राजमणि मांझी ‘मकरम’ की रचनाएँ

केवल अपने लिए

मैं स्वार्थी हूँ
अपनी बीवी की गाँठ खोलकर
लूट लेता हूँ
उसकी बची-खुची अस्मिता

जबरन उधार माँगता हूँ
उस बनिए से
जो रोज़ खीझकर मुझे भगा देता है
उधार देने से इनकार करता है
मगर अपने स्वार्थ के लिए
हाथ जोड़ लेता हूँ
अपनी बेटी को फुसलाकर
उसका सन्दूक माँगकर
चुरा लेता हूँ उसके कुछ सपने
सहेजे हुए कुछ अरमान
और उसके छोटे-से भविष्य पर
पानी फेर देता हूँ

बेटे का गुल्लक फोड़ने में भी
मैं नहीं हिचकिचाता
जहाँ से भी हो, कैसे भी हो
अपना स्वार्थ पूरा कर लेता हूँ
भले ही उसके लिए / कितनी गालियाँ
कितनी ही लानतें सुननी पड़ें
पर अपना स्वार्थ ब

इसी से नाराज़ हो जाता हूँ मैं

ग़रीबी को पान की तरह
चबाकर खाने वाले / ओ सफ़ेदपोश
किस क़दर चबाकर थूक देते हो
ज़िन्दगी का रंग
इसी से नाराज़ हो जाता हूँ
मैं और मेरा सर्वहारा वर्ग
और टूट जाता है सभ्यता के आगे
सारा का सारा वहशीपन

इस तरह समाज को सिगरेट की तरह
न पिया करो कम-से कम / और धुआँ
देश के मुँह पर न उगला करो

क्या पुरुषार्थ इसी में है कि
औरत को चूना लगाकर
तम्बाकू की तरह मसल डालो?
और जीवन का नशा
उतरा भी न रहे
स्कॉच की तरह रस्मों की सील / तोड़ दो?
बोलो आदमियत के ठेकेदार
क्या तुम्हें एड्स नहीं लगेगा
जो हर वक़्त विदेशी वस्तु
करते हो इस्तेमाल?

टोर लेता हूँ।

 

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