रामेश्वर खंडेलवाल ‘तरुण’ की रचनाएँ

कसकर जिया

जेठ की जली-सूखी दराड़-खाइर्द्य पपड़ीली धरती
अपनी आँतों में जैसे
वर्षा का पानी, अबाध रूप से है जज्ब करती-
वैसे ही, मैंने भी जीवन को ठेठ तक, अपने में आने दिया,
-मैं कसकर जिया।

दाएँ-बाएँ के फैलाव की खा कर पूरी गोलाई-
लेते ठेठ नीचाई से ठेठ ऊँचाई-
लेते ठेठ ऊँचाई से ठेठ नीचाई-
पूरे वेग से घूम चुका अपने तो लघु जीवन का लौह-पहिया।
-मैं कसकर जिया।

जीवन को मुट्ठीबंध ठेठ हत्थे से पकड़ा,
मौत को गला भींच कर जकड़ा।
प्रभात की अरुणालियों का शरबती शृंगार,
नील-क्षुब्ध समुद्रों का विस्तार-ज्वार,
-सभी तो इन होठों तक आ लिया।
-मैं कसकर जिया।

अपने स्नायु-स्पंज में धरा का
हरित-अरुण रस-सौन्दर्य पूरा भींचा,
आकाशी नील सपनों का
कल्पना-मदिर वैभव प्राणों में खींचा
आकाश से पृथ्वी तक का अनन्त विस्तार उधेड़ा, सिया।
-मैं कसकर जिया।

जीवन का मीठा-खारा, कड़वा-कसैला
तरल-गाढ़ा, अँधेरा-उजेला-
आँखें खोले, मौन रह,
कण्ठ भींच, पैदें तक पिया!

-मैं कसकर जिया।

198

प्रतिश्रुत हूँ

मैं प्रतिश्रुत हूँ-
अपने क्त की लाली के प्रति,
उषा की सरस गुलाली के प्रति,
धरती की ओस-जड़ी हरियाली के प्रति!
आदमी के सलोने सपने और खुशहाली के प्रति-
मैं प्रतिश्रुत हूँ!

मैं प्रतिश्रुत हूँ-
अपनी पहुँच की प्राण-सीमाओं तक,
जहाँ तक जल-लहरें, विसर्जनपूर्वक,
रेत की सूखी पसलियाँ-मात्र शेष रह जाती हैं!
अगरबत्ती और दीये की कांति-किरणें-
धूम्रपटलियाँ-मात्र शेष रह जाती हैं!
अपनी काया के पंख की-
जेठ की जलती रेत में असहाय टूटन-मुड़न तक,
अपनी आस्था-ज्वलित प्राण-तन्त्री के
अन्तिम गुंजन, अन्तिम मूर्च्छना, अन्तिम स्पन्दन तक
मैं प्रतिश्रुत हूँ!

मानव-अस्तित्व को चिलचिलाना है!
पीट कर, रौंद कर, मथ कर, सँवार कर-
बेपेंदी की-सी किरमिची जीवन-मिट्टी में से कंचन-लौ जगाना है!
मानव की आँखों का सलोना आदिम सपना
सत्य बनाना है!
हाँ, हाँ, मैं-
प्रतिश्रुत हूँ! प्रतिश्रुत हूँ!

1987

7

 

रू-ब-रू-ज़िन्दगी से

जब पूरी तानी पर तनी खुली छतरी जैसे
ऊँचे, गहरे-गहरे, धुपहले-चमकीले
विस्मय-ही-विस्मय-जैसे, तिल के फूल-से, नीले-
आसमान के नीचे-
अपने काँधे फेनों के अयाल लहराता
गहर-गम्भीर उछालें खाता, मीलों से हरहराता आता
थबोलता समुद्र का पानी
(कोई सुने या न सुने!)
नुकीली-खुरदुरी-बेडौल काली-भूरी-हरी-कत्थई
इस्पाती चट्टानों वाले किनारे से
सिर मार-मारकर,
पछाड़ें खा-खाकर, ताबड़तोड़ टकराया-
तब मैं जिंदगी से रू-ब-रू मिला!

धूप में
हवाई झोंक-झँकोरे के स्निग्ध-मौन चादरी बहाव के तहत
गेहूँ की हरी किरणों वाली अन्तर्जड़ाऊ बालियों
तोतापंखी समन्दर
एक महीन लय में
अलमस्त ग्राम-नर्तकी की धानी साड़ी की फहरान-सा
यहाँ से वहाँ तक
कोमल पटलियों में
आ-क्षितिज तरंगाया-
तब मैं जिंदगी से रू-ब-रू मिला!
पतले-कोमल चिकने डण्ठल में नहीं-
मेंहदी-रची हथेलियों वाली अज्ञातयौवना
मासूम पँखुरियों में भी नहीं-
पर, केसर-मधु-पराग खुशबू से रंगारंग-लथपथ
सुमनों के, कििलयों के कुँवारे कलेजे-सा
मुझमें कुछ-अपना, गीतों-भरा, नितान्त निजी
लदा-उभरा-सा, ज्वारों-भरा कुछ उफनाया-
तब मैं जिंदगी से रू-ब-रू मिला!

1987

अग्निचक्र: अग्नि-चित्र

बालपने में
अपने मटियाये-धूमधुमैले-से गाँव के
अपनी काची भीतों व खपरैल वाले
अपने घर के ममतालु चूल्हे के पास
माँ की गोद के पास हम बैठते थे।

मैं था बड़ा ऊधमी।
चूल्हे में से कपास के अधजले अग्नि-मुख डंठलों को, बनेष्ठियों को
दोनों हाथों से निकाल कर, दोनों हाथों की रगड़ी जाती
हथेलियों के बीच
मैं खूब घुमाता था गोलाकार-
स्वर्णिम-चंचल अग्नि-चक्र, अग्नि-चित्र कई आकारों के बनाने!

मेरे तकिये के गिलाफ पर
मेरी नींद व स्वप्न के फलक पर
अग्नि-कुसुमों की, अग्नि-चित्रों की ही तो डिजाइनें रही हैं।

रहा-मेरा सोना, खाना और पीना-
इन्हीं डिजाइनों का तो जीना!
जो था माँ के पास, मेरा मनोरंजनार्थ-
वही तो था मेरे शेष जीवन का यथार्थ!

1978

हम जीते तो हैं!

काली-पीली आँधियों वाली-
रेगिस्तानी
आसाढ़-साँझ में,
विद्युद्युति से प्रताड़ित,
डाल-लुकी,
अपने ही डैनों में,
अंगों में दुबकी
(‘छाँहौ चाहति छाँह’ की याद दिलाती)
किसी चिड़िया की
नन्ही-गोल,
स्तब्ध-भीत,
काठ-मारी
आँख-सा ही-
हमारा अस्तित्व भले ही हो,
पर, हम जीते तो हैं!

1969

 

 

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