रामेश्वरी देवी मिश्र ‘चकोरी’ की रचनाएँ

खेला करती थी बगिया में

खेला करती थी बगिया में, फूलों और तितलियों से।
बातें करती रहती थी अक्सर उन अस्फुट कलियों से।
कितना परिचय था घनिष्ठ नरही की प्यारी गलियों सें।

किन्तु लगा चस्का पढ़ने का, कुछ दिन बाद मुझे प्यारा।
मिली साथिनें नयी-नयी वह नूतन जीवन था प्यारा।
मेरे लिए विनोद-भवन महिला-विद्यालय था सारा॥

महिला-विद्यालय को छोड़ा, नरही की गलियाँ छोड़ीं।
बगिया-सी विभूत छोड़ी, हँसती प्यारी कलियाँ छोड़ीं।
साथ खेलोवाली वे बचपन की प्रिय सखियाँ छोड़ीं॥

वे अतीत की स्मृतियाँ आकर, हाहाकार मचाती हैं।
अन्तरतम में एक मधुर-सी, पीड़ा ये उपजाती हैं॥

कुछ कहो, कहाँ से आये हो

कुछ कहो, कहाँ से आये हो, मतवाली व्यापकता लेकर?
मरकत के प्याले में भर दी, यह किसकी मादकता लेकर?
शैशव के सुन्दर आँगन में, तुम चुपके से आगये कहाँ?
भोले-भाले चंचल मन में, लज्जा-रस बरसा गये कहाँ?

ले गये चुरा किस हेतु, कहो वह जीवन शान्त तपस्वी का!
निष्कपट, अलौकिक, निर्विकार, शुचि, सुन्दर, धीर मनस्वी का।
उस छोटे से नन्दनवन में जिसमें न पुष्प थे, कलियाँ थीं;
थे भाव नहीं, आसक्ति न थी, केवल प्रमोद रँगरलियाँ थीं।

संकुचित कली की पंखुरियाँ छू चुपके-से विकसा दीं क्यों?
सौरभ की सोई-सी अलकें आसक्त कहो उसका दीं क्यों?
उस शान्त स्निग्ध नीरवता में प्रलयंकर झंझावत मचा;
यह कैसा कायाकल्प किया-यह कैसा माया-जाल रचा।

लज्जा का अंजन लगा दिया, उन चपल हठीली आँखों में।
ले गये लूट स्वातंत्र्य-सौम्य हे हठी लुठेरे लाखों में॥
नन्हंे मन में किस भाँति अचानक आज प्रणय को पहचाना।
अभ्यन्तर में क्यों सुनती हूँ पीड़ा का व्यथा-सिक्त गाना॥

उर-अन्तर किसके मिलने को अज्ञात भावनाएँ भरकर।
उन्मत सिन्धु-सा उबल पड़ा अपना लेने किसको बढ़कर॥
उस सरल हृदय में यह कैसा अभिलाषाओं का द्वन्द्व हुआ।
उत्थान हुआ या पतन हुआ, दुख हुआ, या कि आनन्द हुआ॥

अँग-अँग मूक सम्भाषण की यह कैसी जटिल पहेली है।
बतलाओ तुम्हीं, तुम्हारी ही उलझाई अखिल पहेली है॥

क्या है यह आकर्षण

क्या है यह आकर्षण? कैसा है इसका इतिहास?
आँखों के मिलते ही बढ़ती क्यों अखों की प्यास?
अधर खोजते रहते अस्फुट अधरों की मुसकान;
यौवन हाथ पसार माँगता क्यों यौवन का दान?

हृदय स्वयं ही कर लेता है न्याय हृदय का आप;
बन जाता है अपनापन क्यों अपना ही अभिशाप?
एक वासना है, उसको सब क्यों कहते हैं प्यार?
अचिर उमंग-जनित यह कैसा है कलुषित व्यापार।

अब न देखना पगली इस नश्वर यौवन का रंग॥
एक सुनहरी छाया, जिस पर हँसता रहे अनंग।
इसी क्षणिक अस्पष्ट स्वप्न की परिभाषा है पाप।
जिसमें सीमित है ममता के जीवन का अनुताप।

भव-सागर के तट पर अज्ञान

भव-सागर के तट पर अज्ञान, सुनती हूँ वह कलरव महान।
एकाकी हूँ कोई न संग, उठती हैं रह-रह भय-तरंग॥
केवल हैं बादल अश्रु-दान, घन का सुनती गर्जन महान॥

आती है तड़ित चिराग लिये, बिछड़ी स्मृति का अनुराग लिये;
होता है भीषण अट्टहास, बुझ जाता है वह भी प्रकाश॥
मारुत का वेग प्रचंड हुआ, वह उदधि हृदय भी खंड हुआ।
ओढ़े काले रँग का दुकूल, है अन्त-हीन-सा सिंधू-कूल।

उत्ताल तरंगे बढ़ आई छूने को मेरी परिछाईं।
उन संभ्रम शिथिल झकोरों की, ममता-सी-मृदुल हिलोरों को॥
लेकर सब शून्य उमंगों को, पकड़ा उन तरल तरंगों को।
वह चली त्याग पीड़ा-विषाद, सुध-हीन हुई, मिट साध॥

सहसा कानों में उषा-गान, झनझना उठा छू शिथिल प्राण।
सागर की धड़कन शान्त हुई, वह स्वप्न-नाटिका भ्रांत हुई॥
खिलखिला पड़ा जग एक बार, आ पहँचा मेरा कर्णधार।
यौवन-कलिका थी जाग उठी, लहरों की शय्या त्याग उठी॥

अर्पण कर प्रेम मुझे नाविक ने दिया सुहाग मुझे।
नाविक की वह पतवार-हीन, नौका थी जर्जर अति मलीन॥
द्रुत गति से नौका बहती थी, कुछ मौन स्वरों में कहती थी।
इस बार तरंगें मचल पड़ी, तरणी के पथ में अचल अड़ीं॥

मैं काँप उठी, उद्भ्रांत हुई, जर्जर नौका भी शांत हुई।
रक्षक भी मेरा था अधीर, दृग-कोरों से बह चला नीर॥
सहसा तरणी जल-मग्न हुई, छाया-सी क्षण में भंग हुई।
प्राची में अरुण मुस्कुराया, लहरांे ने प्रलय-गान गाया।

मेरा नाविक बह गया कहीं, जीवन सूना रह गया वहीं॥
फिर बिखरा दी संचित उमंग, ले गई उसे भी जल-तरंग।
मैंने हो पथ-दर्शक-विहीन, कर लिया सिन्धु में आत्मलीन॥
कितना अथाह! कितना अपार! ले चली मुझे भी एक धार।

छूटे भव-बंधन, चाह नहीं, हो जाय प्रलय परवाह नहीं॥
जाती हूँ मैं उस पार वहाँ, है मेरा प्राणाधार जहाँ-
पीने को सुख से लूट-लूट, वह प्रण

होती यदि मीठी रागिनी मैं किसी कोयल की

होती यदि मीठी रागिनी मैं किसी कोयल की
होती यदि शान्त सरिता का एक कूल मैं॥
अमरों को नित्य ही कराती मधुपान, यदि-
होती मंजु वाटिका का प्राण एक फूल मैं।
भावमयी कल्पना जो कवि की ‘चकोरी’ होती,
होती कहीं विरही के अन्तर की शूल मैं।
चूमती सप्रेम मैं तुम्हारे चरणों को नित्य,
होती प्राणनाथ! यदि मारग की धूल मैं।

य-सुधा की ए

न मैं हूँ शैशव का मृदुहास

न मैं हूँ शैशव का मृदुहास, न मैं हूँ यौवन का उन्माद
न मैं हूँ आदि, न मैं हूँ अन्त, न हूँ वृद्धापन का अवसाद।
प्रकृति की हरियाली से तोल, हमारे जीवन का क्या मोल!

न हूँ मैं किसी हार की जीत, न मैं हूँ किसी हृदय का प्यार।
न मैं हूँ शान्ति, न मैं हूँ भ्रांति, न मैं हूँ सुखद प्रणय-उपहार।
समीरण के कंचन से तोल, हमारे जीवन का क्या मोल!

न मैं हूँ घृणा, न मैं हूँ प्रेम, न मैं हूँ आन, न मैं सम्मान।
न हूँ आशा की उज्ज्वल ज्योति, न मैं हूँ गान, न मैं अभिमान।
निशा के अन्धकार से तोल, हमारे जीवन का क्या मोल!

जिसे सुनती हूँ केवल स्वप्न, वही मेरा जीवन-संगीत।
जहाँ सीमित जग का अनुताप, वही है मेरा विसुध अतीत।
विश्व को नश्वरता से तोल, हमारे जीवन का क्या मोल!

अरे हूँ वन्य-कली सी देव, झाड़ियों में लिखती अनजान।
न सौरभ है, न मधुर मकरंद, न है भ्रमरों का मोहित गान।
कौन सकता है मुझको तोल, हमारे जीवन का क्या मोल!

किन्तु आयी हूँ बिकने आज, तुम्हारे ही हाथों हे नाथ।
अब न ठुकराना, करलो मोल, नाथ! मेरे प्राणों के नाथ।
अरे अपनी पद-रज से तोल, वही मेरे जीवन का मोल!

क घूँट।\

 

 

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