राधेश्याम बन्धु की रचनाएँ

रूप बादल हुआ

रूप बादल हुआ
प्यार पागल हुआ
क्यों नदी घाट की प्यास बुझती नहीं

मेघ घिरते रहे कामना की तरह
हम तरसते रहे प्रार्थना की तरह
धैर्य बंधन हुआ
दर्द क्रंदन हुआ
क्यों सुखद नेह की बूँद झरती नहीं

सीपियाँ तन बदन मोरपंखी नयन
ढूँढती है किसे खुशबुओं की छुअन
नैन दपर्ण हुआ
अश्रु अंजन हुआ
क्यों हिरन की व्यथा रेत सुनती नहीं

धूप से छांव तक हम भटकते रहे
अजनबी की तरह घर में रहते रहे
मौन परिचय हुआ
क्रूर संशय हुआ
क्यो घुटन की किठन रात कटती नहीं

आया है नया दौर

आया है नया दौर, नया मन बनाइए,
घायल दिलों के घाव पर मरहम लगाइए ।

लाना है अगर आदमी को आदमी के पास,
काँटों की जगह प्यार की ख़ुशबू बसाइए ।

रिश्तों का आर्इना बहुत नाज़ुक है दोस्तो,
शीशे के महल से नहीं पत्थर चलाइए ।

ऊँची हवेलियों का प्यार कहाँ खो गया,
उनमें भी कभी प्रेम का, दीपक जलाइए ।

करते रहे जो उम्र भर रोटी की तिजारत,
कुछ तो वतन के वास्ते ज़ज्बा जगाइए ।

लड़ते रहे जो उम्र भर कुर्सी के वास्ते,
उनको भी भरत की तरह जीना सिखाइए ।

सच्ची तड़प हो अगर तो मिलते हैं राम भी,
पहले तो अपने आप को ‘शबरी’ बनाइए ।

मैं अजनबी हूँ आज भी अपने ही शहर में ,
यह दर्द ‘बन्धु’ का क

उनकी खातिर कौन लड़े ?

उनकी खातिर कौन
लड़े जो ख़ुद से डरे-डरे ?

बचपन को बन्धुआ
कर डाला, कर्ज़ा कौन भरे ?

जिनका दिन गुज़रे भठ्ठी में
झुग्गी में रातें,
कचरे से पलने वालों की
कौन सुने बातें ?
बिन ब्याही माँ
बहन बन गई, किस पर दोष धरे ?

चूड़ी की भठ्ठी हो चाहे
कल खराद वाले,
छोटू के मुखपर ढाबे ने
डाल दिए ताले ।
पिता जहाँ
लापता, पुत्र किससे फ़रियाद करे ?

आतिशबाज़ी के मरुथल में
झुलस रहा बचपन,
भीख माँगता भटक रहा है
सड़कों पर जन-गण ।
सौ-सौ घाव
लगे बुधिया तन, मरहम कौन धरे ?

उनकी खातिर
कौन लड़े, जो ख़ुद से डरे-डरे ?

भी दिल से लगाइए ।

 

राशन की नदियाँ

संसद की राशन
की नदियाँ किस तहख़ाने में खो जातीं ?
पानी के बदले
शब्दों की कोरी हमदर्दी दिखलातीं ?

फ़सलों का दुख कौन सुनेगा
जो है सबकी भूख मिटाती ?
क्यों विदर्भ के कृषक मर रहे
जिनकी मेहनत स्वर्ग उगाती ?

संसद की मधुऋतु
बयार भी झुग्गी तक है गन्ध न लाती ?

क्यों कपास की फ़सल लुट रही
क्यों धनिया ख़ुदक़ुशी कर रही ?
कर्जे के जुल्मों से डरकर
आत्मदाह ख़ुद कुटी कर रहीं ?

बहता रोज़ तकाबी
का जल फिर भी क्यों कुर्की है आती ?

खलिहानों में मौत उग रही
पर मुखिया-घर दावत चलती,
आज सियासत बनी तवायफ़
मंत्री के घर मुजरा करती ।
क्यों गरीब बुधिया
की जवानीं मुखिया के घर में लुट जाती ?

संसद की राशन
की नदियाँ किस तहख़ाने में खो जातीं ?

शब्द बोलेंगे

जो अभी तक
मौन थे, वे शब्द बोलेंगे,

हर महाजन
की बही का, भेद खोलेंगे ।

पीढ़ियाँ गिरवीं फ़सल के
बीज की खातिर,
लिख रहा है भाग्य मुखिया
गाँव का शातिर !

अब न पटवारी
घरों में युद्ध बोएँगे ।

आ गई खलिहान तक
चर्चा दलालों की,
बिछ गई चौपाल में
शतरंज चालों कीं ।

अब शहर के
साण्ड, फ़सलों को न रौंदेंगे ।

कौन होली, र्इद की
ख़ुशियाँ लड़ाता है ?
औ हवेली के लिए
झुग्गी जलाता है ।

सभी नकली
वोट की दूकान तोड़ेंगे,

जो अभी तक
मौन थे,

जीवन केवल गीत नहीं

जीवन केवल
गीत नहीं है, गीता की है प्रत्याशा,

पग-पग जहाँ
महाभारत है, लिखो पसीने की भाषा ।

हर आँसू को जंग न्याय की
ख़ुद ही लड़नी पड़ती,
हर झुग्गी की वुंफती भी अब
स्वयं भाग्य है लिखती ।

लड़ता है संकल्प
युग में, गाण्डीव की झूठी आशा ।

‘भागो मत दुनिया को बदलो’
सूरज यही सिखाता,
हर बेटा है भगतसिंह जब
ख़ुद मशाल बन जाता ।

सदा सत्य का
पार्थ जीतता, यही युद्ध की परिभाषा ।

अख़बारों में रोज़ क्रान्ति की
ख़बर खोजने वालो,
पर पड़ोस की चीख़ें सुनकर
छिपकर सोने वालो ।

हर मानव-बम
इन्क़लाब है, हर झुग्गी की अभिलाषा,

पग-पग जहाँ
महाभारत है, लिखो पसीने की भाषा ।।

वे शब्द बोलेंगे

अभी परिन्दों में धड़कन है

अभी परिन्दों
में धड़कन है,
पेड़ हरे हैं ज़िन्दा धरती,

मत उदास
हो छाले लखकर,
ओ माझी नदिया कब थकती?

चांद भले ही बहुत दूर हो
राहों को चांदनी सजाती,
हर गतिमान चरण की खातिर
बदली खुद छाया बन जाती।

चाहे
थके पर्वतारोही,
धूप शिखर पर चढ़ती रहती।

फिर-फिर समय का पीपल कहता
बढ़ो हवा की लेकर हिम्मत,
बरगद का आशीष सिखाता
खोना नहीं प्यार की दौलत।

पथ में
रात भले घिर आए,
कभी सूर्य की दौड़ न रूकती।

कितने ही पंछी बेघर हैं
हिरनों के बच्चे बेहाल,
तम से लड़ने कौन चलेगा
रोज दिये का यही सवाल ?

पग-पग
है आंधी की साजिश,
पर मशाल की जंग न थमती।

मत उदास
हो छाले लखकर,
ओ माझी नदिया कब थकती?

मोनालिसा के आलिंगन में

हम इतने
आधुनिक हो गए
अपना ही घर भूल गए,

‘मोनालिसा’
के आलिंगन में
ढाई-आखर भूल गए।

शहरी राधा को गाँवों की
मुरली नहीं सुहाती अब
पीताम्बर की जगह ‘जीन्स’ की
चंचल चाल लुभाती अब।

दिल्ली की
दारू में खोकर
घर की गागर भूल गए।

विश्वहाट की मंडी में अब
खोटे सिक्कों का शासन,
रूप-नुमाइश में जिस्मों का
सौदा करता दु:शासन।

स्मैकी
तन के तस्कर बन
सच का तेवर भूल गए।

अर्धनग्न तन के उत्सव में,
देखे कौन पिता की प्यास?
नवकुबेर बेटों की दादी
घर में काट रही बनवास।

नकली
हीरों के सौदागर
माँ का जेवर भूल गए,

हम इतने
आधुनिक हो गए
अपना ही घर भूल गए।

 

यादों के महुआ वन

यादों के-
महुआ-वन, तन-मन में महक उठे,
आओ हम बाँहों में, गीत-गीत हो जाएँ !

दिवसों की यात्राएँ
रातों में खो गईं,
सूर्यमुखी चर्चाएँ
छुई-मुई हो गईं !

मौसम के-
आश्वासन, दुश्मन से हो गए,
आओ हम राहों में, मीत-मीत हो जाएँ !

काँटे भी फूलों के
वेश बदल आते हैं,
रिश्तों के गुलदस्ते-
फिर-फिर चुभ जाते हैं !

अपने-
पिछवाड़े का हरसिंगार कहता है
आओ हम चाहों में, प्रीत-प्रीत हो जाएँ !

एक गन्ध

चम्पई इशारों
से लिख-लिख अनुबन्ध,
एक गन्ध
सौंप गयी सौ-सौ सौगन्ध।

चितवन की चर्चायें
महफिल में झूमती,
गलियों की मनुहारें
ग्रन्थों में गूँजती।
वादे की
गणित लिखे प्यार पर निबन्ध।

बाँहों भर स्वीकृतियाँ
गतिविधियाँ ले गयीं,
गन्धवती मुस्काने
खामोशी दे गयीं।
सिरहाने
बतियाते छुअनों के छन्द।

यादों के हरसिंगार
रात-रात जागते,
इठलाती पूनम से
एक रात माँगते।
रातों को
बहुत खले दिन के सम्बन्ध,

चम्पई इशारों
से लिख-लिख अनुबन्ध।

अब न रहो दूर

याद की मुंडेरी पर
टेर रहा
द्वार-द्वार मधुऋतु का प्यार,
अब न
रहो दूर खिले आँगन कचनार ।

सरसों को रिझा रही
अलसी की डालियाँ,
मेढों पर इठलाती
गेहूँ की बालियाँ ।

बनजारिन
गन्ध लिखे पत्र बार-बार ।

कभी-कभी होती है
नयनों से बात,
उम्र भर महकती है
एक मुलाकात ।

करे रात
रात एक गन्ध इन्तजार।

याद की मुंडेरी पर
कागा का शोर,
भिगो-भिगो जाता है
काजल की कोर ।

सूनापन
राह तके खडे-खडे द्वार,
अब न
रहो दूर खिले आँगन कचनार

क्यों नदियाँ चुप हैं

जब सारा जल
ज़हर हो रहा, क्यों नदियाँ चुप हैं?
जब यमुना का
अर्थ खो रहा, क्यों नदियाँ चुप हैं?

चट्टानों से लड़-लड़कर जो
बढ़ती रही नदी,
हर बंजर की प्यास बुझाती
बहती रही नदी!
जब प्यासा
हर घाट रो रहा, क्यों नदियाँ चुप हैं?

ज्यों-ज्यों शहर अमीर हो रहे
नदियाँ हुईं गरीब
जाएँ कहाँ मछलियाँ प्यासी
फेंके जाल नसीब?
जब गंगाजल
गटर ढो रहा, क्यों नदियाँ चुप हैं?

कैसा ज़ुल्म किया दादी-सी
नदियाँ सूख गई?
बेटों की घातों से गंगामैया
रूठ गईं।
जब मांझी ही
रेत बो रहा, क्यों नदियाँ चुप हैं?

कजरारे बादल

फिर-फिर मेघ
मुखर घिर आते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती,
द्वार-मुडेरी
झड़ी लगाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।

कभी धवल कजरारे बादल,
मदिरा से मतवाले बादल,
‘जीन्स’ पहन रूमाल हिलाते
ये मनचले रंगीले बादल।
घर-घर मेघदूत
बन गाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।

जब मिलने को पुरवा चलती
गदराई बालियाँ मचलतीं,
ढीठ छोकरी-सी इठलाकर
खिड़की पर बिजली क्या कहती?
फिर-फिर मेघमल्हार
सुनाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।

जब-जब रिमझिम बरसे पानी,
बढ़ जाती है प्यास पुरानी,
किसको सपने दर्द सुनाएँ
हर आँसू की यही कहानी?
बदरा सारी रात
जगाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती,
द्वार-मुडेरी झड़ी
लगाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।

 

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