लीलाधर जगूड़ी की रचनाएँ

आँधी

रात वह हवा चली जिसे आँधी कहते हैं
उसने कुछ दरवाजे भड़भड़ाए
कुछ खिड़कियाँ झकझोरीं, कुछ पेड़ गिराए
कुछ जानवरों और पक्षियों को आकुल-व्याकुल किया
रात जानवरों ने बहुतसे जानवर खो दिए
पक्षियों ने बहुत-से पक्षी
जब कोई आदमी नहीं मिले
तब उसने खेतों में खड़े बिजूके गिरा दिए
काँटेदार तारों पर टँगे मिले हैं सारे बिजूके
आदमियो! सावधान
कल घरों के भीतर से उठनेवाली है कोई आँधी

अपने से बाहर

जब घाटी से देखा तो, सुंदर दिखता था
शिखर
अब शिखर पर हूँ तो ज़्यादा सुन्दर दिखती है घाटी
अपने से बाहर जहाँ से भी देखो
दूसरा ही सुन्दर दिखता है ।

चट्टान पर चीड़

पानी पीटता रहा, हवा तराशती रही चट्टान को
दरारों के भीतर गूँजती हवा कुछ धूल छोड़ आती रही हर बार
कुछ धूप कुछ नमी कुछ घास बन कर उग आती रही धूल
धूल में उड़ते हैं पृथ्वी के बीज

छेद में पड़े बीज ने भी सपना देखा
मातृभूमि में एक दरार ही उसके काम आई
चट्टान को माँ के स्तन की तरह चुसते हुए बाहर की पृथ्वी को झाँका
हठी और जिद्दी वह आखिर चीड़ का पेड़ निकला
जो अकेला ही चट्टान पर जंगल की तरह छा गया

उस चीड़ और चट्टान को हिलोरने
चला आ रही है नटों की तरह नाचती हवा
कारीगरों की तरह पसीना बहाती धूप
चट्टान और पेड़ को भिगोने
आँधी में दौड़ती आ रही है बारिश ।

एक बुढ़िया का इच्छा-गीत 

जब मैं लगभग बच्ची थी
हवा कितनी अच्छी थी

घर से जब बाहर को आई
लोहार ने मुझे दराँती दी
उससे मैंने घास काटी
गाय ने कहा दूध पी

दूध से मैंने, घी निकाला
उससे मैंने दिया जलाया
दीये पर एक पतंगा आया
उससे मैंने जलना सीखा

जलने में जो दर्द हुआ तो
उससे मेरे आँसू आए
आँसू का कुछ नहीं गढ़ाया
गहने की परवाह नहीं थी

घास-पात पर जुगनू चमके
मन में मेरे भट्ठी थी
मैं जब घर के भीतर आई
जुगनू-जुगनू लुभा रहा था
इतनी रात इकट्ठी थी ।

मेरा ईश्वर

मेरा ईश्वर मुझसे नाराज़ है
क्योंकि मैंने दुखी न रहने की ठान ली

मेरे देवता नाराज़ हैं
क्योंकि जो ज़रूरी नहीं है
मैंने त्यागने की कसम खा ली है

न दुखी रहने का कारोबार करना है
न सुखी रहने का व्यसन
मेरी परेशानियां और मेरे दुख ही
ईश्वर का आधार क्यों हों ?

पर सुख भी तो कोई नहीं है मेरे पास
सिवा इसके कि दुखी न रहने की ठान ली है ।

अपने अन्दर से बाहर आ जाओ

हर चीज़ यहाँ किसी न किसी के अन्दर है
हर भीतर जैसे बाहर के अन्दर है
फैल कर भी सारा का सारा बाहर
ब्रह्मांड के अन्दर है
बाहर सुन्दर है क्योंकि वह किसी के अन्दर है

मैं सारे अन्दर-बाहर का एक छोटा सा मॉडल हूँ
दिखते-अदिखते प्रतिबिम्बों से बना
अबिम्बित जिस में
किसी नए बिम्ब की संभावना-सा ज़्यादा सुन्दर है
भीतर से ज़्यादा बाहर सुन्दर है
क्योंकि वह ब्रह्मांड के अन्दर है

भविष्य के भीतर हूँ मैं जिसका प्रसार बाहर है
बाहर देखने की मेरी इच्छा की यह बड़ी इच्छा है
कि जो भी बाहर है वह किसी के अन्दर है
तभी वह संभला हुआ तभी वह सुन्दर है

तुम अपने बाहर को अन्दर जानकर
अपने अन्दर से बाहर आ जाओ

ऊंचाई है कि

मैं वह ऊँचा नहीं जो मात्र ऊँचाई पर होता है
कवि हूँ और पतन के अंतिम बिंदु तक पीछा करता हूँ
हर ऊँचाई पर दबी दिखती है मुझे ऊँचाई की पूँछ
लगता है थोड़ी सी ऊँचाई और होनी चाहिए थी

पृथ्वी की मोटाई समुद्रतल की ऊँचाई है
लेकिन समुद्रतल से हर कोई ऊँचा होना चाहता है
पानी भी, उसकी लहर भी
यहाँ तक कि घास भी और किनारे पर पड़ी रेत भी
कोई जल से कोई थल से कोई निश्छल से भी ऊँचा उठना चाहता है छल से
जल बादलों तक
थल शिखरों तक
शिखर भी और ऊँचा होने के लिए
पेड़ों की ऊँचाई को अपने में शामिल कर लेता है
और बर्फ़ की ऊँचाई भी
और जहाँ दोनों नहीं, वहाँ वह घास की ऊँचाई भी
अपनी बताता है

ऊँचा तो ऊँचा सुनेगा, ऊँचा समझेगा
आँख उठाकर देखेगा भी तो सवाए या दूने को
लेकिन चौगुने सौ गुने ऊँचा हो जाने के बाद भी
ऊँचाई है कि हर बार बची रह जाती है
छूने को ।

पत्थर विमर्श

पत्थरों को न मरा हुआ घोषित किया जा सकता है
न स्पंदित जीवन की तरह विकासमान
लाखों सालों से वे अन्य चीज़ों की अपेक्षा कम ह्रासमान हैं

फिर भी प्रत्यक्ष दिखती वास्तविकता से
पत्थरों को पत्थर कह कर बरी नहीं किया जा सकता

जैसे वे हैं और जैसा उन्हें बनने का मौका मिला
वैसा बने रहने के अलावा उनमें पत्थर होने की
और भी बहुत सी काबिलियतें हैं
यह भी कि वे अपने भरोसे बिल्कुल नहीं बदलते
विश्व की ठोस नश्वरता में
बस एक ही जगह अमर से दिखते रहते हैं वे
उनकी छीजन भरी नश्वरता सुदीर्घ जीवन के अंत में कहीं
कभी उन लोगों को दिखेगी
जिन्होंने उनकी शुरुआत को कल्पना में भी नहीं जाना होगा

पत्थरों में अपने आप किसी परिवर्तन को देखने के लिए
हमें हज़ारों साल के जीवन की भी ज़रूरत पड़ सकती है
सबसे अच्छे पत्थर वे है जो सुदृढ़ हैं
और यह जाने बिना भी बने हुए हैं कि उनके न हाथ हैं न पाँव
ये जाने बिना भी पड़े हैं कि सदियों
पथराये रहने के अलावा कुछ नहीं करना है
अपनी हृष्ट—पुष्ट सुस्ती में बिना दिमाग के सुस्ताते रहना है सदियों

अच्छे पत्थर त्वचा पर लेते हैं दिल पर नहीं
अच्छे पत्थरों में दरार नहीं होती
वे किसी को नहीं बताते कि उनके दिल आखिर हैं कहाँ?
किसी दीवार में चिने हुए?
किसी सड़क या किसी पुल पर बिछे हुए?
बिना यादगार अपने चट्टान माँ —बाप के सभी गुण लिए हुए
(पत्थरों पर उनके माँ —बाप लादना
मनुष्य भाषा की कमज़ोरी है)

पुल के नीचे उसे देखो
वह अब तक की किसी बाढ़ में सिर तक नहीं डूबा
वह एशिया और योरोप की तरह एक ओर से सँवलाया
दूसरी ओर से सफ़ेद और बीच में भूरा —सा दिख रहा है
प्रलय के समय के कुछ परमाणुओं ने उस पर
जनेऊ जैसी धारी बना रक्खी है
कुछ आस्थावान भारतीय कह सकते हैं कि श्वेत—श्याम वह
सीताराम,राधाकृष्ण सरीखा है
पर,सीता और राधा तो शूद्रों की तरह जनेऊ से वंचित थे
जनेऊ से न मनुष्यों को पहचानो न चीज़ों को
(जनेऊ निषेध के सूत्रों से बना है)

न वह पत्थर पुरुष है न स्त्री
पत्थर स्त्री—पुरुष नहीं होते
न स्त्री—पुरुष पत्थर होते हैं

जनेऊ छाप होने से वह पत्थर हिन्दू भी नहीं हैं
पत्थर भी जब प्रतीकों में बदल जाते हैं
सांप्रदायिक हो जाते हैं
जहाँ उस पर जनेऊ जैसी धारी है
शायद वहीं से फटेगा वह
उसके संगठन में वह विघटन की लकीर है

पत्थर हिन्दू नहीं होते और हिन्दू पत्थर नहीं होते
आदमियों की बुरी संगत के कारण
पदार्थों के भी धर्म और संप्रदाय हो जाते हैं
पदार्थों के अपने स्वभाव होते हैं
जिन्हे अपने फ़ायदे और नुक्सान के नज़रिये से
हम गुण —अवगुण की सूचियों में डाले रखते हैं
फिर भी सावधान रहना चाहिये कि कहीं ईश्वर—अल्लाह को हम
पत्थर में तो नहीं बदल रहे हैं
वह एक निचट्ट पत्थर है अनोखा और सुन्दर
धर्म से हो कर उस तक नहीं जाया जा सकता
नदी से हो कर जाना पड़ेगा
और उसके भीतर जाने का कोई दरवाज़ा भी नहीं

हो सकता है हम में से कोई उस में दरवाज़ा बना ले और गर्भ-गृह भी
पर सारी कला भी अपनी सहृदयता को उसकी हृदयहीनता में
एक बड़े—से छेद के रूप में ही बनाएगी
अंत:करण के नाम पर एक सुराख को मिलेंगी
पथरीली दीवारें

पत्थरों में न गर्भाशय होते हैं न शुक्राणु
पत्थर को ज़्यादा संख्या में पत्थर होने के लिए
टूटना पड़ता है
उत्तर आधुनिकता जैसा जड़ विखंडन नहीं होता
पत्थर का

देव शिल्पी

शुरू से ही पत्थरों ने देवताओं की भूमिका निभाई
और देवताओं ने पत्थरों की

देवताओं के प्रसन्न वदन से मैं परिचित नहीं हूँ
पर पत्थर के मूर्तिमान चेहरे की प्रसन्नत्ताएँ
कभी एकानन,कभी चतुरानन
कभी पंचानन हो कर मेरा पीछा करती हैं
कभी त्रिनेत्र कभी सहस्रनेत्र हो कर मुझे देखते
रहते हैं देवता

शास्त्रों में कहीं भी देवताओं की नाक का
वैशिष्टय नहीं दिखता

कहीं भी किसी की मसें भीगने और दाढ़ी बनाने
का
प्रसंग नहीं आता
उनकी द्रष्टा होने की कथाएँ मिलती हैं घ्राता होने
की नहीं
उन्हें सुगंध तो पसंद है पर उनकी घ्राण शक्ति के
संकट
या चमत्कारों की गाथा नहीं मिलती
लेकिन पत्थरों में देवताओं की नाक बहुत
प्रभावित करती है
वही बताती है कि किधर है देवता का मुँह

‘सुगंधिम् पुष्टि वर्धनम्’
सुगंधि से उनकी ताकत बढ़ती है
वह ताकत जो अपने द्विभुज, चतुर्भुज, अष्टभुज में
भी
एक ही नाक से काम चलाती है

किसी देवता में बदलता हुआ पत्थर आधा किसी
वन्य पशु—सा
आधा किसी जलजंतु—सा चिकना और सुघड़
बनाना पड़ता है
मैं खदान ढूंढता हूँ और आनन विहीन पत्थर मुझे
ढूंढ लेता है
मैं पत्थर को उठाता, बैठाता और खड़ा करता हूँ
और उसमें किसी न किसी देवता का मुँह ढूंढ
लेता हूँ
अपनी आँखों से बड़ी बनाता हूँ मैं पत्थर की
आँखें
मैं पत्थर के नाक—मुँह और हाथ—पाँव बनाने
लगता हूँ
अपने जीवन से गायब निर्भयता, पराक्रम ,वरदान
और आशीर्वाद इत्यादि
पत्थर के जीवन में गढ़ने लगता हूँ
अपने विषाद के मुकाबले मैं पत्थर को किंचित्
मुस्कुराते हुए दिखाता हूँ
मैं छोटे—से पत्थर में भी बड़े से बड़ा देवता
बनाता हूँ

शरीर की सारी मुद्राएँ बनाने के बाद
देचता का हृदय नहीं बना पाता हूँ मैं
न उसका दिमाग़ रच पाता हूँ
उसके कान बना देता हूँ पर उसका सुनना नहीं
बना पाता
आँखेँ बना देता हूँ पर देखना नहीं बना पाता
क्या इस तरह मैं रोज़—रोज़ के रचनात्मक
झूठ
बुलवाये और कबूलवाये जाने से मुक्त कर देता
हूँ ?

मैं उनकी इन्द्रियाँ बनाता हूँ
पर इन्द्रियों का मज़ा नहीं बना पाता
जबकि देवताओं को सबसे प्रिय है आनंद
ऐन्द्रिक सुखों के अतीन्द्रिय प्रतिनिधि
देवता हो सकते हैं पत्थर नहीं
पत्थर वे ही हो सकते हैं जिन्होंने अपनी
सारी इन्द्रियाँ जीतने के नाम पर निष्क्रिय बना
डाली हों
इन्द्रियजित पत्थरों पर मैं इन्द्रियोन्मुख काम को
बनाता हूँ
मैं पत्थर के देवता बनाता हूँ
उनकी अमरता नहीं बना पाता
पत्थर के जीवन तक ही रह पाता है पत्थर में
देवता
दीन-दुखियों की प्रार्थना में देवताओं के लिए
सानुरोध गालियाँ सुन कर
पत्थरों तक का क्षरण शुरू हो जाता है
मगर देवता नहीं पिघलते
यह तो उनकी बड़ी कृपा है
कि वे मेरी छैनी-हथौड़ी के नीचे आ जाते हैं
उन्हें पता है कि चोटें उन पर नहीं पत्थरों पर पड़
रही हैं।

असंत-वसंत के बहाने

हवा, पानी और ऋतुओं में बदल कर समय
हेमंत और शिशिर का कल्याणकारी उत्पाती
सहयोग ले कर
अनुवांशिकी के लिए खोजता या ख़ाली करवाता
है जगह

संत या असंत आगंतुक वसंत ने
वृक्षस्थ पूर्वज— वसंत के पीछे
हेमंत—शिशिर दो वैरागियों को लगा रक्खा है
जो पत्रस्थ गेरुवे को भी उतार अपने सहित
सबको
दिगम्बर किए दे रहे हैं
और शीर्ण शिराओं से रक्तहीन पदस्थ पीलेपन के
ख़ात्मे में जुटे हुए हैं

हिम—शीत पीड़ित दो हथेलियों को करीब ले आने वाली
रगड़ावादी ये दो ऋतुएँ
जिनका काम ही है प्रभंजन से अवरोधक का
भंजन करवा देना
हवाओं को पेड़ों और पहाड़ों से लड़वा देना
नोचा—खोंसी में सबको अपत्र करवा देना
ताकि प्रकृति की लड़ाई भी हो जाए और बुहारी
भी
और परोपकार का स्वाभाविक ठेका छोड़ना भी न
पड़े

पिछला वसंत अगर एक ही महंत की तरह
सब ऋतुओं को छेके रहे
तो नवोदय कहाँ से होगा
कैसे उगेगी नवजोत एक—एक पत्ती की

हर ऋतु के अस्तित्व को कोई दूसरी ऋतु धकेल
रही है
चुटकी भर धक्के से ही फूटता है कोई नया फूल
खिलती है कोई नई कली
शुरु होता है कोई नया दिल
चटकता है कोई नया फूट कछारों में
ब्राह्म मुहूर्त में चटकता है पूरा जंगल

रोंगटों—सी खड़ी वनस्पतियों के पोर—पोर में
हेमंत और शिशिर की वैरागी हवाएँ
रिक्तता भेंट कर ही शांत होती हैं जिनकी चाहें और
बाहें
स्त्रांत में पत्रांत ही मुख्य वस्त्रांत है जिनका
वसनांत के बाद खलियाई जगहें ऐसे पपोटिया
जाती हैं
जैसे पेड़ भग-वान इन्द्र की तरह सहस्त्र नयन हो
गए हों
घावों पर वरदान-सी फिरतीं
वसंत की रफ़ूगर उँगलियाँ काढ़ती हैं पल्लव
सैंकड़ों बारीक पैरों से जितना कमाते हैं पादप
उतना प्रस्फुटित हज़ारों मुखों को पहुँचाते हैं
टहनियों के बीच खिल उठते हैं आकाश के कई
चेहरे

दो रागिये—वैरागिये
हेमंत और शिशिर
अधोगति के तम में जाकर पता लगाते हैं उन
जड़ों का
जिनके प्रियतम-सा ऊर्ध्वारोही दिखता है अगला
वसंत

पिछली पत्तियाँ जैसे पहला प्रारूप कविता का
झाड़ दिये सारे वर्ण
पंक्ति—दर—पंक्ति पेड़ों के आत्म विवरण की नई
लिखावट
फिर से क्षर —अक्षर उभार लाई रक्त में
फटी, पुरती एड़ियों सहित हाथ चमकने लगे हैं
पपड़ीली मुस्कान भी स्निग्ध हुई
आत्मा के जूते की तरह शरीर की मरम्मत कर दी
वसंत ने
हर एक की चेतना में बैठे आदिम चर्मकार
तुझको नमस्कार !

आज का दिन 

क्या यकीन किया जा सकता है
कि आज का दिन भी ऐतिहासिक होगा
अगर आज भी किसी डाक्टर ने भ्रूण का लिंग बताने
से इन्कार किया है
अगर आज कहीं नहीं हुई कन्या-भ्रूण-हत्या
तो आज का दिन ऐतिहासिक हो सकता है

आज का दिन इस लिए भी ऐतिहासिक हो सकता है
क्योंकि पूरे दाँत खोलकर हँसती हुई ग्यारह वर्ष
की लड़की
अकेले साइकिल सीखने निकली है

अनजान शहर में अकेली औरत ने
आफ़िस जाती किसी अकेली औरत से
ऐसे पुरुष का पता पूछा
जिसे पूछने वाली के सिवा कोई नहीं जानता

सोचने की बात यह है कि आज के दिन
अकेली औरत अगर सुरक्षित है
तो आज के दिन को ऐतिहासिक होने से कोई
रोक ही नहीं सकता

विश्वसनीय सूत्रों से थोड़ी आश्चर्यजनक
ख़बर से भी
मैं आज के दिन को ऐतिहासिक मानता हूँ
कि छ: महीने की जिस बच्ची ने बिस्तर पर
आधी पल्टी ली थी और चोट खाई थी
आज उसी सात महीने की बच्ची ने
पहली बार पूरी पल्टी ली और चोट नहीं खाई

आज का दिन ऐतिहासिक ही नहीं अद्भुत भी है
पल्टी खाने के बाद सुना कि वह ख़ुद हँस भी दी

आज एक और घटना भी हुई है
जिसका मैं ख़ुद गवाह हूँ

कि साइकिल सीखने वाली ग्यारह वर्ष की
अकेली लड़की
चोट खा कर भी मुस्कुराती हुई लौटी है
अपने को हर जगह से बेफ़िक्र झाड़ती हुई

यक़ीन मानिए
आज का दिन कहीं सचमुच ऐतिहासिक न हो!

प्रेम

प्रेम ख़ुद एक भोग है जिसमें प्रेम करने वाले को भोगता है प्रेम
प्रेम ख़ुद एक रोग है जिसमें प्रेम करने वाले रहते हैं बीमार
प्रेम जो सब बंधनों से मुक्त करे, मुश्किल है
प्रेमीजनों को चाहिये कि वे किसी एक ही के प्रेम में गिरफ़्तार न हों
प्रेमी आएं और सबके प्रेम में मुब्तिला हों
नदी में डूबे पत्थर की तरह
वे लहरें नहीं गिनते
चोटें गिनते हैं
और पहले से ज़्यादा चिकने, चमकीले और हल्के हो जाते हैं

प्रेम फ़ालतू का बोझ उतार देता है,
यहां तक कि त्वचा भी।

छाता

भारत में बरसातें अब भी बड़ी हैं
आड़ी तिरछी, लम्बी चौड़ी बरसातें
जो कि दिन रात बरसतीं आखिर पुराने छाते की याद दिला ही देती हैं
यह जो छोटी सी एक आदमी लायक छतरी लाया हूँ
उसमें अकेला भी भीग रहा हूँ …

जब हाई स्कूल पास किया था
तो घर में एक छाता होता था
बड़ा सा
हम तीन भाइयों के लिए
जो कि काफ़ी पड़ता था

छाते की तरह भाइयों में मैं ही बड़ा था…
पर छाता लेकर जब कभी
मैं कॉलेज जाता और कोई सहपाठिन कभी उसके नीचे आ जाती
तो बिना सटे भी हम भीगते नहीं थे
अलबत्ता पायँचे भीगे हुए होते थे

पुराने छाते पारिवारिक और सामाजिक लगते थे
जबकि ये छतरियाँ व्यक्तिवादी और अकेली लगती हैं
ये शायद धूप के लिए हैं, बारिश के लिए नहीं
जब कि घर वाले मुझसे ही तीन-चार काम ले लेते थे
खेत में किसान का
इधर-उधर हरकारे का
स्कूल खुलते ही वे मुझसे स्कूल जाने का काम लेते थे।

पुराना छाता देख कर धूप प्रचण्ड हो जाती
बादल उमड़ आते थे
तेज़ बारिश हो या तेज़ धूप
बस, जल्दी-जल्दी घर पहुँचना याद आता है
जैसे किसी और भी पुराने और भी बड़े
किसी दूसरे छाते के नीचे आ गए हों
जब भी मैं उसे कहीं भूला
रात को दोस्तों के घर ढूँढ़ने जाना पड़ता था

बरसाती अन्धेरी रातों में सिर्फ़ कानों को सुनाई देता है छाता
बारिश हो रही हो और छाता न हो
आसमान एक उड़े हुए छाते जैसा लगता है
धूप हो तो साथ चलते पेड़ जैसा लगता है छाता
अगर बारिश न हो रही हो रात में
तो छाता सिर पर हो या हाथ में किसी को नहीं दिखता

चमकती बिजली चमकते हत्थे की याद दिला देती
चमकता हत्था टॉर्च की याद दिला देता
(जो हमारे घर में नहीं था)
अब तो पुराने छाते जैसी घनी तनी रात भी
कम ही दिखती है उतनी अन्धेरी, उतनी बड़ी
कितनी तरह के उजालों से भर गई है वही रात।

जाति विहीन 

अयोग्य की जाति मत बनने दो
अयोग्यता को मत बनने दो इन्द्रियों का गोत्र
कोई न कोई योग्यता पैदा करने में मदद करो
अयोग्य की

वह जाति विहीन होगा तो कम बोझ होगा
जातीय बोध से बनी व्यवस्थाओं के लिए ।

नई दिशा

बेटी जब पहली बार रजस्वला हुई
दादी और माँ के साथ
दीदी और भुली की भी याद आई मुझे

पिछली बार जब बुआ जी आईं थीं
साबी को यही समझाकर गईं
कि बेबी अब सातवें दर्ज़े में है
कभी भी अचानक कुछ हो सकता है

बेबी को पितर आशीषों से नहला गए
बेटी से ही खुलती है रिश्तों की नई दिशा ।

देखने का बोलना

आँखों के देखे हुए को बताने के लिए
ज़ुबान को खोलने पड़ते हैं भाषा के ताले
देखना भी बोलने लगता है

अनुभूति का यह खेल अजब है
बातों ही बातों में पंक्ति दर पंक्ति बन जाती है
शब्दों की
कई-कई आँखें दिखने लगती हैं
कई-कई निगाहों के साथ ।

जादू

दृश्यों की भी एक शाब्दिक आहट होती है
जिसे कान पहचान लेते हैं
बे-ज़ुबान कान भी चख लेते हैं ध्वनियाँ
घने दृश्यों के जंगल से गुज़रती
न दिखती हवा को भी
देख लेती है हमारी त्वचा
जो कई बार की छुई हुई दुनिया के लिए
छिपाकर रखती है
हर बार पहली बार छूने का जादू

डर

जिधर चिड़िया गा रही थी
उधर से भी हटा मैं कि वह उड़ न जाए
जिधर फूल खिल रहा था
उधर पीठ फेर दी कि मुरझा न जाए
इस तरह आया एक भूला हुआ गाना
एक झरा हुआ फूल मुझे याद
एक भरा हुआ फूल मुझे याद
वर्तमान को इस तरह अतीत बनाया पतझर ने ।

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