राकेश रोहित की रचनाएँ

उसकी तस्वीर

उसकी जितनी तस्वीरें हैं
उनमें वह स्टूडियो के झूठे दरवाज़े के पास खड़ी है
जिसके उस पार रास्ता नहीं है
या फिर वह एक सजीली मेज़ पर कुहनी रखे
टिका रही है हथेली पर अपने चेहरे को
सोच की मुद्रा में।
पास में बन्द स्टूडियो की दो-चार सीढ़ियाँ हैं
एक में वह सीढ़ियाँ चढ़कर
थोड़ा मुड़कर देख रही है
और समय फिर वहीं ठहरा हुआ है।

हर तस्वीर खिंचवाने के पीछे कितनी कवायदें होती थीं
उसने तय किया था वह एक दिन रोएगी
अपनी इन सारी तस्वीरों के साथ
जबकि सिर्फ़ साफ़ दिखता है स्टूडियो का नाम
अब भी आँखें भरी-भरी लगती हैं
उन श्वेत-श्याम तस्वीरों में!

अपनी पुरानी तस्वीरें देखकर वह
ख़ुद हैरान होती है
उसके पास नहीं है ऐसी तस्वीर
जिसमें उसके हाथ में फूल हो
और वह तितली के पीछे भाग रही हो!

पुरानी तस्वीरें देखते हुए
वह याद करती है अपनी पुरानी कविताएँ
जिसमें उसका अजाना बचपन छिपा है
कच्ची अमिया खाना उसे बहुत पसन्द था
पर हाथ में पत्थर उठाए उसकी कोई तस्वीर नहीं है।

परसों हम मिले थे

परसों हम मिले थे
याद है?
मैंने संजो रखी है वह मुलाक़ात!

आजकल मैं छोटी- छोटी चीज़ सहेजता रहता हूँ
जैसे काग़ज़ का वह टुकड़ा
जिस पर किसी का नम्बर है पर नाम नहीं
जैसे पुरानी क़लम का ढक्कन
खो गया है जिसका लिखने वाला सिरा
जैसे बस की रोज़ की टिकटें
उस एक दिन का छोड़ जब मैं खुद से नाराज़ था
जैसे अख़बार के संग आए चमकीले पैम्फ़लेट
जैसे भीड़ भरी बस में
एक अनजान लड़की की खीज भरी मुस्कान!

जब कोई मेरे साथ नहीं होता
मैं उलटता-पलटता रहता हूँ इन चीज़ों को
जो मेरे पास है और जो मेरे मन में है
नौकरी मिलने पर भाई ने पहली बार चिट्ठी लिखी थी
पिता ने बताया था घर आ जाओ
शादी पक्की हो गई है
माँ ने कहा था कोई दवाई काम नहीं करती
मशरूम वाली दवाई खा लूँ
दोस्त ने शहर आने की सूचना दी थी
और आया नहीं बता कर भी
बहुत सी स्मृतियाँ मैं अपने साथ समेट कर
भीड़ भरे शहर में अनमना घूमता रहता हूँ।

यह जो असबाब इकट्ठा कर रखा है मैंने
मन के अन्दर और घर के उदास कोनों में
क्या एक दिन मैं इनको सजाकर तरतीब से
खोजूँगा अपनी ज़िन्दगी का उलझा सिरा
और किसी गुम हँसी को अपने चेहरे पर सजा कर
गाने लगूँगा कोई अधूरा गीत!

कल मुझे अचानक वह नाम याद आया
जिससे दोस्त मुझे बुलाते थे
मुझे उनका इस तरह पुकारना कभी पसन्द नहीं आया
पर मैंने उसे भी संजो लिया है
और कई बार ख़ुद को पुकार कर देखता हूँ उस नाम से
क्या वह आवाज़ अब भी मुझ तक पहुँचती है!

अख़बार के कई पीले पड़ गए टुकड़े
जिस पर छपी ख़बर की प्रासंगिकता भूल चुका हूँ मैं
अब भी रखे हैं मेरी पुरानी कॉपी में
और साहस कर भी उन्हें फेंक नहीं पाता
क्या था उन ख़बरों में जिन्हें मैं सहेजता आया इतने दिन
सोचता हूँ और गुज़रता हूँ
स्मृति की अनजान गलियों में
किसी दिन वह जागता हुआ क्षण था
अब जिसकी याद भी बाक़ी नहीं है।

सहेजता हुआ कुछ अनजाना डर
मैं कुरेदता रहता हूँ
अनजान चेहरों में छुपा परिचय
संजोकर रखता हूँ कुछ अजनबी मुस्कराहटें
परसों हम मिले थे
याद है?
पर क्या हम कल भी मिले थे?

रंग कहाँ हैं?

प्रिय!
रंग कहाँ हैं?
बस तुम्हारी आँखों में
जिसमें एक अधूरे स्वप्न की छाया है
और मेरी कविताओं में
जहाँ तुम्हें पुकारते कुछ शब्द हैं।

तुम्हारे लहराते दुपट्टे में
आसमान की सतरंगी छाया है
तुम्हारे होठों पर ठहरा हुआ है
सूरज की शोखी का रंग लाल
तुम्हारे मुस्कराहटों से धरती पर
थोड़ी पीली धूप फैली हुई है
तुम्हारी नज़रों के देखे से
हरे रंग में रंगी हैं दिशाएँ!

इनके अलावा
इन सबके अलावा रंग कहाँ हैं?
बस सारी उदासी को हटाकर जहाँ
मैंने प्यार का आख्यान लिखा है
वहाँ ज़िन्दगी में अब भी बचे हैं
रंग की निशानदेही करते कुछ शब्द
उनके अलावा
उन सबके अलावा रंग कहाँ हैं?

टूटने दो उस सितारे को
तुम तक जिसकी रोशनी नहीं पहुँचती
बस तुम्हारी हथेली में
एक शब्द प्रिय
झिलमिलाता रहने दो!
इस स्याह- सफ़ेद दुनिया में
रंगों की तलाश करते मेरी कविता के शब्द
तुम्हारे साँसों की ऊष्मा से जरते हैं
जवां होते हैं!

एक दिन तुम्हारी आँखों में देखता हुआ मैं
देखता हूँ शाश्वत अग्नि से दहकती हुई धरती
एक दिन मैं देखता हूँ कविता
कैसे छुपी हुई थी तुम्हारे होठों के आस्वाद में।
एक दिन हम तुम मिलकर लिखते हैं
धरती का धानी रंग
एक दिन बारिश में हरा हो जाता है
पत्तों का पीला रंग!

नमक के बारे में कविता और अपरिचय की कहानियाँ

वह मुझसे थोड़ा नमक चाहता था!
नमक! मैं चकित था
हाँ, नमक! उसने कहा तो उसकी आँखों में नमी थी
जो शायद उसने बचा रखी थी
इसी दिन के लिए जब वह
एक अजनबी से सरे राह नमक माँगेगा!

पर नमक क्यों?
क्या भूखे हो तुम?
सुन्दर, सजीले इस बाज़ार के दृश्य में
मैं कहाँ तलाश सकता था चुटकी भर नमक!
कुछ खाना है?
मैंने पूछा
यह सबसे सरल प्रस्ताव था मेरे लिए
पर उसने कहा, नहीं भूखा नहीं हूँ मैं
मैं भूल चुका हूँ जिन्दगी का स्वाद
नहीं भूख नहीं, तुम्हारी आँखों में छाया
अपरिचय डराता है मुझे
मैं आज तुमसे लेकर थोड़ा नमक
कृतज्ञ होना चाहता हूँ एक अजनबी के प्रति!

पर क्यों
नमक ही क्यों चाहिए उसे?
मैं ख़ुद से पूछता हूँ
और लगता है
जैसे अपने ही बेसबब सवाल से डर रहा हूँ
वे जो टूटी सड़क के कोने पर
मूंगफलियाँ बेच रहे हैं
क्या उनके पास होगा नमक!
मैं इस सृष्टि में विकल मन की तरह दौड़ रहा हूँ
नमक की तलाश में
मैं उस खोमचे वाले के सम्मुख अपना अपरिचय लिए
नतमस्तक खड़ा हूँ
क्या उसे पता है
मुझे चाहिए चुटकी भर नमक!

रोज़ हमारी जिन्दगी का नमक कम हो रहा है
पर मैं रोज़ व्यग्र नहीं होता हूँ नमक की तलाश में
मैं अपनी याचना की दुविधा को
अपनी मुस्कराहट से ढकता हूँ
मैं चाहता हूँ नमक
जो थोड़ा कुछ बचा है
जतन कर लपेटी छोटी पुड़ियाओं में।

मैं चुटकी भर नमक
उस अजनबी के हाथ में रखकर
देखता हूँ उसकी आँखों की चमक
और नमक विहीन यह सृष्टि!
मैं उदास हूँ
मैं गले से चिपट कर रोना चाहता हूँ उसके
पर ठिठक कर पूछता हूँ
तुम बहुत दिनों से तलाश रहे थे नमक
कुछ खास बात है भाई इसमें?

हाँ ख़ास है न!
वह कहता है
कुछ ख़ास बात है इस नमक में
तभी तो, इस नमक की तलाश में
बेकल नदियाँ समन्दर तक पहुँचती हैं
इसी नमक को खोकर मैं
मिलता हूँ तुमसे विह्वल रोज़
और तुम तक नहीं पहुँचता!

मॉल में भय

वह देख कर सचमुच चकित हुआ

पैरों के नीचे ज़मीन नहीं थी, काँच था
और काँच के नीचे लोग थे!

यह नए युग का बाज़ार था
काँच से सजा हुआ
काँच की तरह
कि कोई छूते हुए भी डरे
और काँच के पीछे कुछ लोग थे बुत की तरह खड़े!

कोई देखता नहीं
यह कैसा है उल्लास का एकान्त
है खड़ा कोने में वह
अस्थिर और अशान्त!

सामने स्पष्ट लिखा हुआ
पर नहीं किसी को ख़बर है
सावधान आप पर
सीसीटीवी की नज़र है!

बाहर निकलते हुए भी नज़र करती है पीछा
यहाँ आपकी ईमानदारी की परीक्षा करता
एक दरवाज़ा लगा है!

आपसे है अनुरोध महाशय
आप इधर से आएँ!

क्या ख़रीदा है, क्यों ख़रीदा है साफ़-साफ़ बतलाएँ?
आप अच्छे ग्राहक हैं, अगर आप बेआवाज़ निकल जाएँ!

पेड़ पर अधखाया फल 

पेड़ पर अधखाया फल
पृथ्वी के गाल पर चुम्बन का निशान है
यह प्रेम की अधसुनी आवाज़ है
यह सहसा मुड़ कर तुम्हारा देखना है।

यह तुम्हें पुकारते हुए
ठिठक गया मेरा मन है
यह कोई मधुर कथा सुनते हुए अचानक
तुम्हारे आँखों में ढलक आई नींद है।

अधखाए फल से छुपाए नहीं छुपता है
प्यार का मीठा ताज़ा रंग
अधखाए फल से झरते हैं बीज
तो हरी होती है धरती की गोद

अधखाया फल अचानक हथेली पर गिरा
तो मैंने चाँद की तरह उसे समेट लिया
यह धरती पर सितारे बरसने की रात थी
मैंने हौले से चूम लिया उसे
जैसे उनींदे उठ कर तुम्हारा नींद भरा चेहरा।

प्रेम में हूँ इसलिए

मैं प्रेम में हूँ
इसलिए बेवकूफ हूँ।

मैं दुख में हूँ
इसलिए सिकुड़ा हुआ हूँ।

मैं जागता हूँ
तो रोता रहता हूँ

मैं नींद में हूँ
इसलिए डूबा हुआ हूँ।

तमाम फैले ज्ञानी जन
तैरते रहते हैं जल में

मैं कवि हूँ
इसलिए तल में हूँ।

शून्य के साथ

शून्य के साथ रखा अंक
सुन्दर लगने लगता है
जैसे पांच की जगह पचास!

जैसे अपने हृदय का शून्य
सौंपता हूँ तुम्हें
और महसूसता हूँ विराट की उपस्थिति!

अपना शून्य लेकर
भटकता रहता हूँ इस निर्जन वन में

तुमसे मिलता हूँ
तो साकार हो जाता हूँ।

मनुष्य को खा जाता है दुख

गेहूँ को घुन खा जाता है
और कभी-कभी पिस भी जाता है।

कीट खा जाते हैं हरी पत्तियाँ
और कभी मिल भी जाते हैं मिट्टी में।

सूखते पत्तों के संग
झर जाते हैं, जर जाते हैं
खाद हो जाते हैं।

मनुष्य को खा जाता है दुख

मनुष्य मर जाता है
दुख नहीं मरता

बस, धीरे से देह बदल लेता है।

रह जाता

धरती की तरह
सह जाता

नदी की तरह
बह जाता

चिड़िया की तरह
कह जाता

तो दुख की तरह
रह जाता

मैं भी

मन में और जीवन में!

नम अँधेरे में उम्मीद

झर गया हूँ
पत्ते से कहता हूँ
पर टूटा तो नहीं हूँ!

टूट गया हूँ
पेड़ से कहता हूँ
पर उखड़ा तो नहीं हूँ!

उखड़ गया हूँ
जड़ से कहता हूँ
पर सूखा तो नहीं हूँ!

सूख गया हूँ
बीज से कहता हूँ
और चुप रहता हूँ!

इस नम अँधेरे में जन्मना है तुम्हें फिर
कहता है इस बार बीज।

केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग

केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग।

एक दिन
जब करते हैं कृपा, महादेव
रीझती है भोली-भंडारी जनता
बढ़े चले आते हैं
वर्जित देव-प्रदेश में
बिखरे बालों
और बढ़ी मूँछोंवाले राक्षस।
बेशऊर, असभ्य, उजड्ड, गँवार
होते हैं आरूढ़ रत्नजटित सिंहासन पर
वरदान के लोकतंत्र के मारे
बहिष्कृत होते हैं देवता
पवित्र, अविनाशी, सुंदर।
सलोने, सुगढ़, सजीले, नेत्रप्रिय देवता
स्वर्ग में कितना भाते हैं।

हवाएँ, आग, पानी, और ऐसी ही तमाम
हमारी, आपकी आम ज़िन्दगी की चीज़ें
उनके वश में हैं
यद्यपि वे ईश्वर नहीं हैं।
विलासप्रिय हैं देवता-रंग उन्हें भाता है
राग में डूबे हैं वे, प्रिय है उन्हें गंध
पर उन्हें नहीं भाता है तप।
पाप से मही डोलती है
और तप से डोलता है सिंहासन स्वर्ग का
इंद्र को प्रिय नहीं है तप।

एक दिन वे
जिनका सृष्टि की तमाम चीज़ों पर नियंत्रण है
हार जाते हैं करके सारे उपाय
तब सारे निरुपाय देवता
छोड़कर मदालसा अप्सराओं को रंगशाला में
करते हैं विचार
करते हैं प्रार्थना
और अचानक मनुष्य हो जाते हैं
निर्बल, निरीह, दया उपजाते हुए से।

इतने बड़े, इतने महान देवता
ईश्वर के सामने होकर विनीत
मद से चमकते
श्रद्धा से झुके हुए
माँगते हैं देवता होने की सुविधा का लाभ
सदा के लिए।
कि अब तो बंद हो वरदान का यह सिलसिला
आखि़र ये स्वर्ग है
आखि़र हम देवता हैं
और हैं वे राक्षस
वे तो कर देंगे
स्वर्ग की मर्यादा को ही तहस-नहस।

इतनी पवित्र, निर्दोष चिन्ता पर मुस्कराते हैं ईश्वर
समझाते हैं…
कैसे न दें वरदान
अगर तप करते हैं राक्षस
भले वे सत्ता की मोहिनी के वश में
रख दें अपने ही सर पर हाथ।
देवताओं के प्रति करुण हैं ईश्वर
कभी-कभी वे देवताओं के पक्ष में हो जाते हैं
पर अब भी राक्षस जानते हैं
केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग।

बाज़ार के बारे में कुछ विचार

ख़ुशी अब पुरानी ख़ुशी की तरह केवल ख़ुश नहीं करती

अब उसमें थोड़ा रोमांच है, थोड़ा उन्माद
थोड़ी क्रूरता भी
बाज़ार में चीज़ों के नए अर्थ हैं
और नए दाम भी।
वो चीज़ें जो बिना दाम की हैं
उनको लेकर बाज़ार में
जाहिरा तौर पर असुविधा की स्थिति है।
दरअसल चीज़ों का बिकना
उनकी उपलब्धता की भ्राँति उत्पन्न करता है
यानी यदि ख़ुशी बिक रही है
तो तय है कि आप ख़ुश हैं (नहीं तो आप ख़रीद लें)
और यदि पानी बोतलों में बिक रहा है
तो पेयजल संकट की बात करना
एक राजनीतिक प्रलाप है।
ऐसे में सत्ता के तिलिस्म को समझने के कौशल से बेहतर है
आप बाज़ार में आएँ
जो आपके प्रति उतना ही उदार है
जितने बड़े आप ख़रीदार हैं।

बाज़ार में आम लोगों की इतनी चिन्ता है
कि सब कुछ एक ख़ूबसूरत व्यवस्था की तरह दीखता है
कुछ भी कुरूप नहीं है, इस खुरदरे समय में
और अपनी ख़ूबसूरती से परेशान लड़की!
जो थक चुकी है बाज़ार में अलग-अलग चीज़ें बेचकर
अब ख़ुद को बेच रही है।
यह है उसके चुनाव की स्वतंत्रता
सब कुछ ढक लेती है बाज़ार की विनम्रता।
सारे वाद-विवाद से दूर बाज़ार का एक खुला वादा है
कि कुछ लोगों का हक़ कुछ से ज़्यादा है
और आप किस ओर हैं
यह प्रश्न
आपकी नियति से नहीं आपकी जेब से जुड़ा है

यदि आप समर्थ हैं
तो आपका स्वागत है उस वैश्विक गाँव में
जो मध्ययुगीन किले की तरह ख़ूबसूरत बनाया जा रहा है
अन्यथा आप स्वतंत्र हैं
अपनी सदी की जाहिल कुरूप दुनिया में रहने को,
बाज़ार वहाँ भी है
सदा आपकी सेवा में तत्पर
क्योंकि बाज़ार, विचार की तरह नहीं है
जो आपका साथ छोड़ दे।
विचार के अकाल या अंत के दौर में
बाज़ार सर्वव्यापी है, अनंत है।

लोकतंत्र में ईश्वर

एक आदमी
चूहे की तरह दौड़ता था
अन्न का एक दाना मुँह में भर लेने को विकल।
एक आदमी
केकड़े की तरह खींच रहा था
अपने जैसे दूसरे की टाँग।
एक आदमी
मेंढक की तरह उछल रहा था
कुएँ को पूरी दुनिया समझते हुए।
एक आदमी
शुतुरमुर्ग की तरह सर झुकाए
आँधी को गुज़रने दे रहा था।
एक आदमी
लोमड़ी की तरह न्योत रहा था
सारस को थाली में खाने के लिए।
एक आदमी
बंदर की तरह न्याय कर रहा था
बिल्लियों के बीच रोटी बाँटते हुए।
एक आदमी
शेर की तरह डर रहा था
कुएँ में देखकर अपनी परछाईं।
एक आदमी
टिटहरी की तरह टाँगें उठाए
आकाश को गिरने से रोक रहा था।
एक आदमी
चिड़िया की तरह उड़ रहा था
समझते हुए कि आकाश उसके पंजों के नीचे है
एक आदमी…!

एक आदमी
जो देख रहा था दूर से यह सब,
मुस्कराता था इन मूर्खताओं को देखकर
वह ईश्वर नहीं था
हमारे ही बीच का आदमी था
जिसे जनतंत्र ने भगवान बना दिया था ।

बहुत थोड़े शब्द हैं

बहुत थोड़े शब्द हैं, कहता रहा कवि केवल
और सोचिए तो इससे निराश नहीं थे बच्चे ।
खो रहे हैं अर्थ, शब्द सारे
कि प्यार का मतलब बीमार लड़कियाँ हैं
और घर, दो-चार खिड़कियाँ
धूप, रोशनी का निशान है
फूल, क्षण का रुमान !
और जो शब्दों को लेकर हमारे सामने खड़ा है
जिसकी मूँछों के नीचे मुस्कराहट है
और आँखों में शरारत
समय, उसके लिए केवल हाथ में बंधी घड़ी है ।

घिस डाले कुछ शब्द उन्होंने, गढ़ता रहा कवि केवल ।

ऐसे में एक कवि है कितना लाचार
कि लिखे दुःख के लिए घृणा, और उम्मीद को चमत्कार ।
क्या हो अगर घिसटती रहे कविता कुछ तुकों तक
कोई नहीं सहेजता शब्द ।
बच्चों के हाथ में पतंगें हैं, तो वे चुप हैं
लड़कियों के घरौंदे हैं तो उनमें ख़ामोश पुतलियाँ हैं
माँ के पास कुछ गीत हैं तो नहीं है उनके सुयोग
बहनों के कुछ पत्र, तो नहीं हैं उनके पते
कुछ आशीष तो नहीं है साहस
कहाँ हैं मेरे असील शब्द ?

क्या होगा कविता का
बना दो इस पन्ने की नाव[1]
तो कहीं नहीं जाएगी
उड़ा दो बना कनकौवे तो
रास्ता भूल जाएगी ।

केवल हमीं हैं जो कवि हैं
किए बैठे हैं भरोसा इन पर
एक भोली आस्था एक ख़त्म होते तमाशे पर
लिखते हैं ख़ुद को पत्र
ख़ुद को ही करते हैं याद
जैसे यह ख़ुद को ही प्यार करना है.
एक मनोरोगी की तरह टिका देते हैं
धरती, शब्दों की रीढ़ पर
जबकि टिकाओ तो टिकती नहीं है
उंगली भी अपनी ।

बहुत सारा उन्माद है
बहुत सारी प्रार्थना है
और भूलते शब्द हैं ।
हमीं ने रचा था कहो तो कैसी
अजनबीयत भर जाती है अपने अंदर
हमीं ने की थी प्रार्थना कभी
धरती को बचाने की
सोचो तो दंभ लगता है ।
हमीं ने दिया भाषा को संस्कार
इस पर तो नहीं करेगा कोई विश्वास ।
लोग क्षुब्ध होंगे
हँस देंगे जानकार
कि बचा तो नहीं पाते कविता
सजा तो नहीं पाते उम्मीद
धरती को कहते हैं, जैसे
हाथ में सूखती नारंगी है
और जानते तक नहीं
व्यास किलोमीटर तक में सही ।

टुकड़ों में बँट गया है जीवन
शब्द चूसी हुई ईख की तरह
खुले मैदान में बिखरे हैं
इनमें था रस, कहे कवि
तो इतना बड़ा अपराध !

बहुत थोड़े शब्द हैं, कहता रहा कवि केवल
घिस डाले कुछ शब्द उन्होंने, गढता रहा कवि केवल ।

हाय ! हमें ईश्वर होना था

हाय! हमें ईश्वर होना था ।
जीवन की सबसे पवित्र प्रार्थना में
अनंत बार दुहराया जाना था इसे
डूब जाना था हमें
अनवरत अभ्यर्थना के शुभ भाव में
घिर जाना था
ईश्वर की अपरिचित गंध में
महसूस करना था
हथेली में छलछलाती
श्रद्धा का रहस्य-भरा अनुभव ।

सत्य के शिखर से उठती
आदिम अनुगूँज की तरह
व्याप्त होना था हमें
पर इन सबसे पहले
हाय! हमें ईश्वर होना था ।

ईश्वर ।
धरती के सारे शब्दों की सुंदरता है इसमें
ईश्वर !
धरती की सबसे छोटी प्रार्थना है यह
ईश्वर ?
हाय, नहीं हैं जो हम ।

अभिमंत्रित आहूतियों से उठती है
उसकी आसक्ति
पितरों के सुवास की धूम से रचता है
उसका चेहरा
जीवन की गरमाई में लहकती है
उसकी ऊष्मा ।
वह सब कुछ होना था
हम सब में, हमारे अंदर
थोड़ा-थोड़ा ईश्वर ।

सोचो तो जरा
सभ्यता की सारी स्मृतियों में
नहीं है
उनका ज़िक्र
हाय ! जिन्हें ईश्वर होना था ।
हाय ! हमें ईश्वर होना था ।

ईश्वर का सच

मैं समझता हूँ ईश्वर का सच
दुहराई गई कथाओं से सराबोर है
और जो बार-बार चमकता है
आत्मा में ईश्वर
वह केवल आत्मा का होना है ।

जीवन के सबसे बेहतर क्षणों में
जब भार नहीं लगता
जीवन का दिन-दिन
और स्वप्नों को डँसती नहीं
अधूरी कामनाएँ
तब भी मेरा स्वीकार
आरंभ होता है वैदिक संशय से
अगर अस्तित्वमान है ईश्वर
धरती पर देह धारण कर….

मैं समझता हूँ
सृष्टि की तमाम अँधेरी घाटियों में
केवल
सूनी सभ्यताओं की लकीरें हैं
कि जहाँ नहीं जाती कविता
वहाँ कोई नहीं जाता.
सारी प्रार्थनाओं से केवल
आलोकित होते हैं शब्द
कि ईश्वर का सच
ईश्वर को याद कर ईश्वर हो जाना है ।

असम्भव समय में कविता

हर दिन वर्णमाला का एक अक्षर मैं भूल जाता हूँ
हर दिन टूट जाती है अन्तर की एक लय
हर दिन सूख जाता है एक हरा पत्ता
हर दिन मैं तुमको खो देता हूँ ज़रा-ज़रा !

ऐसे असम्भव समय में लिखता हूँ मैं कविता
जैसे इस सृष्टि में मैं जीवन को धारण करता हूँ
जैसे वीरान आकाशगंगा से एक गूँज उठती है
और गुनगुनाती है एक गीत अकेली धरा !!

रेखा के इधर-उधर

विश्वास कीजिए
यह रेखा
जो कभी मेरे इधर
कभी मेरे उधर नज़र आती है
और कभी
आपके बीच खिंची
ज़मीन पर बिछ जाती है
मैंने नहीं खींची ।

मैंने नहीं चाही थी
टुकड़ों में बँटी धरती
यानी इस ख़ूबसूरत दुनिया में ऐसे कोने
जहाँ हम न हों
पर मुझे लगता है हम
अनुपस्थित हैं
इस रेखा के इर्द-गिर्द
तमाम जगहों पर ।

कुछ लोग तो यह भी कहते हैं-
रेखाएँ अकसर काल्पनिक होती हैं
और घूमती पृथ्वी को
इससे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता ।
यानी रेखाओं को होना न होना
केवल हमसे है
और जबकि मैं चाहता हूँ
कम-से-कम एक ऐसी रेखा का
अस्तित्व स्वीकारना
जिसके बारे में दावे से कहा जा सके,
यह रेखा मैंने नहीं खींची ।

समुद्र नहीं है नदी-1

चाहता तो मैं भी था
शुरू करूँ अपनी कविता
समुद्र से
जो मेरे सामने टँगे फ्रेम में घहराता है
और तब मुझे
अपना चेहरा आइने में नज़र आता है
पर मुझे याद आई नदी
जो कल अपना
घुटनों भर परिचय लेकर आई थी
और मैंने पहली बार देखा था नदी को इतना क़रीब
कि मैं उससे बचना चाहता था

नहीं, मैं नदी से
उतना अपरिचित भी नहीं था
नदियाँ तो अकसर
हमसे कुछ फ़ासले पर बहती हैं
और हमारे सपनों में किसी झील-सी आती हैं ।

मैं समझ रहा था
कि महसूसा जा सकता है
इस धरती पर नदी का होना ।
बात नदी-सी प्यास से
शुरू हो सकती थी
बात नदी की तलाश पर
ख़त्म हो सकती थी
पर मैं कब चाहता हूँ नदी
अपने इतने पास
जितने पास समुद्र
मेरे सामने टँगे फ्रेम में घहराता है ।

समुद्र नहीं है नदी-2

बचे हुए लोग
किससे पूछेंगे अपना पता !
शायद नदी से
जो तब किसी उदास समुद्र की तरह
भारी जहाज़ों के मलबे तले
बहती रहेगी ख़ामोश ।

शायद तब वे पाएँगे
कोई समुद्र अपने पास
जो दूर, बहुत दूर, दूर है अभी
जिसे कभी देखा होगा पिता ने पास से ।
कितना भयानक होगा
उस समुद्र का याद आना
जब पिता पास नहीं होंगे
किसी नदी की तरह ।

शायद वे ढूँढ़ेंगे नदी
किसी पहाड़, किसी झरने
किसी अमूर्त कला में
पर कठिन होगा
ढूँढ़ पाना अपना पता
जब पास नहीं होगी
कोई कविता यह कहती हुई
समुद्र नहीं है नदी,
समुद्र नहीं है नदी ।

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