रतन पंडोरवी की रचनाएँ

अक़्ल वाले क्या समझ सकते हैं दीवाने की बात 

अक़्ल वाले क्या समझ सकते हैं दीवाने की बात
अहले-गुलशन को कहां मालूम वीराने की बात।

इस क़दर दिलकश कहां होती है फर्जाने की बात
बात में करती है पैदा बात दीवाने की बात।

बात जब तय हो चुकी तो बात का मतलब ही क्या
बात में फिर बात करना है मुकर जाने की बात।

इसका ये मतलब क़ियामत अब दुबारा आएगी
कह गए हैं बातों-बातों में वो फिर आने की बात।

बात पहले ही न बन पाये तो वो बात और है
सख़्त हसरत नाक है बन कर बिगड़ जाने की बात।

दास्ताने-इश्क़ सुन कर हम पे ये उक़्दा खुला
दर हक़ीक़त इश्क़ है बे-मौत मर जाने की बात।

अब्र छाया है चमन है और साक़ी भी करीम
ऐसे आलम में न क्यों बन जाये पैमाने की बात।

इसमें भी कुछ बात है वो बात तक करते नहीं
सुन के लोगों की ज़बानी मेरे मर जाने की बात।

बात का ये हुस्न है दिल में उतर जाये ‘रतन’
क्यों सुनाता है हमें दिल से उतर जाने की बात।

क्या तिरी दरिया दिली है ऐ-खुदा मेरे लिये 

क्या तिरी दरिया दिली है ऐ-खुदा मेरे लिये
हर क़यामत हर मुसीबत हर बला मेरे लिये।

हर जफ़ा हर जौर हर सख़्ती रवा है आप को
हर शिकायत हर गिला है ना-रवा मेरे लिये।

तेग़े-अबरू, तेग़े-चीं, तेग़े-नज़र, तेग़े-अदा
कितनी तलवारों का पहरा रख दिया मेरे लिये।

मुझको तेरे वास्ते बे-मौत मर जाना पड़ा
तू न लेकिन भूल कर भी जी सका मेरे लिये।

क्यों न मेरी बे-कसी पर रो उठे ख़ुद बे-कसी
हो गया हर आस

आस्तां से कम नहीं हर नक़्शे-पा मेरे लिये।

ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई

ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई
ग़म में राहत का भी पहलू नज़र आए कोई।

सामने उस के दिल ओ जान ओ जिगर मैं रख दूँ
हाँ मगर हाथ में ख़ंजर तो उठाए कोई।

अपने ही घर में मिला ढूँड रहे थे जिस को
उस के पाने के लिए ख़ुद ही को पाए कोई।

आ गई काली घटा झूम के मय-ख़ाने पर
तौबा कहती है कि मुझ को भी पिलाए कोई।

जब नज़र आता है वो जान-ए-तमन्ना दिल में
किस तमन्ना को लिए तूर पे जाए कोई।

ज़िंदगी क्या है फ़क़त मौत का जाम-ए-रंगीं
हस्त होना है तो हस्ती को मिटाए कोई।

हुस्न है महज़ जफ़ा इश्क़ है तस्वीर-ए-वफ़ा
रब्त का कुछ तो सबब मुझ को बताए कोई।

जज़्बा-ए-शौक़ उसे खींच के लाएगा यहाँ
आ नहीं सकता तो सौ बार न आए कोई।

दिल में यूँ पर्दा-नशीं रहने से हासिल क्या है
लुत्फ़ तो जब है ‘रतन’ सामने आए कोई।

जुदा वो होते तो हम उन की जुस्तुजू करते

जुदा वो होते तो हम उन की जुस्तुजू करते
अलग नहीं हैं तो फिर किस की आरज़ू करते।

मिला न हम को कभी अर्ज़-ए-हाल का मौक़ा
ज़बाँ न चलती तो आँखों से गुफ़्तुगू करते।

अगर ये जानते हम भी उन्हीं की सूरत हैं
कमाल-ए-शौक़ से अपनी ही जुस्तुजू करते।

जो ख़ाक चाक-ए-जिगर है तो पुर्ज़े पुर्ज़े दिल
जुनूँ के होश में किस किस को हम रफ़ू करते।

दिल-ए-हज़ीं के मकीं तू अगर सदा देता
तिरी तलाश कभी हम न कू-ब-कू करते।

कमाल-ए-जोश-ए-तलब का यही तक़ाज़ा है

हमें वो ढूँडते हम उन की जुस्तुजू करते।

नमाज़-ए-इश्क़ तुम्हारी क़ुबूल हो जाती
अगर शराब से तुम ऐ ‘रतन’ वज़ू करते।

पहुँचे न जो मुराद को वो मुद्दआ हूँ मैं

पहुँचे न जो मुराद को वो मुद्दआ हूँ मैं
नाकामियों की राह में ख़ुद खो गया हूँ मैं।

कहते हैं जिस को हुस्न उसी का है नाम इश्क़
देखो मुझे ब-ग़ौर कि शान-ए-ख़ुदा हूँ मैं।

पर्दा उठा कि होश की दुनिया बदल गई
हैरान हूँ कि सामने क्या देखता हूँ मैं।

पैवंद ख़ाक हो के मिलें सर-बुलंदियाँ
दश्त-ए-जुनूँ में बन के बगूला उड़ा हूँ मैं।

वाइज़ के पंद-ओ-व’अज़ का इतना असर तो है
जो कुछ भी आज उस ने कहा पी गया हूँ मैं।

समझे मिरी हक़ीक़त-ए-हस्ती कोई ‘रतन’
ऐन-ए-फ़ना की शक्ल में ऐन-ए-बक़ा हूँ मैं।

मौजों ने हाथ दे के उभारा कभी कभी

मौजों ने हाथ दे के उभारा कभी कभी
पाया है डूब कर भी किनारा कभी कभी।

करती है तेग़-ए-यार इशारा कभी कभी
होता है इम्तिहान हमारा कभी कभी।

चमका है इश्क़ का भी सितारा कभी कभी
माँगा है हुस्न ने भी सहारा कभी कभी।

तालिब की शक्ल में मिली मतलूब की झलक
देखा है हम ने ये भी नज़ारा कभी कभी।

शोख़ी है हुस्न की ये है जज़्ब-ए-वफ़ा का सेहर
उस ने हमें सलाम गुज़ारा कभी कभी।

फ़रियाद-ए-ग़म रवा नहीं दस्तूर-ए-इश्क़ में
फिर भी लिया है उस का सहारा कभी कभी।

मुश्किल में दे सका न सहारा कोई ‘रतन’
हाँ दर्द ने दिया है सहारा कभी कभी।

लुत्फ़ ख़ुदी यही है कि शान-ए-बक़ा रहूँ

लुत्फ़ ख़ुदी यही है कि शान-ए-बक़ा रहूँ
इंसान के लिबास में बन कर ख़ुदा रहूँ।

जब मुझ को मेरे सामने आने से आर है
किस हौसले पे तुझ को ख़ुदा मानता रहूँ।

पर्दे में इक झलक सी दिखाने से फ़ायदा
जल्वे को आम कर कि तुझे देखता रहूँ।

इक तू कि मेरे दिल ही में छुप कर पड़ा रहे
इक मैं कि हर चिहार तरफ़ ढूँढता रहूँ।

तू ही बता कि ये कोई इंसाफ़ तो नहीं
तेरा ही जुज़्व होने पे तुझ से जुदा रहूँ।

भेजा है ऐ ख़ुदा मुझे क्या तू ने इस लिए
हर वक़्त ज़िंदगी में रहीन-ए-बला रहूँ।

हर गाम मुझ को काबा ही मक़्सूद है रतन
आया है वो मक़ाम कि हर दम झुका रहूँ।

ग़म की बस्ती अजीब बस्ती है 

ग़म की बस्ती अजीब बस्ती है
मौत महँगी है जान सस्ती है

मैं उसे क्यूँ इधर-उधर ढूँडूँ
मेरी हस्ती ही उस की हस्ती है

आलम-ए-शौक़ है अजब आलम
आसमाँ पर ज़मीन बस्ती है

जान दे कर जो ज़िंदगी पाई
मैं समझता हूँ फिर भी सस्ती है

ग़म है खाने को अश्क पीने को
इश्क़ में क्या फ़राग़-ए-दस्ती है

ख़ाक-सारी की शान क्या कहिए
किस क़दर औज पर ये पस्ती है

चाक-ए-दामान ज़िंदगी है ‘रतन’
ये जुनूँ की दराज़-दस्ती है।

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