रामसेवक शर्मा की रचनाएँ

खेल कबड्डी

देशी खेल हमारा-
खेल कबड्डी का
सबसे सस्ता प्यारा
खेल कबड्डी का।

महँगा क्रिकेट-साथी
टेनिस बल्ला है,
समझ नहीं आता क्यों
इतना हल्ला है।

बोल कबड्डी, बोल कबड्डी
बोलो भी
कितना दम खम है,
आपस में तोलो भी!

करें प्रदर्शन घेर
खिलाड़ी आते हैं,
दिल्ली की संसद में
माँग उठाते हैं।

सबको हो अनिवार्य
कबड्डी, क्या कहना,
मैच कबड्डी वाले
होते ही रहना।

-साभार: नंदन, जुलाई, 1996, 37

प्यासी सोन-चिरैया

प्यासी-प्यासी सोन-चिरैया
पानी दो।
बादल-भैया प्यासी बुढ़िया
पानी दो।

पिछली बार बहुत कम बरसे
तरसे हम।
अब की बार बरसना जमके
हरषें हम।

प्यासी-प्यासी नीम-निबरिया
पानी दो।

उठा घटाएँ काली-काली
अड़-अड़ धम।
गरज-गरज के बरसो आँगन
झर-झर झम।

प्यासी-प्यासी ताल मछरिया
पानी दो।

झूलों का मौसम आएगा
झूलेंगे।

पेंग बढ़ाके आसमान को
छू लेंगे।
प्यासी-प्यासी श्याम-कुयलिया
पानी दो।

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