लक्ष्मीकांत वर्मा की रचनाएँ

नव्य न्याय का अनुशासन-1

तुम्हारे इर्द-गिर्द फैलती अफ़वाहों से
मैं नहीं घबराता
तुम्हारे आक्रोश, क्रोध और आदेश से भी
मैं नहीं डरता

जब तुम चीख़ते-चिल्लाते, शोर मचाते हो
मैं तुम्हें आश्चर्य से नहीं देखता,
क़िताबों को फाड़कर जब तुम होली जलाते हो
हर हरियाली को चिता की सुलगती आग में–
बदलना चाहते हो,

मौलश्री की घनी छाया में आफ़ताब
वट-वृक्षों की वृद्ध जटाओं में सैलाब
और गुलमोहर की सुर्ख़ियों में
मशालों की रोशनी

पहाड़ों की चढ़ाइयों पर ज्वालामुखी
उगने की सभी आकांक्षाएँ मुझे ललकारती हैं
और मैं कुपित नहीं होता।

मैं निरन्तर तुम्हारे साथ होता हूँ
ख़ामोश लेकिन बहुत नज़दीक
मेरी ख़ामोश पुतलियाँ देखती हैं तुम्हारे चेहरे
मेरे कान सुनना चाहते हैं वे आहटें
कि तुम कब अपनी आग को
पराई व्यथा से जोड़ोगे
अपने दर्द को उस हद तक ले जाओगे
जिसमें केवल तुम्हारा दर्द नहीं
दूसरे का दर्द भी शामिल होगा।

कब तुम अकेले समूह बन पाओगे
और समूह को अकेला छोड़ दोगे
क्योंकि तब मेरी ख़ामोशी
तुम्हारी आवाज़ के साथ होगी
और मैं निरन्तर तुम्हारे साथ हूंगा
कभी अकेला समूह-सा
कभी समूह-सा अकेला

ईसा ने कहा : उत्सर्गित होने के पहले
मैंने जो सलीब कंधों पर रखी थी
तो लगा था– मैं अकेला हूँ
लेकिन जब चढ़ने लगा सलीब लादे चढ़ाइयाँ
मुझे लगा मेरे कन्धों पर सलीब नहीं
पूरे समूह की आस्था है
एक ब्रह्माण्ड ही मेरे साथ गतिमान है
किन्तु जब मैं पुनर्भाव में लौटा
तो नितान्त अकेला था।

नव्य न्याय का अनुशासन-2 

तुम गुलाब की क्यारियों में आग लगना चाहते हो
लगा दो : किन्तु गुलाब की सुगन्ध बचा लो
तुम हरी-भरी लताओं को लपटों में बदलना चाहते हो
बदल दो : किन्तु हरियाली मन में बसा लो

तुम प्रतिमाएँ तोड़ना चाहते हो
तोड़ दो : किन्तु आस्थाएँ ढाल लो
तुम ज्ञान को नकारना चाहते हो
नकार दो : किन्तु अनुभवों को संजो लो
तुम लक्ष्मण रेखाएँ मिटाना चाहते हो
मिटा दो : पर मर्यादाएँ सम्भाल लो
दीवारोंपर नारे और चौराहों पर क्रान्तियाँ लाना चाहते हो
ले आओ : पर शब्दों को संयम भाषा का मर्म दो
सुनो,
मैं तुम्हारे बदहवास चेहरों को
क़िताब मानता हूँ
इसलिए उठो मेरी जिज्ञासाएँ सम्भाल लो
तभी वैशम्पायन ने कहा–
बाणभट्ट
समास की भाषा नहीं
मुझे समास-मुक्त करके देखो
मुझे जीवन दो
तुम्हें मुक्ति मिलेगी।

एक दर्द और कई सीमाएं

एक दर्द और कई सीमाएं
हां
यह मैं हूँ
अकेला राहगीरों से अलग
मगर
मेरे साथ भी एक कारवां है
जिसे तुम कभी नहीं देखोगे
(मैं-
महज राख का गुबार नहीं
राह की गति भी हूँ
जिसे तुम नहीं समझोगे)

वह विराट् स्वप्न जिसके समक्ष सारा ब्राह्मण्ड केवल तीन
कदमों में बंध जाता है
वह अस्तित्व जिसमें केवल अनुभूतियों के क्षण समय के
मापदण्ड होते हैं
सच मानों मैं अकेला हूँ, इतना अकेला जितना प्रत्येक नक्षत्र दूसरे से अपरिचित किंतु अपरिचिति
की किरणों से प्रदीप्त
अकेला किंतु उस सामूहिक चेतना से अभिभूत…
शायद माला के उस मणि-सा जो केवल इसीलिए शोभा पाता है,
क्योंकि वह माला के दानों से सम्बध्द किन्तु पृथक होता है

मेरी सीमाएं- अस्थि-पंजर देह की, पिण्ड की, दृष्टि की, बुध्दि की
लेकिन मैं तुम्हारी उधार ली हुई दृष्टि लेकर क्या करूंगा, क्योंकि वह दृष्टि मेरी नहीं होगी, तुम्हारी
होगी
मेरे अस्तित्व के नाश पर वह बनी होगी।

मेरी सीमाएं हैं- आस्था की, विचारों की, संस्कारों की लेकिन मैं केवल अपनी आस्था लेकर क्या
करूंगा, क्योंकि तुम केवल समूह को पूजते हो
जिसमें सब कुछ है, केवल व्यक्ति नहीं है!

एक गलत अनुभूति के माध्यम से दूसरा सही निष्कर्ष
मैं आज व्यस्त हूँ
क्योंकि पडा-पडा सुन रहा हूँ
पडा-पडा देख रहा हूँ
पडा-पडा चल रहा हूँ
लोग गलत कहते हैं
पडे-पडे आदमी काहिल
हो जाता है।

बाथरूम का शावर खुला है
टैप से बूंद-बूंद पानी टपक रहा है
टेबू बडा शरारती है
मेरे पास से जाने कब उठा
और जाकर बम्बे में टपकने लगा।

मेरे बगैर उठे
दुनिया बदल गई
बच्चे धूप में चले गए
चारपाइयां आंगन में उल्टी खडी हो गई
मैं पडे-पडे देख रहा हूँ
यह बेडरूम
ड्राइंग रूम में बदल गया

सुबह दोपहर हो गई
कैलेण्डर की तारीख बदल गई
मैं पडा-पडा देखता रहा
जल्दी-जल्दी उठा
पत्नी पर बिगडा
आईने में अपनी शक्ल की
हजामत बनाई
बिना नहाए ही कपडे पहनने लगा
धुला कपडा नहीं मिला
गंदा ही पहन लिया

जूते को पहले उलटा पहना
कुछ तकलीफ हुई, लेकिन नही समझा
कोट पर ब्रश नहीं किया
पैण्ट की क्रीज सरगपताली ही रहने दिया।
रात को कोसा
क्यों नींद नहीं आई
आई तो सुबह क्यों चली गई
बस पर बस
आदमी पर आदमी
सडके विधवा-सी नजर आई
मुझे अपनी विधवा भाभी
याद आ गई
उन्होंने कहा था :
उनका लिवर खराब है
घडी की स्ंप्रिग की तरह।

रोड नं. एक
काशीपुरा
बाबू काशीनाथ मर गए
याद आया
इतवार को मरे थे
आज इतवार है।

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