विजयदान देथा ‘बिज्‍जी’ की रचनाएँ

मेरे रोम—रोम में ऊषा छाई !

मेरे रोम-रोम में ऊषा छाई!

सकल विश्व देखा करता है
असीम अम्बर के मानस पर छाकर
रजनी की श्यामल चादर को दूर हटा
ऊषा ! कोमल किसलय पातों को
सागर सरिता की चंचल लहरों को
वायु को रेशा-रेशा उज्ज्वल कर
समूची जगती का कण-कण
करती है ज्योतिर्मय!

फिर क्योंकर न हो
मुझको भी यह विश्वास अरे
कि मेरे युग-युग से घन आच्छादित
गहन अन्तरतम को आलोकित कर
ऊषा प्रेम-प्रकाश फैलाएगी!
इतनी तो मुझ को भी
दी मधुर आशा दिखलाई!

मेरे रोम-रोम में ऊषा छाई!

इतनी तो मेरी भी सुन लो ! 

ऊषे!
इतनी तो मेरी भी सुन लो

यौवन की अनुपम लाली पर
होकर उत्तेजित कामी दिनकर
किरणों को लेकर सैन्य-समूह
आ रहा तुम्हारे नव-अक्षत
यौवन को खोने!

स्वर्ण-श्रृंखला में कसकर
से सैनिक निष्ठुर
ले जाएँगे तुमको
अपने स्वामी के सम्मुख
लखकर उसकी भीषण कामानल
झुलस जाएगा
यह नूतन किसलय-सा
कोमल गात तुम्हारा
फिर सहन करोगी कैसे
उसका आलिंगन?
प्रतिक्षण पल-पल समय बीत रहा
लो आओ…!
रवि आने से पहिले
तुम मुझ में….
मैं तुम में मिल जाऊँ!

बोलो-बोलो री बाला
अपने अरुणिम अधरों से
कुछ तो नीरव स्वर में बोलो!

ऊषे!
इतनी तो मेरी भी सुन लो!
आओ रवि आने से पहिले
तुम मुझ में…
मैं तुम में मिल जाऊँ!

मेरा तो स्वप्न बना रखना ! 

ऊषे!
मेरा तो स्वप्न बना रखना!

रजनी की गोदी में सोये
न जाने कितनों के
तू नित्य नये
स्वप्निल हीरक प्रासादो को
क्षण भर में कर जीर्ण-शीर्ण
फिर हो जाती द्रुत-अन्तर्धान!

मेरे जीवन की अभिलाषाओं ने
चंचल गति सत्वर से सरिता बन
समय-सिन्धु में मिल
बन्द किया
कल-कल का आशायम गायन!

प्रताड़ित पीड़ित मानस ने मेरे
सब सुखमय स्वप्नों को त्याग अरे
बस तेरा ही सपना देखा है!

इस स्वप्न पर ही तो केवल
निर्धारित रे मेरा जीवन!
इस स्वप्न-सुमन की पाँखुरियों पर
झीनी सौरभ मधु से रस पर
मेरा मधुकर-सा यौवन निर्भर!
यदि यह भी गया बिखर
फिर कैसे री सम्भव?
अलि-यौवन का जीवित रहना!

ऊषे!
मेरा तो स्वप्न बना रखना!
प्रताड़ित पीड़ित मानस ने मेरे
सब सुखमय स्वप्नों को त्याग अरे
बस तेरा ही सपना देखा है!

मैं तुमको न मिटने दूँगा !

ऊषे!
मैं तुमको न मिटने दूँगा

मेरे अन्तर से निकाला प्रेम-श्वास
बनकर वाष्प
बादल का धर अमिट रूप
कामी दिनकर को छा लेगा!

तुम्हारी लाली को
आरक्त बना रखने
दे अपने शोणित का प्रत्येक बिन्दु
कर विलीन समस्त जीवन अपना
तुम्हारी यौवन को
चिर आक्षय रखने
अपने यौवन का क्षय कर दूँगा!

ऊषे!
मैं तुमको न मिटने दूँगा!

मेरे अन्तर से निकला प्रेम-श्वास
बनकर वाष्प
बादल का धर अमिट रूप
कामी दिनकर को छा लेगा!

किसका सन्देशा लाई हो

ऊषे!
किसका सन्देशा लाई हो
चिर प्रकाश या चिर अन्धकार का?

अरुणिम वेला में आकर अम्बर पर
बनकर प्रकाश की पथचरी
चिर अनुचरी!
उसके आने का सन्देशा देकर
फिर पथ से हट जाती हो!

अधरों पर लेकर मुस्कान
मन्द-मन्द मन्थर गति से
जगमग-जगमग ज्योति पुंज से
कर ज्योतिर्मय जग-संसार
वह दिग्विजयी नृप-सा
करता है शासन
समूची धरती पर!

तुम गोधिूलि वेला में फिर
प्राची के नभ पर आकर
बन अन्धकार की चिर अनुगामिनी
तारक दीपों से पथ आलोकित कर
उसके आने का लाती हो आमन्त्रण!
तब आता है वह
लेकर अपना विकराल रूप
जग के हर कण-कण पर
क्रुर-सा बन
करता है शासन!

तुम मेरे भी मानस पर छाई हो
पर लाई हो सन्देशा किसका?
कुछ तो नीरव स्वर में कहकर
अब कर दो इतना इंगित भर
किसकी अनुचरी बनकर आई हो?

ऊषे!
किसका सन्देशा लाई हो
चिर प्रकाश या चिर अन्धकार का?

क्या यह आमन्त्रण गान सुनाया ? 

ऊषे!
तुम्हीं ने… बोली री
क्या यह आमन्त्रण गान सुनाया?

मेरे तमिस-जीवन के
चिर सहचर प्रियतम को
देकर सब दुखमय जीवन का भार!

निद्रा के अदृश्य अपरिमित पट पर
देख रहा था होकर निमग्न
बस केवल तेरा ही
सुखमय सुन्दर स्वप्न!

चढ़कर उस स्वप्न-विहग की पाँखों पर
तुम्हें पाने की सुमधुर आशा में
उड़ रहा था गति सत्वर से
फर-फर कर मर-मर
होकर विह्नल-सा अति आकुल!

पर जाग रे जाग उठ…. ओ नादान युवक
स्वप्न का संसार त्याग
अम्बर के पट पर कर ले
सचमुच की ऊषा का दर्शन!
अरुण शिखी के
इस मधुर-मधुर कलरव में
मेर इस दीन दशा पर करुणा कर
किसने यह शुभ सन्देश दिया?

ऊषे!
तुम्हीं ने …. बोली री
क्या यह आमन्त्रण गान सुनाया ?

मेरे अन्तर—तम में छिप जाओ !

ऊषे!
मेरे अन्तर-तम में छिप जाओ!

स्वर्ण-विमान पर चढ़कर
जब कामी दिनकर
हो अति कामातुर
तीक्ष्ण रश्मियों के सहस्र भुज फैलाकर
सन्निकट खींच लेता है सत्वर
तुमको…. कर बलात्कार!

फिर बाँहों में भर-भर
करता है आंलिगन जी भरकर!
नश्वर मानव के नश्वर नयन
देख सकें भी तो कैसे
यह अनश्वर निष्ठुर प्रणय मिलन?
पल-पल देकर पीड़ा
उस प्रबल विषमय-सी कामानल का
वह जग को देता है परिचय!
फिर साँझ पड़े
गगन के धुँधले धूमिल वातारण में
कर समाप्त आलिंगन
होकर शिथिल गात
ऊषा का कर परित्याग
छोड़ उसे अम्बर पर
न जाने कहाँ किधर
क्रुर हत्यारे-सा इधर-उधर
अदृश्य हो जाता स्वयं?

मगर तुम सकुचाकर
शरमाकर लज्जित हो
तम में होकर विलिन
चाहती हो अपने को खोना!
पर ऐसा क्यों?
अब भी शिशु की-सी
शुचिता है तुम में
मुझको तो उस में
तनिक भी सन्देह नहीं!
गर अन्धकार ही में मिल जाने की
है प्रबल इच्छा तुम्हारी
तो आओ-आओ री
मेरा सघन अन्तर-तम
करता है प्रतिक्षण
तुम्हारा सुस्वागतम्
लो आओ री….. नर्भय चली आकर
ऊषे!
मेरे अन्तर तम में छिप जाओ!

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