रश्मि प्रभा की रचनाएँ

दर्द को हम बाँट लेंगे !!!

तुम्हें क्या लगता है
मुझे शाखों से गिरने का डर है
तुम्हें ऐसा क्यूँ लगता है
कैसे लगता है
तुमने देखा न हो
पर जानते तो हो
मैं पतली टहनियों से भी फिसलकर निकलना
बखूबी जानती हूँ ….

डर किसे नहीं लगता
क्यूँ नहीं लगेगा
क्या तुम्हें नहीं लगता …
तुम्हें लगता है
मैं जानती हूँ !

संकरे रास्तों से निकलने में तुम्हें वक़्त लगा
मैं धड़कते दिल से निकल गई
बस इतना सोचा – जो होगा देखा जायेगा …
होना तय है , तो रुकना कैसा !

एक दो तीन … सात समंदर नहीं
सात खाइयों को जिसने पार किया हो
उसके अन्दर चाहत हो सकती है
असुरक्षा नहीं …
और चाहतें मंजिल की चाभी हुआ करती हैं !

स्त्रीत्व और पुरुषार्थ का फर्क है
वह रहेगा ही
वरना एक सहज डर तुम्हारे अन्दर भी है
मेरे अन्दर भी …
तुम्हारे पुरुषार्थ का मान यदि मैं रखती हूँ
तो मेरे स्त्रीत्व का मान तुम भी रखो
न तुम मेरा डर उछालो
न मैं ….
फिर हम सही सहयात्री होंगे
एक कांधा तुम होगे
एक मैं ….. दर्द को हम बाँट लेंगे !!!

सिर्फ पलायन है !!!

अपनों की परिभाषा
प्रश्न बन
विचारों की जननी होती है…

ये ‘अपने’ क्या होते हैं ?

जिनसे खून का रिश्ता होता है ?

रुको रुको
‘हाँ’ की मुहर लगाने से पहले
खुद को टटोलो
फिर कहो –

विचारों की जननी के यक्ष प्रश्न
खड़े हैं तुम्हारे आगे
या तो भीम की दशा पाओ
या युद्धिष्ठिर सा मान रखो ….

रक्त मोह और स्नेह संबंध में
हमेशा फर्क रहा है
खून के अपनेपन में यदि प्यार ना हो
तो संबंध कैसा !
उदाहरण सिर्फ इतिहास नहीं
तुम्हारा वर्तमान भी है –
फर्क ये है कि तुम उनको देखकर भी
आँखें मूंद लेते हो
पाप ( पाप ही है ) के भागीदार बनते हो

तुम्हें झकझोरने के लिए
इतिहास के पन्ने फड़फड़ाने पड़ते हैं ….
कृष्ण देवकी कृष्ण यशोदा
देवकी का दर्द अपनी जगह है
मान यशोदा का है ….
कृष्ण कंस – अन्याय के अंत का साक्ष्य !
कृष्ण सुदामा … दोस्ती का सशक्त उदाहरण !
हिरन्यकश्यप – प्रहलाद – होलिका
जीत आराध्य की !
…… दुनिया उदाहरणों से भरी है
पर तुम उन उदाहरणों की लकीरें पिटते हो
जिनसे न संस्कारों की सुगंघ आती है
न संबंधों की खुशबू आती है
दुश्मनी सख्ती से निभाई जाती है
पर ….
यक्ष खड़ा है विस्मित प्रश्न लिए
और तुम निरुत्तर !
क्या यह निरुत्तरता
तुम्हारा खुद से पलायन नहीं ?

तुम संबंधों को जीना नहीं चाहते
ढोना चाहते हो
और दयनीयता , विवशता का रोना रोते हो !
सच पूछो तो दयनीयता , विवशता की अवधि
बहुत छोटी होती है
उसे नियति बनाना अपनी चाल होती है
…. भूख …….
सम्मान को घुटन मानने लगता है
पेट भरकर
डकार लेकर रोने में
एक नाटकीय सुकून मिलता है
…..
तुम जानते भी हो , नहीं भी जानते
कि तुम्हें क्या चाहिए …..
तुम अपने पूरे परिवेश को झूठा बनाकर
खुद मकड़ी बन जाते हो ….

चुप रहो-… बेहतर है
यक्ष तो तुम्हारा मन है
भटकने दो उसे
राजा जीमूतवाहन बनने की क्षमता
हर किसी में नहीं होती …
तुम अच्छी तरह जानते हो
हरे रामा हरे कृष्णा गाना – सिर्फ पलायन है !!!

मुमकिन है क्या ?

राजा भागीरथ की 5500 वर्षों की तपस्या ने
मुझे पृथ्वी पर आने को विवश किया
मेरे उद्दात वेग को शिव ने अपनी जटा में लिया
और मैं गंगा
पृथ्वी पर पाप के विनाश के लिए
आत्मा की तृप्ति के लिए
तर्पण अर्पण की परम्परा लिए उतरी …

पृथ्वी पर पाप का वीभत्स रूप
शनैः शनैः बढ़ता गया …
किसी की हत्या , किसी की बर्बादी
आम बात हो गई
स्व के नकारात्मक मद में डूबा इन्सान
हैवान हो उठा !
जघन्य अपराध करके
वह दुर्गा काली की आराधना करता है
खंजर पर
गलत मनसूबों की ललाट पर
देवी देवता के चरणों को छू
विजय तिलक लगाता है
लाशों की बोरियां मुझमें समाहित करता है …
मेरे सूखते ह्रदय ने
हैवान बने इन्सान को
घुटे स्वर में कई बार पुकारा …
पर बड़ी बेरहमी से वह मेरी गोद में
लाशें बिछाता गया ……

अति की कगार पर मैंने हर देवालय को
खाली होते देखा है
अब मैं – गंगा
फिर से शिव जटा में समाहित हो
भागीरथ के तप से मुक्त होना चाहती हूँ
क्योंकि इस दर्द से मुक्त करने में
भागीरथ भी अवश शिथिल हैं
उनके तप में मुझे लाने की शक्ति थी
पर घोर नारकीय तांडव के आगे तपस्या
……
अपने अपने दिल पर हाथ रखकर कहो
मुमकिन है क्या ?

क्या सच में ?

प्यार –
एक नशा …
नशा आँखों का
प्यार की एक झलक का
एक मुस्कान , एक छुवन
एक शब्द , एक इशारे का ..
.
नशा – इंतज़ार का
रुक जाती है -घड़ी की सूई
सौ प्रतिशत रुक जाती है
धड्कनें अजीब सी धड़कती हैं
आँखों की पुतलियाँ चकरी बन जाती हैं
सड़कों पर कुछ नज़र नहीं आता
सिवा उस नशीले इंतज़ार के ….

नशा- उसके होने का
घड़ी की सुइयों की रफ़्तार
बेहिसाब …..
तेज धड्कनें , डगमगाते कदम
कभी हँसी
कभी नमी …. अजीब हालात होते हैं !
………
फिर सड़क पर भीड़ ही भीड़
दिमाग में सन्नाटा
और अनुभवों की हिदायतें
नशा कोई भी हो – बुरा है
क्या सच में ?

प्रतिविम्बित अक्स

आदमकद शीशे सा उसका व्यक्तित्व
और तार तार उसकी मनःस्थिति !
मैं मौन उसे सुनती हूँ
आकाश में प्रतिविम्बित उसका अक्स
घने सघन मेघों सा बरसता जाता है
धरती सी हथेली पर !
नहीं हिलने देती मैं हथेलियों को
नहीं कहती कुछ…
कैसे कहूँ कुछ
जब वह आकाश से पाताल तक
अपने सच को कहता है !
ओह … सच की सिसकियाँ
मेरे मौन की गुफा में
पानी सदृश शिवलिंग का निर्माण करती हैं
……..
अदभुत है यह संरचना
सबकुछ निर्भीक
शांत
स्व में सुवासित होता !
गंगा आँखों से निःसृत होती है
त्रिनेत्र से दीपक प्रोज्ज्वलित होता है
अपने ही संकल्प परिक्रमा करते हैं
निर्णय मंदिर की घंटियों में
उद्घोषित होते हैं
द्वार पूर्णतया खुले होते हैं
पर दर्शन वही कर पाता है
जो सत्य के वशीभूत होता है !

अमृत देवता के हाथ

सर्वप्रथम कृष्ण मनुष्य
फिर भगवान्
कभी कुशल राजनेता
कभी सारथी , …..
कभी सार कभी सत्य
आदि अनादि अनंत अच्छेद अभेद
सूक्ष्म ब्रम्हाण्ड
मौन निनाद
वह था
वह है
वह रहेगा ……….
तुम जितना मिटाओगे
वह उभरेगा
कहाँ मार पाया कंस उसे
पूतना ने स्वयं दम तोड़ दिया
क्या कर लिया हिरणकश्यप ने प्रह्लाद का
प्रह्लाद को भस्म करने की चाह लिए
होलिका जल गई !
….
लगी थी दाव पर जब द्रौपदी
भरी सभा में जब हुए थे सब मौन
तो कृष्ण ने महाभारत की नीव रखी
इस पर ऊँगली उठाकर
कर पाओगे क्या तुम कृष्ण को कलंकित ?
दुह्शासन की ध्रिष्ट्ता क्या हो जाएगी गौण
क्या इसके लिए
बचपन से किया कृष्ण ने कोई प्रयोजन ?
……
चेतन ,अचेतन , परोक्ष, अपरोक्ष
इसे वही देख सकता है
जिसमें व्याकुलता हो एकलव्य सी
निष्ठा हो प्रह्लाद सी
जो विनीत हो अर्जुन सा….
द्वेष ,प्रतिस्पर्धा आवेश
असुरों सा समुद्र मंथन तो कर सकता है
अमृत तो देवता के हाथ ही होता है !

ईश्वर कटघरे में

चिंगारी तो भड़काओ

व्यक्तिविशेष को ज़िम्मेदार ठहराओ

या भाग्य को
पर जो ज़िन्दगी के मायने ढूंढते हैं ,
उनकी आलोचना से तुम्हें क्या मिलेगा
सिक्के के किस पहलू पर अपना नज़रिया
तुम पुख्ता समझोगे ?
बाह्य और आतंरिक दो किनारे हैं
एक किनारे से दूसरे किनारे को देखना
परखना
आसान नहीं होता
और जब आसान होता है
तो कोई तर्क नहीं होता ….
क्यूँ व्यर्थ अपनी ज़िन्दगी से निकल
दूसरों का जोड़ घटाव करते हो
वक़्त जाया करते हो
जब तुम्हारा जोड़ घटाव कोई करता है
तब तो तुम अपनी सोच
अपनी विवशता
अपने अभावों के आंसू बहाने लगते हो
चीखने लगते हो
फिर भी नहीं समझते
कि जिसने उठापटक नहीं की
उसके अन्दर भी कुछ टूट रहा होगा
अगर तुम दोस्त नहीं बन सकते
तो इतनी भयानक दुश्मनी भी मत निभाओ !
अदालतों में भी सच की सुनवाई देर से होती है
यूँ कहें अधिकतर नहीं होती है
कानून की देवी भी अँधेरे में तीर मारती है
पैसे से गवाह ही नहीं
मुजरिम भी ढूंढ लिए जाते हैं
खूनी लोगों के मध्य होता है
फांसी की सज़ा किसी अनजाने को सुनाई जाती है !
हम सारे समझदार लोग इस बात से भिज्ञ हैं
फिर भी ….
जब दूसरे के घर की बेटी भागती है
या यातनाओं का दौर उसके साथ चलता है
…. जो भी होता है
तो अपनी अपनी धारणाओं की पेटी
सब खोल लेते हैं
ऐसे ऐसे शब्द बोलते हैं
कि उबकाई आने लगे
पर जैसे ही धमाका अपने घर होता है
हमारे सारे वाक्य बदल जाते हैं
और जब कुछ नहीं हाथ मिलता
तब ईश्वर कटघरे में होता है !

चिंगारी तो भड़काओ

चिंगारी तो भड़काओ

जालियावाला बाग ..
निर्धारित वक़्त से पहले
भगत सिंह को फांसी !
… निजी अस्तित्व की लड़ाई भी
ऐसी ही होती है !
मुख्य द्वार से
अपनों की लिबास में सजे लोग
शब्द बाण चलाते हैं …
ऐसे में अपनी सोच
कभी कुँए में छलांग लगाती है
कभी लम्बी दीवारों को लांघना चाहती है
कभी अपने दुधमुंहे ख्यालों संग
बच्चे की खातिर
मृत के समान लेट जाती है …
आजादी – आसान नहीं होती !
गुप्तचर लगाए जाते हैं
फूट डालो शासन करो की नीति
बखूबी अपनाई जाती है
बगावत की लहर
और कूटनीति में
यदि मन क्षणांश को भी
सुखदेव सा भरमाता है
तो कई संभावनाओं के द्वार खोल दिए जाते हैं
…. शहीदों की मजारों पर
मेले लगाकर क्या होगा
यदि एक चिंगारी को आग तुमने नहीं बनाया !

बताओ तो

माँ बताओ तो
जब तुमने मेरे पैरों में तेल लगाया था
नहलाकर जब काला टीका लगाया था
कान में दुआओं के मंत्र पढ़े थे
तो तुमने जाना था
कि पाँव में कितने छाले पड़ेंगे
….
पापा बताओ तो
जब तुमने मेरा दाखिला करवाया
जब तुमने अन्ताक्षरी में मुझे जिताया
जब तुमने मुझमें अनेक संभावनाएं देखीं
एक इंजेक्शन लेते वक़्त मेरा सर सहलाया
तो क्षणांश को भी तुमने जाना
कि नुकीले पत्थर पर चलकर
मेरे आंसू सूख जायेंगे
….
माँ पाँव तो तेरे भी लहुलुहान हुए
फिर पांवों में कभी सूई चुभाकर क्यूँ नहीं देखा
क्यूँ नहीं मुझे अभ्यस्त बनाया
क्यूँ झालरवाली फ्रॉक पहना
मुझे गुड़िया कहा ?
मैं तो खुद को यही मान बैठी न !

पापा तुम तो मनुष्य की सर्प नीति से वाकिफ रहे
जिनका तुमने स्वागत किया
उनका छल देखते रहे
सूली पर एक नहीं कई बार चढ़ाये गए
फिर तुमने बताया क्यूँ नहीं
अच्छाई का सिला सर्प दंश सा विषैला होता है
काटना ना सही
फुफकारना तो सिखाया होता
…..
नीति उपदेश ने क्या दिया तुमदोनों को
हमारे सिवा तुम्हें कौन जानता है
और यह पहचान भी आखिर कब तक !

वसीयत

एक शब्द
किरणों की झालरों से मैंने लिया
गौर से देखा
सूरज मेरी मुट्ठी में है
एक शब्द
ओस की बूंदों से मैंने लिया
गौर से देखा
नम एहसास मेरी हथेलियों में है
एक शब्द
चिड़ियों के कलरव से मैंने लिया
गौर से सुना
साज मेरे अन्दर तरंगित है
एक शब्द
अमलतास से लिया मैंने
गौर से देखा
प्यार मेरे चारों तरफ
किसी बच्चे की तरह
गोल गोल घूम रहा है
एक शब्द
देवदार से लिया मैंने
गौर से देखा
मेरे हर निर्णय में दृढ़ता है
एक शब्द संध्या से लिया मैंने
गौर से देखा
लालिमा मेरा सौन्दर्य है
एक शब्द
रात से लिया मैंने
गौर से देखा
चांदनी मेरे कमरे में है
………………………
शब्द शब्द चुनकर
मैंने पिरोया और संजोया है …
यह वसीयत सिर्फ उनके नाम
जिन्होंने इन शब्दों को सींचने में
धूप की परवाह नहीं की
बस इसका मान रखा
मुझे मायने दिए ….. !!!

अस्तित्व

हम सच को नकार के
अपने बाह्य और अंतर को नकार के
एक दूसरा स्वरुप प्रस्तुत करते हैं
तो फिर हम हम नहीं रह जाते …

हम कहते हैं
मृत्यु अवश्यम्भावी है
फिर भी इससे लड़के हम खुद को जीते हैं न
जो हमारे अंतर को ख़त्म करना चाहता है
उसके आगे
खुद को प्रोज्ज्वलित करते हैं न

पर जब हम उसकी रौशनी से प्रभावित होते हैं
तो हमारा कमरा स्याह हो जाता है
हम हम नहीं रह पाते

अपनी सोच को बनावटी मत बनाओ
जब रोने का दिल करे तो हर बार हंसो मत
ऐसे में
तुम्हारा अस्तित्व तुम्हारे एकांत में
तुम्हें जीने नहीं देगा
और तब तुम खुद के आगे ही नहीं
पूरे समूह में पागल घोषित किये जाओगे …

क्या कहा ?
‘क्या फर्क पड़ता है?’
पड़ता है –
आईने में तुम खुद को ताउम्र ढूंढते रह जाते हो
और आईना
वह भी छद्म रूप धारण कर लेता है !

सुना है आँखों से निःसृत शंखनाद को 

चाँद के गांव से
किरणों के पाजेब डाल
जब सूरज निकलता है
तब चिड़ियों के कलरव से
मैं मौन आरती करती हूँ
– हर जाग्रत दिशाओं की
जाग्रत भावनाओं की
जाग्रत क़दमों की …….
कभी सुना है आँखों से निःसृत शंखनाद को ?
……
अविचल पलकें
आँखों के मध्य से
जब दुआओं का अभिषेक करती हैं
तब दसों दिशाएं गूंजती हैं
तब तक …… जब तक किरणों के पाजेब के स्वर
मद्धम न होने लगें
रात लोरी न गाने लगे …..
और पंछी अपने पंख न समेट लें !

सपनों की कभी हार नहीं होती

दो बुलबुले आँखों के मुहाने से
बादलों की तरह
ख़्वाबों की दुनिया बनाते हैं ….
ये ख़्वाबों की दुनिया
कितनी अच्छी लगती है !
न कहीं जाना
ना कोई खर्च
सबकुछ पास उतर आता है
बादल , पहाड़, चाँद , सितारे
आकाश, पाताल , धरती , नदी
बस ख्वाहिशों के धागे खोलते जाओ
सपनों की पतंग ऊपर ऊपर बहुत ऊपर
….. मजाल है कोई काटे …
कैची भी तुम्हारे हाथ !
चाहो और खिलखिलाओ
टप्प से आंसू बहा लो… हल्के हो जाओ
सोच लो- उसकी हथेली सामने
परिधान भी एक से एक – मनचाहे
खूबसूरत से खूबसूरत हसीन वादियाँ
ओह ! वक़्त कम पड़ जाता है …
गीत आँखों में थिरकते हैं
पैरों में मचलते हैं
सब अपना बस अपना लगता है !
सोओ जागो … सपना साथ साथ चलता है
प्यार ख़्वाबों में … बहुत चटकीला होता है
महकता है बहकता है
सावन के गीत गाता है
खुद ही विछोह पैदा कर बिरहा गाता है
तानसेन, बैजू बावरा सबकी हार
एक मटकी के सहारे
कई नदिया पार …..
अपना कैनवस अपनी आकृति अपने रंग
कुछ भी अनछुआ नहीं होता
…. सपनों की कभी हार नहीं होती
अपनी जीत मुट्ठी में होती है !

सिद्धार्थ ही होता..

मेरे महाभिनिष्क्रमण की ताकत
मेरे पिता नहीं थे
उन्होंने तो मेरे उद्विग्न मन को
बाँधने का प्रयास किया
निःसंदेह ….. एक पिता के रूप में
उनके कदम सराहनीय थे
पर यशोधरा के उत्तरदायी बने !

मैं जीवन की गुत्थियों में उलझा था
मैं प्रेम को क्या समझता
मेरी छटपटाहट में तो दो रिश्ते और जुड़ गए …
यशोधरा मौन मेरी व्याकुलता की सहचरी बनी !
मैं बनना चाहता था प्रत्युत्तर – राहुल की अबोध मुस्कान का
पर दर्द के चक्रव्यूह में
मैं मोह से परे रहा ….

मैं जानता हूँ
यशोधरा , राहुल मेरी ज़िम्मेदारी थे
पर मैं विवश था ….
मेरे इन विवश करवटों को यशोधरा ने जाना
और मेरी खोज की दिशा में
वह उदगम बनी
सारे बन्द रास्ते खोल दिए
……………
मैं तो रोया भी
पर उसकी आँखें दुआएं बन गईं
उस वक़्त
मुझमें और राहुल में
कोई फर्क नहीं रहा …..
वह पत्नी से माँ बन गई
और उसके आँचल की छाँव में मैं
सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध हुआ …..

दुनिया चाहे मुझे जिस उंचाई पर ले जाए
करोड़ों अनुयायी हों
पर मैं बुद्ध
इसे स्वीकार करता हूँ –

निर्वाण यज्ञ में
यशोधरा तू मेरी ताकत रही
दुनिया कुछ भी कहे
सच तो यही है,
यदि यशोधरा न होती
तो मैं सिद्धार्थ ही होता…

ज़िन्दगी से मुलाकात

कल मेरे अनमने मन की मुलाकात ज़िन्दगी से हुई
सुसज्जित पुष्प आवरण में
खुशबू से आच्छादित
अप्रतिम सौन्दर्य लिए ….
सौन्दर्य ने मन की दशा ही परिवर्तित कर दी
लगा – बसंत तो कहीं गया ही नहीं है !
मुस्कुराती ज़िन्दगी की चपल आँखों ने कहा ,
कुछ कहना है या पूछना है ….

मन ने ज़िन्दगी की आँखों में गोते लगाए
जितने ख्वाब चुन सकता था – चुने
बेशुमार रंगों से रंग लिए
और टिमटिमाती ज़िन्दगी को छू छूकर देखा
बुदबुदाया -‘ ज़िन्दगी तो माशा अल्लाह कमाल की है
इसे कौन नहीं जीना चाहेगा !’
कई सवाल कुलबुलाये ….
पर ये ज़िन्दगी तो कई खेल खेलती है
…… दर्द का सिलसिला , भय का सिलसिला
हार का सिलसिला …. चलता है तो रुकता ही नहीं
शिकायतों का पुलिंदा लिए हम रोते जाते हैं
और ज़िन्दगी कानों में रुई डाले अनजान बनी रहती है ….

मन आगे बढ़ा… ज़िन्दगी के काँधे पर हाथ रखा
…. ज़िन्दगी फिर मुस्कुराई ,
आँखों को उचकाकर कहा – ‘कहो भी … ‘
मन ने संयत भाव लिए कहा –
” ज़िन्दगी तुम्हारे सौन्दर्य में तो
कहीं कोई कमी नहीं ….
जीने के हर खुले मार्ग हैं तुमसे जुड़े
व्यवधान का पुट कहीं दिखता ही नहीं
फिर जब हम तुम्हें जीते हैं
तो मार्ग अवरुद्ध कैसे हो जाते हैं !”

ज़िन्दगी ने मन का सर सहलाया
संजीवनी सी लहरें लहरायीं
मन देवदार की तरह हो ज़िन्दगी को सुनने लगा –
” मैं ज़िन्दगी हूँ
जन्म से मृत्यु के मध्य
मैं सिर्फ जीवन देती हूँ
तहस नहस करना मेरा काम नहीं
छल के बीज भी मैं नहीं बोती
विनाश से मेरा कोई नाता नहीं
मैं तो बस देती आई हूँ …
अर्थ का अनर्थ
यह तो इंसानी दाव पेंच हैं …
‘इसी जीवन में सब होता है ‘
ऐसा कहकर इन्सान अपनी चालें चलता है
अपने स्वार्थ साधता है
सबकुछ तोड़ मरोड़कर
बढ़ाकर घटाकर
मायूसी से कहता है
‘ज़िन्दगी के रंग ही अजीब हैं …. ‘
सच तो ये है
कि मेरे पास कुछ भी बेमानी नहीं
हर रंग की अपनी खासियत है
अगर इंसानी मिलावट ना हो …
मैं तो सिर्फ राहें निर्मित करती हूँ
सेंध लगाना इंसानी फितरत है
किसी और को कटघरे में डालना भी
उसकी सधी चाल है .. ..”

अनमना मन अनमना नहीं रहा
उसने बड़े प्यार से ज़िन्दगी के हाथ चूमे
लम्बी सी सांस ली
और मेरे पास आ गया
कहीं कोई सवाल शेष नहीं रहा ….

सर्द चेहरे

सर्द लम्हों से
सर्द चेहरे !
सर्द जज़्बात,
सर्द मुलाकात…
कोई अलाओ जलाओ भाई !

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