेक्षता, कहीं केवल धर्म
बदले बदले स्वर
कहाँ जाऊँ, क्या लाऊँ?
जहाँ सब सस्ता है?
या जहाँ सब अच्छा है
जहाँ गुणवत्ता है
या जहाँ महत्ता है
या जहाँ मिले पाँच साल की गारंटी व वारंटी
पर यहाँ तो ये ही खुद असमंजस में है
ये ही नहीं जानते
कब हाथ मसल दिया जायेगा
कब कमल कुम्हला जायेगा
कब हाथी हताश हो हांफता बैठ जायेगा
या फिर
कब ये सुकोमल हाथ
अपनेपन से, दुलार से
तोड़ेगा कमल
संजोयेगा हाथी की सूंढ में इसे प्यार से
और अर्पित करेगा
माँ लक्ष्मी के चरणों में
कौन जाने

 

 

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