‘वहशत’ रज़ा अली कलकत्वी

आँख में जलवा तिरा दिल में तिरी याद रहे 

आँख में जलवा तिरा दिल में तिरी याद रहे
ये मयस्सर हो तो फिर क्यूँ कोई ना-शाद रहे

इस ज़माने में ख़ामोशी से निकलता नहीं काम
नाला पुर-शोर हो और ज़ोरों पे फ़रियाद रहे

दर्द का कुछ तो हो एहसास दिल-ए-इंसान में
सख़्त ना-शाद है दाइम जो यहाँ शाद रहे

ऐ तिरे दाम-ए-मोहब्बत के दिल ओ जाँ सदके
शुक्र है क़ैद-ए-अलाइक से हम आज़ाद रहे

नाला ऐसा हो कि हो उस पे गुमान-ए-नग़मा
रहे इस तरह अगर शिकवा-ए-बेदाद रहे

हर तरफ़ दाम बिछाए हैं हवस ने किया क्या
क्या ये मुमकिन है यहाँ कोई दिल आज़ाद रहे

जब ये आलम हो कि मँडलाती हो हर सम्त को बर्क़
क्यूँ कोई नौहा-गर-ए-ख़िरमन-ए-बर्बाद रहे

अब तसव्वुर में कहाँ शक्ल-ए-तमन्ना ‘वहशत’
जिस को मुद्दत से न देखा हो वो क्या याद रहे

आह-ए-शब-ए-नाला-ए-सहर ले कर 

आह-ए-शब-ए-नाला-ए-सहर ले कर
निकले हम तोश-ए-सफर ले कर

शुग़्ल है नाला कुछ मुराद नहीं
क्या करूँ ऐ फ़लक असर ले कर

तेरी महफ़िल का यार क्या कहना
हम भी निकले हैं चश्म-ए-तर ले कर

आप मैं ने दिया दिल उस बुत को
झुक गई शाख़ ख़ुद समर ले कर

था क़फ़स का ख़याल दामन-गीर
उड़ सके हम न बाल ओ पर लेकर

‘वहशत’ उस बज़्म में रहे थे रात
सुब्ह निकले हैं दर्द ए सर लेकर

आप अपना रू-ए-ज़ेबा देखिए 

आप अपना रू-ए-ज़ेबा देखिए
या मुझे महव-ए-तमाशा देखिए

शौक़ को हँगामा-आरा देखिए
कारोबार-ए-हसरत-अफज़ा देखिए

रंग-ए-गुल-ज़ार-ए-तमन्ना देखिए
दिल-कशी-हा-ए-तमाशा देखिए

हुस्न है सौ रंग में तहसीं तलब
दीदा-ए-हैराँ से क्या क्या देखिए

बज़्म में उस बे-मुरव्वत की मुझे
देखना पड़ता है क्या क्या देखिए

हसरत आँखों में है लब ख़ामोश हैं
शेव-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना देखिए

हाए रे ज़ौक़-ए-तमाशा-ए-जमाल
ख़ुद तमाशा हूँ तमाशा देखिए

आप ने फिर कर न देखा इस तरफ़
हो गया ख़ून-ए-तमन्ना देखिए

उठती हैं नज़रें मेरी किस शौक़ से
मुझ को हँगाम-ए-तमाशा देखिए

हसरतों का हाए रे दिल में हुजूम
आरज़ुओं का नतीजा देखिए

सजदे को बे-ताब होती हैं जबीं
शोख़ी-ए-नक़्श-ए-कफ़-ए-पा देखिए

मैं हूँ उस साक़ी का दीवाना जिसे
देखिये जब मस्त-ए-सहबा देखिए

ख़ाक में किस दिन मिलाती है मुझे
उस से मिलने की तमन्ना देखिए

कहते हैं कर लेंगे उस काफ़िर को राम
हज़रत-ए-‘वहशत’ का दावा देखिए

आज़ाद उस से हैं के बयाबाँ ही क्यूँ न हो

आज़ाद उस से हैं के बयाबाँ ही क्यूँ न हो
फाड़ेंगे जेब गोशा-ए-जिन्दाँ ही क्यूँ न हो

हो शुग़्ल कोई जी के बहलने के वास्ते
राहत-फ़ज़ा है नाला ओ अफ़्ग़ाँ ही क्यूँ न हो

सौदा-ए-जुल्फ़-ए-यार से बाज़ आएँगे न हम
मज्मू-ए-हवास-ए-परेशाँ ही क्यूँ न हो

एहसान-ए-तीर-ए-यार अदा हो सकेगा क्या
जान अपनी नज़र-ए-लज़्ज़त-ए-पैकाँ ही क्यूँ न हो

जीते रहेंगे वादा-ए-सब्र-आज़मा पे हम
उम्र अपनी मिस्ल-ए-वक़्त-ए-गुरेज़ाँ ही क्यूँ न हो

‘वहशत’ रूकें न हाथ सर-ए-हश्र देखना
उस फ़ितना-ख़ू का गोशा-ए-दामाँ ही क्यूँ न हो

ऐ अहल-ए-वफ़ा ख़ाक बने काम तुम्हारा 

ऐ अहल-ए-वफ़ा ख़ाक बने काम तुम्हारा
आग़ाज बता देता है अंजाम तुम्हारा

जाते हो कहाँ इश्क़ के बेदाद-कशो तुम
उस अंजुमन-ए-नाज़ में क्या काम तुम्हारा

ऐ दीदा ओ दिल कुछ तो करो ज़ब्त ओ तहम्मुल
लबरेज़ मय-ए-शौक़ से है जाम तुम्हारा

ऐ काश मिरे क़त्ल ही का मुज़्दा वो होता
आता किसी सूरत से तो पैग़ाम तुम्हारा

‘वहशत’ हो मुबारक तुम्हें बद-मस्ती ओ रिंदी
जुज़ इश्क़-ए-बुताँ और है क्या काम तुम्हारा

और इशरत की तमन्ना क्या करें

और इशरत की तमन्ना क्या करें
सामने तू हो तुझे देखा करें

महव हो जाएँ तसव्वुर में तेरे
हम भी अपने क़तरे को दरिया करें

हम को है हर रोज़ हर वक़्त इंतिज़ार
बंदा-परवर गाह गाह आया करें

चारा-गर कर चाहिए करना इलाज
उस को भी अपना सा दीवाना करें

उन के आने का भरोसा हो न हो
राह हम उन की मगर देखा करें

हम नहीं ना-वाक़िफ़ रस्म-ए-अदब
दिल की बे-ताबी को ‘वहशत’ क्या करें

चला जाता है कारवान-ए-नफ़स 

चला जाता है कारवान-ए-नफ़स
न बाँग-ए-दरा है न सौत-ए-जरस

बरस कितने गुज़रे ये कहते हुए
के कुछ काम कर लेंगे अब के बरस

न वो पूछते हैं न कहता हूँ मैं
रही जाती है दिल की दिल में हवस

वो हसरत-ज़दा सैद मैं ही तो हूँ
है परवाज़ जिस की दुरून-ए-हवस

सितम हैं से ‘वहशत’ तेरी ग़फ़लतें
तुझे काश होता शुमार-ए-नफ़स

दर्द आके बढ़ा दो दिल का तुम ये काम तुम्हें क्या मुश्किल है

दर्द आके बढ़ा दो दिल का तुम ये काम तुम्हें क्या मुश्किल है
बीमार बनाना आसाँ है हर-चंद मुदावा मुश्किल है

इल्ज़ा न देंगे हम तुम को तस्कीन में कोई की न कमी
वादा तो वफ़ा का तुम ने किया किया कीजिए ईफ़ा मुश्किल है

दिल तोड़ दिया तुम ने मेरा अब जोड़ चुके तुम टूटे को
वो काम निहायत आसाँ था ये काम बला का मुश्किल है

आग़ाज़ से ज़ाहिर होता है अंजाम जो होने वाला है
अंदाज़-ए-ज़माना कहता है पूरी को तमन्ना मुश्किल है

मौक़ूफ़ करो अब फ़िक्र-ए-सुख़न ‘वहशत’ न करो अब ज़िक्र-ए-सुख़न
जो काम के बे-हासिल ठहरा दिल उस में लगाना मुश्किल है

देखना वो गिर्या-ए-हसरत मआल आ ही गया

देखना वो गिर्या-ए-हसरत मआल आ ही गया
बेकसी में कोई तो पुरसान ए हाल आ ही गया

जुरअत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना का सबब वो ख़ुद हुए
मेहरबाँ देखा उन्हें लब पर सवाल आ ही गया

दिल को हम कब तक बचाए रखते हर आसेब से
ठेस आख़िर लग गई शीशे में बाल आ ही गया

बे-वफ़ाई से वफ़ा का देते वो कब तक जवाब
दिल ही तो है रफ़्ता रफ़्ता इंफ़िआल आ ही गया

ख़ुद-फ़रामोशी की लज़्ज़त ना-मुकम्मल रह गई
बा-वजूद-ए-बे-ख़ूद तेरा ख़याल आ ही गया

एक मुद्दत से नहीं मिलता था ‘वहशत’ का पता
ले तिरे कूचे में वो आशुफ़्ता-हाल आ ही गया

दिल के कहने पे चलूँ अक़्ल का कहना न करूँ

दिल के कहने पे चलूँ अक़्ल का कहना न करूँ
मैं इसी सोच में हूँ क्या करूँ और क्या न करूँ

ज़िंदगी अपनी किसी तरह बसर करना है
क्या करूँ आह अगर तेरी तमन्ना न करूँ

मजलिस-ए-वाज़ में क्या मेरी ज़रूरत नासेह
घर में बैठा हुआ शुग़्ल-ए-मय ओ मीना न करूँ

मस्त है हाल में दिल बे-ख़बर-ए-मुस्तक़बिल
सोचता हूँ उसे होश्यार करूँ या न करूँ

किस तरह हुस्न-ए-ज़बाँ की हो तरक़्की ‘वहशत’
मैं अगर ख़िदमत-ए-उर्दू-ए-मोअल्ला न करूँ

जो तुझ से शोर-ए-तबस्सुम ज़रा कमी होगी

जो तुझ से शोर-ए-तबस्सुम ज़रा कमी होगी
हमारे ज़ख़्म-ए-जिगर की बड़ी हँसी होगी

रहा न होगा मिरा शौक़-ए-क़त्ल बे-तहसीं
ज़बान-ए-खंज़र-ए-क़ातिल ने दाद दी होगी

तिरी निगाह-ए-तजस्सुस भी पा नहीं सकती
उस आरजू को जो दिल में कहीं छुपी होगी

मिरे तो दिल में वही शौक़ है जो पहले था
कुछ आप ही की तबीअत बदल गई होगी

बुझी दिखाई तो देती है आग उल्फ़त की
मगर वो दिल के किसी गोशे में दबी होगी

कोई ग़ज़ल में ग़ज़ल है ये हज़रत-ए-‘वहशत’
ख़याल था कि ग़ज़ल आप ने कही होगी

कहते हो अब मेरे मज़लूम पे बे-दाद न हो

कहते हो अब मेरे मज़लूम पे बे-दाद न हो
सितम-ईजाद हो फिर क्यूँ सितम ईजाद न हो

नहीं पैमान-ए-वफ़ा तुम ने नहीं बाँधा था
वो फ़साना ही ग़लत है जो तुम्हें याद न हो

तुम ने दिल को मेरे कुछ ऐसा किया है ना-शाद
शाद करना भी जो अब चाहो तो ये शाद न हो

जो गिरिफ़्तार तुम्हारा है वही है आवाज़
जिस को आज़ाद करो तुम कभी आज़ाद न हो

मेरा मक़सद के वो ख़ुश हों मेरी ख़ामोशी से
उन को अंदेशा के ये भी कोई फ़रियाद न हो

मैं न भूलूँ ग़म-ए-इश्क का एहसाँ ‘वहशत’
उन को पैमान-ए-मोहब्बत जो नहीं याद न हो

किस नाम-ए-मुबारक ने मज़ा मुँह को दिया है 

किस नाम-ए-मुबारक ने मज़ा मुँह को दिया है
क्यूँ लब पे मेरे ज़मज़म-ए-सल्ल-ए-अला है

किस दर की गदाई मेरी क़िस्मत में है या रब
सर पर जो मेरे साया-फ़गन बाल-ए-हुमा है

सीने में मेरे दाग़-ए-ग़म-ए-इश्क़-ए-नबी है
इक गौहर-ए-नायाब मेरे हाथ लगा है

सरगर्म है दिल शाफ़ा-ए-महशर की तलब में
काफ़िर हूँ अगर कुछ भी ग़म-ए-रोज़-ए-जज़ा हुई

गुस्ताख़ तेरी मदह-सराई में है ‘वहशत’
क्यूँकर न हो तेरे ही तो कूचे का गदा है

किसी सूरत से उस महफ़िल में जा कर

किसी सूरत से उस महफ़िल में जा कर
मुक़द्दर हम भी देखें आज़मा कर

तग़ाफ़ुल-केश मैं ने ही बनाया
उसे हाल-ए-दिल-ए-शैदा सुना कर

उठा लेने से तो दिल के रहा मैं
तू अब ज़ालिम वफ़ा कर या जफ़ा कर

तिरे गुलशन में पहुँचे काश इक दिन
नसीम-ए-आश्नाई राह पा कर

ख़ुशी उन को मुबारक हो इलाही
वो ख़ुश हैं ख़ाक में मुझ को मिला कर

दहन है रश्क से ग़ुंचे का पुर-ख़ूँ
किधर देखा था तुम ने मुस्कुरा कर

किसी तरह दिन तो कट रहे हैं फ़रेब-ए-उम्मीद खा रहा हूँ 

किसी तरह दिन तो कट रहे हैं फ़रेब-ए-उम्मीद खा रहा हूँ
हज़ार-हा नक़्श आरज़ू के बना रहा हूँ मिटा रहा हूँ

वफ़ा मिरी मोतबर है कितनी जफ़ा वो कर सकते हैं कहाँ तक
जो वो मुझे आज़मा रहे हैं तो मैं उन्हें आज़मा रहा हूँ

किसी की महफ़िल का नग़मा-ए-नय मोहर्रिक-ए-नाला ओ फ़ुगाँ है
फ़साना-ए-ऐश सुन रहा हूँ फ़साना-ए-ग़म सुना रहा हूँ

ज़माना भी मुझ से ना-मुवाफ़िक़ मैं आप भी दुश्मन-ए-सलामत
तअज्जुब इस का है बोझ क्यूँकर मैं ज़िंदगी का उठा रहा हूँ

न हो मुझे जुस्तुजू-ए-मंज़िल मगर है मंज़िल मिरी तलब में
कोई तो मुझ को बुला रहा है किसी तरफ़ को तो जा रहा हूँ

यही तो नफ़ा कोशिशों का कि काम सारे बिगड़ रहे हैं
यही तो फ़ाएदा हवस का कि अश्क-ए-हसरत बहा रहा हूँ

खुदा ही जाने ये सादा-लौही दिखाएगी क्या नतीजा ‘वहशत’
वो जितनी उल्फ़त घटा रहे हैं उसी क़दर मैं बढ़ा रहा हूँ

लगाओ न जब दिल तो फिर क्यूँ लगावट 

लगाओ न जब दिल तो फिर क्यूँ लगावट
नहीं मुझ को भाती तुम्हारी बनावट

पड़ा था उसे काम मेरी जबीं से
वो हँगामा भूली नहीं तेरी चौखट

ये तमकीं है और लब हों जान-ए-तबस्सुम
न खुल जाए ऐ शोख़ तेरी बनावट

मैं धोके ही खाया किया ज़िंदगी में
क़यामत थी उस आश्ना की लगावट

ठिकाना तेरा फिर कहीं भी न होगा
न छूटे कभी ‘वहशत’ उस बुत की चौखट

लूटा है मुझे उस की हर अदा ने

लूटा है मुझे उस की हर अदा ने
अंदाज़ ने नाज़ ने हया ने

दोनों ने किया है मुझ को रूसवा
कुछ दर्द ने और कुछ दवा ने

बे-जा है तेरी जफ़ा का शिकवा
मारा मुझ को मेरी वफ़ा ने

पोशीदा नहीं तुम्हारी चालें
कुछ मुझ से कहा है नक़्श-ए-पा ने

क्यूँ जौर-कशान-ए-आसमाँ से
मुँह फेर लिया तेरी जफ़ा ने

दिल को मायूस कर दिया है
बे-गाना मिज़ाज-आश्ना ने

दोनों ने बढ़ाई रौनक़-ए-हुस्न
शोख़ी ने कभी कभी हया ने

ख़ुश पाते हैं मुझ को दोस्त ‘वहशत’
दिल का अहवाल कौन जाने

मुरव्वत का पास और वफ़ा का लिहाज़

मुरव्वत का पास और वफ़ा का लिहाज़
करे आश्ना आश्ना का लिहाज़

दम-ए-सजदा सर सख़्त था बे-अदब
किया कुछ न उस नक़्श-ए-पा का लिहाज़

न महरूम रख मुझ को हुस्न-ए-कुबू़ल
रहे कुछ तो दस्त-ए-दुआ का लिहाज़

वो हैं पास अब बस कर ऐ दर्द-ए-दिल
करे कुछ मरज़ भी दवा का लिहाज़

मिलाई न ‘वहशत’ कभी उस से आँख
मुझे था जो उस की हया का लिहाज़

नालों से अगर मैं ने कभी काम लिया है

नालों से अगर मैं ने कभी काम लिया है
ख़ुद ही असर-ए-नाला से दिल थाम लिया है

आज़ादी-ए-अंदोह-फ़ज़ा से है रिहाई
अब मैं ने कुछ आराम तह-ए-दाम लिया है

उठती थीं उमंगें उन्हें बढ़ने न दिया फिर
मैं ने दिल-ए-नाम-काम से इक काम लिया है

जुज़ मशग़ला-ए-नाला ओ फ़रियाद न था कुछ
जो काम कि दिल से सहर ओ शाम लिया है

ख़ुद पूछ लो तुम अपनी निगाहों से वो क्या था
जो तुम ने दिया मैं ने वो पैग़ाम लिया है

था तेरा इशारा कि न था मैं ने दिया दिल
और अपने ही सर जुर्म का इल्ज़ाम लिया है

ग़म कैसे ग़लत करते जुदाई में तिरी हम
ढूँढा है तुझे हाथ में जब जाम लिया है

आराम के अब नाम से मैं डरने लगा हूँ
तकलीफ़ उठाई है जब आराम मिला है

मालूम नहीं ख़ूब है वो वाफ़िफ़-ए-फ़न हैं
‘वहशत’ ने महाकात से क्या काम लिया है

नहीं के इश्क़ नहीं है गुल ओ सुमन से मुझे 

नहीं के इश्क़ नहीं है गुल ओ सुमन से मुझे
दिल-ए-फ़सुर्दा लिए जाता है चमन से मुझे

मिसाल-ए-शम्मा है रोना भी और जलना भी
यही तो फ़ाएदा है तेरी अंजुमन से मुझे

बढ़ी है यास से कुछ ऐसी वहशत-ए-ख़ातिर
निकाल कर ही रहेगी ये अब वतन से मुझे

अज़ीज़ अगर नहीं रखता न रख ज़लील ही रख
मगर निकाल न तू अपनी अंजुमन से मुझे

वतन समझने लगा हूँ मैं दश्त-ए-ग़ुर्बत को
ज़माना हो गया निकले हुए वतन से मुझे

मेरी भी दाग़-ए-जिगर मिसल-ए-लाला हैं रंगीन
है चश्मक उस गुल-ए-ख़ूबी के बाँकपन से मुझे

छुपा न गोशा-नशीनी से राज़-ए-दिल ‘वहशत’
के जानता है ज़माना मेरे सुख़न से मुझे

नहीं मुमकिन लब-ए-आशिक़ से हर्फ़-ए-मुद्दआ निकले 

नहीं मुमकिन लब-ए-आशिक़ से हर्फ़-ए-मुद्दआ निकले
जिसे तुम ने किया ख़ामोश उस से क्या सदा निकले

क़यामत इक बपा है सीना-ए-मजरूह-ए-उल्फ़त में
न तीर-ए-दिल-नशीं निकले न जान-ए-मुब्तला निकले

तुम्हारे ख़ू-गर-ए-बेदाद को क्या लुत्फ़ की हाजत
वफ़ा ऐसी न करना तुम जो आख़िर को जफ़ा निकले

गुमाँ था काम-ए-दिल अग़्यार तुम से पाते हैं लेकिन
हमारी तरह वो भी कुश्त-ए-तेग़-ए-जफ़ा निकले

ज़बरदस्ती ग़ज़ल कहने पे तुम आमादा हो ‘वहशत’
तबीअत जब न हो हाज़िर तो फिर मज़मून क्या निकले

पैमान-ए-वफ़ा-ए-यार हैं हम

पैमान-ए-वफ़ा-ए-यार हैं हम
यानी ना-पाएदार हैं हम

ख़ाक-ए-सर-ए-रह-गुज़ार हैं हम
पामाल-ए-जफ़ा-ए-यार हैं हम

नौमीदी ओ यास चार सू है
उफ़ किस के उम्मीदवार हैं हम

किस दुश्मन-ए-जाँ की आरज़ू है
जो मौत के ख़्वास्त-गार हैं हम

तू हम से है बद-गुमाँ सद अफ़सोस
तेरे ही तो जाँ-निसार हैं हम

‘वहशत’ ख़ामोश जल रहे हैं
गोया शम-ए-मज़ार हैं हम

पोशीदा देखती है किसी की नज़र मुझे 

पोशीदा देखती है किसी की नज़र मुझे
देख ऐ निगाह-ए-शौक तू रूसवा न कर मुझे

मक़सद है बे-नियाज़ रहा ज़ौक़-ए-जुस्तुजू
मैं बे-ख़बर हुआ जो हुई कुछ ख़बर मुझे

मैं शब की बज़्म-ए-ऐश का मातम-नशीं हूँ आप
रो रो के क्यूँ रूलाती है शम्मा-ए-सहर मुझे

हैरत ने मेरी आईना उन को बना दिया
क्या देखते के रह गए वो देख कर मुझे

क़ुर्बान जाऊँ छोड़ तकल्लुफ़ की गुफ़्तुगू
कह कर पुकार ‘वहशत’-ए-शोरीदा-सर मुझे

संग-ए-तिफ़्लाँ फ़िदा-ए-सर न हुआ

संग-ए-तिफ़्लाँ फ़िदा-ए-सर न हुआ
आज उस कूचे में गुज़र न हुआ

हम भी थे जौहर-ए-गिराँ-माया
पर कोई साहिब-ए-नज़र न हुआ

अम्न-आलम में क्यूँ नहीं या रब
इस के क़ाबिल मगर बशर न हुआ

बे-कसी पर्दा-दार-ए-दर्द हुई
ख़ैर गुज़री के अपना घर न हुआ

क़द्र-दानी की कैफ़ियत मालूम
ऐब क्या है अगर हुनर न हुआ

सर झुकाए जो आते हो ‘वहशत’
मगर इस बज़्म में गुज़र न हुआ

शर्मिंदा किया जौहर-ए-बालिग़-नज़री ने 

शर्मिंदा किया जौहर-ए-बालिग़-नज़री ने
इस जिन्स को बाज़ार में पूछा न किसी ने

सद शुक्र किसी का नहीं मोहताज-ए-करम मैं
एहसान किया है तिरी बे-दाद-गरी ने

मोहताज थी आईने की तस्वीर सी सूरत
तस्वीर बनाया मुझे महफ़िल में किसी ने

गुल हँसते हैं ग़ुंचे भी हैं लबरेज़-ए-तबस्सुम
क्या उन से कहा जो के नसीम-ए-सहरी ने

मायूस न कर दे कहीं उन की निगह-ए-गर्म
उम्मीद दिलाई है मुझे सादा-दिली ने

मेहनत ही पे मौक़ूफ़ है आसाइश-ए-गेती
खोई मिरी राहत मिरी राहत-तलबी ने

‘वहशत’ मैं निगाहों के तजस्सुस से हूँ आज़ाद
एहसान किया मुझ पे मिरी बे-हुनरी ने

शौक़ देता है मुझे पैग़ाम-ए-इश्क़

शौक़ देता है मुझे पैग़ाम-ए-इश्क़
हाथ में लब-रेज़ ले कर जाम-ए-इश्क़

आप हूँ ज़ौक़-ए-असीरी से ख़राब
कोई ले जाए मुझे ता दाम-ए-इश्क़

इश्तियाक़-ए-सजदा से बे-ताब हूँ
ऐ हरीब-ए-काबा-ए-इस्लाम-ए-इश्क़

क़ैस ओ वामिक़ से कहाँ अब अहल-ए-दिल
था उन्हीं लोगों से रौशन नाम-ए-इश्क़

नाश पर फ़रहाद के शीरीं गई
वो सितम परवरदा-ए-आलाम-ए-इश्क़

और यूँ करने लगी रो कर ख़िताब
ऐ वफ़ा की जान ऐ नाकाम-ए-इश्क़

तुझ से रौनक़-आश्ना है सुब्ह-ए-शौक़
तुझ से ज़ीनत आफ़रीं है शाम-ए-इश्क़

जान दे कर तू तो छूटा रंज से
रह गई मैं ही बला आशाम-ए-इश्क़

तेरा मरना इश्क़ का आग़ाज़ था
मौत पर होगा मेरे अंजाम-ए-इश्क़

‘वहशत’ वहशी के था सब से अलग
हो गया क्या बे-तकल्लुफ़ राम-ए-इश्क़

शौक़ ने इशरत का सामाँ कर दिया 

शौक़ ने इशरत का सामाँ कर दिया
दिल को महव-ए-रू-ए-जानाँ कर दिया

तू ने ऐ जमइयत-ए-दिल की हवस
और भी मुझ को परेशाँ कर दिया

वाह रे ज़ख़्म-ए-मोहब्बत की ख़लिश
जिस को दिल ने राहत-ए-जाँ कर दिया

ख़ुद-नुमाइ्र ख़ुद-फ़रोशी हो गई
आप ने अपने को अरज़ाँ कर दिया

उन के दामन तक न पहुँचा दस्त-ए-शौक़
उस को मररूफ़-ए-गिरेबाँ कर दिया

बज़्म में जब ग़ैर पर डाली नज़र
आप ने मुझ पर भी एहसाँ कर दिया

कुछ बढ़ा कर मैं ने बहर-ए-शरह-ए-ग़म
चाक को उनवान-ए-दामाँ कर दिया

झुक गई आख़िर हया से उन की आँख
शौक़ ने मुझ को पशेमाँ कर दिया

पा-ए-बुत पर मैं ने दो सजदे किए
कुफ्र को भी जुज़्व-ए-ईमाँ कर दिया

उसे ख़याल-ए-लैला-ए-मजनूँ-नवाज़
तू ने सहरा को गुलिस्ताँ कर दिया

हो के ज़ाइल कुव्वत-ए-एहसास ने
मुश्किलों को मेरी आसाँ कर दिया

दिल नहीं जाता था सू-ए-राह-ए-दैर
कैसे काफ़िर को मुसलमाँ कर दिया

तू ने ‘वहशत’ क्यूँ ख़िलाफ-ए-रस्म-ए-इश्क़
दर्द को रूसवा-ए-दरमाँ कर दिया

शौक़ फिर कूचा-ए-जानाँ का सताता है मुझे 

शौक़ फिर कूचा-ए-जानाँ का सताता है मुझे
मैं कहाँ जाता हूँ कोई लिए जाता है मुझे

जल्वा किस आईना-रू का है निगाहों में के फिर
दिल-ए-हैरज-ज़दा आईना बनाता है मुझे

आशिक़ी शेवा लड़क-पन से है अपना नासेह
क्या करूँ मैं के यही काम कुछ आता है मुझे

लुत्फ़ कर लुत्फ़ के फिर मुझ को न देखेगा कभी
याद रख याद के तू दर से उठाता है मुझे

‘वहशत’ इस मिस्रा-ए-जुरअत ने मुझे मस्त किया
कुछ तो भाया है के अब कुछ नहीं भाता है मुझे

सुरूर-अफ़ज़ा हुई आख़िर शराब आहिस्ता आहिस्ता

सुरूर-अफ़ज़ा हुई आख़िर शराब आहिस्ता आहिस्ता
हुआ वो बज़्म-ए-मय में बे-हिजाब आहिस्ता आहिस्ता

रूख़-ए-रौशन से यूँ उट्ठी नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता
कि जैसे हो तुलू-ए-आफ़ताब आहिस्ता आहिस्ता

किया जब शौक़ ने उस से ख़िताब आहिस्ता आहिस्ता
हया ने भी दिया आख़िर जवाब आहिस्ता आहिस्ता

वो मस्ती-ख़ेज़ नरजें रफ़्ता रफ़्ता ले उड़ीं मुझ को
किया काशना-ए-दिल को ख़राब आहिस्ता आहिस्ता

बढ़ा हंगामा-ए-शौक़ इस क़दर बज़्म-ए-हरीफ़ाँ में
कि रूख़्सत हो गया उस का हिजाब आहिस्ता आहिस्ता

किया कामिल हमें इक उम्र में सोज़-ए-मोहब्बत ने
हुए हम आतिश-ए-ग़म से कबाब आहिस्ता आहिस्ता

अबस था ज़ब्त का दावा सितम उस के सितम निकले
निगाहें हो गईं आख़िर पुर-आब आहिस्ता आहिस्ता

दबिस्तान-ए-वफ़ा में उम्र भर की सफ़हा-गर्दानी
समझ में आई उल्फ़त की किताब आहिस्ता आहिस्ता

ब-क़द्र-ए-शौक़ उसे ताब-ए-तपीदन थी कहाँ क़ातिल
किया बिस्मिल ने तेरे इजि़्तराब आहिस्ता आहिस्ता

बला हैं शाहिदान-ए-शहर ‘वहशत’ मय-परस्ती में
हुआ मैं उन की सोहबत में ख़राब आहिस्ता आहिस्ता

तल्ख़ी-कश-ए-नौमीदि-ए-दीदार बहुत हैं

तल्ख़ी-कश-ए-नौमीदि-ए-दीदार बहुत हैं
उस नर्गिस-ए-बीमार के बीमार बहुत हैं

आलम पे है छाया हुआ इक यास का आलम
यानी कि तमन्ना के गिरफ़्तार बहुत हैं

इक वस्ल की तदबीर है इक हिज्र में जीना
जो काम कि करने हैं वो दुश्वार बहुत हैं

वो तेरा ख़रीदार-ए-क़दीम आज कहाँ है
ये सच है कि अब तेरे ख़रीदार बहुत हैं

मेहनत हो मुसीबत हो सितम हो तो मज़ा है
मिलना तिरा आसाँ है तलब-गार बहुत हैं

उश्शाक़ की परवाह नहीं ख़ुद तुझ को वगरना
जी तुझ पे फ़िदा करने को तय्यार बहुत हैं

‘वहशत’ सुख़न ओ लुत़्फ-ए-सुख़न और ही शय है
दीवान में यारों के तो अशआर बहुत हैं

तीर-ए-नज़र ने ज़ुल्म को एहसाँ बना दिया

तीर-ए-नज़र ने ज़ुल्म को एहसाँ बना दिया
तरकीब-ए-दिल ने दर्द को दरमाँ बना दिया

सद शुक्र आज हो गई तकमील इश्क़ की
अपने को ख़ाक-ए-कूचा-ए-जानाँ बना दिया

कोताही कोई दस्त-ए-जुनूँ से नहीं हुई
दामन को हम-किनार-ए-गिरेबाँ बना दिया

छोड़ी है जब से मैं ने सलामत-रवी की चाल
दुश्वारियों को राह की आसाँ बना दिया

ऐ माशअल-ए-उम्मीद ये एहसान कम नहीं
तारीक शब को तू ने दरख़्शाँ बना दिया

हुस्न-आफ़रीं हुआ है तसव्वुर जमाल का
दिल को हवा-ए-गुल ने गुलिस्ताँ बना दिया

ज़ोहद और इत्तेक़ा पे मुझे अपने नाज़ था
ख़ुद मैं ने तुझ को दुश्मन-ए-ईमाँ बना दिया

आईना-ए-जमाल को देखूँगा किस तरह
उस ने तो पहले ही मुझे हैराँ बना दिया

वो इम्तियाज़-ए-हुस्न है मानी ओ लफ़्ज़ का
‘वहशत’ को जिस ने ‘ग़ालिब’-ए-दौरान बना दिया

तू है और ऐश है और अंजुमन-आराई है

तू है और ऐश है और अंजुमन-आराई है
मैं हूँ और रंज है और गोशा-ए-तन्हाई है

सच कहा है के ब-उम्मीद है दुनिया क़ाएम
दिल-ए-हसरत-ज़दा भी तेरा तमन्नाई है

दिल की फ़रीयाद जो सुनता हूँ तो रो देता हूँ
चोट कमबख़्त ने कुछ ऐसी ही तो खाई है

बे-नियाज़ी की अदाएँ वो दिखाते हैं बहुत
ख़ू-ए-तस्लीम मेरी उन को पसंद आई है

ज़ुल्फ़ बरहम मिज़ा बर्गश्ता जबीं चीन-आलूद
मेरी बिगड़ी हुई तक़दीर की बन आई है

अदब आमोज़ बला का है तग़ाफ़ुल उन का
शौक़-ए-पुर-हौसला ने ख़ूब सज़ा पाई है

कहे देता हूँ किसी और की जानिब तू न देख
क्या ये कुछ कम है के ‘वहशत’ तेरा सौदाई है

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