विजयदेव नारायण साही की रचनाएँ

चमत्कार की प्रतीक्षा 

क्या अब भी कोई चमत्कार घटित होगा ?
जैसे कि ऊपर से गुजरती हुई हवा
तुम्हारे सामने साकार खड़ी हो जाए
और तुम्हारा हाथ पकड़कर कहे
तुम्हारे वास्ते ही यहाँ तक आई थी
अब कहीं नहीं जाऊंगी।

या यह दोपहर ही
जो, हर पत्ती, हर डाल, हर फूल पर लिपटी हुई
धीरे-धीरे कपूर कि तरह
बीत रही है
सहसा कुंडली से फन उठाकर कहे —
मुझे नचाओ
मैं तुम्हारी बीन पर
नाचने आई हूँ।

या यह उदास नदी
जो न जाने कितने इतिहासों को बटोरती
समुद्र की ओर बढ़ती जा रही है
अचानक मुद कर कहे–
मुझे अपनी अँजली में उठा लो
मैं तुम्हारी अस्थियों को
मैं तुम्हारी अस्थियों को
मुक्त करने आई हूँ।

या इन सबसे बड़ा चमत्कार
हवा जैसे गुज़रती है गुज़र जाए
दोपहर जैसे बीतती है बीत जाए
नदी जैसे बहती है बह जाए
सिर्फ तुम
जैसे गुज़र रहे हो गुज़रना बंद कर दो
जैसे बीत रहे हो बीतना बंद कर दो
जैसे बह रहे हो बहना बंद कर दो।

प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए

परम गुरु
दो तो ऐसी विनम्रता दो
कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ
और यह अंतहीन सहानुभूति
पाखंड न लगे।

दो तो ऐसा कलेजा दो
कि अपमान, महत्वाकांक्षा और भूख
की गाँठों में मरोड़े हुए
उन लोगों का माथा सहला सकूँ
और इसका डर न लगे
कि कोई हाथ ही काट खाएगा।

दो तो ऐसी निरीहता दो
कि इसे दहाड़ते आतंक क बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिन्ता न हो
कि इसे बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा।

यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ।

सूरज 

साधो तुमको विश्वास नहीं होगा
रोज़ सवेरे अभी भी सूरज निकलता है
गोल-गोल, लाल-लाल
उसकी बड़ी-बड़ी आँखें हैं
फूले-फूले गाल
और भोला-सा मुँह
मेरे जी में आता है
उसे गोद में ले लूँ
और स्याही से उसकी मूँछें बनाऊँ।

सारी दुनिया तो उसके ताप से
जल रही है
साधो भाई
मैं अपना यह वत्सल भाव
किसको सुनाऊँ?

सवाल है कि असली सवाल क्या है

असली सवाल है कि मुख्यमन्त्री कौन होगा?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि ठाकुरों को इस बार कितने टिकट मिले?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि ज़िले से इस बार कितने मन्त्री होंगे?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि ग़फ़ूर का पत्ता कैसे कटा?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि जीप में पीछे कौन बैठा था?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि तराजू वाला कितना वोट काटेगा?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मन्त्री को राजदूत बनाना अपमान है या नहीं?

नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मेरी साइकिल कौन ले गया?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि खूसट बुड्ढों को कब तक बरदाश्त किया जाएगा?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि गैस कब तक मिलेगी?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि अमरीका की सिट्टी-पिट्टी क्यों गुम है?

नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मेरी आँखों से दिखाई क्यों नहीं पड़ता?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मुरलीधर बनता है
या सचमुच उसकी पहुँच ऊपर तक है?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि पण्डित जी का अब क्या होगा?

नहीं नहीं, असली सवाल है
कि सूखे का क्या हाल है?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि फ़ौज क्या करेगी?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि क्या दाम नीचे आएँगे?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मैं किस को पुकारूँ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि क्या यादवों में फूट पड़ेगी?

नहीं नहीं, असली सवाल है
कि शहर के ग्यारह अफसर
भूमिहार क्यों हो गये?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि बलात्कार के पीछे किसका हाथ था?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि इस बार शराब का ठीका किसे मिलेगा?

नहीं नहीं, असली सवाल है
कि दुश्मन नम्बर एक कौन है?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि भुखमरी हुई या यह केवल प्रचार है?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि सभा में कितने आदमी थे?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मेरे बच्चे चुप क्यों हो गए?

नहीं नहीं, असली सवाल …
सुनो भाई साधो असली सवाल है
कि असली सवाल क्या है?

दे दे इस साहसी अकेले को

दे दे रे
दे दे इस साहसी अकेले को
एक बूंद।

ओ सन्ध्या
ओ फ़कीर चिड़िया
ओ रुकी हुई हवा
ओ क्रमशः तर होती हुई जाड़े की नर्मी
ओ आस पास झाड़ों झंखाड़ों पर बैठ रही आत्मीयता

कैसे ? इस धूसर परिक्षण में पंख खोल
कैसे जिया जाता है ?
कैसे सब हार त्याग
बार-बार जीवन से स्वत्व लिया जाता है ?
कैसे, किस अमृत से
सूखते कपाटों को चीर चीर
मन को निर्बन्ध किया जाता है ?

दे दे इस साहसी अकेले को।

दीवारें 

जिस दिन हमने तोडी थीं पहली दीवारें,
(तुम्हें याद है?)
छाती में उत्साह
कंठ में जयध्वनियां थीं।
उछल-उछल कर गले मिले थे,
फिरे बांटते बडी रात तक हम बधाइयां।
काराघर में फैल गई थी यही सनसनी-
लो कौतूहल शांत हो गया।
फिर ये आए-
ये जो दीवारों के बाहर के वासी थे :
उसी तरह इनके भी पैरों में
निशान थे,
उसी तरह इनके हाथों में
रेखाएं-
उसी तरह इनकी भी आंखों में
तलाश थी।
परिचय स्वागत की जब विधियां खत्म हो गई
तब ये बोले-
यहां कहीं कुछ नया नहीं है।
और हमें तब ज्ञात हुआ था
(तुम्हें याद है?)
इसके आगे अभी और भी हैं दीवारें।
तबसे हमने तोडी हैं कितनी दीवारें,
कितनी बार लगाए हमने जय के नारे,
पुष्ट साहसी हाथों की अंतिम चोटों से
जब जब अरराकर टूटीं जिद्दी प्राचीरें,
नभ में उडकर धूल गई है-
(किलकारी भी!)
लेकिन, हर बार क्षितिज पर,
क्रुध्द वृषभ के आगे लाल पताका जैसी,
धीरे-धीरे फिर दीवारें उग आई हैं।
नथुने फुला-फुला कर हमने घन मारे हैं।
अजब तरह की है यह कारा
जिसमें केवल दीवारें ही
दीवारें हैं,
अजब तरह के कारावासी,
जिनकी किस्मत सिर्फ तोडना
सिर्फ तोडना।

अकेले पेड़ों का तूफ़ान 

फिर तेजी से तूफ़ान का झोंका आया
और सड़क के किनारे खड़े
सिर्फ एक पेड़ को हिला गया
शेष पेड़ गुमसुम देखते रहे
उनमें कोई हरकत नहीं हुई।
जब एक पेड़ झूम-झूम कर निढाल हो गया
पत्तियाँ गिर गयीं
टहनियाँ टूट गयीं
तना ऐंचा हो गया
तब हवा आगे बढ़ी
उसने सड़क के किनारे दूसरे पेड़ को हिलाया
शेष पेड़ गुमसुम देखते रहे
उनमें कोई हरकत नहीं हुई।
इस नगर में
लोग या तो पागलों की तरह
उत्तेजित होते हैं
या दुबक कर गुमसुम हो जाते हैं।
जब वे गुमसुम होते हैं
तब अकेले होते हैं
लेकिन जब उत्तेजित होते हैं
तब और भी अकेले हो जाते हैं।

बहस के बाद 

असली सवाल है कि मुख्यमन्त्री कौन होगा ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि ठाकुरों को इस बार कितने टिकट मिले ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि ज़िले से इस बार कितने मन्त्री होंगे ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि ग़फ़ूर का पत्ता कैसे कटा ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि जीप में पीछे कौन बैठा था ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि तराजू वाला कितना वोट काटेगा ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मन्त्री को राजदूत बनाना अपमान है या नहीं ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मेरी साइकिल कौन ले गया ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि खूसट बुड्ढों को कब तक बरदाश्त किया जाएगा ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि गैस कब तक मिलेगी ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि अमरीका की सिट्टी पिट्टी क्यों गुम है ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मेरी आँखों से दिखाई क्यों नहीं पड़ता ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मुरलीधर बनता है
या सचमुच उसकी पहुँच ऊपर तक है ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि पण्डित जी का अब क्या होगा ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि सूखे का क्या हाल है ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि फ़ौज क्या करेगी ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि क्या दाम नीचे आयेंगे ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मैं किस को पुकारूँ ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि क्या यादवों में फूट पड़ेगी ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि शहर के ग्यारह अफसर
भूमिहार क्यों हो गये ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि बलात्कार के पीछे किसका हाथ था ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि इस बार शराब का ठीका किसे मिलेगा ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि दुश्मन नम्बर एक कौन है ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि भुखमरी हुई या यह केवल प्रचार है ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि सभा में कितने आदमी थे ?
नहीं नहीं, असली सवाल है
कि मेरे बच्चे चुप क्यों हो गये ?
नहीं नहीं, असली सवाल …

सुनो भाई साधो
असली सवाल है
कि असली सवाल क्या है ?

सुनसान शहर

मैं बरसों इस नगर की सड़कों पर आवारा फिरा हूँ
वहाँ भी जहाँ
शीशे की तरह
सन्नाटा चटकता है
और आसमान से मरी हुई बत्तखें गिरती हैं ।

बन जाता दीप्तिवान

सूरज सवेरे से
जैसे उगा ही नहीं
बीत गया सारा दिन
बैठे हुए यहीं कहीं

टिपिर टिपिर टिप टिप
आसमान चूता रहा
बादल सिसकते रहे
जितना भी बूता रहा

सील रहे कमरे में
भीगे हुए कपड़े
चपके दीवारों पर
झींगुर औ’ चपड़े

ये ही हैं साथी और
ये ही सहभोक्ता
मेरे हर चिन्तन के
चिन्तित उपयोक्ता

दोपहर जाने तक
बादल सब छँट गये
कहने को इतने थे
कोने में अँट गये

सूरज यों निकला ज्यों
उतर आया ताक़ से
धूप वह करारी, बोली
खोपड़ी चटाक से

ऐसी तच गयी जैसे
बादल तो थे ही नहीं
और अगर थे भी तो
धूप को है शर्म कहीं ?

भीगे या सीले हुए
और लोग होते हैं
सूरज की राशि वाले
बादल को रोते हैं ?

ओ मेरे निर्माता
देते तुम मुझको भी
हर उलझी गुत्थी का
ऐसा ही समाधान
या ऐसा दीदा ही
अपना सब किया कहा
औरों पर थोपथाप

बन जाता दीप्तिवान ।

कोयल और बच्चा 

सन्तो ऎसा मैंने एक अजूबा देखा

आज कहीं कोयल बोली
मौसम में पहली बार
और उसके साथ ही, पिछवाड़े,
किसी बच्चे ने उसकी नकल कर के
उसे चिढ़ाया कू… कू…

देर तक यह बोलना-चिढ़ाना चला।
खीज कर कोयल चुप हो गई
ख़ुश हो कर बच्चा।

इस नगरी में रात हुई

मन में पैठा चोर अँधेरी तारों की बारात हुई
बिना घुटन के बोल न निकले यह भी कोई बात हुई
धीरे-धीरे तल्ख़ अँधेरा फैल गया, ख़ामोशी है
आओ ख़ुसरो लौट चलें घर इस नगरी में रात हुई ।

इन दबी यादगारों से

इन दबी हुई यादगारों से ख़ुशबू आती है
और मैं पागल हो जाता हूँ
जैसे महामारी डसा चूहा
बिल से निकल कर खुले में नाचता है
फिर दम तोड़ देता है।

न जाने कितनी बार
मैं नाच-नाच कर
दम तोड़ चुका हूँ
और लोग सड़क पर पड़ी मेरी लाश से
कतरा कर चले गए हैं।

अयाचित झोंका

 हो गया कम्पित शरद के शान्त, झीने ताल-सा
तन
आह, करुणा का अयाचित एक झोंका
सान्त्वना की तरह मन की सतह पर लहरा गया
कहाँ से उपजा ?
कहाँ को गया ?

प्यास के भीतर प्यास 

प्यास को बुझाते समय
हो सकता है कि किसी घूँट पर तुम्हें लगे
कि तुम प्यासे हो, तुम्हें पानी चाहिए
फिर तुम्हें याद आए
कि तुम पानी ही तो पी रहे हो
और तुम कुछ भी कह न सको।

प्यास के भीतर प्यास
लेकिन पानी के भीतर पानी नहीं।

अब 

वे बाजार में लुकाठी लिए खड़े हैं
मेरा घर भी जलाते हैं
और मुझे साथ भी पकड़ ले जाते हैं
अब ?

वे बाज़ार लूटते हैं.
और रमैया की जोरू की इज़्ज़त भी
नर भी । नारी भी । देवता भी । राक्षस भी ।
उन्होंने हाहाकार मचा दिया है
अब ?

मैंने जो प्रेम का घर बसाया था
ठीक उसके सामने
उन्होंने मेरा सर उतारा
और भूमि पर रख दिया
फिर मेरे घर में पैठ गए
जैसे यह उनकी ख़ाला का घर हो ।
अब ?

सबसे भली यह चक्की है
जिसके द्वारा
संसार पीस खाता है
क्या सचमुच सबसे भली यह चक्की है
जिसके दो पाटों के बीच में
कोई साबूत नहीं बचता ?
अब ?

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