राम गोपाल भारतीय की रचनाएँ

किसी की आँख में आँसू सजाकर

किसी की आँख में आँसू सजाकर
बहुत पछताओगे यूँ मुस्कुराकर

तुम उसके पाँव के छाले तो देखो
कहीं वो गिर न जाए डगमगाकर

तेरी शोहरत तेरा धन-माल इक दिन
हवा ले जाएगी पल में उड़ाकर

वही देता है अक्सर चोट दिल को
जिसे हम देखते हैं आज़माकर

हमारे सर की भी क़ीमत है कोई
जिसे हम जान पाए सर गँवाकर

बड़ा अच्छा था उनसे फ़ासला था
बहुत पछताए हम नज़दीक आकर

मेरी ज़बान में जो इतनी तल्ख़ियाँ होंगी

मेरी ज़बान में जो इतनी तल्खियाँ होंगी
ये आज की नहीं सदियों की ग़लतियाँ होंगी

अगर ये मुल्क़ कभी फिर से टूट कर बिखरा
तो ज़िम्मेदार हमारी ये जातियाँ होंगी

फ़ज़ा में घोल दिया ज़हर तो सोचो कैसे
हवा में तितलियाँ पानी में मछलियाँ होंगी

हमारी आँख का जल भाप बन गया शायद
बरस रही जो, उस जल की बदलियाँ होंगी

ख़ुदा का शुक्रिया करना जनम पे इनके भी
सहारा तेरे बुढ़ापे का बेटियाँ होंगी

दर्द औ’ फ़िक्र की पहचान ही रहने दे मुझे

दर्द औ’ फ़िक्र की पहचान ही रहने दे मुझे
देवता मत बना इंसान ही रहने दे मुझे

इतनी शोहरत न दे, दौलत न दे, मैं, मैं न रहूँ
ऐसी मुश्किल न कर आसान ही रहने दे मुझे

छीन मत मुझसे किसी फूल-से बच्चे की हँसी
एक मासूम-सी मुस्कान ही रहने दे मुझे

मुझको न बम, न किसी किस्म का हथियार बना
बस खिलौने का इक सामान ही रहने दे मुझे

उनको तू कुछ भी बना लोग जो बनना चाहे
मै हूँ जैसा मेरे भगवान् वैसा ही रहने दे मुझे

याद करते है तुझे लोग परेशानी में
है यही सच तो परेशान ही रहने दे मुझे

वफ़ा का ज़िम्मा किसी एक पर नहीं होता

वफ़ा का ज़िम्मा किसी एक पर नहीं होता
दिलों में फ़ासले लेकर सफ़र नहीं होता

किसी का टूट गया दिल तुम्हे पता ही नहीं
कोई भी दोस्त हो यूँ बेख़बर नहीं होता

किसी का बसता हुआ घर उजाड़ने वालो
हरेक शख़्स की क़िस्मत में घर नहीं होता

दिलों के बीच मुक़दमा भी क्या मुक़दमा है
की जिसका फ़ैसला सारी उमर नहीं होता

हरेक बात उड़ा देता है वो बातों में
किसी भी बात का उस पर असर नहीं होता

जब किसी मुफ़लिस से हक़ माँगा शिवाला चल दिए

जब किसी मुफ़लिस से हक़ माँगा शिवाला चल दिए
छीनकर मज़लूम के मुँह का निवाला चल दिए

ग़र उसूलों की कहीं बाते कोई करने लगा
तो हँसी में बात को, लोगो ने टाला चल दिए

रोशनी घर-घर में पहुँचे दे रहे उपदेश जो
चुपके से सूरज उठा, जेबों में डाला चल दिए

जो निक़्क़मे हैं, अगर देखें, तमाशा ग़म नहीं
लोग अच्छे भी ज़ुबाँ पर डाल ताला चल दिए

इस क़दर है रहनुमाओ पर सियासत का जुनून
पुर-अमन लोगो में इक मुद्दा उछाला चल दिए

रास्ते में, दोस्तो, कुछ लोग ऐसे भी मिले
दोस्ती के नाम पर मतलब निकाला चल दिए

मुस्कुराते ग़र रहोगे और पास आएँगे लोग

मुस्कुराते ग़र रहोगे और पास आएँगे लोग
तुम अगर रोने लगोगे दूर हट जाएँगे लोग

आज भोलेपन की क़ीमत ये भला समझंगे क्या
एक दिन खो देंगे तुझको और पछ्ताएँगे लोग

साँप अब डसने लगे है आस्तीनों से निकल
और कब तक दोस्त बनकर हमको बहलाएँगे लोग

हर गली, हर मोड़ पर, तैयार बेठे है सभी
आइना दिखलाओगे तो ईंट बरसाएँगे लोग

हादसे में जल गया है जिसके सपनो का जहाँ
वो भला समझेगा कैसे, कैसे समझाएँगे लोग

अब कोई समझे न समझे लेखनी के दर्द को
एक न एक दिन तो हमारे गीत दोहराएँगे लोग

 

लोग तो चलते रहे साथ उजाले लेकर

लोग तो चलते रहे साथ उजाले लेकर
और हम बैठ गए पाँव के छाले लेकर

एक मुफ़लिस ने ग़ुरबत मे ही दम तोड़ दिया
लोग आए भी तो क्या शाल-दुशाले लेकर

कोई सच बात भी लाए ज़ुबाँ पर कैसे
रहनुमा ही हैं खड़े हाथ मे ताले लेकर

एक अभागन का पिता रोज़ अदालत जाए
हाथ की चूड़ियाँ औ’ कान के बाले लेकर

है यहाँ दोस्त की पहचान न दुश्मन का निशाँ
आ गए मुझको कहाँ चाहने वाले लेकर

कैसे पाग़ल हैं जो नफरत में उसे ढूँढ़ते हैं
कोई खंजर तो

तेरा ख़याल जो मेरा ख़याल हो जाए

तेरा ख़याल जो मेरा ख़याल हो जाए
तो ख़त्म तेरा-मेरा हर सवाल हो जाए

जुड़े हो काश हमारे-तुम्हारे दिल ऐसे
सितम हो तुझपे मेरी आँख लाल हो जाए

किसी अमीर की ख़ुशियों से ऐतराज़ नहीं
ख़ुशी ग़रीब की भी तो बहाल हो जाए

न चाँद तारे न सूरज की ज़रूरत है मुझे
मेरे चिराग़ की बस देखभाल हो जाए

मै अपने ख़ून की स्याही से इन्क़लाब लिखूँ
ख़ुदाया मेरी क़लम इक मशाल हो जाए

ख़ुदा के वास्ते इतना भी तुम करम न करो
मै बेकमाल रहूँ और कमाल हो जाए

कोई हा

आज को छोड़ दिया जो तो मेरा कल फिसला

आज को छोड़ दिया जो तो मेरा कल फिसला
रेत की तरह मेरे हाथ से हर पल फिसला

मैं भटकता ही रहा ग़म के बियाबानों में
जब भी सर से मेरे माँ-बाप का आँचल फिसला

लोग कहते हें इसे दर्द का रिश्ता शायद
मैं भी रोया जो तेरी आँख से काजल फिसला

इस तरक़्क़ी में भी क्या-क्या न गँवाया हमने
शहर से छाँव गई गाँव से पीपल फिसला

चाँद छूने के लिए जिसने वतन को छोड़ा
आसमाँ छू न सका और धरातल फिसला

तू भी धरती की तरह प्यास लबों पर रखना
हाँ वही प्यास जिसे देख के बादल फिसला

थ में भाले लेकर

तमाम उम्र चिराग़ों के आस-पास रहे

तमाम उम्र चिराग़ों के आस- पास रहे
हमारे दौर के जुगनू मगर उदास रहे

उधर फ़क़ीरों की महफ़िल में मय बरसती रही
इधर अमीरों के खाली पड़े गिलास रहे

मुझे वो हौंसला देना की शेर पढता रहूँ
तुम्हारे होंठ पे जब तक ग़ज़ल की प्यास रहे

कठिन है दौर ज़रूरी है आदमी बनना
हमारा कोई धरम हो कोई लिबास रहे

 

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