रामकृष्ण खद्दर की रचनाएँ

दाम-नाम क्या

छै साल की छोकरी,
सिर पर रखे टोकरी।
नहीं बताती दाम है,
नहीं बताती नाम है,
दाम-नाम क्या पूछना,
हमें आम है चूसना!

गुलगुला

छुट्टी हुई खेल की,
चढ़ी कढ़ाही तेल की।
सुर-सुर उठता बुलबुला,
छुन-छुन सिकता गुलगुला।
भुलभुला और पुलपुला,
मीठा-मीठा गुलगुला।

लड़े नकलची राजा

हरी मिर्च का किला बनाया,
धनिया का दरवाजा,
बैंगन की झट तोप लगाई,
लड़े नकलची राजा।

मेरे खेल

मैं खूब फुदकता रहता हूँ,
मैं लुकता छिपता रहता हूँ।
मैं आँख मिचौली खेलता हूँ,
मैं चूहा बिल्ली खेलता हूँ।
मैं चूँ चूँ म्याऊँ करता हूँ,
मैं मच्छी, मच्छी खेलता हूँ।
मैं कित्ता पानी पूछता हूँ,
मैं यह सब खेल खेलता हूँ।

-साभार: बालसखा, जुलाई 1940, 301

Share