राजर्षि अरुण की रचनाएँ

पुकारें तो किसे

सूक्ष्मतम भावनाओं के उलझाव
किस कदर चिपके रहते हैं
अंतर्मन की दीवारों पर
जैसे पत्थरों पर काई
साफ़ भी करने जाएँ तो फिसलने का डर !

इन्हें समझने की कोशिश
बाँधकर उलझा जाती है हमीं को
बंधन से निकलने की कोशिश
और भी मज़बूत कर जाता है बंधन को ।

जीवन के स्रोत
जीवन को अवरुद्ध करते दीखते हैं
पुकारें तो किसे
सबकी गति ऐसी ही है ।

प्रकाशहीन अंतहीन सुरंग
असंख्य अवरोध
अपनी यात्रा का अकेला पथिक
अनुभोक्ता केवल स्वयं का

मैं चला जा रहा हूँ
नदी की भाँति सागर की तरफ़
अपनी गति में अपना अर्थ खोजता ।

समय का नया चेहरा

कँपाती ठंड में ठंडी हवा कँपा जाती है जैसे
ओस सँभालती पत्तों को कँपा रही हैं स्थितियाँ
प्लेटो, अरस्तू और सुकरात के शब्दों को भी वैसे ही
अर्थ अस्तित्व खोते जा रहे हैं
पत्र-पतित ओस-कणों की तरह ।

सभ्यता का विकास
समय को एक नया चेहरा देता है
ऐसा इतिहास-शिक्षक कहते थे
और ऐसा कहते हुए
मोटे चश्मे के भीतर उनकी आँखें
पसीज जाती थीं

मुझे याद है अच्छी तरह
जब यह बात मैंने अपनी माँ को बताई थी
उसका दमा और भी बढ़ गया था ।

मेरा डर पुरातन है
पर है स्थायी
अर्थ की केंचुली उतारकर शब्द
कृत्रिम नवीनता ओढ़
रेंग रहे हैं इधर-उधर

जब भी टकराते हैं मुझसे
मेरी कविता की ओट में
सभ्यता और समय को
गालियाँ बकते रहते हैं ।

सदियों की पीड़ा लिए चाँद

आधा बूढ़ा चाँद
पसरकर झाँकता है छत पर से
सदियों की पीड़ा लिए
समय की झील समझ
मुझमें अपना प्रतिबिम्ब ।
चाँद उदास है
विश्व की करोड़ों थकी आँखें समाई हैं लगता है

इतिहास के काले अक्षर
सफ़ेद होना चाहते हैं
चाँद के सहारे
सहयोग देना चाहते हैं वे
उदासी को अर्थ देना चाहते हैं वे ।

वैसे तो चाँद भी जानता है
जिसकी रोशनी का बल है उसमें
वही इतिहास का सच्चा साक्षी है
पर इतिहास जानता है
जिस रोशनी का सौन्दर्य फैला है जगत में
उसे चाँद ही चाहिए स्वरूप देने को ।

आज अपने स्वरूप-परिवर्तन के क्रम में
चाँद उदास क्यों है, बूढ़ा क्यों है
क्यों उभर आई है पीड़ा सदियों की उसके बदन पर
कि खोज रहा है अर्थ अपने प्रतिबिम्ब का मुझमें !

मेरा साथ दो

घायल हो गया हूँ मैं
समय ने छला है मुझे
एक तुम हो कि
चमड़ी हटे भाग को
बार-बार छूते हो
खेलते हो मेरे घाव से

मुस्कुराते हो
जब-जब भी मैं
कराहता हूँ दर्द में
प्यार की परिभाषा के इस पक्ष को
समझना चाहता हूँ मैं सचेतन
मेरा साथ दो ।

अँधेरे के गर्भ में पल रहे
श्वेत अणुओं से
कुछ सार्थक सवाल करना चाहता हूँ मैं
जानना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ होने की पीड़ा की समय-सीमा
सुलझाना चाहता हूँ मैं

तुम्हारी मुस्कुराहट की अबूझ पहेली
मेरा साथ दो ।

मैं ऐसा हूँ विरुद्ध मैं वैसा होता

पत्थर ही नहीं
हर चीज़ को सर नवाते फिरता हूँ मैं
कितना ग़रीब और बेबस बना दिया है
ईश्वर ने मुझे

झुकना प्रेम से, प्रार्थना में
कितना कठिन हो गया है
ईश्वर के संभावित अस्तित्व का ख़ौफ़
इतना लद जाता है मन पर
कि सर पत्थर तक जा गिरता है ।

मैं नहीं समझ पाता
डरना चाहिए अपने पिता से
या उद्दंडतापूर्वक अपराध करके
क्षमा माँगने का ढोंग करना चाहिए

या माध्यम बनाकर किसी को
अपनी भूल बेच देनी चाहिए
ईश्वर के बाज़ार में
और खोजना चाहिए
झूठे पश्चात्ताप का मूल्य ।

जो भी हो
अगर मैं ऐसा हूँ तो इसलिए कि
मैं ऐसा हूँ
अगर मैं वैसा होता तो इसलिए कि
मुझ पर ईश्वर की कृपा होती ।

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