विकि आर्य की रचनाएँ

एक तितली

एक तितली
काट गयी रास्ता
सुबह सुबह
दिन सारा
रंग रंग हो गया

खुली आँख तो

खुली आँख तो खुद को
जकड़े हुए पाया
गुलीवर सा जीवन
आज फिर
बौने सपनों की गिरफ़्त में है

मैं!

मैं!
मैं!
और मैं!
ले वामन ने नाप लिये
तीन ही पग में
घरती, आकाश और पाताल

अपनी ही छटपटाहट 

अपनी ही छटपटाहट ने
रेत पर ला छोड़ा है,
मगर…
सुनो, इस शंख में कैद है
धड़कन समुद्र की

तुम्हारे चले जाने के बाद 

तुम्हारे चले जाने के बाद
मैं काँपता लक्ष्मण झूले सा
एक पुल भर ही तो था,
तुम्हारा गंतव्य नहीं था मैं।

तुम्हारे जाते ही

तुम्हारे जाते ही
चले जाते हैं
व जाने कहाँ
सुख ये सारे
प्रवासी परिंदे हैं!

आधी दुनिया

सौ में से निन्यान्वें
अनचाही …
फिर भी,
बनाती हैं
आधी दुनिया …
न जाने कैसे?

बरस में 

बरस में
बस एक बार हैं धुलते
श्रद्धा से इसके नन्हें पांव
फिर हैं सबके
बंद दरवाजे़
कहाँ जायें
ये नन्हें पांव?
बस! एक दिन की देवी ये
फिर रहता है
विसर्जन जारी
कहाँ है
इस देवी की बाड़ी?
कहाँ है
इक बेटी का गाँव?

वो बयार

वो बयार
वो बारिश तो
कब की गुज़र गयी
भीगी दीवार से मगर
खुशबू अब भी आती है

अंतिम बूँद तक 

कटना, पिसना और निचुड़ जाना
अंतिम बूँद तक………….
ईख से बेहतर कौन जाने है,
मीठा होने का मतलब?

कुछ तबियत आवारा

कुछ तबियत आवारा
कुछ किस्मत भी आवारा मिली
मुझे उसकी तलाश थी
और वो…
मुझे ढूँढने के बहाने निकली

आँगन में बैठी माँ

आँगन में बैठी माँ
घर डाल रही है!
धूप नर्म गिलहरी सी
उसके साथ – साथ
आगे – पीछे फुदकती है
माँ घर बुन रही हैं…!
साथ-साथ हवायें भी
घोंसला बनायेंगी, यहीं
यहीं चहचहायेंगी ऋतुयें!
माँ घर बुन रही हैं
आकार ले रहा है घर
यह एक दो तरफा स्वेटर है
एक तरफ माँ,
एक तरफ घर !
घर माँ में समा गया है,
माँ घर में…!
माँ ने जीवन पूंजी देकर
बुना है ये घर!
जीवन भर घर की गर्माहट
वैसी ही रही, वैसी ही!

वो जो एक बुत पर

वो जो एक बुत पर
आकाश बन के छाया था
वो बूढ़ा पीपल
जो कभी था, आज नहीं है
है अब भी वही
गंगा स्नान को जाती हुई भोर
वो ही हैं बाजार की
गर्माती हलचलें,
वही कढ़ाहों में खौलता हुआ दूध
वही टोकरियों में बिकती सब्जियाँ
हैं अब भी वही रिक्शों की
टनटनाती घंटियाँ,
हैं अब भी आँचल में
खनकती चूड़ियाँ.
इस पार से उस पार
अब भी गुजरते हैं बन्दर
खड़े हुए निठ्ठल्ले दरोगा
अब भी सुड़कते हैं चाय अक्सर
वही भीड़ पान की दुकानों पर
वही रंगीन पीकें सड़कों पर
है सब कुछ वही
बस वही नही है,
वो जो एक बूढ़ा पीपल था
आज नही है …!
उस बुत को मिल गये हैं अब
चार खम्भे, कंकीट छत!
सुना है उस मन्दिर का वो
अब देव हो गया है
पुजता है सरी भोर से वो
रात गये तक
खोया है कीर्तनों में
है अपने ही में मगन वो
उसे उस बूढ़े पीपल की अब
याद नही है …!
वो ही जो उस बुत पर
आकाश बन के छाया था
वो बूढ़ा पीपल, कभी था,
आज नही है
न जाने क्यूं मगर
वो जिंदा है मुझमें
इस पार से उस पार तक
शाखें फैलाये हुए
मुझमें क्यूं बैठ गया उस दिन
टूट जाना उसका?
चोट क्यूं देता रहा
कट जाना उसका?
बारिशों में लगने लगा
क्यों मुझे भी जड़ से
उखड़ जाने का खौफ़?
हां वो बूढ़ा पीपल, जो कभी था
आज भी है – शायद…!

फिर नया सूरज जन्मा

फिर नया सूरज जन्मा, सड़कें जाने लगी मंदिर
शंख, सायरन, धुआँ, कोलाहल, झुके सर निकले काम पर

गुरद्वारे के स्वर्णिम शिखरों सी गूंज रही सुनहरी दोपहर
पैरों में परछाईयाँ समेट कर कितने अरमान खा चुके लंगर

दिन बड़े मठ सा गुज़रा, फेरते घुमाते कर्म चक्र
फ़िर भी कितने काम अधूरे, जा टंगे पताकाओं में फ़हरा कर

शाम उतरी सूने गिरजे में पियानो की मद्धिम धुन पर
जी चाहा गुनहगार हो लूं आज फ़िर उसको याद कर

रात अंधेरी फैली जैसे चादर किसी दरगाह पर
सिक्के सितारों के छिटके हैं, किसी ने दुआऐं माँग कर

कहाँ वो बरसातें

कहाँ वो बरसाते कि जब खुद भीग कर
कमीज़ों में किताबें बचाते थे बच्चे

वो टॉफी की पन्नी जो बनती तितलियाँ
किताबों में फूल खिलाते थे बच्चे

ऊँचे उड़ लेता था पुरानी कॉपी का कागज़
कभी कश्ती उस से बनाते थे बच्चे़

रख के किताबों में एक पंख मोर का
ख़्यालों को कई रंग देते थे बच्चे़

कोई पेड़ आँगन में 

कोई पेड़ आँगन में
होना ही चाहिये…
कि सींचने से लेकर
छांह में भीगने का सुख,
कोंपलों से लेकर
पतझर तक का सफ़र…
हर इक साल
बदलते कैलेण्डर के साथ
नये अनुभव तो
होने ही चाहिये.
कोई पेड़ तो आँगन में
होना ही चाहिये…
कि जब जिंदगी चुक कर
सूखे तने सी दिखने लगे,
पीले – भूरे, चकत्ते भरे पत्ते
स्मृतियों के, लहरा कर गिरने लगें…
किसी दिन उन्हें
बुहारने का सुख
मिलना ही चाहिये,
कोई पेड़ तो आँगन में
होना ही चाहिये.

यूँ ही नहीं सुर्ख़़ हैं

यूँ ही नहीं सुर्ख़़ हैं
ये चटख़ी हुई,
दिल्ली की चट्टानें !
नहाई है लहू में,
सुलगती रहीं युद्धों में
न जाने कब से…
कितनी बार…

बाँसों के वनों तले

बाँसों के वनों तले
क्यों पसरे रहते हैं
अंधेरे और नाग ?
गाँठ – गाँठ बंधे पड़े हैं
सब बाँस !
कोई भी गीत नहीं गाता
या तो चिर कर पटपटाते हैं
या केंचुल सी उतारते हैं
अभिव्यक्ति के लिए
खुले हुये मुख नहीं हैं
किसी के पास !
सब के सब बाँस,
सिर्फ बाँस हैं
बहुत भाग्यशाली होते हैं
वे बाँस, जो बाँसुरी बनते हैं
किसी को कुछ कह सकते हैं,
रो सकते हैं,
गा सकते हैं!

नदी-किनारे

नदी-किनारे
लम्बी घास में
अंगुलियाँ फिरा जाती है हवा,
जैसे एक अनाथ बच्ची के सर पर
हाथ रख जाती है हवा.
झड़ जाती है ओस
जैसे उसकी आँखों से आँसू,
बिखर जाती है धूप,
फिर खिलखिलाहट सी…
यहाँ-वहाँ

गर देखने हैं

गर देखने हैं, सपनों में इन्द्रधनुष
किताब एक कविता की सिरहाने रखना

न जाने कब ज़रुरत आन पडे़
थोड़े बहाने, थोड़े झूठ भी छुट्टे रखना

इक न इक रोज़ वो पलट के आयेगा
उसके हिस्से का दरवाज़ा थोड़ा खुला रखना

इश्क क्या है बस इक पल का तमाशा है
समझ कर ही आतिश मे चिंगारी रखना

मिल जाती है श्रद्धा की अगरबत्तियाँ, प्यार के फूल भी
रुको लाल बत्ती पर तो शीशे ज़रा गिराकर रखना

उखाड़ लाये हो माना जड़ समेत ये जंगली पौधा
लगा न पाओगे गमले में, निगरानी रखना

चाह कहो 

चाह कहो
गर्ज़ कहो
प्रतिज्ञा या
फ़र्ज कहाँ
और न दुआ
न बाकि तमन्ना रहे,
मन में सुलगती
धधकती आग रहे.
आग आँखों में
आग हाथों में
आग दामन में
आग ही मन में रहे
आग दियों में, उजालों में रहे
आग सूरज में धूप सी खिले.
आग गुमनाम राहों में मशालों की जले
आग से दुनिया में क्रान्तियाँ जन्में.
आग पावन यज्ञ में
आग जीवन में, चूल्हे की रहे.
और न दुआ
न बाकि तमन्ना रहे
मन में सुलगती.
धधकती आग रहे.
आग जो शंकर की
तीसरी आँख से उपजे
आग जो मार सके ‘मार’ को भी
आग वो, जो गौतम को बुद्ध करे
आग जो सीता के
फैसले निष्पक्ष करे
आग, जो भस्माभूत
अभिमानी की लंका करे
आग, जो गिरा दे
हर नामुमकिन दीवार
आग, जो आशिक को
फरहाद करे
आग में जल कर ही
निखर आता है सोना,
आग जो फौलाद भी
साँचों में ढाल दे !
और न दुआ
न बाकि तमन्ना रहे
मन में धधकती,
सुलगती आग रहे

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