विकास पाण्डेय की रचनाएँ

सड़कोॅ पर 

खेतोॅ रं तोंय चुप अनाज दौ बात नै लानोॅ सड़कोॅ पर
चार जनां जे नपना बनलै धुय्यां उड़लै सड़कोॅ पर
लाठी-सोंटा बम-तम फोड़ी मारी भगैलकै सड़कोॅ पर
तिनका-तिनका जोड़ी-जोड़ी घोॅर उठैलकै सड़कोॅ पर
कूड़ा-कर्कट चुनी-चुनी बाग लगैलकै सड़कोॅ पर
खून-पसीना बुनी-बुनी भाग जगैलकै सड़कोॅ पर
घोॅर गिरै छै, घोॅर उठै छै असली शासन सड़कोॅ पर
रोग उगै छै, रोज डूबै छै सूरज सन सब सड़कोॅ पर
चाँदनी राती कुत्ता-गीदड़ राज करै छै सड़कोॅ पर
मुर्गा-खस्सी जे रं बिक्कै, लोग बिकै छै सड़कोॅ पर
जानवर जात बड़ी बज्जात, गावै सुखिया सड़कोॅ पर
मोर-कबूतर के रं चुप्पा सब सुनवैय्या सड़कोॅ पर
अगर कहीं जों भारी लागौं उतरी आबोॅ सड़कोॅ पर
सन-सनाठी हुक्का-पाती खेलोॅ भैय्या सड़कोॅ पर
नै तेॅ स्वाति पावै लेली मूँ फैलावोॅ सड़कोॅ पर
मन्नोॅ केॅ समझावै लेली हाथ देखलावोॅ सड़कोॅ पर ।

संतति

पाँव पर अपने खड़े हो गए,
अब तो बच्चे बड़े हो गए।

बालक बिन जीवन था खाली,
जैसे बिन फूलों की डाली।
जब घर में गूँजी किलकारी,
मिल गयी जैसे खुशियाँ सारी।
दुखड़े सारे परे हो गए,
अब तो बच्चे बड़े हो गए।

खेल खेल में बच्चा बोला,
ले आऊँग उड़न-खटोला।
मम्मी-पापा को बैठाकर,
लाऊँगा मैं देश घुमाकर।
हृदय भाव से भरे हो गए,
अब तो बच्चे बड़े हो गए।

सुखमय जीवन की अभिलाषा,
बच्चों को हीरे-सा तराशा।
पिता ने की दिन रात कमाई,
पूर्ण हुई बच्चों की पढ़ाई।
सोना जैसे खरे हो गए,
अब तो बच्चे बड़े हो गए।

बहुत दीर्घ यह सफ़र रहा था,
तिनका-तिनका सँवर रहा था।
यूँ ही नहीं बना है घर यह,
प्रतिदिन बना है आठ पहर यह।
स्मृति-पत्र सब हरे हो गये,
अब तो बच्चे बड़े हो गए।

आसमान से ऊँचे सपने,
पीछा करते छूटे अपने।
परदेश को अपना ठौर बनाया
माँ-बाप को गैर बनाया।
शब्द पुत्र के कड़े हो गए,
अब तो बच्चे बड़े हो गए।

माँ जी का जंजाल हो गयी,
परित्यक्त रही, कंकाल हो गयी।
धन-अर्जन में इतना डूबे
धनलोलुपता काल हो गयी।
संस्कार तो मुर्दे गड़े हो गए,
अब तो बच्चे बड़े हो गए।

ऐसा कभी न होने देना,
सुख देना मत रोने देना।
कदापि माता और पिता को
यह पीड़ा मत होने देना
कि दिन अब काँटों जड़े हो गए।
अब तो बच्चे बड़े हो गए।

मिलन

तुम धरा बन जा, मुझको गगन होने दो,
हृदय के क्षितिज पर मिलन होने दो।

अनुक्रिया तुम बनो, मैं उद्दीपक बनूँ,
तुम बन जाना लौ, मैं जो दीपक बनूँ।

प्रीति की दीप्ति उज्ज्वल सघन होने दो,
ह्रदय के क्षितिज पर मिलन होने दो।

तुम बनो धारा जल की, मैं गागर हुआ,
तुम नदी बनके आना, मैं सागर हुआ।

एक दूजे में शाश्वत मगन होने दो,
हृदय के क्षितिज पर मिलन होने दो।

सूर्य की रश्मि तुम, मैं हिमालय शिखर,
तुमसे होता रहूँ स्वर्णमय और प्रखर।

दीप्त कंचन-सा मेरा वदन होने दो,
हृदय के क्षितिज पर मिलन होने दो।

तुम धरा बन जा मुझको गगन होने दो,
हृदय के क्षितिज पर मिलन होने दो

अभिनंदन

अभिनंदन है, अभिनंदन!
हे वीर, तुम्हारा अभिनंदन!

अविजित रक्षक हो सीमा के,
शौर्य-शिखरर, आदर्श हो तुम।
नव नीति-रीति के भारत का
सर्वोत्तम प्रतिदर्श हो तुम।

सच्चे सपूत इस माटी के,
तुम देश के माथे का चंदन।
अभिनंदन है, अभिनंदन
हे वीर, तुम्हारा अभिनंदन!

थे अरि-दल से घिरे हुए, पर
दृढ़ प्रतिज्ञ, तुम झुके नहीं।
लगा दाँव पर जीवन, फिर भी
कदम तुम्हारे रुके नहीं।

सह लिया वार वक्षस्थल पर,
करते ही रहे तुम सिंह-गर्जन।
अभिनंदन है, अभिनंदन!
हे वीर, तुम्हारा अभिनंदन!

अरि के नापाक प्रयासों को
अपने कौशल से विफल किया।
दागा अभेद्य आग्नेयास्त्र,
तुमने दुश्मन को विकल किया।
‘आतंकवाद की धरती’ पर
सर्वत्र व्याप्त हुआ रूदन।
अभिनंदन है, अभिनंदन!
हे वीर, तुम्हारा अभिनंदन!

अस्पताल का बिस्तर 

मैं अस्पताल का बिस्तर हूँ,
व्यग्र-विकल, करुणाक्षी हूँ।
मृत्यु के नग्न, अकाल-नृत्य का
मूक-अचेतन साक्षी हूँ।

चमकी ज्वर से पीड़ित बच्चे
अति-विपन्नता के मारे हैं।
चिकित्सक की टकटकी लगाए
परिजन तो विवश, बेचारे हैं।

मैं देख रहा, माताएँ स्वयं
मुन्ने के दु: ख को झेल रहीं।
अपनी ममता के बल से
मृत्यु को पीछे ठेल रहीं।

यह कैसा ज्वर! हे भगवन!
कि ताप कम नहीं होता है।
चुप रह मुन्ने! मजबूत बनो
क्यों कायर जैसा रोता है।

घड़ी-दो घड़ी, चार घड़ी,
अब धैर्य का धागा टूट गया।
ममत्व-नीर माँ की आँखों से
धारा बन कर फूट गया।

किसकी जय बोलें लोग यहाँ
कि दवा समय पर आ जाए।
दिल्ली बहरी, पटना गूंगा
ये बेबस लोग कहाँ जाएँ!

कब बहरे कान खड़े होते हैं
दुर्बल की चीत्कारों से!
मृत्यु टला नहीं करती
नेताओं की जयकारों से।

टूट रही हैं सांसे, साथ ही
टूट रहीं हैं आशाएँ।
जनसेवा के शपथ की, देखो
बदल रही परिभाषाएँ।

बार-बार यह करुण दृश्य,
मेरी छाती पर घटता है।
नन्हा बिरवा मुरझाता है
और सीना मेरा फटता है।

मैं अस्पताल का बिस्तर हूँ,
व्यग्र, विकल, करूणाक्षी हूँ।
मृत्यु के नग्न, अकाल-नृत्य का,
मूक-अचेतन साक्षी हूँ।

आहत 

छीन लो मेरा सब कुछ,
लूट लो मेरा सर्वस्व।
कर दो मेरे टुकड़े-टुकड़े
और बनाए रखो अपना वर्चस्व।

मेरी जमीन, मेरा धन,
मेरे संसाधन सब बाँट दो।
कर दो द्दिन्न-भिन्न,
मेरा अंग-अंग काट दो।

बाँट दो मुझे दलितों में,
पिछड़ों और अगड़ों में।
जला दो मुझे रेत कर,
सांप्रदायिक झगड़ों में।

घेर दो किसी मानसिक
संकीर्णता के मण्डल में,
या ठूँस दो मुझे दर्पहीन
केसरिया कमण्डल में।

तौल दो मेरा वजूद
जातियों में बंटे वोटों से,
खरीद लो मेरी अन्तरात्मा
भ्रष्टाचार जनित नोटों से।

सब सह लूँगा निःशब्द
क्योंकि मैं अत्यंत महान हूँ।
क्योंकि तुम उन्मादियों के नेता हो
और मैं, विकास की भूलभुलैया में
खोया हिन्दुस्तान हूँ।

एक भारत श्रेष्ठ भारत 

एक भारत, श्रेष्ठ भारत
ज्ञान सिंधु, विवेक भारत।
विश्व के मानस-पटल पर
है सुनहरा लेख भारत।

अनेकता में एकता का
दीप निशदिन जल रहा।
विशिष्ट शक्ति, संपदा का
स्वर्ण-पक्षी पल रहा।
चिर सनातन का से
समृद्धि का अतिरेक भारत।
विश्व के मानस-पटल पर
है सुनहरा लेख भारत।

भगत का, आज़ाद का,
सुभाष चंद्र बोस का।
‘लाल’ ‘बाल’ औ पाल’ का
स्वराज्य के उद्घोष का।
स्वतंत्रता कि राह में है
क्रांति का अभिषेक भारत।
विश्व के मानस-पटल पर
है सुनहरा लेख भारत।

गीता की, गुरुग्रंथ की,
वेद और पुराण की।
बुद्ध की, महावीर की,
अवेस्ता और कुरान की।
हर धर्म की सुरभित पवन
पावन बना परिवेश भारत।
विश्व के मानस-पटल पर
है सुनहरा लेख भारत।

गांधी का सत्याग्रह,
अंबेडकर की कीर्तियाँ।
कलाम और गफ़्फ़ार की
समभाव वाली नीतियाँ।
महानतम विभूतियों का
विश्व में उल्लेख भारत।
विश्व के मानस-पटल पर
है सुनहरा लेख भारत।

राज्य का और क्षेत्र का
जो भूल कर विभेद हम,
भाषा और प्रदेश का
करें नहीं जो भेद हम।
पुनः विश्व गुरु बनेगा
श्रेष्ठ-निर्मल-नेक भारत।
विश्व के मानस-पटल पर
है सुनहरा लेख भारत।

एक भारत, श्रेष्ठ भारत
ज्ञान सिंधु, विवेक भारत।
विश्व के मानस-पटल पर
है सुनहरा लेख भारत।

संसद ठप थी

ना प्रश्नकाल ना शून्यकाल था,
संसद ठप थी।

सड़कों पर भारी बवाल था,
संसद ठप थी।

नव कलियों के पद मर्दन से
मानवता थी त्रस्त हुई।
निर्भया चौक चौराहों पर
अवपीड़न की अभ्यस्त हुई।
रक्त से रंजित वस्त्र लाल था,
संसद ठप थी

सड़कों पर भारी बवाल था,
संसद ठप थी।

नलकूप था सूखा, बच्चे भूखे
चहुँओर थी तंगहाली।
धरती का सीना फट जाता था
देख फसल की बदहाली।
हर किसान का बुरा हाल था,
संसद ठप थी।

सड़कों पर भारी बवाल था,
संसद ठप थी।

विश्वविद्यालय गूँजा था
भारत विच्छेद के नारों से।
अफजल के पोषक निकले थे
सत्ता के गलियारों से।
देशद्रोह का बिछा जाल था,
संसद ठप थी।

सड़कों पर भारी बवाल था,
संसद ठप थी।

न्यायपालिका कि शुचिता पर
प्रश्नों की बौछार हुई।
माननीय उतरे सड़कों पर
संविधान की हार हुई।
उठा स्वायत्तता पर सवाल था,
संसद ठप थी।

सड़कों पर भारी बवाल था,
संसद ठप थी।

जनता का धन असुरक्षित था,
बैंकों ने था घात किया।
धन पशुओं और नीति नियंताओं
ने मिल आघात किया।
जन-जन का जीना मुहाल था
संसद ठप थी।

सड़कों पर भारी बवाल था,
संसद ठप थी।

दोहे: उर्जा संरक्षण

बिजली सबको चाहिए, सुबह दोपहर शाम।
बिन बिजली होते नहीं, अब बहुतेरे काम॥

ऊर्जा सभी बचाइए, बालक युवा वृद्ध।
सुखमय सबका कल रहे, इच्छित होवे सिद्ध॥

पंखे, एसी, हीटर सब, चलते हैं अविराम।
इनको तभी चलाइये, जब हो इनका काम॥

कोयला व यूरेनियम, शिला तेल की खान।
सभी पुनः अप्राप्य हैं, हर पल रखिये ध्यान।

कितने वन निर्वन हुए, उजड़े कितने गाँव।
जलविद्युत का देश में, हुआ तभी फैलाव॥

धरती पर है जल रही, प्रदूषण की आग।
सब मिलकर कुछ कीजिये, बचे सुनहरा बाग॥

ऊर्जा के प्रति राखिये, बहुमूल्यता बोध।
इसके संरक्षण के लिए, करते रहिए शोध।

ईंधन खपत घटा सकें, खींचें नई लकीर।
हम कहलायेंगे तभी, नव भारत के वीर॥

फागुन 

आया फागुन, मधुर वसंती राग लिए।
है स्वागत को आतुर वसुधा, अनुराग लिए।
पुष्पलताएँ लहराईं पुलकित होकर
अलि गुंजन करते हैं प्रेम-पराग लिए।

पीत-वसन सरसों पर मुग्ध हुई अलसी,
लगी दिखाने नृत्य, लिए कटि पर कलसी।
चली जो पुरवाई तो सरसों झूम गया,
उसके नील-कपोल पुष्प को चूम गया।
कृत्रिम क्रोध दिखाई अलसी, पर मन में
प्रीत-प्रणय का आधा-आधा का भाग लिए।

आया फागुन, मधुर वसंती राग लिए।
है स्वागत को आतुर वसुधा, अनुराग लिए।

पूर्ण चन्द्र पर कौमुदी जो मुदित हुई
अठखेल की इच्छा उर में उसके उदित हुई।
हरित रंग ले हाथों में छुपकर, छलकर
बोली, ‘होली है’ चन्दा के मुखपर मलकर
तबसे दीखता है चाँद हरा वह दाग लिए
आया फागुन, मधुर वसंती राग लिए।
है स्वागत को आतुर वसुधा, अनुराग लिए।

इस ऋतु में पाषाण हृदय भी पिघल गए
सूखे वृक्षों में भी कोंपल निकल गए।
कहाँ मगन हो मेरे प्रियतम, आ जाओ,
प्रीत सुधा से सींचो, विरह मिटा जाओ।
क्यों फिरते हो तुम मन में वैराग लिए!
आया फागुन, मधुर वसंती राग लिए।
है स्वागत को आतुर वसुधा, अनुराग लिए।

मेरे मन में माधुर्य कहो क्या कमतर है!
प्रेम प्रकाश से आलोकित अभ्यन्तर है।
तुम पुष्प बनो, मैं मधुकर बनकर गाऊँगा।
है शपथ यही, आजीवन साथ निभाऊँगा।
आऊँगा मैं स्वयं सिंदूर-सुहाग लिए।
आया फागुन, मधुर वसंती राग लिए।
है स्वागत को आतुर वसुधा, अनुराग लिए।

मत का मूल्य

लोकतंत्र के मूल्यों का
अंतर्मन से सम्मान करें।
चलिए! चलकर मतदान करें।

चुनाव भारत का उत्सव है
स्वतंत्रता कि शान है यह।
जनता के हाथों की ताकत,
मतदाता का मान है यह।
आज़ादी के इस उत्सव में
हम खुशियों का गान करें।
चलिए! चलकर मतदान करें।

देशप्रेम की ज्योति हमें
सर्वदा जलाकर रखनी है।
राजनीति की पवित्रता
स्वच्छता बचा कर रखनी है।
इसबार पराजित हों अयोग्य
हम केवल इसका ध्यान करें।
चलिए! चलकर मतदान करें।

भ्रष्टाचार, आतंकवाद है,
बेरोजगार, महंगाई है।
अनंत समस्याओं की काली
बदली नभ में छाई है।
मत को बनाकर पवन प्रबल
इस बदली का अवसान करें।
चलिए! चलकर मतदान करें।

है आपका मत एक आग्नेयास्त्र,
दुर्जन का यह संहारक है।
देश समाज के हित का हेतु,
यह तीर अकाट्य है, मारक है।
ईवीएम के शरासन पर हम भी
मत के शर का संधान करें।
चलिए! चलकर मतदान करें।

न भूलेंगे, ना माफ करेंगे 

बेतरतीब उगी है झाड़ी
एक ओर से साफ करेंगे।
न भूलेंगे, ना माफ करेंगे।

जो कहलाती स्वर्ग धरा का,
वह घाटी संतप्त पड़ी है।
सुगंध लुप्त हुआ केसर का
बारूद की गंध भरी है।

कातिल धर्मान्धों को क्यों
मासूम बताया जाता है!
देश को खंडित करने का
षड्यंत्र रचाया जाता है।
क्यों अक्षम्य अत्याचारों को
क्षमा भला हम आप करेंगे?
न भूलेंगे, ना माफ़ करेंगे।

कहाँ गए कश्मीरी पंडित,
कहाँ गया केसरिया चंदन!
लहू बहा निर्दोषों का, क्यों
हुआ था सामूहिक विस्थापन!

डल झील का मस्त सिकारा
और वैष्णवी गुफा निराली।
अमरनाथजी के दर्शन पर
जिसने काली छाया डाली,
पुण्य धरा के उस दोषी का
समयोचित इंसाफ करेंगे।
न भूलेंगे, ना माफ करेंगे।

कैसे पनपा अलगाववाद
अखण्ड भारत की धरती पर!
सरकारें क्यों दोष हैं मढ़ती
पूर्ववर्ती, परवर्ती पर!

क्यों उस नाग को पालें हम
जिससे जहरीला पानी है!
क्यों वह भारत का अन्न खाय
जो मन से पाकिस्तानी है!
भय होगा तो प्रीत भी होगी
सब जय हिंद का जाप करेंगे।
न भूलेंगे, ना माफ करेंगे।

काल विवश कायर ने मारा
था निःशस्त्र जवानों को,
परन्तु भारत कब भूला है
वीरों के बलिदानों को!

दुश्मन नापाक, समझता है
पीतल-बारूद की भाषा बस।
हमने इसीलिए बदली
प्रत्युत्तर की परिभाषा बस।
जब गरजेगा भारत शत्रु तब,
शान्ति! शान्ति! आलाप करेंगे।
न भूलेंगे, ना माफ करेंगे।

सैनिक

भारत के प्रति समर्पण का
निज धर्म निभाने आया हूँ।
स्वतंत्रता कि वेदिका पर
सुमन चढ़ाने आया हूँ।
मैं देश बचाने आया हूँ।

माँ के स्वप्निल स्पर्शों को
पिता के स्नेहिल बाहों को।
छोड़ दिया मैंने पीछे
भार्या कि झुकी निगाहों को।
अपनी धरती माता का
आलिंगन पाने आया हूँ।
मैं देश बचाने आया हूँ।

मुझ को आकर्षित कर न सकी
नूपुरों की झंकार कभी।
सम्मोहन मुझमें भर न सके
प्रेम-वाद्य के तार कभी।
शत्रु को अब रणभेरी का
नाद सुनाने आया हूँ।
मैं देश बचाने आया हूँ।

स्वर है शांति का श्वेत रंग
और केसरिया है बल मेरा।
इस धरती की हरियाली
को अर्पित है हर पल मेरा।
श्वेत-हरा-केसरिया तीनों
रंग जमाने आया हूँ।
मैं देश बचाने आया हूँ।

आतंकवाद के पोषक और
अलगाव के ठेकेदारों को।
सीमा पार के शत्रुओं
और छुपे हुए गद्दारों को
और नए अंग्रेजों को
औकात बताने आया हूँ।
मैं देश बचाने आया हूँ।

बहुत उपाय थे जीवन भर
धन बहुत कमा सकता था मैं।
अपने खेत की मिट्टी से
सोना उपजा सकता था मैं।
सर्वस्व त्याग, मैं वीरोचित
ऐश्वर्य कमाने आया हूँ।
मैं देश बचाने आया हूँ।

हृदय से पुकारूँगा

एकबार फिर तुम्हें
हृदय से पुकारूँगा।
अहंकार की छत से,
विनम्रता कि सीढियों से
स्वयं को उतारूँगा।

जीवन के पन्नों पर,
वर्तनियों की त्रुटियाँ
सजग हो सुधारूँगा।
आशाओं के आकाश तले
अनंत सम्भावनाओं की
बाहें पसारूँगा।

स्वागत करूँगा मैं,
पश्चाताप-अश्रुओं से
तुम्हारे पग पखारूँगा।
पूर्णमासी की निशा में,
चंद्रमुख का स्मित मधुर,
अपलक निहारूँगा।

एकबार फिर तुम्हें
हृदय से पुकारूँगा।

प्यार बहुत है! 

बात-बात में रार बहुत है।
तुम कहते हो प्यार बहुत है।

करनी हों जब प्यार की बातें
तब तुमको इनकार बहुत है।

अपनों से नफरत करते हो
दुश्मन से इकरार बहुत है।

लाख उधर से घुसते हों पर
इधर से गिनती चार बहुत है।

रेंग रहा घुटनों के बल
आतंकवाद लाचार बहुत है।

देश की रक्षा जो करता है
उस खंजर में धार बहुत है।

चाँद अकेला है ‘विकास’ , पर
तारों की भरमार बहुत है।

सियासत

सियासत को मेरा भी पैग़ाम दे दो।
इन्क़लाबियों में मेरा नाम दे दो।

बस भी करो मुझको खैरात देना,
हाथों को मेरे कोई काम दे दो।

अब मेरी बस्ती में मत बाँटो रुपये,
अम्न की सुबह, खुशनुमा शाम दे दो।

नहीं चाहिए मुझको हीरे-जवाहर,
पसीने का मेरे, उचित दाम दे दो।

मज़हब से तुमने बहुत खेल खेले,
इस फसाद को आख़िरी मुक़ाम दे दो।

बहुत हो चुके हैं यासिन और गिलानी,
भारत को फिर से ‘अबुल कलाम’ दे दो।

अम्न, भाईचारा और ईद ओ दीवाली,
तोहफ़े, मेरे मुल्क को तमाम दे दो।

तुम झूठ कहते हो

तुम झूठ कहते हो
निस्तब्ध कड़कड़ाती ठंढी रात्रि में
कि आज ठंढ कम है
और कम्बल बहुत गर्म।

तुम झूठ कहते हो
ईंट गिरने से बने
तुम्हारे टखने के घाव के लिए
कि अब दर्द कम हो रहा है
और कल की मजूरी से खरीदोगे दवा।

तुम झूठ कहते हो हमारे बच्चों से,
दशहरा का मेला घुमा लाने की बात।
झूठा वादा करते हो उनसे
मजेदार खिलौने मोल देने का।

तुम झूठ कहते हो मुझसे
कि इस बार एक साथ लाओगे
पूरे महीने का राशन
और मेरे लिए नई साड़ी।

मैं नहीं चाहती
तुम्हारे इस असत्य पर
कभी सत्य की विजय हो।

स्वर्ण 

वह स्वर्ण,
जिसकी पीत-कांति पर
रहते हैं आप मुग्ध,
वह कभी दबा होता है
भारत के किन्हीं कुडप्पा
या धारवाड़ चट्टानों में,
या अफ्रीका के प्लेसर निक्षेपों में।
वह स्वर्ण,
जिससे निर्मित आभूषणों के सौन्दर्य पर
मोहित रहती हैं यौवनाएँ,
उस स्वर्ण की मातृ चट्टानों को
उड़ाया गया होता है डायनामाइट से
और पीसा गया होता है
दैत्याकार मशीनों से।
वह स्वर्ण,
जिसे पहन कर, लकदक
चलते हैं लोग,
उसके खनन में कुचल गया होता है
किसी द्रविड़ या पिग्मी
या मसाई का हाथ।

वह स्वर्ण
जो अर्थव्यवस्था का एक मानक है,
उसे चमकाने में खपे होते हैं,
किसी के जीवन के प्रत्येक दिन के
बारह-बारह घण्टे,
मर गई होती है
किसी की जिजीविषा।

स्वर्ण, यूँ ही
स्वर्ण नहीं बन गया होता है।

स्वप्न

कितना कठिन कार्य है
स्वप्न में घटित घटनाओं के तार
क्रमवार जोड़ना!

स्वप्निल सुनहरी घाटी में,
तुम्हारी प्रतीक्षा में बैठा मैं,
अपने चरम पर है नीरवता।
सभी पादप
संभवतः कई दिनों का हलचल
स्वयं में समेटे
शांत बैठे हैं मेरे साथ।

अचानक,
असीमित आकाश का नीला रंग
पूरी घाटी में पसर गया है।
आसपास के सभी पत्थर
उड़ने लगे हैं
तितलियाँ बनकर।
अब सारी तितलियाँ
फूल हो गई हैं
और मुस्कुराने लगी हैं
पौधों की टहनियों पर लगकर।

पहाड़ी की पगडंडी पर
तुम्हारे चपल, सधे कदम,
जैसे उतर रही हो
संवेदनाओं का सलिल लिए
त्वरा से परिपूर्ण नदी।

तुम्हारे निकट आते ही,
धीमी हो गई हैं
घड़ी की सभी सूइयाँ।
दो दूरस्थ पहाड़ियों में
अभिसरण होने लगा है।
अब पवन तीव्र है और
नारियल के दो पेड़
ऐसे झुक आए हैं सन्निकट
कि बातें कर रहे हों, दो व्यक्ति।

सूरज तेजी से नीचे उतरकर
छिप गया है पर्वतों के पीछे।
उसे भी अभिरुचि है हमारी बातों में।

तुम बोलती जा रही हो
और मैं देख रहा हूँ उन दो पहाड़ियों को,
जिनमें से एक बदल रही है
मोनालिसा जैसी किसी कलाकृति में,
पर सुखद आश्चर्य!
उसकी गोद में एक शिशु भी है।

झनझनाने लगी है घड़ी,
बिजली के पंखे-सी चल रही हैं
सूइयाँ अब।
सूरज फिर से पूरब में उग आया है।

दाना माँझी

जर्जर हो गया है, गल गया है,
सड़ गया है सामाजिक तन्त्र।
बदबूदार हो चुकी है यह व्यवस्था।

करुण क्रंदन कर रहे है
गली के कुत्ते,
हर एक का मार्ग काट रहीं
काली बिल्लियाँ,
किन्तु, आज संवेदनाओं को जगाने का
हर प्रयास निष्फल है।

तुम्हारी बाँहों में
मृत पड़ी है मानवता
या संवेदना या फिर सहानुभूति।
अर्धांगिनी का नहीं
तुमने कंधे पर रखा है तन्त्र का शव।
चिकित्सा तंत्र का,
जनतंत्र का, पुलिस तंत्र का,
प्रशासनिक तंत्र का,
लोकतान्त्रिक राजे-राजकुमारों का।

पक्षी, पशु, मेंढक, चींटियाँ सब
आतुर हैं सहायता को।
आज तो गिरगिट भी बार-बार
गर्दन घुमा कर देखता है
तुम्हारे चट्टानवत कंधे को।
बस मानवों की भीड़
खड़ी है अकर्मण्य।
पत्थरों में नहीं होती कोई संवेदना।

तुम्हारे अश्रु के ताप से
समीपस्थ लताएँ धू-धू कर के
जल जाना चाहती हैं।
पुष्प बिखर जाना चाहते हैं
तुम्हारे पग में।

तुम तो माँझी हो,
पार उतारने वाले हो,
पर तुम्हारी नाव कौन खेवेगा!
गरीब को करनी पड़ती
एक कंधेवाली शव यात्रा।

ओह! सत्तर वर्षीया भारत माँ के
आँसू बह रहे हैं, तुम्हारी
बारह वर्षीया पुत्री की आँखों से।

जय माता दी 

हे माँ भवानी! दिव्यरूपा
लाया हूँ श्रद्धा सुमन॥
हे आदिशक्ति विश्वरूपा
है तुम्हें शत-शत नमन॥
उस नादब्रह्म की स्रोत तुम हो
जिससे जग सृजित हुआ।
भ्रमणशील हैं ग्रह व तारे
विश्व आलोकित हुआ॥
तुमने रचे नक्षत्र सारे
इनसे शोभित है गगन।
हे आदिशक्ति विश्वरूपा
है तुम्हें शत-शत नमन॥
निर्मित हुए उत्तुंग पर्वत
हिम से मण्डित हैं शिखर।
तेरी दया से दीप्त हैं
आदित्य की किरणें प्रखर॥

शशि की अद्भुत हैं कलाएँ
तुममें हैं शशिधर मगन।
हे आदिशक्ति विश्वरूपा
है तुम्हें शत-शत नमन॥
माँ कर कृपा, सुख शांति से
संतृप्त यह संसार हो।
हे शक्तिदा! तुम शक्ति दो
यह भक्त भव से पार हो॥
स्वास्थ्य-सम्बल युक्त तन हो
अवगुणों से मुक्त मन।
हे आदिशक्ति विश्वरूपा
है तुम्हें शत-शत नमन।
हे माँ भवानी! दिव्यरूपा
लाया हूँ श्रद्धा सुमन॥
हे आदिशक्ति विश्वरूपा
है तुम्हें शत-शत नमन॥

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