वरयाम सिंह की रचनाएँ

पसन्द अपनी-अपनी

घोड़े ने ऊँट को देखा
और हिनहिनाकर हँसा —
‘ऐसा
बड़ा
अनोखा
होता है घोड़ा’

दिया ऊँट ने उत्तर—
‘तुम क्या घोड़े हो
कतई नहीं हो
तुम तो केवल
बड़ा नहीं हो पाया
ऐसे ऊँट हो’

और सत्य तो केवल वही जानता
जो सर्वज्ञ विधाता
वे दोनों ही
भिन्न नस्ल के
मैमल थे

अँग्रेज़ी से अनुवाद : रमेश कौशिक

एक बजे के बाद

एक बज गया
सोई होगी तुम निश्चय ही
अका[1] जैसी
जल्दी क्या है मैं न जगाऊँगा तुमको
सर-दर्द न दूँगा
तुरत-तार देकर के तुमको स्वपन न कोई भंग करूँगा
जैसा वे कहते हैं
ख़त्म कहानी यहीं हो गई
नाव प्रेम की
जीवन-चट्टानों से टकरा कर चूर हो गई
अब हम स्वतंत्र हैं
आपस के अपमान व्यथा आघातों की
नहीं ज़रूरत है कोई फहरिस्त बनाने की
देखो सारा जग शांत हुआ है तारों के उपहार तले
नभ को निशि ने सुला दिया है
ऐसे पहर जगा है कोई
युग इतिहास विश्व को
संबोधित करने को ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : रमेश कौशिक

करतब-भर के बादल

नीले नभमंडल में
तिरते हुए बादल
गिनती में सिर्फ़ चार
कैसे कहूँ दल-बादल !
उनमें से प्रथम तीन
मानव-आकृतियों-से
चौथा था — बालू पर
ऊँट भरे डग जैसे ।
उनका सैलानी मन
जब उरूज़ पर आया
पाँचवा बादल भी
उनसे आ टकराया ।
लेकिन वह पाँचवाँ था
ख़ासा ख़ुराफ़ाती—
अपने डीलडौल में
छिपाए था कई हाथी ।
जो कि निकल-निकल
यहाँ-वहाँ लगे भागने
उनसे आसमान भी
पनाह लगा माँगने ।
तभी, शायद छठा, आया,
क्या तो कमाल की
दी उसने घुड़की;
हवा हुए पल-भर में
सब-के-सब
ऐसी ज़ोरदार रही
छठे बादल की झिड़की !
उसके बाद बादलों को
हरे चारे-सा चबाता हुआ
पीले रंग के किसी जिराफ़-सा
दीख पड़ा सूरज
चौकड़ी भरता आता हुआ !

अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल

अपनी-अपनी रुचियाँ 

घोड़ी की नज़र पड़ी ऊँट पर
तो फटी-फटी-सी आवाज़ में
वो हिनहिनाई;
’हे भगवान घोड़ों की सुदर्शन नस्ल में
यह कूबड़ करामात
कहाँ से आई !’
ऊँट ने भी तुर्शी-ब-तुर्शी
उसी लहजे में
जवाब दिया :
’चल-चल ! बड़ी आई !
ग़नीमत समझ की माफ़ किया,
तू भला कैसी, और कहाँ की घोड़ी !
’अरी, तू तो ऊँटनी है,
ख़ुदा के फ़जल से
ठिगनी रह गई थोड़ी ।’
यह तो जानता था
सर्वज्ञानी ईश्वर
या ख़ुदा ही अस्ल में—
कि दोनो पैदा हुए, स्तनपायी
चौपाये पशुओं की
अलग-अलग नस्ल में ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल

छैले की जैकेट

मैं सिलाऊँगा काली पतलूनें
अपनी आवाज़ की मखमल से
और
तीन गज सूर्यास्त से पीली जैकेट ।
टहलूँगा मैं
डान जुआँ और छैले की तरह
विश्व के चमकीले नेव्स्की चौराहे पर ।

अमन में औरता गई पृथ्वी चिल्लाती रहे :
“तुम जा रहे हो हरी बहारों से बलात्कार करने ।”
निर्लज्ज हों, दाँत दिखाते हुए कहूँगा सूर्य को :
“देख, मज़ा आता है मुझे सड़को पर मटरगश्ती करने में ।”

आकाश का रंग इसीलिए तो नीला नहीं है क्या
कि उत्सव जैसी इस स्वच्छता में
यह पृथ्वी बनी है मेरे प्रेमिका,
लो, भेंट करता हूँ तुम्हें कठपुतलियों-सी हँसमुख
और टूथब्रश की तरह तीखी और अनिवार्य कविताएँ !

ओ मेरे माँस से प्यार करती औरतो,
मेरी बहनों की तरह मुझे देखती लड़कियो,
बौछार करो मुझ कवि पर मुस्कानों की,
चिपकाऊँगा मैं
फूलों की तरह अपनी जैकेट पर उन्हें।

मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

प्रिय लिली को

चिट्ठी के बदले

निगल डाली है हवा तम्बाकू के धुएँ ने ।
और कमरा हो गया है जैसे क्रुचोनिख के ‘नर्क’ का अध्याय ।
याद करो —
जब पहली बार
इन खिड़कियों के पीछे
तुम्हारे उत्तेजित हाथ सहलाए थे मैंने।
आज बैठी हो
लोहे का-सा हृदय लिए।
सम्भव है एक और दिन
फेंक दोगी बाहर ग़ालियाँ बकते हुए।
धुआँ भरे कमरे में देर तक
आस्तीनों में समा नहीं पाएगा काँपता हाथ।
भाग जाऊँगा
बाहर फेंक दूँगा शरीर।
पाशविक
निराशाओं का काटा हुआ
पागल हो जाऊँगा मैं।
कोई नहीं इसकी ज़रूरत
मेरी प्रिये,
आओ कर दें क्षमा हम एक दूसरे को ।
यों विकल्प नहीं कोई दूसरा —
भारी वज़न-सा मेरा प्रेम
लटका रहेगा तुम पर
जिधर भी चाहो भागना।
अन्तिम चीख़ तक निकालने दो मुझे
अपमानित शिकायतों की आग ।
जब कठिन हो जाता है
बैल के लिए जुते रहना
वह भाग जाता है
और टाँगें पसार कर लेट जाता है पानी में।
तुम्हारे प्यार के सिवा
कोई और समुद्र नहीं है मेरे लिए,
और तुम्हारा प्यार है
कि रोने पर भी
नहीं देता थोड़ा-सा आराम ।
जब आराम करना चाहता है थका हाथी
शाही ठाठ से लेट जाता है वह गर्म रेत पर ।
तुम्हारे प्यार के सिवा
कहीं नहीं है मेरे लिए धूप,
मालूम नहीं मुझे, तुम कहाँ हो और किसके साथ ?
यदि प्रेयसी ने इसी तरह दी होती यन्त्रणा कवि को
वह उसक बजाय स्कावी करता ख्याति और धन,
पर मेरे लिए
एक भी गूँज नहीं है मधुर
तुम्हारे प्रिय नाम की गूँज के सिवा ।
आत्महत्या नहीं करूँगा मैं खाई में कूद कर,
न ही पिऊँगा कोई ज़हर
और न ही दबा सकूँगा बन्दूक का घोड़ा ।
मेरे ऊपर
तुम्हारी नज़र के सिवा
वश नहीं तेज़ से भी तेज़ खंजर का ।

कल तक भूल जाओगी तुम
मैंने ही तो किया था तुम्हारा राज़्याभिषेक,
कि जला डाला प्यार से खिलता हुआ हृदय,
और रिक्त दिनों का यह उत्सव
पन्ने बिखेर देता है मेरी पुस्तकों के
क्या सूखे पन्ने
ठीक से साँस लेने न देंगे
मेरे शब्दों को ?
और नहीं
इतना करने की इजाज़त तो दो
कि बिछा सकूँ मैं अपनी शेष बची कोमलता
प्रस्थान के लिए उठे तुम्हारे पाँवों के नीचे !

मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

मेरुदण्ड-बाँसुरी

(प्राक्कथन)

कविताओं से भरी खोपड़ी
जाम की तरह उठाता हूँ मैं
तुम सबकी सेहत के लिए
जो मुझे पसन्द रहे और आज भी हैं
जिन्हें अपने हृदय की गुफ़ाओं में
देव प्रतिमाओं की तरह सजाए रखा है मैंने ।

अक्सर सोचता हूँ मैं —
अच्छा नहीं होगा क्‍या
अपने अन्त में लगाना गोलियों का पूर्ण विराम ।
कुछ भी हो
आज दे रहा हूँ मैं
अपने संगीत का कार्यक्रम आख़िरी बार ।

इकट्ठी करो दिमाग़ के सभागार में,
प्रियजनों की अन्तहीन कतारें ।
हँसियों के ठहाके उँडेलो आँखों से आँखों में,
शाही शादियों से सजाओ
इस रात को,
ख़ुशियों से भरो जिस्मों को
भूले न कोई यह रात,
आज मैं बजाऊँगा बाँसुरी —
अपनी रीढ़ की हड्डी ।

(1)

पाँवों के पंखों से लाँघता कोसों लम्बॊ सड़कें
कहाँ जाऊँगा मैं यह नरक छोड़ कर ।
किस दिव्य हॉफ़्मान की
अभि‍शप्त तुम आईं कल्पनाओं में ?

तंग पड़ गई हैं सड़कें
ख़ुशियों के तूफ़ानों को,
नज़र नहीं आता अन्त कहीं
सजे-धजे लोगों के त्योहार का ।
सोचने लगता हूँ जब
बीमार और तपे हुए ख़ून के लोंदों की तरह
टपकने लगते हैं विचार खोपड़ी से ।

त्योहारों का रचयिता मैं
किसी का भी ढूँढ नहीं पाता साथ
त्योहारों में शामिल होने के लिए ।
गिर पड़ूँगा इसी पल धड़ाम से पीठ के बल,
फोड़ दूँगा सिर निवा की चट्टानों पर ।
हाँ, मैंने ही नकारा था ख़ुदा को,
कहा था — ख़ुदा है नहीं ।
पर ख़ुदा नारकीय गहराइयों से
निकाल लाया बाहर उसे
थरथराने लगते हैं पहाड़ भी जिसके सामने ।
और हुक़्म दिया मुझे —
ले, कर प्यार अब इसे ।

सन्तुष्ट है ख़ुदा ।
आसमान के नीचे ढलान पर

पागलों की तरह चिल्लाता रहा दुखी इन्सान ।
ख़ुदा पोंछता है हथेलियाँ ।
सोचता है वह —
‘ठहर तू, व्लदीमिर !’

उसे ही तो आया था ख़याल
तुम्हारे लिए पति ढूँढ़ निकालने का ।
अब यदि चुपके से पहुँच जाऊँ
तुम्हारे शयन-कक्ष में
महकने लगेंगे ऊनी कम्बल
धुआँ उठने लगेगा शैतान के माँस का ।
ऐसा नहीं किया मैंने
बल्कि थरथराता रहा गुस्से में सुबह तक
कि तुम्‍हें ले गए प्यार करने के लिए
मैं बस खरोंचता रह गया चीख़ें कविताओं में ।
ख़राब होने लगा मेरा दिमाग़ ।
क्यों न खेली जाए ताश
क्यों न शराब में सहलाई जाए
मरे हुए दिल की गर्दन ।

मुझे ज़रूरत नहीं अब तेरी।
कुछ फ़र्क नहीं पड़ने का,
मालूम है मुझे
दम तोड़ दूँगा कुछ ही क्षणों में।

ओ ख़ुदा,
सचमुच है तू अगर
तूने ही बुना है अगर तारों का आकाश
तूने ही भेजी है अगर
मुझे परखने कि लिए
दिन-ब-दिन बढ़ती यह तकलीफ़
तो पहन न्यायाधीशों का पहरावा।
मेरे आने का तू इन्तज़ार करना!
मैं आ जाऊँगा ठीक वक़्त पर
एक भी दिन की देर किए बिना।
सुनो, ओ उच्चतम अन्वेषणाधिकारी
बन्द कर लूँगा मुँह।
कटे होठों से निकलने न दूँगा एक भी चीख़ ।
बाँध दो मुझे घोड़े की पूँछ की तरह पुच्छल तारे से,
और निकाल फेंकों
अपनी दाँतों की तरह।
या
जब मेरी आत्मा छोड़ दे यह शरीर
और हाज़िर हो जाए तुम्हारे दरबार में,
नाराज़ तुम
फाँसी के फन्दे की तरह
झुलाना आकाश-गंगा
और झकझोर डालना
मुझ अपराधी को।

चाहो तो टुकड़े-टुकड़े कर डालना मेरे
ओ ख़ुदा,
मैं स्वयं पोंछूँगा तेरे हा‍थ ।
सुन इतनी-सी बात
ले जा मेरे पास से इस औरत को
बनाया है जिसे तूने मेरी प्रेमिका ?

पाँव के पंखों से लाँघता कोसों लम्बी सड़कें
कहाँ जा पाऊँगा मैं यह नरक छोड़ !
किस दिव्य हाफ्मान की
अभिशप्त तुम आई कल्पनाओं में ?

(2)

और आसमान
धुएँ के बीच भूल गया अपना रंग,
और बादल हैं जैसे फटीचर शरणार्थी
मैं उदित हूँगा अपने अन्तिम प्यार में चमकता हुआ
क्षय रोगी के गालों की लाली की तरह ।
ढँक दूँगा खुशियों से
उन लोगों की भीड़ के शोर को
जो भूल गए हैं स्वाद अपने घर और आराम का ।

सुनो, लोगो,
निकल आओ खाइयों से बाहर ।
लड़ लेना बाद में ।
अगर वि‍वेकहीन लड़ाई हो भी रही हो
खौलते ख़ून में
बाख़ुस की तरह
क्षीण नहीं पड़ेंगे प्रेम के शब्‍द ।
प्रिय जर्मन लोगों,
मुझे मालूम है — तुम्हारे होठों पर

ग्रेटखन है गोयटे की
संगीन पर मुस्कराते हुए
मरता है फ़्राँसीसी ।

मुस्कान खिली रहती है
घायल बेहोश यानचालक के होठों पर ।
ओ त्रावियाता
याद आता है चुम्बन में डूबा तुम्हारा चेहरा ।
मुझे मतलब नहीं उस गुलाबी गोश्त से
नोंचती आ रही हैं जिसे शताब्दियाँ ।
आज लेट जाओ नए पाँवों के पास ।
ओ सुर्ख़ी किए लाल गालों वाली
गा रहा हूँ मैं आज तुम्हें ।

सम्भव है जब दाढ़ी पर सफ़ेद रंग फेरेंगी शताब्दियाँ
संगीन की धार की तरह
बाक़ी बचोगी
तुम
और एक शहर से दूसरे शहर भगाया जाता हुआ
मैं ।
ले जाएँगे समुद्रपार तुम्हें
रात की खोह में छुपी होगी तुम ।
लन्दन की धुन्ध चीरते हुए
तुम्हें भेजे हुए मेरे चुम्बन
स्पर्श करेंगे मशालों के होठों का
मरुस्थलों की लौ में
फैलाऊँगा मैं कारवाँ
जहाँ पहरा दे रहे होंगे शेर,
तुम्हारे लिए
हवाओं द्वारा त्रस्त धूल के नीचे
सहारा की तरह
रख दूँगा अपने दहकते गाल ।

होठों पर बिठाए मुस्कान
तुम देखती हो —
कितना हैं सुन्दर वृषयोद्धा ।
और मैं ईर्ष्या को बैल की आँख की तरह
निकला फेंक दूँगा दर्शक-दीर्घा पर ।

घसीट लाओगी पुल तक अपने भुलक्कड़ कदम ।
सोचोगी —
कितना अच्छा है नीचे ।
यह मैं दूँगा सीन की तरह
पुल के नीचे बहता हुआ ।
पुकारूँगा, हँस दूँगा, सड़े दाँत दिखाते हुए ।
दुलत्ती चलते घोड़े पर बैठी
किसी दूसरे के साथ
तुम लगा दोगी आग
स्‍त्रेल्का या स्कोलिनिकी में
नग्न और प्रतीक्षारत
यह मैं हूँगा चाँद की तरह तरसाता हुआ ।

उन्‍हें ज़रूरत पड़ेगी
मुझ ताक़तवर की ।
आदेश मिलेगा :
जा, मार आ अपने को युद्ध में,
तेरा नाम होगा
बम से टुकड़ा-टुकड़ा हुए अन्तिम होठों पर ।

मैं मिट जाऊँगा मुकुट
या साध्वी हेलेन की तरह ।
ज़िन्दगी के तूफ़ान पर लगाम लगाए
मैं हूँ बराबरी का उम्मीदवार
क़ैद के लिए या ब्रह्माण्ड के सम्राट पद के लिए ।
सम्राट होना
लिखा है मेरे भाग्य में —
मैं हुक़्म दूँगा प्रजा को
सोने के सिक्कों पर तुम्हारा मुखड़ा कुरेदने का ।
और वहाँ
जहाँ टूण्ड्रा की तरह फीकी पड़ जाती है दुनिया,
जहाँ उत्तरी हवाओं से
चलता है नदियों का व्‍यापार —
हाथों पर खरोंचूँगा लिली का नाम
और चूमूँगा उन्हें कारगार के अन्धकार में ।

सुनों लोगो,
तुम जो भूल गए हो आकाश का नीला रंग,
तुम जो बिदक गए हो ढोरों की तरह,
सम्भव है यह
क्षयरोगी के गालों की सुर्खी की तरह
चमक उठा हो इस दुनिया में अन्तिम प्यार ।

(3)

भूल जाऊँगा मैं — साल, दिन, तारीख़,
बन्द कर दूँगा स्‍वयं को अकेला काग़ज़ के पन्ने के साथ,
दिखाओ अपने करिश्मे, ओ अमानवीय जादू,
यातनाओं से आलोकित शब्दों के ।

आज प्रवेश ही किया था मैंने
कि महसूस हुआ
सब कुछ ठीक नहीं है इस घर में ।
तुम कुछ छिपा रही थी अपने रेशमी वस्त्रों में,
फैल रही थी ख़ुशबू हवा में धूप की ।

‘ख़ुश हो क्या? ‘
उत्तर में ठण्डा ‘बहुत’ ।

‘भय ने तोड़ दी है वि‍वेक की बाड़ ।
दहकता हुआ बुखार में
मैं लगा रहा हूँ निराशाओं के ढेर ।
सुनो, तुम छिपा नहीं सकोगी यह लाश,
ज्वालामुखी के सिर पर ये भयानक शब्द ।
कुछ भी हो
तुम्हारी हर माँसपेशी
भोंपू की तरह दे रही है आवाज़ —
मर गई, मर गई, मर गई ।
नहीं, जवाब दो !
झूठ मत बोलो !

कैसे जाऊँगा मैं वापिस इस तरह ?
दो क़ब्रों के गढ़ों की तरह
खुद आई हैं आँखें तुम्हारे चेहरे पर ।
गहरी होती जा रही है क़ब्रें ।
दिखाई नहीं देता कोई तला ।
लगता है

गिर पडूँगा दिनों के फाँसी के तख़्ते से
रस्सियों की तरह टाँग दिया है मैंने अपना हृदय,
मैं झूल रहा हूँ उन पर
शब्दों के करतब दिखाता ।

मालूम है मुझे
प्यार ने घिसा दिया है उसे।
सैकड़ों लक्षणों के आधार पर
लगा सकता हूँ मैं ऊब का अनुमान।
मेरे हृदय में
प्राप्त करो अपना यौवन!
शरीर के उत्सव से
परिचय कराओ अपने हृदय का।
मालूम है मुझे —
हर कोई चुकाता है औरत की क़ीमत।
कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा
अगर पेरिस के फ़ैशनेबल कपड़ों के बजाए
तुम्हें पहनाऊँ मैं धुआँ तम्बाकू का।

प्राचीन पैगम्बर की तरह
हज़ारों राहों से ले जाऊॅंगा अपना प्यार।
जिस मुकुट को बनने में लगे हैं हज़ारों वर्ष
इन्द्रधनुष की तरह अंकित है उसमें मेरी पीड़ा के शब्द।
जिस तरह वज़न उठाने के खेल में
पिर की जीत हासिल की हाथियों ने,
प्रतिभाशाली व्यक्ति की तरह
मैंने क़दम-ताल किया है तुम्हारे दिमाग़ों पर।
लेकिन व्यर्थ है यह सब
तुम्हें तो तोड़ नहीं पाऊॅंगा मैं।
ख़ुश हो लो,
हाँ, ख़ुश हो लो,
तुमने कर डाला है अन्त।
अब दुख हो रहा है इतना
कि बस जा सकूँ अगर नहर तक
पूरा सिर दे डालूँगा पानी में।
तुमने दिए होंठ।
कितने भद्दे ढंग से पेश आती हो तुम अपने होंठों से —
छुआ नहीं उन्हें कि ठण्डा पड़ जाता हूँ मैं
जैसे कि तुम्हें नहीं
चूम रहा होऊँ मंदिर की ठण्डी चट्टानों को।

खड़ाक खुले किवाड़।
उसने किया प्रवेश,
सड़कों की ख़ुशी से भीगा हुआ मैं
विलाप में टूट गया दो हिस्सों में।

मैं चिल्लाया उस पर।
‘ठीक है चला जाऊँगा।
तेरी जीत हुई,
चीथड़े पहना उसे!
कोमल पंखों जैसे जिस्म पर भर गई है रेशम की चर्बी ।
सावधान, कहीं उड़ न जाए तेरी बीवी
बाँध दे उसके गले में हीरों के हार।’
उफ यह रात।
स्वयं ही कसता गया और अधिक निराशाओं को।
थरथराने लगा है कमरे का थोबड़ा
मेरे हँसने और रोने से।

और पिशाच की तरह
तुम से दूर ले जाया गया चेहरा उठा।
उसके गालों पर आँखों की तरह चमक उठीं तुम ।
किसी नये ब्यालिक की कल्पनाओं में
आई हो जैसे यहूदी सिओना-साम्राज्ञी।

टेक दिए घुटने यातनाओं के आगे ।
सम्राट अल्बेर्त
सारा शहर भेंट कर
उपहारों से लदे जन्म-दिन की तरह खड़ा है मेरे साथ।

सोना हो जाओ धूप, फूल और घास में
बहार हो जाओ, ओ सब तत्त्वों के जीवन।
मैं चाहता हूँ एक ही नशा
कविताओं को पीते रहने का।

ओ प्रिये,
तुम तो चुरा चुकी हो हृदय
हर चीज़ से वंचित कर उसे,
बहुत दुख दे रही हो तुम मुझे।
स्वीकार करो मेरा उपहार।
इससे अधिक, सम्भव है, सोच न पाऊँ कुछ और।

आज की तारीख़ पर फेरी त्योहारों के रंग।
दिखाओ, सूली से अपना करिश्मा, ओ जादू,
देखो —
शब्दों की कीलों से
काग़ज़ पर ठुका पड़ा हूँ मैं ।

मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

लेखक स्वयं अपने आपको समर्पित करता है ये पँक्तियाँ

प्रहार की तरह भारी
बज गए हैं चार

मुझ जैसा आदमी
सिर छिपाए तो कहाँ?
कहाँ है मेरे लिए बनी हुई कोई माँद ?

यदि मैं होता
महासागर जितना छोटा
उठता लहरों के पंजों पर
और कर आता चुम्बन चन्द्रमा का !
कहाँ मिलेगी मुझे
अपने जैसी प्रेमिका ?
समा नहीं पाएगी वह
इतने छोटे-से आकाश में ।

यदि मैं होता
करोड़पतियों जितना निर्धन !
पैसों की हृदय को क्‍या ज़रूरत ?
पर उसमें छिपा है लालची चोर ।
मेरी अभिलाषाओं की अनियन्त्रित भीड़ को
कैलिफोर्नियाओं का भी सोना पड़ जाता है कम ।
यदि मैं हकलाने लगता
दाँते
या पेत्राक की तरह
किसी के लिए तो प्रज्ज्वलित कर पाता अपना हृदय ।
दे पाता कविताओं से उसे ध्वस्त करने का आदेश ।
बार-बार
प्यार मेरा बनता रहेगा विजय द्वार :
जिसमें से गुज़रती रहेंगी
बिना चिह्न छोड़े प्रेमिकाएँ युगों-युगों की ।
यदि मैं होता
मेघ गर्जनाओं जितना शान्त —
कराहता
झकझोरता पृथ्वी की जीर्ण झोंपड़ी ।
निकाल पाऊँ यदि पूरी ताकत से आवाज़ें
तोड़ डालेंगे पुच्छलतारे पने हाथ
और दु:खों के बोझ से गिर आएँगे नीचे ।

ओ, यदि मैं होता
सूर्य जितना निस्तेज
आँखों की किरणों से चीर डालता रातें !
बहुत चाहता हूँ मैं पिलाना
धरती की प्यासी प्रकृति को अपना आलोक ।

चला जाऊँगा
घसीटता अपनी प्रेमिका को ।
न जाने किस ज्वरग्रस्‍त रात में
किन बलिष्‍ठ पुरुर्षों के वीर्य से
पैदा हुआ मैं
इतना बड़ा
और इतना अवांछित ?

मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

सुनिए

सुनिए !
आख़िर यदि जलते हैं तारे
किसी को तो होगी उनकी जरूरत ?
कोई तो चाहता होगा उनका होना ?
कोई तो पुकारता होगा थूक के इन छींटों को
हीरों के नामों से ?
और दोपहर की धूल के अन्धड़ में,
अपनी पूरी ताक़त लगाता
पहुँच ही जाता है ख़ुदा के पास,
डरता है कि देर हुई है उससे,
रोता है,
चूमता है उसके मज़बूत हाथ,
प्रार्थना करता है
कि अवश्य ही रहे कोई-न-कोई तारा उसके ऊपर ।
क़समें खाता है
कि बर्दाश्त नहीं कर सकेगा तारों रहित अपने दुख ।
और उसके बाद
चल देता है चिन्तित
लेकिन बाहर से शान्त ।
कहता है वह किसी से,
अब तो सब कुछ ठीक है ना ?
डर तो नहीं लगता ?
सुनिए !
तारों के जलते रहने का
कुछ तो होगा अर्थ ?
किसी को तो होगी इसकी ज़रूरत ?

ज़रूरी होता होगा
हर शाम छत के ऊपर
चमकना कम-से-कम एक तारे का ?

मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

आख़िर तो

सिफ़लिस के रोगी की नाक की तरह
पड़ी हुई थी सड़क !
काम-लिप्सा की लार थी नदी ।
अन्तिम पत्ते उतारकर
नंगे हो गए थे जून में उद्यान ।

मैं निकल आया चौराहे की तरफ़
विग की तरह सिर पर पहने झुलसा हुआ मुहल्ला ।
डरने लगे हैं लोग — मेरे मुँह में
अनचबी चीख़ हिला रही है टाँगें ।

लेकिन मुझपर कोई काबू नहीं पा सकता
न ही कर सकता है कोई निन्दा मेरी,
पैगम्बर के से मेरे पाँवों पर बरसाएँगे फूल
अपनी नाक खोए सभी लोग,
जानते हैं : मैं हूँ तुम्हारा — कवि ।

शराबख़ाने की तरह डरावनी है तुम्हारी कचहरी,
जलती हुई इमारत के बीच से
पवित्र चित्रों की तरह उठा ले जाएँगी मुझे वेश्याएँ
और करेंगी पेश मुझे अपनी निर्दोषता के सबूत में
और रो पड़ेगा ख़ुदा मेरी किताब पर ।

शब्दों की जगह
ढेले की तरह चिपकी होंगी माँसपेशियाँ,
बग़ल में दबाए हुए मेरी कविताएँ
ख़ुदा भागेगा आकाश में
और सुनाएगा अपने परिचितों को उन्हें ।

मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

सस्ता सौदा

चलाने लगता हूँ जब
किसी औरत से प्यार का चक्कर
या महज देखने लगता हूँ राहगीरों की तरफ़…
हर कोई सँभालने लगता है अपनी जेबें ।
कितना हास्यास्पद !
अरे रंकों के यहाँ भी
कोई डाका डाल सकता है क्या ?
बीत चुके होंगे न जाने कितने वर्ष
जब मालूम होगा —
शिनाख्त के लिए शव-गृह में पड़ा हुआ
मैं
कम नहीं था धनी
किसी भी प्येरपोंट मोरगन की तुलना में ।
न जाने कितने वर्षों बाद
रह नहीं पाऊँगा जीवित जब
दम तोड़ दूँगा भूख के मारे
या पिस्तौल का निशाना बन कर —
आज के मुझ उजड्ड को
अन्तिम शब्द तक याद करेंगे प्राध्यापक —
कब ?
कहाँ ?
कैसे अवतरित हुआ ?
साहित्य विभाग का कोई महामूर्ख
बकवास करता फिरेगा भगवान-शैतान के विषय में ।
झुकेगी
चापलूस और घमण्डी भीड़ :
पहचानना मुश्किल हो जाएगा उसे :
मैं-मैं ही हूँ क्या :
कुछ-न-कुछ वह अवश्य ही खोज निकालेगी
मेरी गंजी खोपड़ी पर
सींग या प्रभामण्डल जैसी कोई चीज़ ।
हर छात्रा
लेटने से पहले
होती रहेगी मंत्रमुग्‍ध मेरी कविताओं पर ।
मालूम है मुझ निराशावादी को
सदा-सदा रहेगी कोई-न-कोई छात्रा इस धरा पर ।
तो सुनो!
मापो उन सभी सम्पदाओं को
जिनका मालिक है मेरा हदय
महानताएँ
अलंकार हैं अमरत्व की ओर बढ़ते मेरे क़दमों की,
और मेरी अमरता
शताब्दियों में से उद्घोष करती
एकत्र करेगी दुनिया भर के मेरे प्रशंसक —
चाहिए क्‍या तुम्हें यह सब कुछ ?
अभी देता हूँ
मात्र एक स्‍नेहपूर्ण मानवीय शब्द के बदले में ।

लोगो !
खेत और राजपथ रौंदते हुए !
चले आओ दुनिया के हर हिस्से से ।
आज
पित्रअग्राद, नद्येझदिन्सकया में
बिक रहा है एक अमूल्य मुकुट
दाम है जिसका मात्र एक मानवीय शब्द ।

सच्च, सौदा सस्ता है ना ?
पर कोशिश तो करो
मिलता भी है कि नहीं —
वह एक शब्द मानवीय।

मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

तुम्हारे लिए 

नहीं ।
यह सच नहीं ।
नहीं !
तू भी ?
तू जिसे प्यार करता हूँ मैं
किसलिए
आख़िर किसलिए ?
ठीक है
मैं भेंट करता था फूल तुझे
पर मैंने तो चुराए नहीं थे चम्मच चान्दी के !
सफ़ेद मैं
गिर पड़ा था चौथी मंज़िल से ।
हवा में झुलस गए थे मेरे गाल ।

प्राचीन देब-प्रतिमाओं का सा गम्भीर
ललाट उठा
राजधानी की विवेकहीन एकरस दिनचर्या से ऊपर ।
तुम्हारे शरीर पर
ठीक जैसे मृत्यु शैय्या पर
हृदय
पूरे कर चुका है
अपने दिन ।
निर्मम हत्या में तुमने मैले नहीं किए अपने हाथ ।

तुमने, बस, इतना कहा
“नर्म बिस्तर पर
वह था
और थे फल
और शराब मेज़ की हथेली पर ।”

ओ मेरे प्रेम,
तुम्हारा यदि कहीं ठिकाना था
तो मेरे रुग्ण मस्तिष्क में !
बन्द कर दो मूर्खतापूर्ण यह प्रहसन ।
देखो —
उतार फेंक रहा हूँ
कवच
मैं — महानतम क्विगजोट !
याद रखो :
पल भर में
थक गए थे ईसा
सलीब पर
भीड़ थी कि गला फाड़-फाड़कर चीख़ रही थी

न्यायसंगत है यह :
जो भी
सोना चाहेगा आराम की नीन्द
थूक दूँगा मैं उसके वसन्त दिवस पर !
कभी भी तरस नहीं खाएगा इनसान
इस संसार को त्याग चुके तपस्वियों पर ।

बहुत हो लिया !
अब
सच, अपनी समस्त आदिम शक्ति की क़सम,
यदि ले आओ तुम कोई ख़ूबसूरत छोकरी मेरे सामने,
ज़रा भी तकलीफ़ नहीं दूँगा अपने हृदय को,
बल्कि बलात्कार करूँगा उससे
और थूक दूँगा उसके वक्ष पर ।
जैसे को तैसा !
फैलने दो प्रतिशोध की यह आग !
हर कान में डालो यह बात :
यह पृथ्वी पूरी की पूरी
क़ैदी है
जिसके एक सिरे से सूर्य ने काट रखे हैं बाल !
जैसे को तैसा !
जान से भी यदि मार डालो मुझे तुम
दफ़्ना दिए जाने के बाद भी
मैं निकल आऊँगा बाहर ।
पत्थर पर घिसकर और तेज़ होंगे चाकू मेरे दाँतों के
कुत्ते की तरह घुस जाऊँगा बैरक में ।
पागल मैं
पसीने और बाज़ार की गन्ध छोड़ते
चाकू से
काट डालूँगा अपने मैले हाथ ।
रात में कूद पड़ोगे !
गो मैने पुकारा हो !
ज़मीन पर से उठ खड़ा होऊँगा सफ़ेद बैल की तरह !
हुआँ-हुआँ करता हुआ ।
फोड़े की तरह उभरी हुई गर्दन
तंग आ गई है जूए
और फोड़े पर भिनभिनाती मक्खियों से ।

बारहसिंघे की तरह मुड़ता हूँ पीछे,
उलझ जाता है टहनियों जैसा सिर
ख़ून से भीगी आँखों से ।
हाँ,
ज़हर पिलाए गए पशु की तरह प्राण नहीं छोड़ूँगा मैं ।
यह आदमी कहीं नहीं जा पाएगा !
मुँह पर अटकी रह गई प्रार्थना —
दयनीय और गन्दा लेट गया वह पत्थर पर ।
उसकी तस्वीर बनाऊँगा
ज़ार के महल के द्वारों पर
राज़िन[1] के दिव्य मुख पर ।

फेंकों न अपनी किरणें, ओ सूर्य !
सूख जाओ, ओ नदियो,
बुझने न पाए उसकी प्यास —
कि पैदा हों मेरे हज़ार-हज़ार शिष्य
चौराहों पर से धर्मच्युत किए जाने की घोषणा करने के लिए !

ओ अन्तत:
जब शताब्दियों की पीठ पर खड़ा
प्रकट होगा उनके लिए अन्तिम दिन —
हत्यारों और अराजकतावादियों कीअन्धेरी आत्माओं में
प्रज्वलित होऊँगा मैं रक्तिम प्रेतात्माओं की तरह !

सुबह हो रही है
और अधिक खुल रहा है आकाश का मुँह ।
बून्द-बून्द पीता है वह
यह रात ।
खिड़कियों में से आग की लपटें धधक रही हैं
घनी धूप बिखर रही है सोए शहर पर ।

पवित्र है मेरा प्रतिशोध !
पुन:
सड़कों की धूल के ऊपर
पँक्तियों की सीढ़ियों के ऊपर चढ़कर
उँडेल दालो पूरा हृदय
स्वीकारोक्ति में !

कौन हो तुम,
ओ भविष्य के लोगो ?
यह — मैं हूँ
पूरे का पूरा
दर्द और घाव !
तुम्हारे लिए छोड़ रहा हूँ मैं
फलों भरा यह उद्यान
अपने उदत्त हृदय का ।

(1916)
मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

जवाब चाहिए 

युद्ध के बज उठे हैं नगाड़े ।
ज़िन्दा लोगों में घोंपे जाने के लिए
पुकार रहे हैं हथियार ।

हर देश से
गुलाम के बाद गुलाम
निशाना बनाया जा रहा है संगीनों का ।

किसलिए
काँप रही है धरती
भूखी
नंगी ?
भाप की तरह उठ रहा है ख़ून मानवता का
मात्र इसलिए
कि कहीं कोई
कब्ज़ा कर सके अल्बानिया पर ।
इनसानों के झुण्डों का सम्मिलित क्रोध
गिर रहा है प्रहार पर प्रहार करते हुए दुनिया पर
मात्र इसलिए
कि बिना कर चुकाए वोस्फ़ोरस से गुज़र सकें
जहाज़ किसी के ।

वह दिन दूर नहीं
जब दुनिया के पास बच नहीं सकेगी
एक भी पसली सही सलामत ।
निकाल डालेंगे आत्मा को बाहर
और कुचल डालेंगे
मात्र इसलिए
कि कोई समेट ले अपने हाथों मेसोपोटेमिया को !
किसके नाम पर
चरमराता भद्दा जूता रौन्द रहा है धरती को ?
कौन है लड़ाइयों के आकाश पर —
आज़ादी ?
ख़ुदा ?
पैसा ?
अपनी जान न्योछावर करने वालो,
कब दे मारोगे तुम उनके मुँह पर ये सवाल —
लड़ रहे हैं हम
किसलिए ?

(1917)
मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह

कैसे हो तुम

डोलची से मैंने कुछ रंगों के छींटे मारे
और इस उबाऊ दुनिया को पोत दिया संवेगों से

जेली की डिश पर मैंने ख़ाका खींचा
समुद्र के उभरी हुई हड्डियों वाले चेहरे का ।
डिब्बा बन्द सालमोन मछली के आँस पर
मैंने सुना बुलावा
नए होठों का ।

और तुम
क्या तुम बजा सकते थे बाँसुरी
फ़कत ड्रेन-पाइप के एक टुकड़े पर ?

1913

तुम

रंगरेलियों से रंगरेलियों तक गुलछर्रे उड़ाते तुम
एक गुसलख़ाने और गर्म आरामदेह पाख़ाने के मालिक !
तुम्हारी यह मजाल कि जार्ज तमगों की बाबत
अपनी चापलूस मिचमिचाती आँखों से अख़बार में पढ़ो ?

क्या तुम्हें एहसास है कि ढेर तमाम छुटभैये
सोच रहे हैं, कैसे ठूँस कर भरा जा सकता है तुम्हारा पेट
जबकि अभी-अभी ही शायद लेफ़्टीनेन्ट पित्रोफ़
बम से अपनी दोनों टाँगें गँवा चुका है ।

फ़र्ज़ करो उसे लाया जाए वध के लिए
और अपनी लहुलुहान हालत में वह अचानक देखे तुम्हें
तुम्हारे मुँह से अब भी सोडावाटर और वोद्का की
लार टपक रही है
और तुम गुनगुना रहे हो सिविरयानिन का गीत ।

तुम जैसों के लिए अपनी जान हलाक़ करूँ
औरतों के गोश्त, दावतों और कारों के मरभुक्खों ?
बेहतर है मैं चला जाऊँ मास्को के शराबख़ानों में
रंडियों को अनन्नास का रस पिलाने ।

1915

अलग-अलग हो सकती हैं रुचियाँ 

घोड़ी ने
देखा ऊँट को,
और हिनहिना कर हँसी।

“कैसी जबरदस्त
सनक है घोड़ी की !”

जवाब टिकाया ऊँट ने
“तुम एक घोड़ी?
तकरी बन नहीं!
तुम हो एक अविकसित ऊँट
मात्र।”

और सिर्फ़ ईश्वर ही
वास्तव में सर्वज्ञ था
जानता था कि स्तनधारी थे वे
अलग-अलग नस्ल के।

1929

एक बजे के बाद.

(आत्महत्या के बाद मायकोवस्की की पतलून की जेब से यह अधूरी कविता मिली थी)

एक बजे के बाद तुम ज़रूर सो चुके होंगे।
बहती है रात की आकाशगंगा, एक रजत धारा की तरह ।
जल्दी नहीं ।
कुचलते हुए तुम्हारे सपनों को, त्वरित तार भेज कर
खलबली पैदा करता तुम्हारे सर में
मैं नहीं जगाऊँगा तुम्हें ।

जैसा कि कहते हैं वे, यही है अन्त कहानी का
ज़िन्दगी की चट्टानों से टकरा कर
चकनाचूर हो चुकी है
प्यार की नाव ।

हम अलग हो चुके हैं और हमें ज़रूरत नहीं
आपसी चोटों, अपमान और दुखों की फ़ेहरिस्त की।
और देखो
संसार कैसा गुमसुम पड़ा है
आकाश अपने बटुए से अदा करता है रात
अनगिनत तारों के साथ ।

ऐसे समय में कोई उठता है
सम्बोधित करता
समय और इतिहास और अखिल ब्रह्माण्ड को !

1930

महानगर का नरक

खिड़कियाँ बाँट देती हैं शहर के विशाल नरक को
छोटे-छोटे नरकों में
बिजली के खम्भों के नीचे लाल राक्षस मोटर गाड़ियाँ
ठीक कान के ऊपर बजाती हैं हार्न ।

और उधर, साइनबोर्ड के नीचे, कर्ज़ पर लाई गई मछली के साथ
गिरा दिया गया एक बूढ़ा, झुकता है ढूँढ़ने
अपनी ऐनक, ज़ोर-ज़ोर से सुबकता है जब एक ट्राम
झटके खाती, चौंधिया देती है आँखों को
साँझ के धुँधलके में ।

गगनचुम्बी इमारतों के पिछवाड़े, भरे हुए धधकते अयस्कों से
जहाँ खड़खड़ाते रहते हैं गाड़ियों के इस्पात
एक हवाई-जहाज़ गिरता है आख़िरी चीख़ के साथ
सूर्य की दुखती आँखों की टपकती कीच में ।

तभी रोशनी के कम्बल में पड़ती हैं सलवटें
अपनी वासना को बाहर उलीचती है रात
लम्पट और पियक्कड़ !
और गली के सूर्य के उस पार सबसे करुण दृश्य
थुलथुल चाँद को डुबोता है अवांछित कबाड़ में ।

1913

एक बजे के बाद

1930 में मायकोवस्की ने आत्महत्या की थी। यह कविता मृत्यु के बाद उनकी जेब से मिली थी। शायद यह अपूर्ण कविता ही उनकी अन्तिम कविता ही थी

एक बजे के बाद
तुम
ज़रूर सो जाओगे

बहती हुई रात की आकाशगंगा
एक रजत धारा की तरह
जल्दी नहीं
कुचलते हुए तुम्हारे सपनों को
त्वरित तार भेजकर
खलबली पैदा करता तुम्हारे सर में
मै नहीं जगाऊँगा तुम्हें

जैसा कि वे कहते है
यही है अन्त कहानी का
ज़िन्दगी की चट्टानों से टकरा कर
चकनाचूर हो चुकी है
प्यार की नाव
हम अलग हो चुके है

और हमें ज़रूरत नही
आपसी चोटों
अपमान और दुखों की तालिका की
और देखो
संसार कैसा गुमसुम पड़ा है
आकाश अपने बटुए से अदा करता है रात
असंख्य सितारों के साथ

ऐसे समय में
कोई उठता है
सम्बोधित करते हुए
समय और इतिहास और अखिल ब्रह्माण्ड को…

अँग्रेज़ी से अनुवाद : विजेन्द्र

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