विजय कुमार की रचनाएँ

जिन दिनों बरसता है पानी 

अरे वर्ष के हर्ष बरस तू
बरस बरस रसधार
– निराला

जिन दिनों इस शहर में बरसता है पानी
मंद
फिर तेज
फिर मूसलाधार फिर मंद मंद
आसमान से उतरते हैं कुछ तर बतर फरिश्ते
सर झुकाए
थोड़े से अपराध बोध भरे घटाओं के बीच
भारी आवाज़ में चुपचाप
और हम सुनते हैं उनके पदचाप
छाप छाप
आते हैं गीले जूतों में
घर की सीढ़ियों पर पांवों के निशान
यह काले बादलों की गरज
यह घमासान
जलधारा में बहते पीले उदास पत्तों में
एक उल्लास ढूंढते
वे हमारे घरों में घुसते हैं कुछ टटोलते
नीम अंधरे में
स्वप्न में थोड़ी सी जगह बचाते
भारी भारी साँसों के साथ
इस तरह इस तरह

इन बंद तालों के भीतर
शोर मचाती हवा
छत के कवेलुओं पर टिन की चद्दरों पर
नाचता हुआ अम्बर
हिलती खिड़कियाँ तल्ले
दरवाजों की सांकलें
कांच पर थपथपाहट
वह धमक
सुलगाते हुए एक पुराना प्रगाढ़ संग दोस्ताना
और सितारों को जेब में ठूंसे हुए कुछ धुनें
आती हैं
हमारी इन भीगी हुई कंपकंपाती देहों में
अपनी शरणस्थलियां खोजती

रिमझिम
अटूट रिमझिम
लगातार रिमझिम
बेतहाशा रिमझिम
टपकती बूंदों की उद्दाम सरगम में यह धार धार बेकली
ये विस्मृत प्रेम . ये अगम आकांक्षाएं नसों में उमड़ते तूफ़ान
ये फिसलनें सरपट ये अपार कामनाओं के प्राण
क्या कोई जगह बची है पागलों के लिए
अब इस संसार में ?
तारीखों में कौन किसे याद करता है
लो आओ
निकलो
निकलो बाहर निर्वस्त्र झर झर बूंदों के इस मैदान में
यहाँ से वहां
वहां से यहाँ धुल धुल जाता हुआ सब
उत्ताप प्रार्थनाएं स्मृति स्वप्न कथाएं आभास
सब सब धुल धुल जाते हुए
सब सब घुल घुल जाते हुए
एक झमाझम बरसते कोलाहल में
स्थगित सब बेमतलब संवाद
बस एक करुणा
तन्द्रिल पानी की
आकाश का नीचे उतरना
बदन में फुरफुरी
रोम रोम में हिलोर
एकरसता के बाहर
यह शोर यह स्तब्धता फिर शोर फिर स्तब्धता
कहाँ बसी थीं ये अटूट इच्छाएं
यह तड़ित आर्तनाद
यह उफनता राग
लो जुआरियों के सारे पत्ते बिखर गए हैं  !

भीगते हैं हम निष्कवच भीगते हैं
ऐसी एक धीमी फिर तेज
फिर मूसलाधार बारिश में
हाँ फिजूल हैं वे सब संवाद
ताप
शिकवे
वे गांठें
उलझन
वे नुस्खे
वे ट्रेफिक सिगनल
बेवज़ह मारे गए थे क्यों हम रोजनामचों में

बरसता है पानी
इस तरह एक जादू
और पार जाने की इच्छाएं
इस घड़ी है पानी केवल पानी
और गुम हम सब
तर बतर भीगते हुए सांवले सलेटी हम पत्थरों की भी यह अपनी गरिमा
धरती में इस तरह
इस तरह
दूब की सिहरन में
जिन दिनों इस शहर में
पानी बरसता है मूसलाधार ।

अग्रज कवि /

वे अगले पचास बरस तक मेरे सपनों में आते रहे
वे मरे नहीं थे जैसा कि लोग समझते थे
अलबत्ता वे अब भी अपनी कविताएँ लिख रहे थे
यह सब मैंने सपने में देखा
फिर मैं नीन्द से जागा और कुछ समझ नहीं पाया

अब क्या बताऊँ वे क्या लिखते रहे थे, क्या छूट गया पीछे
एक बुजुर्ग कवि का ऋण जैसे कि सारी कायनात का ऋण
तो शायद मुझे ही अब उन अधूरी कविताओं को पूरा करना होगा
मुझे चुरा लेनी होंगी अग्रज कवि की भेदभरी पंक्तियाँ
जैसे कि आप उठा लेते हैं पंक्तियाँ
चाँद से, आकाश से, या दरख्तों से
और वे कुछ नहीं कहते
शायद मुझे ही ढूँढ़नी होंगी तमाम शोरगुल के बीच
उनकी ख़ामोशियाँ
और तमाम चुप्पियों के बीच
उनकी कोई अनसुनी चीख़?
वे तो चले उन रास्तों पर
जहाँ सन्देह थे केवल सन्देह और सवाल
और आश्वासन कोई नहीं
और वे जानते थे कि सच कहने से ज़्यादा ज़रूरी है
सच कहने की ज़रूरत का एहसास?

मैं नींद से हड़बडा कर जागूँगा
इस तरह तीस बरस बाद रात दो बजे
मैं एक गहरी निद्रा से जागूँगा
मैं चारपाई, बिस्तर, कोठरी, कुर्सियों, बरतन-भाण्डों,
बाड़ों, बरामदों, मान-अपमान, सुख-दुख, स्वार्थ, तारीखों
और मंसूबों और व्याकरण से बाहर निकलूँगा
रात दो बजे गझिन अन्धकार में
मैं अपने अग्रज कवि के रास्तों पर टटोलते हुए कुछ क़दम बढ़ाऊँगा
लेकिन फिर घबरा कर जल्दी से अपने अहाते में लौट आऊँगा
भारी-भारी साँसों के साथ
इस तरह
इस तरह याद करता हूँ मैं आधी सदी पहले गुज़रे
एक दिवंगत कवि को
उनकी कुछ अधूरी रह गई कविताओं को

वृद्धाश्रम

अन्तिम दिनों में
कोई बात नहीं
बातों के टुकड़े थे
इतनी झीनी झीनी चदरिया कटी -फटी
इसी में जीना था
फिर विस्मृति थी

हमने सोचा कि उनके अस्फ़ुट स्वर
उनके विगत से भीगे हुए हैं
पर नहीं
घर अब छूट गये थे उनसे
कोई विघ्न नहीं था वहां

देह थी अब सिर्फ़ देह
वे देह को पहने हुए एक पोशाक की तरह
घूमते थे
अपने हंसने रोने से बाहर

उन्होंने अंतरिक्ष में
एक भंगिमा रची पृथ्वी के भग्नावेशों की
प्रतीक्षा की
अंधेरी रात में तारे गिने
फिर खडे़ हो गये
मृत्यु की देहरी पर

हम उन्हें देखते थे
वे कहीं और देखा करते थे
ये उंगलियां
जो जर्जर थीं
हमारे चेहरोँ को हल्के से छूती थीं
फिर लौट लौट जाती थीं

हर किसी का जीवन
उसका अपना था
मुलाकात के घन्टे खत्म होने पर
विदा के समय
निशब्द वे
हमें द्वार तक छोड़ने आते थे

भारत कॉफी हाउस

तीन सड़कों के मुहाने पर
पीला हाउस के एक पुराने रेस्त्रां में
कोने की एक टेबल
जहां से दिखती हैं दो सड़कें
ज्यूक बॉक्स पर तलत की आवाज़
शामे गम की कसम
मुझे नहीं मालूम मैं नींद में हूं
मुझे नहीं मालूम मैं जगा हुआ हूं
बाहर सड़क पर धूप में दो अधेड़ वेश्याएं पुती हुई
बाहर सड़क पर एक दलाल टोह में
कुछ सूखे पत्ते
एक गोदाम का गिरा हुआ शटर
एक पुलिस जीप में
दो ऊंघते हवलदारों की नींद में
फैले हैं चिड़ियों के कलरव से भरे आकाश
मैं इस अरूप शोर में डुबो देना चाहता हूं
चाय के गिलास में
इस दुनिया की तमाम आवाज़ों को
मैं योजनाओं से उबर आना चाहता हूं
मेरी इन अधूरी सी कविताओं में क्या कोई छंद बचा हुआ है
जिसमें छिपा लूं ये छायाएं कुछ स्पर्श
कुछ स्मृतियां पश्चाताप कुछ दिवास्वप्न
रचूं एक ढलती दोपहर के सारे रह्स्य
मैं कुछ अनकही वेदनाओं की एक सूची बनाना चाहता हूं
मैं
एक बदनाम बस्ती में
मैं एक महान कवि की कविता की फटी हुई पतली सी किताब
झोले से निकालता हूं
मक्खियों से भिनभिनाते टेबल पर उसे रखता हूं
मैं उसके हाशिये पर कुछ लिखना चाहता हूं
लेकिन शब्द कहाँ हैं ?
कहाँ हैं शब्द ?
तभी सुराखों वाली बनियान में वह छोकरा
आकर टेबल पर पोंछा लगाता है
महान कवि की फटी हुई किताब से कुछ पन्ने
नीचे गिर जाते हैं वह हंसता है एक बचपन की हंसी
दीवार पर सांईबाबा की तस्वीर के पास
एक पुराना स्विच बोर्ड
जिसके तार टूटे हुए हैं
आवाज़ करता एक पंखा
जिसमें हवा बहुत कम है
कांच पर दिखती हैं कुछ छायाएं
कुछ इशारे
और कुछ भी नहीं
मेरी बुदबुदाहट का क्या कोई अर्थ है ?
मैं पूछता हूं यहां
इस धूल और रक्त और आंसू और पावडर और
पेशाब की मिलीजुली गंध वाली किसी जगह में
यह कौन सा समय है मेरा ?
मेरी बुदबुदाहट का क्या कोई अर्थ है?
मैं किसी समय में नहीं मैं पूछता हूं महान कवि की
किताब के फटे हुए पन्नों से
सुराखों वाली बनियान में वह छोकरा हंसता है
हंसता है वही मैले दांतों वाली हंसी

यह जगह जहां हर कोई
खुद से ही बातें करता रहता है
और कोई उसे टोकता भी नहीं
क्या मेरा होना इतना ही है
मैं पूछता हूं बार बार
बार बार हंसता है
सुराखों वाली बनियान में वह छोकरा
आंखें खुल जाने के पहले
इस तरह
एक नींद में ही उठकर मैं
बाहर चला आता हूं
मैं जो आया था यहां
एक पुराने ढब के गाने को सुनने
एक गंदी बस्ती के पुराने रेस्त्रां में

मोहम्मद रफी

कौन जो इन चिथडों में दरवाज़ों के बाहर से गुज़रता है
कुछ पुकारता
एक पुरानी टॉकीज़ थी वहां जिसके टिन के छप्परों पर हवायें नाचती थी
उस गली में हाज़ी पीर की दरगाह के बाहर थके हुए लोग थे
मेहनत के बाद की नींद
और झुका हुआ आसमान
श्वेत श्याम दुनिया में हवा अब भी पकडती है
अंधेरे में खडे पेडों के चीत्कार सब दिशाओं से
उभरती मिट मिट जाती
धुंधली धुंधली सी कुछ खुमारियां
एक आवाज़ जिसमें बस्तियों के बसने और उजडने की खबरें थीं और तिलस्मी फंदों में बीते वे खाली खाली दिन
अंतिम शो के बाद हम निकले
तो बाहर बारिश थी
मैं तुम्हारी आवाज़ के साथ साथ खूब भीगा था
भीतर तक तर बतर –
ये दिल जब भी उदास होता है
जाने कौन आसपास होता है
फुटपाथों पर खडे हम गीली सडकें और रतजगे
और खाली ज़ेबों में हमारे हाथ
तेज़ भागते ट्रेफिक में अभी अभी किस की शक्ल देखी थी
वह जिसने देखकर मुंह फेर लिया
वे सारी उपेक्षायें हमारी थीं
वे सारे अपमान भी हमारे थे
ज़र्रे ज़र्रे पर लिखे इस तरह लिखे हुए थे
हमारे ही होने के सबूत
कि ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
टूटे हुए पुलों से हम उतरे
तो दूर तक चलते ही चले आये
पर अब वहां वे पुरानी बस्तियां नहीं है
वह मॉडेल टकीज़ भी नहीं
बस एक पुरानी रिमझिम है
बंद कारखानों के फाटकों और मिलों की बुझी चिमनियों पर
एक बुलडोज़र ज़मीन को समतल करता हुआ
खत्म हुए वे सब रैन बसेरे अपने
नहीं कोई रिहाइश भी नहीं
पर ये सांस चलती है
हम बारिश की पुरानी रात में खुद से ही बातें करते रहते हैं सडकों पर देर तक

साधना

टेलिविज़न पर
उस अभिनेत्री की पीठ थी कैमरे की तरफ
चेहरा छिपा रहा सारा समय
अपने उन दिनों में टहलते

शायद उसकी आँखें अपना जादू खो बैठी थीं
शायद उसका चेहरा बदल गया था
शायद त्वचा पर अब झुर्रियों का जंगल था
शायद आवाज़ लरज गई थी
पता नहीं किस तरह का होगा उसका थका हुआ वर्तमान
यह सब उसने बताया नहीं
यह सब हमने जानना नहीं चाहा

उसके वहाँ होने
और हमारे न जानने के बीच
एक ठहरा हुआ समय था
साठ के दशक का
अभी न जाओ छोड़ कर
कि दिल अभी भरा नहीं

हम ठिठके खड़े थे एक नींद में
और वह भी संगदिल तो नहीं थी
इस तरह
हमारी आशिक़ी को ज़िंदा रखा उस अभिनेत्री ने
हमारे स्वप्न में
कैमरे की तरफ अपनी पीठ किए हुए

बस यूं टेलीविज़न पर चलता रहा
उसका वह संवाद
उसकी कोई अनधिकृत इच्छा नहीं थी
उसने कोई दखल नहीं दिया
जीवन के गतिमान नियमों में
कैमरे के भीतर वह एक छाया थी
कैमरे के बाहर भी अब वह एक छाया थी

हम उसके आशिक
अरे  ! हम भी कहाँ थे इस पूरे समय
अपनी ही किसी छाया से बाहर

रूपतारा स्टुडियो

वे जो हुस्न और इश्क की दास्तानें थीं
जलवे थे अदाकारी के नग़मानिग़ारी के
ज़माने भर के सादा फ़लसफ़े और ड्रामाई डायलॉग
वे ज़मीन से आसमान तक उठीं आहें वे रूहानी जज़्बे
वे बलबले दिल की वे बेकरारियाँ
वे रसिया वे सौदागर वे ख़ुदफ़रेब वे मालिकान कारिन्दे वे कला के मज़दूर
एक उजाड़ देवालय उन स्वप्नगाथाओं का
अपने खो चुके तिलिस्म की अलामात को
समेटे उनीन्दा और उदास
वह अनुगूँजें अब नहीं हैंख़ि
और पड़ोस से उठीं ख़ुशहाल स्मृतिहीन शिखर रिहाइशी इमारतें
एक गुज़रे हुए दौर पर हँसती हुईं

एक ऊँचा-सा काला जादुई गेट
जिस पर अब नगरपालिका के कब्ज़े का नोटिस टँगा है
और प्रवेश वर्जित
मैं फिर भी नाहक दाख़िल होता हूँ एक गुमशुदा वक़्त में
जंग-आलूद चोर-दरवाज़ों से

कुछ पुराने पेड़ अहाते में
काई लगे कवेलू कुछ टूटे-गले हुए बोर्ड
दीवारें आख़िरी साँसें लेती हुईं
आर्क लैम्पों और आदमक़द तिड़के हुए उतरे आइनों के बीच

वहाँ दो-चार आवारा कुत्ते थे
जिनकी पनियल आँखों में मैंने देखा देर तक
बाहर गुमटी पर चाय बनाते उस छोकरे को पता नहीं
कि यहाँ दिलकश ख़्वाब बुने जाते थे
रोशनियाँ थीं इत्र में नहाई हुई
फिर घुप्प अन्धेरा था
रोशनी और तारीक़ी का चलता था यह इन्द्रजाल
चन्द मस्त कलन्दर नौजवान वे लाखों के चहेते
गले में स्कार्फ़ बान्धे हुए
वे कब के बूढ़े हुए मर खप गए
चन्द हसीन अदाकारा थीं
धुन्धले हो गए चेहरे उनके
वे गुमनाम हो गईं
खो गए उनके तराने

वह जो एक इतिहास है बिख़री चीज़ों का
दास्तानों और हवामहल का
उसे किस चीज़ से बदला जा सकता है अब
दरवाज़ों और पेड़ों और दीवारों और जंग खाए टूटे-गले हुए बोर्डों में
मैं एक प्रेत-समय की गैबी चाबियों को तलाशता हूँ
किन कुओं में बिला गईं वे सामूहिक स्मृतियाँ

ये सारे सपनों के कारख़ाने बन्द हुए
उन्हें पता न था कि अन्त उनका इस तरह से पीछा करेगा
हमें पता न था कि अन्त उनका इस तरह से पीछा करेगा

बाहर अब कुछ नहीं
बाहर केवल एक सड़क, रफ़्तार, ख़रीद-फरोख़्त, हंगामे
नई बनी दुकानों में बहता हुआ दो टूक समय
बाहर सड़क के छोर पर निर्वासित और मूक दादा साहेब फ़ालके
उनका बुत असंख्य चिड़ियों की बीट से ढका हआ

मैं चलता हूँ, रुक जाता हूँ
फिर चलता हूँ
फिर क़दम ठिठक जाते हैं
बहुत से गीतों, बहुत सारे क़िस्सों
अफ़वाहों, दन्तकथाओं, साँसों की गर्माहट
और सुरीली आवाज़ों को अपने भीतर ढोता
यूँ शायद ख़ुद से ही बातें करता जाता हूँ कुछ दूर

यह रास्ता सिर्फ़ यहाँ से गुज़र जाने के लिए नहीं बना था
देखता हूँ पल भर ग़ौर से उन सब को जिन्हें कहीं पहुँचने की जल्दी है
उनके लिये भूमिगत मार्गों और फ्लाइओवरों को बनने से मैं रोक नहीं सकता
बड़े-बड़े गोदाम मुझे डराते हैं
कहीं शरणस्थलियाँ नहीं हैं
कोई पुकारता नहीं अब हठात् किसी अज्ञात दिशा से
मैं फिर भी निकम्मों की तरह बटोरता हूँ कुछ दो समयों के बीच फँसा हुआ
फ़जूल भटकता हूँ बदहवास और फिरता हूँ दीवानों-सा
ढूँढता हुआ कुछ अपने से बाहर

वसीयत

मैंने फ़ोन पर देर तक बातें की कुछ नितान्त अपरिचितों से
उनके स्वर बड़े पहचाने लगे
उस परेशान-सी लड़की से मिला पोस्ट ऑफ़िस में
लिखने को क़लम दी
वह जो माँ को मनीऑर्डर भेज रही थी
मैं भीगती मसों वाले लड़कों के खेल में
यूँ ही शामिल हो गया एक दोपहर
एक किक यहाँ से, एक किक वहाँ से
वे जो यहाँ पार्क में हल्ला-गुल्ला, मस्ती, गाली-गलौज से भरे हुए थे
इन्होंने निराशा को अभी जाना नहीं था

चर्चगेट से रात एक बजे अन्तिम लोकल ट्रेन में
एक थका हुआ उनीन्दा मज़दूर बैठा था जो कोने की सीट पर
उसके सपनों में चुचाप दाख़िल हुआ मैं
लड़ता रहा उसके बदमाश मैनेजर से
शराब की दुकान से गए रात निकला एक बूढ़ा
मैंने अपना कन्धा दिया उसे रोने के लिए
एक पर्यटक जो पता भूल गया था इस शहर में
वह चला आया मेरे साथ
अब इसी मोहल्ले का नागरिक है
एक औरत जो गेहूँ का कनस्तर लिए चक्की पर खड़ी थी
अचानक अपना पिछला जनम मुझे बताने लगी
मैंने तो सिर्फ़ उसकी साड़ी पर खिले फूलों की तारीफ़ की थी

मैं ईश्वर नहीं
मैं कुछ भी नही
मैं बस यूँ ही
पर मेरे ही भीतर थे इस सृष्टि के सारे रहस्य

मेरे चारों ओर बिखरे हुए थे
कितनी परिचित आवाज़ों के अनसुने शोर
पुराने अख़बारों की कतरनें
लॉटरी के फेंके हुए टिकट
जेब में अब भी एक पुरानी चवन्नी
और ग्यारहवीं कक्षा की एक सहपाठिन की
नोटबुक का एक पन्ना भी
मैं उस ख़त की फ़ोटो कॉपी कराकर एक दुकान से निकला
और अपनी इस उम्र को वहीं भूल आया
और सिनेमा के पुराने पोस्टरों में देखता रहा अपना एक चेहरा

मैंने कोई ख़ास जीवन नहीं जिया
मैंने बस कुछ एकालाप याद रखे
कुछ खण्डित दृश्यों की असमाप्त कथाएँ
मैं कुछ बताना चाहता था
जो नहीं बता सका
वह एक रहस्य बन गया
बस थोड़े-थोड़े अचरजों को इसी तरह सँभाल कर रखता रहा
बस यह नसीब इसी तरह से लिखा जाना था

मेरे हर वाक्य के अन्त में एक विस्मयादिबोधक चिह्न था
मैंने पोस्टरों में देखा।

हम न मरब 

जीवन और शब्दों के बीच
क्या बिछा रहता है
मैं
उन अन्तरालों में जाना चाहता था
दूर जुलूस की आती थीं आवाज़ें
सड़क पर आवारा कुत्तों की आँखों में याचनाएँ
एक झुर्रियोंदार बूढ़े ने कहा
लो मेरा थोड़ा-सा बोझा उतार दो
चन्द्रमा था खण्डहरों की स्याही पर उगा हुआ
सुनसान समुद्र से चीख़ती थीं हवाएँ और हज़ार लहरें

मैं उत्सवों की शाम
शामियाने के पीछे
जूठे बर्तन धोते बच्चों के पास बैठ गया
मैंने उन्हें परीकथाएँ सुनाईं
वे सब अब भी कितना यक़ीन करते थे अचरजों पर
उनका तो क्या होता
मैंने ही देखीं आसमान के रंगों में
जीवन की परछाइयाँ
टिन की छत पर, चौखट पर, खिड़कियों की सलाख़ों पर
जेल के दरवाज़ों पर
बन्द तालों पर मैंने मनुष्यों की उँगलियों के निशानों को देखा
आँगन में रखी टूटी कुर्सियों पर बैठे थे पुराने वक़्त
पनियल आँखें और और झुके हुए सिर
वे कुछ बोलते थे
कहे और अनसुने के बीच साँस फूल-फूल जाती थी
तीसरे पेज के अन्तिम कॉलम में
यह जो एक गुमशुदा औरत की तस्वीर है
और अदालतों में सुनवाई की अगली तारीखें
और अस्पताल के अहातों में शव की शिनाख़्त होने तक
जाने कब से खड़े कुटुम्बी
एक दिन शहर के सारे सिगनल बन्द थे
मैंने कहा कि निरापद जगहों पर रख दी जाएँ
मनुष्यों की अनश्वरताएँ
आसमान के सितारों की झिलमिल परछाइयाँ
वृद्धाश्रमों के वार्षिकोत्सव
और बीयर-बार में देर रात तक काम करने वाली लड़कियों की देहें
धीरे-धीरे ही सही
समझ में आने वाली स्थितियाँ
और
न अमल में आने वाली योजनाएँ भी

हत्यारे मोहम्मद रज़ा को डर था
उसकी दूसरी बीवी
झाड़ू-पोंछा की कमाई देना बन्द कर देगी
बदनाम हो जाएगा एक मरद जात-बिरादरी में
लाशों के कपड़ों से बरामद होती हैं डायरियाँ
कुछ टेलिफ़ोन नम्बर जो कभी लगते नहीं

मैं ऐसे ही थोड़े-थोडे़ अन्तरालों में उतरा
डिस्काउण्ट सेल में जब भी मिलती थी
आधे दाम पर ख़ुशी
मैं शॉपिंग सेण्टरों में घुस जाता था
वहाँ घोषणाएँ हो रही थीं कि
हँसने से माँसपेशियों का तनाव कम होता है
मैंने दोपहर में घरेलू सीरियलों को देखकर
रोती हुई स्त्रियों के भीगे हुए गाल देखे
वे बोलीं यही है संसार। यही है जीवन ।
पाप पुण्य भोगने के लिये यह काया मिली है
और सब माथे पर लिखा है

हज़ारों वॉट की दूधिया रोशनी में नहाए स्टेडियमों में
क्रिकेट मैच हो रहे थे
एक उन्मत्त भीड़ थी
सर्द रात में बाहर फ़्लाईओवरों के नीचे रात ग्यारह बजे
भूखे बच्चे ठिठुर रहे थे

नालियों में गन्दे पानी के बहने की आवाज़ को देर तक सुना मैंने
बाहर अन्धेरा था
एक सुनसान सड़क किसी रोशन खम्भे की तलाश में दूर तक जाती हुई
एक लोकल ट्रेन की घड़घड़ाहट
और नींद की गोलियों में थोड़े से बचे हुए आवेश थे

लाल चौक से श्मशान भूमि के रास्ते तक
मैं हर बार शामिल हुआ अनजानी शवयात्राओं में
दुर्घटनाओं के बाद हताहतों की संख्या कहाँ तक पहुँची थी
यह कभी मालूम नहीं पड़ता था

बहुत-सी अपरिचित सड़कों और बहुत-सी अनाम गलियों में
बहुत सी शामों में
घुसा मैं पहली बार
मिला वहाँ बहुत सारे परिचित चेहरों से
वे सब जो कल भी देखे थे
उसके पहले भी उसके पहले भी
जो दूसरी दूसरी सड़कों और गलियों में मिले थे
और उनकी ख़ामोशियाँ पत्थर नहीं थीं
और उनके चीत्कार बिगुल नहीं थे
मैं एक क्षण रुकर उनके गले लग रो लेना चाहता था
कोई एक सिलसिला जो अचानक दूसरे सिलसिलों से निकला था

इसने खो दिया था अपना क्रम
और जीवन ज़्यादा खुल जाता था घबराहट में एक गहराई शाम।

अन्तराल

इधर वायरलैस पुलिस-वैन
नीले रंग
और पीली पट्टियों वाले वाटर कैनन
यातायात बन्द करने की सूचनाएँ
फ़ाइबर की ढाल, आँसू गैस के गोले
डण्डे, राइफ़लें और लोहे के टोप थे
जिनमें उनके आधे चेहरे छिप गए थे
और
किसी अज्ञात जगह से आने वाले आदेशों की प्रतीक्षा थी
उधर झण्डे, बन्द दुकानों के शटर
तख़्ते, नारे, पोस्टर
तमतमाए चेहरे, आँखों में भूख का जमाव
फटी चप्पलें
और संयम का होता हुआ अन्त था

मैं किधर था?
इससे पहले कि कुछ घटे
मैं किधर था?
अपने आप से पूछा मैंने
मैं किधर था ?

मैं कॉपी और पेंसिल लेकर
सड़क के बीचोंबीच बैठ गया
मैंने पेड़ों को देखा
धूप को देखा
उड़ते पक्षियों को देखा
मैले पैरों में टूटी चप्पलों को देखा
भूखी औरतों की गोद में छोटे-छोटे शिशुओं को देखा
और उन दीवारों को देखा
जिन पर बस्ती के बच्चों ने
कोयले से आड़ी-टेढ़ी लकीरें खींची हुई थी
वह चित्रकारी थी
जहाँ अभी ख़ून के छींटे नहीं पड़े थे ।

अनधिकृत 

अनसुने विलाप हमारा पीछा करते रहे
अब लुप्त थे उनके चेहरे
लम्बी कतारें
फैले हुए हाथ अर्जियों के
वे पराजित ईश्वर के हाथ थे
याद मत रखो
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर
से बनती है यह देह
समय के तलघर में
उन जलजलों में
वह मानुस के जीवित बचे रहने का इतिहास था

इन्हीं के घर जल गए थे चार दिन पहले
वे जल चुके की राख से उठे
कतार में खड़े होकर वे जो जीने का हक़ माँग रहे थे
किसी दैवीय कृपा की तरह

यह ज़मीन किसकी है?
मैं पूछता हूँ यह ज़मीन किसकी है?
गुर्राती है केबिन के भीतर से
एक रोबदार आवाज़
और वे गिड़गिड़ाहटें
सभ्यता के तहख़ानों से निकल कर आती हुईं

जिनका सबकुछ लुट गया
उन्हें याद नहीं
कि यह ज़मीन किसकी है
याद है तो सिर्फ़
तार पर सूखते कपड़े
कुछ बर्तन, भात, नमक का स्वाद
बच्चों की किलकारी
एक नींद
एक असमाप्त गाथा

आसान नहीं बताना जिसको
वही तो सब में छिपा रहता है
ज़मीन जिसकी भी हो।

अवशेष

मैं किन्हीं अनिवार्यताओं के साथ हूँ
फिर भी किसी और समय की
तलाश करता हुआ
जहाँ मैं तुमसे वे शब्द पाता हूँ
जिनमें एक असहनीय छटपटाहट है
कुछ पलों के लिए फैलाता हूँ एक कवि का जाल
और फिर हताश समेट लेता हूँ
एक धूसर कोलाहल में थमी हुई कोई स्तब्धता
किसी बाँसुरी के गले में फँसी हुई हलचलें
जहाँ एक दूसरे में घुल मिल गए हैं
जीवन और कला
एक चीत्कार किसी उदास सिहरन में टँगा रह गया
मैं भूल गया सब क़िस्से
पर कोई कम्पन जो अभी भी याद है
मैं शब्दकोशों के बाहर जीवन देख रहा हूँ
ये शब्द
देर रात सड़क पर भटकती उन बदनाम औरतों की तरह हैं
वे औरतें जो दूसरों के चेहरों को पढ़ती हैं
ये मुहावरे जो कल शायद खो जाएँ
पर इनमें मेरी परछाइयाँ फैली हुई हैं
मेरे विचार मेरा साथ छोड़ जाते हैं
मेरे पास कोई अर्थ नहीं बचा है
फिर भी मैं भटकता हूँ
मैं भटकता हूँ
इसलिए मेरी सीमाएँ नहीं हैं।

एक डूबती शाम का गीत

शुरू यौवन के दिनों में इस स्त्री के साथ मैं इस शहर के समुद्र के किनारे
चट्टानों पर बैठता था
शहर की तरफ पीठ थी हमारी
लहरें आती थीं और पानी की छुल-छुल हमारे तलुओं को सहलाती थी
इस तरह यह शुरू हुआ
फिर एक दिन वह मेरे घर आ गई
उसने मेरे गिरस्ती सँभाली और मैं अमूमन भूल गया उसे

आज अचानक जब मैं उस स्त्री के पास आया
तो मृत्यु की तरफ पीठ थी मेरी
और शहर के बेमतलब शोर-गुल के बीच
यूँ घटित हुआ यह आगमन

और यह इतनी ख़ामोशी से भरा हुआ था
कि अफ़वाहों ने पूछा मुझसे
क्या यह सम्भव है?

सड़कें गीली थीं
और रोशनियाँ धुली हुईं
एक सलेटी अन्धेरा घेरता था
शर्म लानतों और विस्मृतियों से गुज़रते हुए
इन्हीं सब के बीच इच्छाओं पर तैरता चला आया था वह समय
जहाँ अचानक हम पहले से ज़्यादा मानुस थे।

मैं उसे क्या दे सकता था इस खण्डित जीवन में
मैं बार-बार एक अच्छा मनुष्य बनने का वादा करता था
फिर बार-बार इस बात को भूल जाता था
कोई भी किसी को क्या दे सकता है
उपनगर की एक घनी बस्ती में एक फटीचर रेस्त्राँ में
सस्ते प्यालों में पी गई चाय के साथ
जीवन के कुछ पछतावों के सिवा

वह सब जो जीवन था
अगरचे ठीक-ठीक अपराध के दायरे में नहीं आता था
और नहीं था यदि मेरे हाथ ख़ून से सना हुआ छुरा
तब भी मैं निरपराध कहाँ था?

चौराहे पर खडे़ होकर
मैं चिल्ला चिल्ला कर भी कहता —
‘‘सुनिए भाईजान, सुनिए, मैं हत्यारा हूँ,
इस स्त्री का वध किया है मैंने’’
कौन यक़ीन करता
लोग हँसते, मुझे सनकी समझते आगे बढ़ जाते
सुबूत कहाँ थे?

तो यह जीवन इसी तरह चलता रहा
और कोई समाधान नहीं था
क्या हममें से कोई
किसी अन्य को बता सकता था
कि कैसे घटित होता रहा यह सब

गला रुँधा हुआ था
आँखें नम
रेस्त्राँ में कहा उस स्त्री से मैंने
मैं तुम्हारे साथ फिर एक जीवन शुरू करना चाहता हूँ
मैं पच्चीस बरस पीछे लौटना चाहता हूँ
लो मैं लौटता हूँ चालीस-पचास, पचपन-साठ बरस पीछे
मैं अपनी माता की कोख से दोबारा जन्म लेना चाहता हूँ
तुम्हारे लिए सिर्फ़ तुम्हारे लिए
और उसके होठों पर पल भर वह जुम्बिश
सिर झुकाए हँसी वह एक मुस्कान
थकी हुई मोनालिसा की एक आदतन मुस्कान
समझना-बूझना जिसे बूते के बाहर था मेरे

उतरती धूप जो थी उसके चेहरे पर वह छूती थी
वह अचानक एक आश्वासन की तरह थी
न कि तमाम सारे कहे और सुने गए शब्द
उसके केश अब भी बहुत प्यारे थे
जो मेरे तमाम कहे गए पर अन्धेरे की तरह झुकते थे
और उस सबको बेमतलब बना देते थे
शुरुआती झुर्रियों वाला उसका चेहरा जो आधा उजाले में था
और आधा किसी शोक में
पचपन बरस की यह औरत
क्यों अब भी इतनी कोमल थी
क्या वह अब भी कोई कामना करती थी
और उम्मीद के परे चली जाती थी?
क्या वह अपने व्यतीत में थी?
क्या वह व्यतीत से बाहर थी?

उस ढलती शाम हमारे हाथों में सब्ज़ियों के थैले थे
और मन के भीतर कुछ अन्तिम बचे हुए आश्रयस्थल
मन हुआ कि मोबाइल पर सुनाएँ हम
अपने दिवंगत पुरखों को
बाज़ार में शाम की इस पवित्रता का गीत

चारों ओर इस अफ़रा-तफ़री में
तेज़ रफ़्तार में
इस तरह हम सड़क पर दो छूटे हुए कोमल पक्षी थे
पेट्रोल की महक में लिपटे बसन्त में
काँपती हुई थी वस्तुएँ
और हमारा आसपास हमारा आईना था।

पिता

माँ नहीं थी
तुम कातर पुकारते थे
रात को नींद में
उस तरफ़ बन्द किसी सुनसान कमरे में निःशब्द
मुझे कुछ नहीं मालूम

तुम्हारे जोड़-जोड़ में दर्द था
दवाइयाँ तुम्हारे लिए बेकार थीं
तुम करवट लेते थे
तुम्हारी हड्डियाँ चटखती थीं
इस कराह को सुनना
फिर हमारी एक आदत बन गई

तुमने एक लम्बा सफ़र काटा अपने में गुम
हम सोते थे अपने-अपने बिस्तरों पर
अपनी बेसुध नींद में
तुम क़रीब थे
तुम बहुत दूर थे

कभी रातों को उठकर देखा मैंने
तुम अन्धेरे में बैठे हुए थे
लगता था कि यह एक जादुई संसार है अनन्त
कुछ-कुछ डरावना भी
और वे ख़ामोशियाँ
अन्धेरे में दिपदिपाती आँखें
और
वे रतजगे तमाम
कभी अपनी मीठी नींद में देखा मैंने
गुनगुने पानी की तरह था
तुम्हारी हथेली का स्पर्श मेरे माथे पर

नहीं मालूम
जाने से पहले
क्या छोड़ा मेरे लिए तुमने
क्या नहीं छोड़ा
एक दिन स्थिर आँखों से
देखा होगा मुझे देर तक
और तुमने विदा ली
जैसे कि थे ही नहीं
जैसे कि कुछ था ही नहीं

मैं हिसाबी-किताबी
किसी दौड़ते – भागते वक्त में गुमशुदा
प्रार्थी, गुजारिशगार
अपराधी, भुलक्कड़
दुनिया के झमेले में
घड़ी की सुइयों के साथ बँधा हुआ
मैं शान्ति खोजता हूँ कैलेण्डर की तारीख़ों में
अर्पण में तर्पण में
पावन नदी के स्नान में
मन्त्रोच्चार में

ओ पथरीली ख़ामोशी वाले पिता !
शान्ति मत देना
मत करना क्षमा
तुम देवताओं की अनुपस्थिति वाला समय हो
सोने मत देना एक सुकून की नीन्द मुझे
वीरान रातों के टिमटिमाते तारों से उतरना
मेरे स्वार्थों की दुनिया में
झाँकते रहना अपनी असहायता में।

रामदास की उत्तर-कथा

(रघुवीर सहाय से क्षमायाचना सहित)

रामदास को लग चुका जब चाकू
हाल हुआ सबका बेकाबू ।

पर डर अब निथर गया था
हर कोई अब उबर गया था ।

कुछ पल जो असमंजस था
अब उसमें घटना का रस था ।

लाश पड़ी है ड्रामा जारी
सभी कवि कितने आभारी ।

क़िस्सा रोचक घटित अनोखा ।
द्रवित हृदय ने सबकुछ सोखा ।

ख़ून वहाँ था जितना भाई
उससे ज़्यादा थी कविताई।

क़िस्साबाज बना हर कोई
जगी सनसनी थी जो सोई।

हर एक ने पतंग बनाई
ख़ूब-ख़ूब जमकर फहराई।

सबके अपने-अपने वृतान्त थे
मनरंजक सब आद्योपान्त थे।

बीच सड़क यह अन्त जो आया
सब कवियों ने नाम कमाया।

शयन यान

रात हमने देर तक बातें की
हमने कहा कि अब साँठ-गाँठ से जिया नहीं जाता
एक लपट जलती है कान की लवों पर
एक ज्वर बना हुआ निरन्तर

हम शोक सन्तप्त थे नशे में
पुराने अशआर
और
महापुरुषों के कुछ नुकीले कथनों को याद करते हुए

खिड़की के बाहर एक असीमित आकाश
हमारी किसी भी बात पर हँसता था
उनीन्देपन में जीवन के तलघर में
इस तरह ये जमा होती जाती हैं कितनी ही परछाईयाँ
रात के पहाड़ के नीचे कितनी सारी विस्मृतियाँ
हमसे कोई बोला कि हम हर चीज़ को उलट पुलट देना चाहते हैं
कोई सिरा मिलता है इन्हीं अचानक सघन ख़ामोशियों में
और इस तरह से ली गई विदा

और फिर लिख ली गईं तुरत-फुरत कुछ कविताएँ
जिनमें उम्मीद का एक मुहावरा था
हम समझ रहे थे कि हम उतार रहे हैं कर्ज़
एक समझदार आदमी हर किसी के पीछे खड़ा था

सर्जनात्मकता, तोष, पुलक, मद
रुको-रुको
यह जो ख़ामोशी है
यह टूटी कहाँ है
शब्द तैर रहे हैं छायाओं पर
हर वाक्य के आख़िर में ये अन्तराल
ये एक भाषा के पुराकोश में छिपकर बैठ जाते हैं।

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