विजय गुप्त की रचनाएँ

मुर्दा नम्बर

बहुत कोशिशें कीं
नहीं सुन सका
टूटी हुई सिलाई वाली
क़िताब के पन्नों में
जैसे-तैसे अटके
धागों की पुकार;
समझ ही नहीं सका
वह ज़बान,
जिसमें;
डाल से टूटते हुए
पत्ते की चीख़ थी;
महसूस ही नहीं कर सका
कुचले हुए फूलों की
देह के घाव ।

अभी-अभी गिरी है
एक चिडि़या
ज़मीन पर,
दूर जंगल में कहीं
गिरा है कोई आदिवासी
नहीं देख सका,
आदिकवि की आँखों से कविता
दिल के ख़ून में डूब कर
जिन अक्षरों को
सुर्ख़ और ज़िन्दा
कविता होना था
वे बैंक एकाउण्ट के
मुर्दा नम्बरों में बदल गए ।

नया पता 

कई रंग-रूप-आकार वाले
इश्तहार की तरह
बदला जाता रहा
बाज़ार ने नफ़ासत और
बेहद सलीके़ से
एक-एक पहचान
मिटा दी ;
हाथ, पाँव, आँखें, दिमाग़
यहाँ तक कि
दिल भी
प्राइज़-लिस्ट की तरह
टंग गया
शॉपिंग मॉल में ।

कभी एक अच्छा भला शख़्स
रहा करता था यहाँ
जिसका नया पता है
आइटम नंबर 13
शॉप 22 बटा 72
थर्ड फ्लोर,
भगतसिंह मार्केट
ब्रह्म-रोड, अम्बिकापुर
जिला – सरगुजा, छत्तीसगढ़
497001

अमरीका

दीवारें,
दिमाग़ में
उतर आईं,
दिल को,
दरवाज़ों ने
बंद किया,
छिपकलियाँ
दौड़ने लगीं
रगों में,
भर गए
आँखों में,
मकडि़यों के जाले

ख़बरें घिर चुकी थीं
विज्ञापनों से,
न्यूज़-चैनल पर
दिखा रहा था
छुपा हुआ कैमरा
नंगी की जा रही औरत को
औरत की निढाल आँखों में
दम तोड़ रहे थे किसान
डूब रहे थे गाँव
उड़ रहे थे
धमाकों से पहाड़
बाज़ार भर चुका था
सौंदर्य-प्रसाधनों, कीटनाशकों और
बीमार बीजों से

घर के भीतर
हर कमरे में
घुस आया था
अमरीका ।

दुश्मन

अपने दुश्मन के बारे में
मैंने सोचा
बीस साल, पचीस साल
शायद तीस साल बाद तो
उसका चेहरा
भाप की तरह
आँखों में उड़ने लगा

हर चोट
उभर आई
ज़िस्म पर
तीर की तरह
वह आज भी
मेरे ख़याल में
धँसा
तीख़ी यातना में
छटपटाते हुए
मैंने फ़ोटो एल्बम देखा
वह दोस्तों और
रिश्तेदारों से भरा था

आज जब
दोस्तों ने मुझे
खाली पास बुक
और रिश्तेदारों ने
बाउंस चेक की तरह
फेंका
तो बाख़ुदा
वह शख़्स मुझको
बेतरह याद आया ।

नींद

अथिर जल में
अनिद्रित मछलियाँ
बर्राता रह-रह पीपल
बेचैनियाँ ओढ़े नीम
अदबदा कर भागता कुत्ता
सियारों की रुलाई
चौकीदार का बस जागना
और चीख़ना –
सोना नहीं ! सोना नहीं !

पर नींद किसकी आँख में
नींद को दुख हर गया
अपमान नींद को चीर गया
आँख के गोलार्द्ध में
उम्र भर का रतजगा

धुनिए की धुनकी पर
धुन गई नींद
आँख भर आँसुओं में
डूब कर
मर गई नींद ।

प्रार्थना-घर

टूट गया जीवन-समास
इष्ट हुए गौण
केवल वास्तु-शिल्प मुखर

प्रार्थनाओं की शाम
रक्त के तालाब में
डूब गई

वर्दियों के धुँधलके में
हमारा प्रार्थना-घर ।

हमारा दिल

प्रार्थना-घर सिर्फ़ इमारत नहीं
सिर्फ पद्धति नहीं
जुलूसों को, संगीनों को
वहाँ से हटा लीजिए

सो रहे हैं
वहाँ हमारे पुरखे

उनकी नींद के बीच
जातिवाचक विशेषण
मत रखिए
किसी भी संज्ञा से
मत पुकारिए

वह हमारा
प्रार्थना-घर है
हमारा दिल ।

सरयू का जल 

जब हम नहीं थे
तब भी था सरयू का जल
जब हम नहीं होंगे
तब भी होगा
सरयू का जल

धरती पर चित्रकारी करता
बादलों का अर्थ देता
वनस्पतियों में रंग भरता
शताब्दियों से
हमारे बीच
बह रहा है
सरयू का जल

वज़ू से पहले
आरती से पहले
अपनी घृणा धो लें
और उतरने दें
अपनी आत्मा में
सरयू का जल ।

रंग बोलते हैं 

न सुनो, लेकिन
रंग बोलते हैं
वाणी के संकेतों
और भाषिक चिन्हों
से अलग
कुछ और कुछ भिन्न !

सफेद,
मरे हुए कबूतर का भी तो रंग है,
शांति, संधि और समर्पण के
अलावा भी
कुछ और कुछ भिन्न !

लाल,
मार दिए गए
आदमी का भी तो रंग है,
शहादत, वीरता, क्राँति के
अलावा भी
कुछ और कुछ भिन्न !

हरा,
काट दिए गए
जंगलों का भी तो रंग है,
पेड़, हरियाली, कुल्हाड़ी के
अलावा भी
कुछ और कुछ भिन्न !

घुप्प काला,
समय और इतिहास का भी तो
रंग है,
पल, छन, संवत्, संवत्सर के
अलावा भी
कुछ और कुछ भिन्न !

सुनो कि,
रंग बोलते हैं ।

आवाज़ नहीं होती

एक पत्ता
टूटता है
प्रकृति की विराटता में
आवाज़ नहीं होती ।

एक नदी
गुम होती है
रेत की अनन्तता में
आवाज़ नहीं होती ।

पानी
जम जाता है
हिमांक की अतलता में
आवाज़ नहीं होती ।

जीवन की
अकथ कथा
खुलती है
चुप की आकुलता में
आवाज़ नहीं होती ।

अदब से

खेत में
गर्व से दिप-दिप
खड़ी है
शिशु रोएँवाली
भिंडी

संभलना,
अदब से छूना
हरेपन के उजास को ।

भाषा 

धीरे-धीरे
गुम हुए
कुछ भाषिक संकेत
अर्द्धचँद्राकार बिन्दी,
अर्द्धविराम, एक हद तक
विसर्ग,
शायद हार जाएगी
खड़ी पाई भी
फुलस्टॉप से
जैसे हार रहा है
पोस्टकार्ड
इ-मेल और मोबाइल से ।

एक दिन,
बाहर हो जाएगा
हलन्त् की तरह उपेक्षित
पोस्टमैन
नहीं आएँगे
प्रेम पत्र
राजी-ख़ुशी,
हारी-बीमारी की चिट्ठी

आएँगे बस,
कम्प्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर
विकलांग भाषा में
कुछ तापहीन संदेश ।

बाहर-भीतर

बाहर की बहुत बोलती
लोरझोर,
लाटा-फाँदा करती
भाषा से अलग

बिल्कुल ख़ामोश
साफ, मगर तेज़
जलती-जलाती
भाषा
रहती है मेरे भीतर

एक दिन
आऊँगा
कविता के पास
इसी भाषा के साथ ।

शिक्षक

मार डालते हैं
शेर को
लकड़बग्घे भी मिलकर,
बच जाए तो
तबाह कर देती हैं
गंदी मक्खियाँ
शेर को ।
पूरे स्कूलों पर
कब्ज़ा है
लकड़बग्घों और
मक्खियों का ।

नौकरशाही की
मामूली दहाड़ भी
ले लेती है जान
ग़रीब और निरीह शिक्षक की
अदने से सरपंच, बाबू और
हवलदार की भिनभिनाहट से भी
गिर जाता है
आँसू की तरह
अपनी ही आँख से शिक्षक ।

गा रहे हैं
बच्चे
डरे हुए शिक्षक के साथ
सुबह की प्रार्थना ।

कीर्तन

आओ, आओ आखेटक महाराज
धरती, अम्बर, नदी, सरोवर
सब पर राज जमाओ आप ।

बुद्धिजीवी खोपडि़यों में,
घुस-घुस जाओ
राग-साज, बोली-बानी पर
कस कर लात जमाओ आप ।
आओ-आओ…

हम चाकर हैं, पेट के मारे
आप बनिक हम, बनिज बिचारे
अगिन पेट की खूब जलाकर
अपनी रोटी सेंको आप ।
आओ-आओ…

हम झुके माथ, लुच्ची आशाएँ
टुच्चा जीवन, खोटी तृष्णाएँ
मर्मस्थल पर घात लगाकर
चुन-चुन बाण चलाओ आप ।

आओ-आओ आखेटक महाराज

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