राजेश गोयलकी रचनाएँ

सरस्वती वन्दना

 माँ सरस्वती मुझको वर दे, वीणा वादिनी मुझको वर दे।
मन में मेरे ज्ञान ध्यान भर, मेरे मन को हर्षित कर दे॥
प्रेमचन्द ने कफन लिख दिया,
मुध शाला बच्चन ने दे दी।
बाल्मीकि ने लिख रामायण,
श्री कृष्ण ने गीता दे दी ॥
गंगा सा मेरा मन कर दे, वीणा वादिनी मुझको वर दे।
माँ सरस्वती मुझको वर दे,वीणा वादिनी मुझको वर दे॥
नये नये मैं गीत सुनाऊँ,
जहाँ भी जाऊँ गुणतेरे गाऊँ।
जहाँ भी चर्चा चले माँ तेरी,
इस धरती पर बलिबलि जाऊ॥
मेरा मन कुन्दन सा कर दे, वीणा वादिनी मुझको वर दे।
माँ सरस्वती मुझको वर दे, वीणा वादिनी मुझको वर दे॥
युगों युगों से गाता आया,
युगों युगों से लिखता आया।
उसने ही रच दी लीला,
सदा जो तेरा भक्त कहाया॥
मेरे मन में गीता भर दे, वीणा वादिनी मुझको वर दे।
माँ सरस्वती मुझको वर दे, वीणा वादिनी मुझको वर दे।

मेरा गीत नही बस मेरा

वो मेरा बस दर्द भी मेरा, मेरा गीत नहीं बस मेरा।
मेरा स्वप्न नही बस मेरा, मेरा गीत नहीं बस मेरा॥
उसके नयनों मे मिलती,
मीठे सपनों की भाषा।
मेरी साँसों में पलती,
नूतन अनुपम अभिलाषा॥
वो मेरी साँसों में रहता, मेरा गीत नहीं बस मेरा।
वो मेरा बस दर्द भी मेरा, मेरा गीत नहीं बस मेरा॥
आँसू से भीगी आँखे भी,
सपनों में मुस्काती।
दर्द भरी साँसे अपनी
गीत प्यार के गाती।
वो मेरे गीतों में रहता, मेरा गीत नहीं बस मेरा।
वो मेरा बस दर्द भी मेरा, मेरा गीत नहीं बस मेरा॥
वो मेरी पीड़ा सा मादक,
और मेरा सपना कोमल।
वो मेरी आखांे में रहता,
और मेरे मन में निश्चल॥
वो मेरे प्रश्नों में रहता, मेरा गीत नहीं बस मेरा।
वो मेरा बस दर्द भी मेरा, मेरा गीत नहीं बस मेरा॥

सारी गरल स्वयं पी जाऊँ

अमृत मिले मुझको सब बाँटूं, सारा गरल स्वयं भी जांऊ।
बीत गया मधुमास कभी का, मैं बासन्ती गीत सुनाऊँ॥
उसके मद में बहता था,
जिसको अपना कहता था।
सर्वस्व लुटा डाला अपना,
जीवन कोष मिटा अपना॥
खुशी मिले मुझको सब बाँटूं सारा दर्द स्वयं पी जाऊँ।
अमृत मिले मुझको सब बाँटूं, सारा गरल स्वयं भी जांऊ॥
माना पैर नही अब बढते,
और प्यास से प्राण तड़पते।
और मिट गया चलते-चलते,
मंजिल पथ तय करते-करते
छांव मिले मुझको सब बाँटूं सारी तपन स्वयं पी जाऊँ।
अमृत मिले मुझको सब बाँटूं, सारा गरल स्वयं भी जांऊ॥
रोदन के पीछे गायन,
प्रकृति का यही नियम।
यदि मेरी तुम हार चाहते,
मुझ पर तुम अधिकार चाहते॥
उजास मिले मुझको सब बाँटूं, सारी रात स्वयं पी जाऊँ।
अमृत मिले मुझको सब बाँटूं, सारा गरल स्वयं भी जाऊँ॥

हाथ लगाना रे

छुई मुई मेरा मन हुआ, ना हाथ लगाना रे।
बसन्त मेरे द्वारे आया, ना हँसी उड़ाना रे॥
पुरबाई ब्यार आई,
आहन किसे तुम्हारे।
गीत गुंजित हो गये,
मधुर होठ पुकारे॥
तिनके बहुत सहारे, ना हाथ किनारा रे।
छुई मुई मेरा मन हुआ, ना हाथ लगाना रे।
वीणा में मुखरित हो आये,
कितने गीत तुम्हारे।
एक वेदना मुखरित हो गई,
सारे रीत तुम्हारे ॥
सखियाँ छूटी, गलियाँ भूली, अब देश बिराना रे।
छुई मुई मेरा मन हुआ, ना हाथ लगाना रे।
धरती पर उतरा बसन्त,
पीली हुई धरा ।
पीली ओढ़ चुनरिया निकली,
पीले हाथ धरा॥
फागुन मेरे आँगन आया, केसू रंग उड़ाना रे।
छुई मुई मेरा मन हुआ, ना हाथ लगाना रे।

मन बौरा गया

पा लिया जब से तुम्हें है, मन मेरा बौरा गया है।
क्या इसी को प्यार कहते क्या, यही जीवन नया है॥
दे मुझे सजनी निमंत्रण,
स्वपन की बेला में आयी।
मिल गये उपहार अनुपम,
प्रीत ने डोली सजायी॥
पा लिया उपहार जब से, मन में कुछ-कुछ हो गया है।
क्या इसी को प्यार कहते, क्या यही जीवन नया है॥
हे अधर मुस्कान लाली,
नयन में मधुमाश छाया।
ली कसम जब से तुम्हारी,
दीप मन का जगमगाया॥
ले रहा अंगड़ाई मौसम, याद कोई आ गया है।
क्या इसी को प्यार कहते ,क्या यही जीवन नया है॥
बज उठे नूपुर कहीं पर,
दूर कोई गा रहा है।
रंग जीवन के संजोये,
पास कोई आ रहा है॥
गीत अधरांे पर मिलन का, आज कोई आ गया है।
क्या इसी को प्यार कहते, क्या यही जीवन नया है॥

तुम कब आओगे

मेरे सपनों के सौदागर, तुम कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले, तुम कब आओगे॥
तेरे ओ मेरे अपने,
मैं दर्द छिपाये जाऊँ।
अब राह बताये मुझको,
मैं पंख लगे उड़ जाऊँ॥
मेरे बन दिल की धड़कन, तुम कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले, तुम कब आओगे॥
अब तो साँस मेरी,
माला जपे तेरी।
चैन चुराया तुमने
नींद उड़ी मेरी॥
मेरा दिल चुराने वाले, तुम कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले, तुम कब आओगे॥
धरती पर आँसू से,
तेरा ही नाम लिखा।
जब भी कहँू गज़ल,
तेरा ही गीत लिखा॥
मेरा गीत चुराने वाले, तुम कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले, तुम कब आओगे॥

मेरे द्वारे

गंगा की पावन धारा तुम, आओ अब मेरे द्वारे।
हर गीत निखर जाये मेरा, तुम आओ जब मेरे द्वारे॥
मैं पलक पांवणे बैठा था,
मेरा अपना भी आयेगा।
ऐसा ही मैं भी गीत लिखूं,
पत्थर मूरत हो जायेगा॥
यह गीत सिन्धू सा हो जाये, तुम आओ जब मेरे द्वारे।
गंगा की पावन धारा तुम आओ अब मेरे द्वारे॥
तू तुलसी की रामायण,
मैं प्रेम चन्द की रंगशाला।
तू गालिब की ग़ज़ल बने,
बच्चन की मैं भी मुधशाला॥
गीतांे को सरगम मिल जाये, तुम आओ जब मेरे द्वारे।
गंगा की पावन धारा तुम आओ अब मेरे द्वारे॥
तुम वृहद कोष हो शब्दों का,
मैं एक शब्द में हो गया।
अब मेरा मथुरा का यौवन,
मन वृन्दावन हो गया॥
हर गीत गीता हो जाये, तुम आओ जब मेरे द्वारे।
गंगा की पावन धारा तुम, आओ अब मेरे द्वारे॥

नूतन सवेरा

रूप का सौरभ लुटाता, लग गया साँसों का पहरा।
प्यार के अब गीत गाता, आ रहा नूतन सवेरा॥
रूप का आज सावन,
बरस गया अंग-अंग।
सौंधी सी गंध आयी,
और भायी तन-मन॥
अंग-अंग भाये तुम, आ रहा नूतन सवेरा।
प्यार के अब गीत गाता, आ रहा नूतन सवेरा॥
तुम काली हो कजरारी,
कितनी उजली सी जलधार।
तन मन में उनके रहता,
कितना मीठा – मीठा प्यार॥
रात की रानी बनी तुम, आ रहा नूतन सेवरा।
प्यार के अब गीत गाता, आ रहा नूतन सवेरा॥
नाम ना पूछा तुम्हारा,
गाँव ना पूछा तुम्हारा।
झलक भर आखों ने देखा,
बस यहीं परिचय तुम्हारा॥
रूप का रस-रंग बरसता, आ रहा नूतन सवेरा।
प्यार के अब गीत गाता, आ रहा नूतन सवेरा॥

तेरा नाम

प्यार तेरा हो समाया, गीत ऐसा गा ना पाया।
हाथों में सुबह शाम, नाम लिख ना पाया॥
प्रेम की अराधना,
मौन रहना साधना।
पास भी हो दूर भी हो,
तुम नयन के बीच हो॥
हृदय के बीच तेरा, नाम लिख ना पाया।
प्यार तेरा हो समाया, गीत ऐसा गा ना पाया॥
चलते-चलते अब मैं हारा,
देखो फिर आया अंधियारा।
सोई पीड़ा जाग ना जाये,
मुझको तेरी याद ना आये॥
आँसू मेरी आँख का, कहानी सुना ना पाया।
प्यार तेरा हो समाया, गीत ऐसा गा ना पाया॥
पास मैं केवल निराशा,
बन गया तेरा दिवाना।
जिन्दगी से जूझ हारा,
जानता संसार सारा॥
जीवन की आशा को डौर बांध ना पाया।
प्यार तेरा हो समाया, गीत ऐसा गा ना पाया॥

पागल मन

बोल सुहाना सुनकर तेरा, मन पागल सा हो जाता है।
जब-जब तेरा रूप निहारूं, मन कैसर सा हो जाता है॥
फूलांे सी मुझको तुम भाती,
घड़ियाँ वो मिलने की मधुरम।
मधुमति सी महक तुम्हारी,
मेरी साँसों की तुम घड़कन॥
नेनों ने तुमको जो देखा, मन चंचल सा हो जाता है।
बोल सुहाना सुनकर तेरा, मन पागल सा हो जाता है॥
मन में अन्दर की हलचल
मोहक तुम मुझको लगती हो।
अंग – अंग तरूणाई लेता,
तुम पुरबा वायु लगती हो॥
दर्पण में तुमने जो देखा, मन सम्मोहित हो जाता है।
बोल सुहाना सुनकर तेरा, मन पागल सा हो जाता है॥
महावर पांव में संचित,
लिख रही किस्मत की रेखा
देखती तुम कनखियों से
नयन में काजल की रेखा॥
देख तुम्हारा रूप मनोरम, मन सरसों सा हो जाता है।
बोल सुहाना सुनकर तेरा, मन पागल सा हो जाता है॥

 

तन मधुबन सा रहता

मेरा मन गंगा सा पावन, तन मधुबन सा रहता है।
तुम जब से मन में आये, मन पागल सा रहता है॥
पर हृदय की पीर,
सदा हरी मैंने।
पर हृदय का गीत,
सदा रचा मैंने॥
तुमने मनके तारांे को झंकार दिया, मन चन्दन सा रहता है।
तुम जब से मन में आये, मन पागल सा रहता है॥
चुपके चुपके सपनों मंे
तुम क्या आये।
सूने मन में अनगिन,
बहार ले आये॥
तुमने अपने घंूघट पट से क्या देखा, मन दर्पण सा रहता है।
तुम जब से मन में आये, मन पागल सा रहता है॥
इस मन पर न जाने,
कितनों का पहरा।
मन ने खाये धोखे,
कितना जख्म हरा॥
तुमने जबसे मन स्पर्श किया, मेरा मन कुन्दन सा रहता है।
तुम जब से मन में आय, मन पागल सा रहता है॥

गुमसुम रहती हो

चुपचाप बैठी हो, गुमसुम रहती हो।
याद में तुम किसके, आहें भरती हो॥
दिल दीवाना ये,
तेरे प्यार में रहता है।
याद में अब तेरी,
दिल पागल रहता है॥
जब प्यार करे कोई, तुम आहें भरती हो।
चुपचाप बेठी हो, गुमसुम रहती हो।
बातें किसके दिल की,
मन बुनता रहता है।
सूनी सूनी रातें,
दिन सूना रहता है॥
राहें तकती किसकी, सुनसान रहती हो।
चुपचाप बेठी हो, गुमसुम रहती हो।
फूलों से रंग चुरा,
भंवरा गुनगुन करता।
खुश्बू तेरी लेकर,
हर फूल खिला करता॥
चांदी से बाल तेरे, सोने सी लगती हो।
चुपचाप

सुख के साथी

सुख के साथी बने हजारों, साथी दुःख के बनों तो जानूँ।
उजियारों के कितने साथी, अधियारों के बनों तो जानूँ॥
कब से दूर सुहाने सपने,
टूट गया विश्वास हमारा।
पथरा गई अब आखंे मेरी,
जीवन अब जीने से हारा॥
मेरे सपनों में तुम रहते, साथी दुःख के बनों तो जानूँ।
उजियारों के कितने साथी, अधियारों के बनों तो जानूँ॥
हमें तिमिर ने बहुत छला,
और नहीं छल पायेगा।
बाहर तो बाहर अब भीतर,
उजियारा भर जायेगा॥
मेरे हृदय में तुम बसते, साथी दुःख के बनों तो जानूँ।
उजियारों के कितने साथी, अधियारों के बनों तो जानूँ॥
तन के संग मन भीगेगा,
खुशियोंका अंकुर फूटेगा।
जाने कितनी राह मिलेंगी,
हर राही अपना होगा॥
मेरे गीतों में तुम रहते, साथी दुःख के बनों तो जानूँ।
उजियारों के कितने साथी, अधियारों के बनों तो जानूँ॥

बेठी हो, गुमसुम रहती हो।

 

याद की परछाइयां

याद की परछाईयों के, गीत गाने दो मुझे तुम।
सिसकती अंगड़ाईयों के, गीत गाने दो मुझे तुम॥
याद की परछाईयों को,
ढूढ़ने को मैं चला हूँ।
दर्द की तन्हाईयों को,
बीनने को मैं चला हूँ॥
सागर की गहराईयों में, डूब जाने दो मुझे तुम।
याद की परछाईयोंके, गीत गाने दो मुझे तुम॥
अश्रु की गहराइयों में,
गीत ढूंढता हूँ मैं।
सिसकती अमराईयो में,
पीर देखता हूँ मै॥
धड़कती तन्हाईयों को, भूल जाने दो मुझे तुम।
याद की परछाईयोंके गीत गाने दो मुझे तुम॥
सिन्धु की गहराईयों में,
अश्रु ढूंढता हूँ मैं।
सपनों की कल्पना में,
प्यार देखता हूँ मैं॥
प्यार की शहनाईयाँ को गुनगुनाने दो मुझे तुम।
याद की परछाइयोंके गीत गाने दो मुझे तुम॥

मन बन्जारा

इतना प्यार नहीं करना तुम, मन बन्जारा गाता जाये।
गीत गाने दो मुझे तुम, मन बन्जारा गाता जाये॥
मुझको कब अहसास ऐसा,
मेरे स्वर तुम्हारे पास।
मेरी काया मेरे पास,
मेरी साँस तुम्हारे पास॥
मेरी हर धड़कन में तुम, मन बन्जारा गाता जाये।
इतना प्यार नहीं करना तुम, मन बन्जारा गाता जाये॥
तुम से जन्म जन्म का नाता,
तन छूटे मन छूट ना पाता।
चांद और तारों की बातें,
क्यांे में गाता और सुनाता॥
मेरे हर सपने में तुम, मन बन्जारा गाता जाये।
इतना प्यार नहीं करना तुम, मन बन्जारा गाता जाये॥
झूठे जग के गायन झूठे,
क्षणिक सुखों के बन्धन झूठे।
व्याकुल सा मेरा तन मन,
अधरों से मेरी अनबन॥
कब से मौन बने हो तुम, मन बन्जारा गाता जाये।
इतना प्यार नहीं करना तुम, मन बन्जारा गाता जाये॥

आम आदमी आयेगा

गुन्डागर्दी नहीं चलेगी, आम आदमी आयेगा।
भ्रष्टाचारी कुर्सी छोड़ो, आम आदमी आयेगा॥

दफ्तर बाबू आता अब, दो रूपये घर से लाता है।
जेब शाम को घर पे देखे, लाखों रूपये पाता है॥

पशु हमारे भूखे मरते, चारा खा गये सारा तुम।
हाथ दलाली में काले, और सारे भ्रष्टाचारी तुम॥

पकड़ के बेटी दो गुन्डे, थाने में ब्याह रचाते हैं।
आनर किलिंग कानून बता, सूना ही रोब जमाते हैं॥

आपस में लड़ने भिड़ने से, देश तरक्की नहीं करेगा।
सदियोंसे सम्बन्ध हमारे, मिलजुल कर ही काम चलेगा॥

लोकतन्त्र की रक्षा करने, आम आदमी आया है।
लोकपाल बिल पास कराने, आम आदमी आया है॥

शिक्षा का स्तर गिरता है, टयूशन की टीचर कहता है।
रिश्वत लेकर दिया दाखिला, बालक कैसे पढ़ता है॥

कोई घटना छेड़छाड़ की, अब ना कर पायेगा।
हाथ में ले लेकर अब झाड़ू, आम आदमी आयेगा॥

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