वशिष्ठ अनूप की रचनाएँ

जो भूखा है

जो भूखा है छीन झपटकर खाएगा
कब तक कोई सहमेगा शरमाएगा

अपनी भाषा घी शक्कर सी होती है
घैर की भाषा बोलेगा हकलाएगा

चुप रहने का निकलेगा अंजाम यही
धीरे धीरे सबका लब सिल जाएगा

झूठ बोलना हरदम लाभ का सौदा है
सच बोला तो जान से मारा जाएगा

जारी करता है वह फतवे पर फतवा
नंगा दुनिया को तहजीब सिखाएगा

मजबूरी ही नहीं जरूरत है युग की
गठियल हाथों में परचम लहराएगा

फूल की खुशबू 

फूल की खुशबू हवा की ताजगी खतरे में है
लोक गीतों की खनकती ताजगी खतरे में है

सभ्यता इस दौर की है नर्वसन होने लगी
आदमीयत गुम रही है आदमी खतरे में है

पानी पानी को तरसती सोच में डूबी नदी
हो रही हर रोज दूषित जिंदगी खतरे में है

पत्थरों के जंगलों में पल रहे विषधर तमाम
प्यार में डूबी हुई निश्छल हँसी खतरे में है

लोग अब करने लगे हैं यूँ अँधेरे को नमन
चाँदनी सहमी हुई है रोशनी ख़तरे में है

दिन ब दिन रंगीन होता जा रहा संसार यूँ
इन दिनों सदियों सराही सादगी खतरे में है

सहमी सी पायल

सहमी सी पायल की रुनझुन सिमट गई तनहाई तक
पहुँच न पाते कितने सपने डोली तक शहनाई तक

मन से लेकर आँखों तक अनकही व्यथा अंकित होगी
कैसे कैसे दिन देखे हैं बचपन से तरुणाई तक

अंबर से पाताल लोक तक चुभती हुई निगाहें है
अक्सर ज़रा-ज़रा सी बातें ले जातीं रुसवाई तक

हृदय सिंधु की एक लहर का भी स्पर्श न कर पाए
जिनका दावा जा सकते हैं सागर की गहराई तक

शहर गाँव घर भीतर-बाहर सब हैं उनके घेरे में
पहुँच चुके हैं साँपों के फन देहरी तक अँगनाई तक

सीता कभी अहिल्या बनती, कभी द्रौपदी, रूप कंवर
जुड़ी हुई है कड़ी-कड़ी सब फूलन भंवरीबाई तक

होठों से अमृत

होंठों से अमृत-खुशियाँ छलकाता है
कोई बच्चा नींद में जब मुसकाता है

हाथ पाँव मुँह और नज़र की भाषा में
माँ से वह जाने क्या क्या बतियाता है

जीवन का अद्भुत संगीत बरसता है
बच्चा जब कुछ कहता है तुलतलाता है

माँ की ममता का वह एक छत्र राजा
अपने आगे किसको कहाँ लगाता है

सारे घर का है वह एक खिलौना पर
स्वयं खिलौनों की खातिर ललचाता है

सारा घर आँगन खुशियों से भर जाता
जब वह उठकर डगमग पाँव बढ़ाता है

इसलिए राह संघर्ष की हमने चुनी

इसलिए राह संघर्ष की हमने चुनी
ज़िंदगी आँसुओं में नहाई न हो,
शाम सहमी न हो, रात हो ना डरी
भोर की आँख फिर डबडबाई न हो। इसलिए…

सूर्य पर बादलों का न पहरा रहे
रोशनी रोशनाई में डूबी न हो,
यूँ न ईमान फुटपाथ पर हो खड़ा
हर समय आत्मा सबकी ऊबी न हो;
आसमाँ में टँगी हों न खुशहालियाँ
कैद महलों में सबकी कमाई न हो। इसलिए…

कोई अपनी खुशी के लिए ग़ैर की
रोटियाँ छीन ले, हम नहीं चाहते,
छींटकर थोड़ा चारा कोई उम्र की
हर खुशी बीन ले, हम नहीं चाहते;
हो किसी के लिए मखमली बिस्तरा
और किसी के लिए इक चटाई न हो। इसलिए…

अब तमन्नाएँ फिर ना करें खुदकुशी
ख़्वाब पर ख़ौफ की चौकसी ना रहे,
श्रम के पाँवों में हों ना पड़ी बेड़ियां
शक्ति की पीठ अब ज़्यादती ना सहे,
दम न तोड़े कहीं भूख से बचपना
रोटियों के लिए फिर लड़ाई न हो। इसलिए…

जिस्म से अब न लपटें उठें आग की
फिर कहीं भी न कोई सुहागन जले,
न्याय पैसे के बदले न बिकता रहे
क़ातिलों का मनोबल न फूले–फले;
क़त्ल सपने न होते रहें इस तरह
अर्थियों में दुल्हन की विदाई न हो। इसलिए…

ये क्या हो गया है हमारे शहर को

जलाते हैं अपने पड़ोसी के घर को
ये क्या हो गया है हमारे शहर को।

समन्दर का पानी भी कम ही पडेगा
जो धुलने चले रक्तरंजित नगर को।

सम्हालो ज़रा सिर फिरे नाविकों को
ये हैं मान बैठे किनारा भँवर को।

मछलियों को कितनी ग़लतफ़हमियाँ हैं
समझने लगीं दोस्त खूनी मगर को।

दिखा चाँद आरै ज्वार सागर में आया
कोई रोक सकता है कैसे लहर को।

मैं डरता हूँ भोली निगाहों से तेरी
नज़र लग न जाये तुम्हारी नज़र को।

परिन्दो के दिल में मची खलबली है
मिटाने लगे लोग क्यों हर शज़र को।

समन्दर के तूफां से वो क्या डरेंगे
चले ढूंढने हैं जो लालो-गुहर को।

उठो और बढ़ो क्योंकि हमको यकीं है
हमारे कदम जीत लेंगे सफर को।

खेलते मिट्टी में बच्चों की हंसी अच्छी लगी

खेलते मिट्टी में बच्चों की हंसी अच्छी लगी
गाँव की बोली हवा की ताज़गी अच्छी लगी।

मोटी रोटी साग बथुवे का व चटनी की महक
और ऊपर से वो अम्मा की खुशी अच्छी लगी।

अप्सराओं की सभा में चहकती परियों के बीच
एक ऋषिकन्या सी तेरी सादगी अच्छी लगी।

सभ्यता के इस पतन में नग्नता की होड़ में
एक दुल्हन सी तेरी पोशीदगी अच्छी लगी।

दिल ने धिक्कारा बहुत जब झुक के समझौता किया
जु़ल्म से जब भी लड़ी तो ज़िन्दगी अच्छी लगी।

अक्षर-अक्षर, तिनका-तिनका चुनना पड़ता है

अक्षर-अक्षर ,तिनका-तिनका चुनना पड़ता है,
भीतर-भीतर कितना कहना-सुनना पड़ता है।

चिड़िया जैसे नीड़ बनाती है तन्मय होकर,
कविता को भी बहुत डूबकर बुनना पड़ता है।

दुहराना पड़ता है सुख-दुख को हँसकर-रोकर,
यादों में खोकर अतीत को गुनना पड़ता है।

इतनी गुत्थमगुत्था हो जाती हैं कुछ यादें,
जज़्बातों को रुई- सरीखा धुनना पड़ता है।

गदोरी पर रची मेंहदी की लाली याद आती है

गदोरी पर रची मेंहदी की लाली याद आती है,
मुझे अक्सर वो लड़की भोली-भाली याद आती है।

किसी कुन्दन-जड़ी गुड़िया को जब भी देखता हूँ मैं,
किसी के कान की पीतल की बाली याद आती है।

तुम्हारी बोलती ख़ामोशियाँ महसूस करता हूँ,
वो फूलों से भरी ख़ुशरंग डाली याद आती है।

बहुत-सी बिजलियों की झालरें आँखों में जब चुभतीं,
वो मिट्टी के दियों वाली दिवाली याद आती है।

नई तहज़ीब जब निर्वस्त्र होती जा रही दिन-दिन,
सलीकेदार औरत गाँव वाली याद आती है।

शहर के होटलों में रोटियों के दाम जब पढ़ता,
मुझे ममता-भरी वो घर की थाली याद आती है।

मशालें जो हम-तुम जलाए हुए हैं

मशालें जो हम-तुम जलाए हुए हैं,
अँधेरे बहुत तिलमिलाए हुए हैं।

उन्हें खल रही है ये हिम्मत हमारी,
कि क्यों लोग परचम उठाए हुए हैं।

दिलों में कोई आग दहकी हुई है,
पलाशों के मुँह तमतमाए हुए हैं।

हमारे पसीने की आभा है इनमें,
जो गुल लान में मुस्कराए हुए हैं।

ये बेख़्वाब आँखें, ये बेजान चेहरे,
उन्हीं ज़ालिमों के सताए हुए हैं।

अजब है जो निकले थे ज़ुल्मत मिटाने,
वे दरबार में सर झुकाए हुए हैं।

महल में बैठकर वह आमजन की बात करता है

महल में बैठकर वह आमजन की बात करता है,
कोई आवारा मीरा के भजन की बात करता है।

तेरे मुँह से सितम के ख़ात्मे की बात यूँ लगती,
स्वयँ रावण ही ज्यों लंका दहन की बात करता है।

नहीं महफ़ूज़ हैं अब बेटियाँ अपने घरों में भी,
जनकपुर में कोई सीताहरण की बात करता है।

मुखौटे में छिपे हर रहनुमा चेहरे का ये सच है,
वो छूकर बर्फ़ तेज़ाबी जलन की बात करता है।

हमारे दौर में अच्छे-बुरे का फ़र्क़ है मुश्किल,
यहाँ हर बदचलन अब आचरण की बात करता है।

जो बाबा बैठता है सोने-चाँदी के सिंहासन पर,
वो इस संसार को माया-हिरन की बात करता है।

तुलसी के, जायसी के, रसखान के वारिस हैं

तुलसी के, जायसी के, रसखान के वारिस हैं,
कविता में हम कबीर के ऐलान के वारिस हैं।

हम सीकरी के आगे माथा नहीं झुकाते,
कुम्भन की फ़कीरी के, अभिमान के वारिस हैं।

सीने में दिल हमारे आज़ाद का धड़कता,
हम वीर भगत सिंह के बलिदान के वारिस हैं।

एकलव्य का अंगूठा कुछ पूछता है हरदम,
हम तीर कमानों के संधान के वारिस हैं।

हमने समर में पीठ दिखाई नहीं कभी भी,
आल्हा के हम सहोदर, मलखान के वारिस हैं।

हमेशा रँग बदलने की कलाकारी नहीं आती

हमेशा रँग बदलने की कलाकारी नहीं आती,
बदलते दौर की मुझको अदाकारी नहीं आती।

जिसे तहज़ीब कहते हैं, वह आते-आते आती है,
फ़क़त दौलत के बलबूते रवादारी नहीं आती।

निगाहों में निगाहें डाल सच कहने की आदत है,
ज़माने की तरह से मुझको ऐयारी नहीं आती।

हज़ारों महल बनवा लो, बहुत-सी गाड़ियाँ ले लो,
अगर किरदार बौना है, तो ख़ुद्दारी नहीं आती।

कभी घनघोर अँधियारा भी जीवन में ज़रूरी है,
अमावस के बिना पूनम की उजियारी नहीं आती।

बुढ़ापा सब पर आता है, बुढ़ापा सब पर आयेगा,
भले होते हैं गर बच्चे, तो लाचारी नहीं आती।

क़लम के साथ ही हाथों में मेरे फावड़ा आया,
सबब यह है कि मुझको अब भी गुलकारी नहीं आती।

बहुत चुपके से कोई दिल में आकर बैठ जाता है,
कभी भी सूचना देकर ये बीमारी नहीं आती।

कोई अंगार दिल को दग्ध करता है बहुत दिन तक,
न हो यह आग तो शब्दों में चिंगारी नहीं आती।

गाँव-घर का नज़ारा तो अच्छा लगा

गाँव-घर का नज़ारा तो अच्छा लगा,
सबको जी भर निहारा तो अच्छा लगा।

गर्म रोटी के ऊपर नमक-तेल था,
माँ ने हँस कर दुलारा तो अच्छा लगा।

अजनबी शह्र में नाम लेकर मेरा,
जब किसी ने पुकारा तो अच्छा लगा।

हर समय जीतने का चढ़ा था नशा,
अपने बच्चों से हारा तो अच्छा लगा।

एक लड़की ने बिखरी हुई ज़ुल्फ़ को
उँगलियों से सँवारा तो अच्छा लगा।

यूँ ही टकरा गई थी नज़र राह में,
मुड़ के देखा दुबारा तो अच्छा लगा।

रेत पर पाँव जलते रहे देर तक,
जब नदी ने पखारा तो अच्छा लगा।

एक खिड़की खुली,एक परदा उठा,
झिलमिलाया सितारा तो अच्छा लगा।

दो हृदय थे, उफनता हुआ सिन्धु था,
बह चली नेह-धारा तो अच्छा लगा।

चाँद-तारों की, फूलों की चर्चा चली,
ज़िक्र आया तुम्हारा तो अच्छा लगा।

उम्र तो है गुड़िया से खेलें, नज़र टिकी गुब्बारों पर

उम्र तो है गुड़िया से खेलें, नज़र टिकी गुब्बारों पर,
नंगे पाँव चले हैं बच्चे, दहक रहे अंगारों पर।

सर पर भारी बोझ लिये बैदेही पैदल भटक रही,
टूटी चप्पल, दूर है मंज़िल, चलना है तलवारों पर।

स्वाभिमान से जो जीते थे, आज भिखारी जैसे हैं,
संकट में भी क्रूर सियासत, थू ढोंगी हत्यारों पर।

कई दिनों से भूखी-प्यासी माँ की छाती सूख गई,
नाज़ुक बच्चा हुआ अधमरा, लानत है मक्कारों पर।

खाना नहीं मिला पर लाठी अक्सर ही खा लेते हैं,
साँसें टँगी हुई हैं इनकी, मंज़िल की मीनारों पर।

सब कुछ खोकर सड़क किनारे भी रुकने को जगह नहीं,
नेताओं की हँसती फोटो चिपकी है दीवारों पर।

रिक्शा ठेला साइकिल पैदल, गिरते-पड़ते निकल पड़े,
अकथ दर्द की कविता कैसे लिख दूँ इन बंजारों पर।

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