विजय राठौर की रचनाएँ

दण्डकारण्य में माँ

दण्डकारण्य के सुदूर वनांचल में
बसती है माँ दन्तेश्वरी

आजानुबाहु राजा के
पुरखों के संचित पुण्यों से,
साक्षात वरदायिनी माँ की ममता से
अब भी अभिभूत हैं जंगल के चराचर

अपनी न्यूनतम ज़रूरतों के बीच
सल्फ़ी के कुछ घूँट
और कोदों के कुछ दानों से लोग
अब भी बुझाते हैं अपनी प्यास और भूख

पृथ्वी ने उन्हें दे रखी है
हज़ारों नियामतें
सागौन, साल और महुए के साए में
अब भी वे रहते हैं आदमी की तरह

पाशविकता के इस कारुणिक मौसम में
माँ दंतेश्वरी की कृपा से।

आओ

आओ!
लेकिन न आना
जाने की दुराशा के साथ

आओ!
सम्वाद के लिए
सार्थक भाषा के साथ

आओ!
नए उत्पाद की जीवन्त
अभिलाषा के साथ

आओ!
आ-आकर
मिलने की प्रत्याशा के साथ
तुम आओ!

अयोध्या

लोहे के घने सीख़चों के बीच
बड़ी साँसत में हैं राम!

कारसेवकों की कारगुज़ारियों और
साधुओं के असाध्य प्रपंच में
डूब जाती है उनकी कारुणिक चीख़

राजनीतिक चीत्कारों के शोर में
कौन सुनेगा उनका आर्त स्वर

ठीक उसी तरह जैसे, कोमल-कांत नारियाँ
झोंक दी जाती हैं धधकती आग में
सती में तब्दील करने

भजनों की कर्कश आवाज़ों के मध्य
कोई नहीं सुनता
मर्यादा पुरुषोत्तम का आर्तनाद
कोई नहीं सुनता!

दूसरों पर भरोसा करके

ईश्वर का दिया हुआ
सब कुछ है मेरे पास
पैनी, दूरदृष्टि सम्पन्न
पारदर्शी आँखें
पूरी सृष्टि को अपने घेरे में क़ैद करने को
आतुर ताक़तवर हाथ
गन्तव्य को चीन्हते क्षमतावान पाँव
कम्प्यूटरीकृत दिमाग़
और असीम सम्भावनाओं भरी
हाथ की लकीरें

सब करने में समर्थ हूँ मैं
पर ख़ुद को कमज़ोर करता हूँ
दूसरों पर भरोसा करके।

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