रविशंकर पाण्डेय की रचनाएँ

जाड़े का सूरज 

जाड़े का सूरज
कोहरे से झाँक रहा
बटन मिर्जई में ज्यों कोई
बूढ़ा टाँक रहा

सहमे-सहमे
पेड़ खड़े
हर टहनी काँपे है
एक धुँध की चादर मैली
सबको ढाँपे है
लम्बे डग भरता दिन, घर का
रस्ता नाम रहा

कथरी ओढ़े
सुबह देर तक
खुद ही सोई है
पश्मीने की शाल
धूप की खोई खोई है
सवा सेर आलस जाँगर बस
एक छँटाँक रहा

सर्द हवा में
हमें निकलना
रोजी-रोटी को
लानत सौ-सौ बार मुई इस
क़िस्मत खोटी को
मज़दूरों से मौसम का यह
खूब मज़ाक रहा

जेठ आया

जेठ आया
सिमट कर सकुचा गयी
फिर गाँव की लहुरी नदी!

बिदा लेती धूप
टमलतासों के सुरों पर
यमन का बजना
दिन ढले अमराइयों में
थके चिट्ठी रसों के
घर गाँव का बसना,
गर्मियों के दिन
ज्यों तुम्हारे बिन
रेत का विस्तार ओढ़े
जी रहे पूरी सदी!

शाम होते
एक पनघट भाभियों के
घूँघटों की ओट
टिकुली का कसकना,
रात धिरते ही
प्रवासी स्वप्न में
गीत गोविन्दम
तुम्हारी देह का बसना,
भूल कुछ ऐसी कि
जब भी शाम गुजरी
खुली सुधियों की तुम्हारी कौमुदी

चँाद उगते
एक अँजुरी नर्म चेहरा
ज्यों पिघलकर
धमनियों की नदी में धुलना,
रात की हर बात में महका किया
आदतन ही
एक बेणीबंध खुलना
चांदनी जब जब मुंडेर पर झरी,
गंघ डूबी बही बाहों की नदी!

खेल फरूक्खाबादी है

खेल फरूक्खाबादी है

निहुरे-निहुरे क्या
खड़े-खड़े
अब होती चोरी ऊंटों की !

शाहों से कहें
जागने को
चोरों से कहते चोरी को,
पकड़े जाने पर
ऊपर से
आमादा सीनाजोरी कोय

सच्चाई की
निगरानी में
चौकस है सेना झूठों की!

सबके होते हैं
भाव-ताव
चुप रहने और बोलने के,
जो दिनभर
मूंदे आंख रहें
सिक्कों से उन्हें तोलने केय

बस मुलुर-मुलुर
ताका करती है
फौज खड़ी रंगरूटों की!

गांधीवादी हैं
कहने को
सर से पांवों तक खादी है,
लेकिन बेखटके
खुला खेल
हो रहा फरूक्खाबादीय

वो न्यारे हो जो जाते हैं
अदला बदली में
खूंटो की!

भैंस गई फिर से पानी मे

भैंस गई फिर से पानी मे

दिल्ली की
बातें कहता हूं
गांवों की बोली बानी में
भैंस गई
फिर से पानी में!

हम भी हैं
कितने सैराठी,
थामे रहे
हाथ में लाठी

फिर भी
रोक न पाए उसको
क्या कर बैठे
नादानी में!

लाठी में अब
नहीं तंत है,
जनता तो
तोता रटंत हैय

मन करता है
बाल नोंच लें
खुद अपने ही
हैरानी में!

कहत कबीर
सुनो भाई साधो,
सब के सब
माटी के माधोय

बेच रहे ईमान धरम सब
महज एक
कौड़ी कानी में!

समय का सच

समय का सच

निथरे थिर
पानी में दिखता
साफ समय का सच!

क्या बतलाएं स्वाद
कि कैसे
ये दिन बीते हैं,
मीठे कम
खट्टे ज्यादा
या एकदम तीते हैंय

मुंह में
भरी हुई हो जैसे
तीखी लाल मिरच!

बेलगाम, बिगड़ैल
समय का
अश्वारोही है,
चोर उचक्कों के
चंगुल में
फंसा बटोही हैय

इनकी टेढ़ी चालों से
क्या कोई पाया बच!

हम सब की
रोटी पर रहती
उनकी आंख गड़ी,
जिनके पेट बड़े हैं
उनकी
होती भूख बड़ीय

पाचनमंत्र बांचते ही
ज्यों सब कुछ जाता पच!

कितना निर्मम
कितना निष्ठुर
समय कसाई है,
छल प्रपंच से
मार रहा
भाई को भाई हैय

मांगा दानवीर से
छल कर
कुंडल और कवच!

देश ठगा दिखता है

देश ठगा दिखता है

हर आनेवाला
आते ही
अपना बहुत सगा दिखता है,
हर जानेवाला
जाते ही
धोखा और दगा दिखता है!

सुबह शाम
आकर देता है
आश्वासन की मीठी गोली
इनकी इन
टेढ़ी चालों को
समझ न पाई
जनता भोलीय

सच पूछो तो
मुझे शख्स वह
एक सियार रंगा दिखता है!

रंग बदलता
रूप बदलता
आए दिन वह रोल बदलता,
नारे बदल-बदल कर उनके
बोल बदलता ढोल बदलताय

उसके मुंह पर
एक मुखौटा
नकली मुझे लगा दिखता है!

आयाराम न बतलाए तो
कोई गयाराम से पूछे,
सब के सब क्यों
देते आए
आश्वासन छूछे के छूछेय

इनकी करतूतों से मुझको
सारा देश ठगा दिखता है!

कड़वी सच्चाई

कड़वी सच्चाई

नहीं फूटते
कुशल क्षेम के
अब अपनों से
आखर ढाई!

चला कहाँ से
और कहाँ पर
आ पहुँचा है आज जमाना,
अब तो प्रायः
खुद से खुद का
पड़े पूँछना पता ठिकानाय
कभी अपरचित
लगने लगती
अपनी ही ड्योढ़ी अँगनाई!

जेब गरम
होने पर होती
रिश्ते नातों में गरमाहट,
शायद यह
खुदगर्ज समय के
आने की
लगती है आहतय
हमने देखा
ऐन वक्त पर
साथ छोड़ देती परर्छाइं!

करने बैठें
यदि हम अपने
जीवनभर का लेखा जोखा,
गैरों से ज्यादा
अपनों से
खाया होगा हमने धोखाय
आपस के
मीठे रिश्तों की
अब यह है कड़वी सच्चाई!

छूट जाता है सिरा

छूट जाता है सिरा

जिंदगी का
ऊन सा उलझा हुआ
गोला गिरा,
अगर पकड़ो
यह सिरा तो
छूट जाता वह सिरा!

स्वप्न सब
साकार होने के लिए
हैं छटपटाते,
किन्तु मन की बात
आखिर हम
किसे कैसे बतातेय
डर लगा रहता
कहीं कोई
कहे न सिरफिरा!

बीतता दिन
हादसों सा
रात दहशत सी ढली,
है हमेशा
बनी रहती
तन बदन में खलबलीय
अगर
दुखती नब्ज पकड़ो
बदन उठता है पिरा!

एक अंधी दौड़ में
बस बीतते हैं
रात दिन,
जिन्दगी की यह पहेली
सुलझना-
कितना कठिनय
एक कंकड़
कर न दें कुछ
स्वाद मुँह का किरकिरा!

देवता रूठे हुए हैं

देवता रूठे हुए हैं

प्रार्थना में
कुछ कमी थी
देवता रूठे हुए हैं!

ताप के
ताये दिनों में
अनवरत तपते रहे हैं,
आपके ही नाम की
माला लिये
जपते रहे हैंय
क्या चढ़ाते
हम चढ़ावा
फूल फल जूठे हुए हैं!

कुण्डली
बाँची किसी ने
या किसी ने
हाथ देखा,
सभी का कहना
यही था
साफ दिखती भाग्य रेखा
फलित ज्योतिष के
सभी अनुमान
क्यों झूठे हुए हैं!

हाथ में-
दिनभर रहा है
फावड़ा या फिर कुदाली,
किन्तु क्यों
मुट्ठी हमारीय
जिन्दगी भर रही खालीय
क्या हुआ जो खून सींचे
बेंत भी ठूठे हुए हैं!

सहमी कचौड़ी पूड़ियाँ

सहमी कचौड़ी पूड़ियाँ

प्लेट पर
चल रहे चाकू
और काँटे छूरियाँ,
बढ़ गयी है
आज मुँह से
कौर की कुछ दूरियाँ!

बढ़ा जबसे चलन
खाने में
चुभोने काटने का,
खो गया जुमला
न जाने कहाँ
अँगुली चाटने काय
कौन पँूछे मौन
वैष्णव जनों की मजबूरियाँ!

सजा करते थे कभी
क्या खूब
दस्तरखाना अपने,
बैठकर थे जीमते
जीभर कभी
मेहमान अपनेय
आज चौके पर
जमें हैं
चाइना मंचूरिया!

अगर सोचो
बात यह है बड़ी
पर
दिख रही छोटी,
ढूँढ़ते रह जाओगे
कल थाल में
तुम दाल रोटीय
देख खस्ता हाल यह
सहमीं कचौड़ी पूड़ियाँ!

ढल रहा है दिन 

ढल रहा है दिन

पिघलते फौलाद जैसा
गल रहा है दिन,
ढल रहा है दिन!

गिर रहे
कतरे पिघल कर
ताल में,
आ न पाया
एक भी
क्यों जाल मेंय
हाथ
मछुआरा सरीखा
मल रहा है दिन!

दोपहर पर
हो गयी है
शाम तारी,
परिश्रम पर
कसैला
परिणाम भारीय
सभी मेहनतकशों को
कुछ
खल रहा है दिन!

लाल होकर
शाम होती
सुरमई है,
लगी चुभने
अकेलेपन की
सुई हैय
इस तरह से रोज
खुद को
छल रहा है दिन!

गले पड़ी दुविधायें हैं 

गले पड़ी दुविधायें हैं

अफवाहों की
धुंध घनी है
डूबी सभी दिशायें हैं,
धुआँ- धुआँ से
इस मौसम की
शातिर बहुत हवायें हैं!

स्याह सफेद
न समझ रहा है
क्या झूठा क्या सच्चा है,
ऊपर से दिखता-
सपाट जो
वही दे रहा गच्चा है य
कौन दाहिने बाँयें है!

चोला बदल रही
बदल रही दुनिया की पहचानें हैं,
गड्डमगड्ड
हो रहे चेहरे
सब जाने अनजाने हैंय
बदले-बदले
सर्वनाम सब
बदल गयीं संज्ञायें हैं!

नीम अँधेरे के
चंगुल में
कब से फँसा सबेरा है,
जिधर कहीं भी
नजर घुमाओ
दीपक तले अँधेरा हैय
आये थे-
संकल्प बोलने
गले पड़ी दुविधायें हैं!

लगा कहाँ कब रोग हमें

दुख के दिन

अन्त हीन-
ऊँचे, उजाड़ से,
दुख के दिन
फैले पहाड़ से!

बैठे ठाले
समय ऊँघता
दिन दिन भर बजते खर्राटे,
बियाबान में
रह-रह चुभते
तेज-
अकेलेपन के काँटेय
कौन सुन रहा
इस जंगल में
चीखो कितना
गला फाड़ के!

दोपहरी-
ठहरी ठहरी सी
सुबह उदासी
शाम उदासी,
पीढ़ी भर का
दर्द समेटे
रात ले रही ऊबासाँसी,
घुटन और
चुप्पी को तोड़ें
चुप्पी से तो
बेहतर ही है
आओ हम रोयें दहाड़ के!

जीवन की
अंधी सुरंग में
अवसादों के
बिछे पलीते,
एक एक पल
ऐसे बीते
जैसे सौ
मन्वंतर जीते,
दफ्तर के
ऊँचे परकोटे
परकोटे-
लगते तिहाड़ से!

 

 

Share