रविकांत अनमोल की रचनाएँ

किसी की सोच है बेटे को सिंहासन दिलाना है

उसे मस्जिद बनानी है इसे मंदिर बनाना है
मुझे बस एक चिंता,कैसे अपना घर चलाना है

सियासी लोग सब चालाकियों में हैं बहुत माहिर
इन्हें मालूम है कब शाहर में दंगा कराना है

किसी का ख़ाब है मां-बाप को कुछ काम मिल जाए
किसी की सोच है बेटे को सिंहासन दिलाना है

भले अल्लाह वालों का हो झगड़ा राम वालों से
मगर पंडित का मौलाना का यारो इक घराना है

लड़ाई धर्म पर हो, जात पर हो या कि भाषा पर
लड़ाई हो! सियासत का तो बस अब ये निशाना है

कोई ऐसा भी साल दे मौला 

कोई ताज़ा ख़्याल दे मौला
दिल से ग़फ़्लत निकाल दे मौला

हर तरफ़ अम्न हो महब्बत हो
कोई ऐसा भी साल दे मौला

शुक्र दे सब्र दे सदाकत दे
चाहे रंजो-मलाल दे मौला

अम्न का रास्ता दिखे सब को
हाथ में वो मशाल दे मौला

उसका चेहरा नज़र में दे हर पल
हिज्र दे या विसाल दे मौला

सारी दुनिया मुझे लगे अपनी
ऐसे सांचे में ढाल दे मौला

चलें हम साथ मिल कर हाल अपना एक जैसा है

लुटे तुम मौलवी से तो हमें पंडित ने लूटा है
चलें हम साथ मिल कर हाल अपना एक जैसा है

मुहम्मद कृष्ण या जीसस कहां लड़वाते हैं हम को
सभी चरवाहे हैं, पूछो तो किस का किस से झगड़ा है

अज़ल ही से रहे हैं आदमी के सिर्फ़ दो मजहब
जिसे लूटा गया है और इक वो जिस ने लूटा है

ये जन्नत किस तरफ़ है मौलवी से पूछ कर देखो
ये बातें स्वर्ग की बस पादरी, पंडित का धोका है

‘अनमोल’ अपने आप से कब तक लड़ा करें

‘अनमोल’ अपने आप से कब तक लड़ा करें
जो हो सके तो अपने भी हक़ में दुआ करें

हम से ख़ता हुई है कि इंसान हैं हम भी
नाराज़ अपने आप से कब तक रहा करें

अपने हज़ार चेहरे हैं, सारे हैं दिलनशीं
किसके वफ़ा निभाएं हम किससे जफ़ा करें

नंबर मिलाया फ़ोन पर दीदार कर लिया
मिलना सहल हुआ है तो अक्सर मिला करें

तेरे सिवा तो अपना कोई हमज़ुबां नहीं
तेरे सिवा करें भी तो किस से ग़िला करें

दी है कसम उदास न रहने की तो बता
जब तू न हो तो कैसे हम ये मोजिज़ा करें

जिसकी तूती बोल रही है 

बाग़ में कोयल बोल रही है
भेद किसी का खोल रही है

मेरे देस की मिट्टी है जो
रंग फ़ज़ा में घोल रही है

जीवन की नन्ही सी चिड़िया
उड़ने को पर तोल्र रही है

कोई मीठी बात अभी तक
कानों में रस घोल रही है

मोल नहीं कुछ उस दौलत का
जो कल तक अनमोल रही है

बाहर उसकी गूँज ज़ियादा
जिसके अंदर पोल रही है

देखें क्या होता है आगे
अब तक धरती गोल रही है

तू भी उसके पीछे हो ले
जिसकी तूती बोल रही है

मर जाते हैं कुछ बेचारे क्या कीजे

उनसे मिलते हैं ग़म सारे क्या कीजे
फिर भी वो लगते हैं प्यारे क्या कीजे

सर ढकने को छत मिलती तो अच्छा था
किस्मत में हैं चंद सितारे क्या कीजे

टूटे सपने अंधी आँखों में लेकर
मर जाते हैं कुछ बेचारे क्या कीजे

जिन लोगों ने दुनिया की ख़ातिर सोचा
वो फिरते हैं मारे मारे क्या कीजे

या तो वो बहरे हैं जिनको सुनना था
या गूँगे हैं गीत हमारे क्या कीजे

शायर की आँखों में आग न पानी है
प्यासे हैं हम नदी किनारे क्या कीजे

ग़ैरों ने हर बार हमारा साथ दिया
जब हारे अपनों से हारे क्या कीजे

तुम्हीं पैरों का बंधन हो गए हो

किसी राधा के मोहन हो गए हो
किसी के दिल की धड़कन हो गए हो

मिरा आंगन महक उठ्ठा है तुमसे
मिरे आंगन का चंदन हो गए हो

हमें कल तक दिलो-जां मानते थे
हमारी जां के दुश्मन हो गए हो

तुम्हीं में बस गए हैं सारे अरमां
हमारे मन का आंगन हो गए हो

तुम्हें बनना था चलने की तमन्ना
तुम्हीं पैरों का बंधन हो गए हो

हमारी इब्तिदा क्या देखते हो इंतिहा पूछो

महब्बत का सिला पूछो, न दुनिया की हवा पूछो
वही बातें पुरानी पूछते हो कुछ नया पूछो

तरक्की के म’आनी जानने की हो अगर चाहत
तो जिसने जांफ़िशानी की है, उसको क्या मिला पूछो

हमारा हौसला देखो, न पूछो पैर के छाले
हमारी इब्तिदा क्या देखते हो इंतिहा पूछो

जलाओ घर कोई इस आग से या प्यार के दीपक
मगर ये क्या कि जलती आग से उसकी रज़ा पूछो

क्या जगह है? मुझको ले आए कहां ?

दो घड़ी इस दिल को बहलाए कहां
आदमी जाए तो अब जाए कहां

सरह्दें ही सरहदें हैं हर तरफ़
क्या जगह है? मुझको ले आए कहां?

झड़ गए पत्ते तो शाख़ें कट गई
अब दरख़्तों में हैं वो साए कहां

आम का वो पेड़ कब का कट चुका
कोयल अब गाए भी तो गाए कहां

खेल कर होली हमारे ख़ून से
पल में खो जाते हैं वो साए कहां

जिनमें कुछ इनसानियत हो, प्यार हो
अब मिलेंगे ऐसे हमसाए कहां
(हमसाए=पड़ोसी)

जिनको गाने के लिए आए थे हम
हमने अब तक गीत वो गाए कहां

 

 

 

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