रज़मी सिद्दीक़ी की रचनाएँ

ज़रा सी मश्क़ करे बे-ज़मीर बन जाए 

ज़रा सी मश्क़ करे बे-ज़मीर बन जाए
तो क्या अजब है कि इंसाँ वज़ीर बन जाए

जो काम-चोर हो बच्चे किराए पर ले ले
उन्हें सदाएँ सिखा ले फ़क़ीर बन जाए

जवान-ए-रिंद जो हो रोज़गार से महरूम
मुरीद मजमा करे और पीर बन जाए

कुछ इश्तिहार हों कुछ पगड़ियाँ उछालने को
ये ख़ाकसार भी फिर तो मुदीर बन जाए

वो बद-गुमाँ हैं विलायत की लड़कियों से बहुत
है डर उन्हें कि न शौहर सफ़ीर बन जाए

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