रम्ज़ आफ़ाक़ी की रचनाएँ

घर है तिरा तू शौक़ से आने के लिए आ

घर है तिरा तू शौक़ से आने के लिए आ
लेकिन मैं ये चाहूँगा न जाने के लिए आ

ये रूख़ भी मोहब्बत का दिखाने के लिए आ
आ मुझ से नज़र फेर के जाने के लिए आ

मुद्दत से हूँ मैं तेरी मुलाक़ात का तालिब
आ मुझ पे कोई ज़ुल्म ही ढाने के लिए आ

पैमानों से पीते हैं पियें रिंद-ए-ख़राबात
तू मुझ को निगाहों से पिलाने के लिए आ

अर्बाब-ए-ख़िरद को है बड़ा नाज़ ख़िरद पर
तू उन को भी दीवाना बनाने के लिए आ

क्या मैं तिरे इस लुत्फ़ के क़ाबिल भी नहीं हूँ
ऐ जान-ए-वफ़ा दिल ही दुखाने के लिए आ

बर्दाश्त इसे इश्क़ की ग़ैरत न करेगी
क्यूँ तुझ से कहूँ मैं कि ज़माने के लिए आ

इश्क़ की ऐसी शान तो होगी

इश्क़ की ऐसी शान तो होगी
इस से तिरी पहचान तो होगी

गाँव की लड़की का क्या कहना
कुछ नहीं वो इंसान तो होगी

उस के नगर में दिल के लिए कुछ
सूरत-ए-इत्मीनान तो होगी

कुछ भी कह लो दिल की ख़लिश को
ज़ीस्त का ये उनवान तो होगी

दार-ओ-रसन के अफ़्सानों में
कैफ़ न होगा जान तो होगी

ज़ेर-ए-लब वो मौज-ए-तबस्सुम
मेरे लिए तूफ़ान तो होगी

हँसती हुई वो चश्म-ए-सुख़न-गो
अहल-ए-दिल की जान तो होगी

‘रम्ज़’ वो काफ़िर ज़ुल्फ़-ए-मुअŸार
दिल का मिरे ईमान तो होगी

जब उन के पा-ए-नाज़ की ठोकर में आएगा 

जब उन के पा-ए-नाज़ की ठोकर में आएगा
कितना ग़ुरूर राह के पत्थर में आएगा

सौदा-ए-इश्क़ कहते हैं अहल-ए-ख़िरद जिसे
क्या जाने कब ये वस्फ़ मिरे सर में आएगा

ऐसी जगह मकान बनाना न था मुझे
जंगल तमाम उड़ के मिरे घर में आएगा

मुझ से निकल के जाएगा क़ातिल मिरा कहाँ
इक दिन तो मेरे सामने महशर में आएगा

हम ख़ुद ही क्यूँ न कर लें सितम जान-ए-ज़ार पर
क्या उस से फ़र्क़ शान-ए-सितमगर में आएगा

सारे ही आब-ओ-गिल के सफ़र मैं ने कर लिए
अब आसमान भी मिरी ठोकर में आएगा

मौसूम है जो ज़हर-ए-हलाहल के नाम से
अब वो मिरे नसीब के साग़र में आएगा

ये क्या ख़बर थी ‘रम्ज़’ की आज़ाद होने पर
सैलाब-ए-ख़ूँ उमड़ के हर इक घर में आएगा

झिलमिलाते हुए आँसू भी अजब होते हैं

झिलमिलाते हुए आँसू भी अजब होते हैं
शाम-ए-फ़ुर्क़त के ये जुगनू भी अजब होते हैं

ये अदा हुस्न की हम क्यूँ नज़र अंदाज़ करें
उस के बिखरे हुए गेसू भी अजब होते हैं

क़त्ल हो कोई तो काँप उठती है सारी दुनिया
दर्द-ए-इंसाँ के ये पहलू भी अजब होते हैं

किस को गीत अपने सुनाते हैं वहाँ क्या कहिए
नग़्मा-ख़्वानान-ए-लब-ए-जू भी अजब होते हैं

इस ख़राबी से तो मामूर है सारा आलम
ये फ़ासादात-ए-मन-ओ-तू भी अजब होते हैं

भाइयों के सितम-ओ-जौर को क्या तुम से कहूँ
‘रम्ज़’ ये क़ुव्वत-ए-बाज़ू भी अजब होते हैं

तुम्हारा क़ुर्ब वजह-ए-इजि़्तराब-ए-दिल न बन जाए 

तुम्हारा क़ुर्ब वजह-ए-इजि़्तराब-ए-दिल न बन जाए
ये मुश्किल सहल हो कर फिर कहीं मुश्किल न बन जाए

अरे ओ तिश्ना-लब ये प्यास ये अंदाज़ पीने का
समुंदर घटते घटते दूर तक साहिल न बन जाए

ये मश्कूक आदमल लूटे हैं जिस ने कारवाँ बरसों
दुआ माँगूँ कहीं ये रहबर-ए-मंज़िल न बन जाए

चला तो हूँ तिरा बख़्शा हुआ ज़ौक़-ए-तलब ले कर
ख़याल इस का रहे ये सई-ए-ला-हासिल न बन जाए

जिसे मेरी मोहब्बत ने सरापा लुत्फ़ समझा है
किसी रूख़ से वहीं इंसाँ मिरा क़ातिल न बन जाए

नज़र अपनी रहे उस वक़्त तक मम्नून-ए-नज़्ज़ारा
दिल-ए-जल्वा-तलब जब तक मह-ए-कामिल न बन जाए

किसी को ‘रम्ज़’ मज़लूमी के इस एहसास ने मारा
वो अपनों की नज़र में रहम के क़ाबिल न बन जाए

वो जो भी बख़्शें वो इनआम ले लिया जाए 

वो जो भी बख़्शें वो इनआम ले लिया जाए
मलाल ही दिल-ए-नाकाम ले लिया जाए

बड़ा मज़ा हमें इस बंदगी में हासिल हो
जो सुब्ह ओ शाम तिरा नाम ले लिया जाए

रहे न ताएर-ए-सिदरा भी अपनी ज़द से दूर
उसे भी आओ तह-ए-दाम ले लिया जाए

हमारी जान से ग़म ने लिए हज़ारों काम
हमारी ख़ाकक से भी काम ले लिया जाए

मुरव्वतों से अदावत बदल तो सकती है
अगर ख़ुलूस से कुछ काम ले लिया जाए

ये चश्म-ए-मस्त तिरी साक़ी-ए-हयात़-अफ़रोज़
ये तुझ से क्यूँ न तिरा जाम ले लिया जाए

बड़ा कमाल हम इस बात में समझते हैं
बख़ील लोगों से इनआम ले लिया जाए

सज़ा से पहले ये हाकिम को चाहिए ऐ ‘रम्ज़’
बयान-ए-मौरीद-ए-इलज़ाम ले लिया जाए

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