राज नारायन ‘राज़’ की रचनाएँ

अशआर रंग रूप से महरूम क्या हुए

अशआर रंग रूप से महरूम क्या हुए
अल्फ़ाज ने पहन लिए मानी नए नए

बूँदें पड़ी थीं छत पे कि सब लोग उठ गए
क़ुदरत के आदमी से अजब सिलसिले रहे

वो शख़्स क्या हुआ जो मुकाबिल था सोचिए
बस इतना कह के आईने ख़ामोश हो गए

इस आस पे कि ख़ुद से मुलाक़ात हो कभी
अपने ही दर पर आ ही दस्तक दिया किए

पत्ते उड़ा के ले गई अंधी हवा कहीं
अश्‍जार बे-लिबास ज़मीं में गड़े हुए

क्या बात थी की सारी फ़ज़ा बोलने लगी
कुछ बात थी कि देर तलक सोचते रहे

हर सनसनाती शय पे थी चादर धुएँ की ‘राज़’
आकाश में शफ़क़ थी न पानी पे दाएरे

जाने किस ख़्वाब का सय्याल नशा हूँ मैं भी

जाने किस ख़्वाब का सय्याल नशा हूँ मैं भी
उजले मौसम की तरह एक फ़ज़ा हूँ मैं भी

हाँ धनक टूट के बिखरी थी मिरे बिस्तर पर
ऐ सुकूँ लम्स तिरे साथ जिया हूँ मैं भी

राह पामाल थी छोड़ आया हूँ साथी सोते
कोरी मिट्टी का गुनह-गार हुआ हूँ मैं भी

कितना सरकश था हवाओं ने सज़ा दी कैसी
काठ का मुर्ग़ हूँ अब बाद-नुमा हूँ मैं भी

कैसी बस्ती है मकीं जिस के हैं बूढ़े बच्चे
क्या मुकद्दर है कहाँ आ के रूकाँ हूँ मैं भी

एक बे-चेहरा सी मख़लूक है चारों जानिब
आईनों देखो मुझे मस्ख़ हुआ हूँ मैं भी

हाथ शमशीर पे है ज़ेहन पस-ओ-पेश में है
‘राज़’ किन यारों के मा-बैन खड़ा हूँ मैं भी

कोई पत्थर ही किसी सम्त से आया होता

कोई पत्थर ही किसी सम्त से आया होता
पेड़ फल-दार मैं इक राह-गुज़र का होता

अपनी आवाज़ के जादू पे भरोसा करते
मोर जो नक़्श था दीवार पे नाचा होता

एक ही पल को ठहरना था मुंडेरों पे तिरी
शाम की धूप हूँ मैं काश ये जाना होता

एक ही नक़्श से सौ अक्स नुमायाँ होते
कुछ सलीक़े ही से अल्फ़ाज़ को बरता होता

लज़्ज़तें क़ुर्ब की ऐ ‘राज़’ हमेशा रहतीं
शाख़-ए-संदल से कोई साँप ही लिपटा होता

क्या बात है कि बात ही दिल की अदा न हो 

क्या बात है कि बात ही दिल की अदा न हो
मतलब का मेरे जैसे कोई क़ाफ़िया न हो

गुल-दान में सजा के हैं हम लोग कितने ख़ुश
वो शाख़ एक फूल भी जिस पर नया न हो

हर लम्हा वक़्त का है बस इक ग़ुँचा-ए-बख़ील
मुट्ठी जो अपनी बंद कभी खोलता न हो

अब लोग अपने आप को पहचानते नहीं
पेश-ए-निगाह जैसे कोई आईना न हो

वहशी हवा की रूह थी दीवार ओ दर में रात
जंगल की सम्त कोई दरीचा खुला न हो

क्या बात थी कि जो भी सुना अन-सुना हुआ

क्या बात थी कि जो भी सुना अन-सुना हुआ
दिल के नगर में शोर था कैसा मचा हुआ

तुम छुप गए थे जिस्म की दीवार से परे
इक शख़्स फिर रहा था तुम्हें ढूँढता हुआ

इक साया कल मिला था तिरे घर के आस-पास
हैरान खोया खोया सा कुछ सोचता हुआ

शायद हवा-ए-ताजा कभी आए इस तरफ
रक्खा है मैं ने घर का दरीचा खुला हुआ

भटका हुआ ख़याल हूँ वादी में ज़ेहन की
अल्फ़ाज के नगर का पता पूछता हुआ

चाहा था मैं ने जब भी हदों का फलांगना
देखा था आगे आगे उफ़ुक दौड़ता हुआ

छिटकी हुई थी चाँदनी यादों की शब को ‘राज़’
आँगन मिरे ख़याल का था चौंकता हुआ

मैं संगलाख़ ज़मीनों के राज़ कहता हूँ

मैं संगलाख़ ज़मीनों के राज़ कहता हूँ
मैं गीत बन के चट्टानों के बीच गूँजा हूँ

तुलू-ए-सुब्ह का मंज़र अजीब है कितना
मिरा ख़याल है मैं पहली बार जगा हूँ

मिरा वजूद गनीमत है सोचिए तो सही
मैं ख़ुश्‍क डाल का पत्ता हरा हरा सा हूँ

बजा कि रोज़ अँधेरा मुझे निगलता है
मैं रोज़ इक नया ख़ुर्शीद बन के उठता हूँ

किसी ने बात ही समझी न हाल ही पूछा
अजीब कर्ब के आलम में घर से निकला हूँ

मैं जानता हूँ कि है इर्तिका की क्या सूरत
मैं आह बन के उठा अब्र बन के बरसा हूँ

अजीब बात है हर सम्त रास्ते हैं रवाँ
अजीब बात है मैं घर की राह भूला हूँ

मुझे तलाश करेंगे नई रूतों में लोग
मैं गहरी धुंद में लिपटा हुआ जज़ीरा हूँ

इस इक सवाल ने रक्खा है मुद्दतों हैराँ
मैं किस का रूप हूँ मैं ‘राज़’ किस की छाया हूँ

टूटी हुई दीवार की तक़दीर बना हूँ

टूटी हुई दीवार की तक़दीर बना हूँ
मैं कैसा फ़साना हूँ कहाँ लिक्खा हुआ हूँ

कोई भी मिरे कर्ब से आगाह नहीं है
मैं शाख से गिरते हुए पत्ते की सदा हूँ

मुट्ठी में लिए माज़ी ओ इमरोज की किरनें
मैं कब से नए दौर की चौखट पे खड़ा हूँ

इस शहर-ए-पुर-आशोब के हँगामा ओ शर में
ज़ैतून की डाली हूँ कहीं शाख़-ए-हिना हूँ

गवय्या नहीं लफ़्जों के मआनी से शनासा
इदराक की सरहद पे मैं चुप-चाप खड़ा हूँ

सिमटा तो बना फूलों की ख़ुश-रंग क़बाएँ
बिखरा हूँ ख़ुशबू की तरह फैल गया हूँ

मैं ‘राज़’ चमकता हुआ झूमर था किसी का
अब शब के समंदर में कहीं डूब गया हूँ

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