विजेन्द्र की रचनाएँ

एक प्रेम कविता 

प्यार को भी देखता हूँ
इन्ही मासूम रंगों में
तेज़, सुर्ख़, हल्के गुलाबी
न हों, न हों, न हों
धूप में तपे चेहरे की तरह
देखता हूँ तुम्हें हर बार
काले रंग की धारियों में
कौन सा क्षण
दहशत खाया हुआ
प्रजनन को आतुर
पक्षी की तड़प की तरह
बहुत कुछ राख़ हो चुका जीवन
बेहद कमज़ोर क्षणो में
दिया है एहसास उसने
हुआ है मेरा चित्त उज्ज्वल
सृजन को हर लम्हा
सच के लिए झेले है
पैने सींग और नाख़ून .तीखे
अपनों ने ही भुलाया है मुझे
ज़िन्दा रहा हूँ कविता और प्यार के बल पर
मोक्ष नही, मोक्ष-धाम नही
चाहा है सदा रचना कर्म ही
क्यों लगने लगा है व्यर्थ
पका श्रीफल भी
जितना हुआ हूँ दूर जीवन से,
वृक्षों से, जल से, हवा से
खोया है उल्लास मै ने
दिखाई दे रहा दूर तक
बरसता पतझड़
सूखी टहनियों को खरोंचता
भीगा रुदन हर पल
लगने लगे है तुम्हारे उपदेश झूठे
पर नहीं ऊबा मन
कविता और प्रेम से ।

खिले हुए हैं नन्हें-नन्हें फूल हज़ारों पीले

खिले हुए हैं नन्हें-नन्हें फूल हज़ारों पीले
धरती पर, जो सूखी है। नहीं देख पाता
उनको कोई। नाम नहीं है उनका। गाता
फिरता जिसको जग में। डंठल हैं जिनके नीले।

सड़क किनारे जहाँ कहीं भी बित्ते भर बची
हुई धरती उर्वर वहीं फूटते देखा है
उनको। पिचे पाँव से ऐसा ही लेखा है
बहुतों का। निर्जन में सन्नाटा धाँधली मची

हुई है ऐसी अन्दर जो रह-रह करती है
विचलित मुझको। उस नद्दी की मंद-मंथर गति है
जिसे सम्भाले आया हूँ सदियों से। यति है
कविता में निस्सीम, अतुल, व्यापक लय रचती है

रूपाकार अनेक सबल भावों के बल पर
हृदय में लिखा नाम है तेरा, मेरा जल पर।

तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो बंधन जंज़ीरों के जो 

तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो बन्धन ज़ंजीरों के जो
तुमको कसे हुए हैं सदियों से। अब उनको
तो़ड़ो। मुक्ति नहीं जो मिली हुई है, तोड़ो
कसकर ज़ड़ आधारों को। उन जलधाराओं

को मोड़ो जो दिशाहीन बहती मैदानों
में। निर्धूम आँच में तपकर ही कुन्दन बनता
है कच्चा सोना। मरुथल में नित जो खिलता
है अलख रोहिड़ा। हीरा छिपा हुआ खानों

में भीतर। चट्टानें तुमने तोड़ी हैं अपने
ही बल पर। मार्ग बनाए हैं पर्वत पर चलकर।
न हों निशान पाँवों के तो क्या – आगे लखकर
क्षितिज दिखाए हैं। मूर्तित होते हैं सपने।

अग्निपरीक्षा है जीवन – हमको मिला हुआ है
अंकुरित न होगा बीज अन्दर से घुना हुआ है।

दहक रहा है, दहक रहा है, दहक रहा है 

दहक रहा है, दहक रहा है, दहक रहा है
घना अंधेरा अब धरती की अतृप्त कोख में।
सूर्य बुलाता है तुमको, जागो। बहक रहा है
मन मीरासी नित। छोड़ूँ यश-लिप्सा, थोक में

जो मिलती है रंगे होठों से। कहता हूँ
दृढ़ता से जागो, जागो! कुचले ही तृण हों
चाहे वसन्त में, अंदर पके व्रण हों।
क्यों न अभी भी लोहा बनकर ही दहता हूँ।

काट दिए पेड़ हरे। सुखा डाली हैं
बारहमासी नदियाँ। करूँ क्या इसे दोआब
जो उजड़ चुका है पहले ही। नए ख़्वाब
हैं। चाहे विरल सूर्यकांत मणि जो पाली है।

क्या सचमुच चिनगारी अन्दर बुझी हुई है
न दे दिखाई मुझे, रुद्र आँख खुली हुई है।

लोगों का कहना है घर से बाहर ही चल

लोगों का कहना है घर से बाहर ही चल
फिरकर देखो उनिया कैसी है। कितने रंग
भरे हैं चित्रों में। किल-बिल सब गलियाँ हैं तंग
अँधोरियों से भरा जिस्म है। मची है हलचल।

घर में ही बैठे रहने से क्या है, आओ
कभी उधर आओ – प्रेस क्लब, कॉफ़ी हाउस में
भी तो आकर बैठो। पत्रकार, कवि आपस में
मिलते-जुलते हैं। वहाँ का सच भी तो पाओ

जीवन में। क्या करते हो आक-धतूरे की
बातें। उधर क्या धरा खेतों-वेतों में, वह
सब पिछड़ी दुनिया है। अधुनातन है अब यह
थोड़ा ’सिप’ करके देखो। ढलते जीवन की

कली खिलेंगी। हवा उधर की भी खाओ
मिल-जुलकर चलो सभी से, भारी यश पाओ।

तोड़ धरा को ऊपर उठता है हाथ तुम्हारा

तोड़ धरा को ऊपर उठता है हाथ तुम्हारा
कहते हैं अंकुर फूटा है। प्रायः है पर्वत पर
फैल रही हैं शिशु किरणें। वृक्षों के वक्षस्थल पर
खिले दिखे हैं फूल अगिन के। साहस कब हारा

है मैंने। ययपि ऊपर मुरझाए पत्ते, पल्लव दल
लाल हुए हैं। हवा डुलाती भर अभिलाषा
मन में होने को अनुष्ठान जीवन का। आशा
का नभ खुला इखे आगे तक। होता राष्ट्र सबल

यदि जन के मन में – जगता संकल्प बड़ा। अवसान
नहीं है संध्या जीवन का। हुआ और समृद्ध जड़ों
से। गहरे जल का वाहक स्रोत हुआ है। बड़ों
को सब नवते हैं। तिनके पिचते हैं घमासान

में। होता है नाश अशिव का – अभिषेक करेगी
वाणी शिव का। जनशक्ति दमन का प्रतिषेध करेगी।

सावन उतरे

सावन उतरे, भादों आए
सूखे जनपद क्या क्या लाए
खाँसी लाए
माछर लाए
जूड़ी ताप तिजारी लाए
खिले फूल चम्पा के
कुल्ले फूटे संका के
झिर- मिर -झिर- मिर पड़ी फुहारें
साँड खड़ा दलकारे ।

आव न देखे
ताव न देखे
कैसी कुगत हुई मिनख की
अपना आपा ख़ुद ही खोबै ।

पंजा अपना लड़ा रहा हूँ
नहीं जगह देते अभिजन तो
गाड़ा अपना अड़ा रहा हूँ
मुझ को भूख ताप लाए हो
धन्ना को सुख ससाधन लाए हो ।
देख रहा हूँ
तुम आए हो
भरे पेट को
तुम भाये हो ।

जिसने कोदी नींव कमर तक
उसको हर कम्प अलग लाए हो ।
जो भी मिलता फटकन- छटकन
खा लेता हूँ अटकन-बटकन
अपनी आँते सड़ा रहा हूँ
लरने को नित तड़ा रहा हूँ ।

खरपत मारे

छोड़ सरग तुम धरती आओ
रूप
रंग
रस अनुपम पाओ
अपना करम अटल है भाया
खत जो खोया फिर न पाया ।

मानुख चले
तो धरती डोले
सबद अरथ सम
क्रिया बोले ।
जीने की इच्छा प्रबल है
लिखता काल सिहा पटल है ।

बेल की पूँछ
मरोड़ हकारे
अपने बल ही
करपत मारे ।
बीजा फूटल
कल्ला ऊगा
कहता हूँ
पत्थर मूँगा ।

कामना

मैंने हर ढलती साँझ के समय
सदा सूर्योदय की कामना की है
जब सब छोड़ कर चले गए
वृक्ष मेरे मित्र बने रहे
खुली हवा… निरभ्र आकाश में
साँस लेत रहा
निखरी धूप में
फूलों ने अंग खोले
वह सूर्य-बिन्दु भी मुझे दिखाओ… वह नखत-पंख
जब सबसे पहले
मेरे पूर्वजों ने सहसा, अचक
मिट्टी का हरा-स्याह ढेला फेंक कर
दमकता ताँबा पा लिया
मैं हिम, पाषाण, धातु युग के पुनर्जागरण काल से
गुज़र कर यहाँ तक आया हूँ
धातुओं को रूप बदलते पहली बर देखा
ओह… जैसे अग्नि की आत्मा चमक उठी हो
कितनी हैरत में हूँ
कहाँ देख पाऊँगा उन्हें
जो चकमक के हथौड़े से धातु को पीटकर
कुल्हाड़ों के फाल…
कुदालों…बर्छियों में बदल रहे थे
कैसे हरे-भरे वृक्ष जीवाश्म बने
कुछ नष्ट नहीं हुआ
रूप और सौन्दर्य बदले हैं
मुझे खदान में उतरते किसी ने देखा
उस समय तनी रस्सियाँ…दाँतेदार बल्लियाँ
मेरी दोस्त थीं
मृत्यु का सामना थ
नीचे गाढ़े अँधेरे में उम्मीद की तीख़ी कौंध
धुएँ की कड़वी घुटन
नन्हें से तेल के दिए की रोशनी में
अपनी साँसों का ध्रुपद सुना है
पोली चट्टानों के खिसकने से
खनिज जहाँ-के-तहाँ दफ़न हुए
हर बार दानव ने मेरी आत्मा का सौदा किया है
मुझे बँधुआ बना के रखा है
बहुत पुरानी खदानों में
खनिकों की गली ठठरियाँ
बड़े-बड़े खण्डों के नीचे मिली हैं
एक युग डायनासोरों का भी था
लद्धड़ सोच ने उन्हें
प्रकृति के महागर्त में बैठाया
जब चकमक के भण्डार चुके
मैंने हरे-स्याह पत्थर को आँच में तपाया
हर क्रिया में मेरा जन्मोत्सव था
नए क्षितिज, नए द्वार, नई उषा, नया भोर
आँखों ने रोशनी की ज़ुबान सीखी
मेरा हर क़दम आगे पड़ा
आज मैं जिन अदृश्य अणुओं को
बारीक औज़ारों से तोड़ने को बैठा हूँ
उसकी शुरूआत बहुत पहले
कर चुका हूँ
न आँच बुझी है
न हाथ हारा है ।

जो रास्ते थे ही नहीं

जो रास्ते थे ही नहीं
मैं उन ही पर
बराबर चलता रहा
 
बाद में लगा वे रास्ते ही हैं
जो वनों ने ढँक लिए थे
ओह ! वे रास्ते ही हैं
कहाँ, किधर, कैसे —
वे किस मंज़िल तक पहुँचेंगे
नहीं जानता

हर मोड़ पर राख की ढेरियाँ थी
सूर्यास्त की बुझी किरनें
उनमे सुनी सिसकियाँ
कराहटें अबूझ
लेकिन वहाँ मुझे रुकने नहीं दिया गया
 
चाँद अब नहीं दीखता
वह कविता से भी गायब है
सूर्योदय -सूर्यास्त
अब बहुमंज़िली इमारतें
देखने ही नहीं देती
 
हर समय एक अजाने वक़्त की
चौहद्दियों में क़ैद हूँ
कोरोना ने इतना कमज़ोर
बना दिया है
 
वह वसन्त भी नहीं
जो हर नई फुनग को
चूमने को ललकता था
आकाश को भी मैंने नापा
हवा की गति भी जानी
धूप की तपिश में
फलों को पकते देखा
हर चीज़ सत्य होकर भी
स्वप्न का आयतन ही थी

धिक्कारों से पस्त होकर
जाने कितने भीगते वनों में
भटकता रहा
वह कोई वक़्त नहीं था
जब मैंने अपने इरादे तय किए
और उन्हें बदला
फिर तय किए
फिर बदला
 
दूसरे समझते रहे
मैं निराश हूँ
जबकि मेरा पथरीला रिक्त
किसी अदेखी-अनसुनी वर्षा से
सराबोर था ।

धातुओं का गलता सच

हमारा प्यार —
सफ़ेद बादल नहीं
जिसे हवा चाहे-जिधर
उड़ा ले जाए
अब वह धातुओं में गलता सच है
जिसकी बंदिशें
वक्त के सीने पर
उभरी दिखती हैं
जैसे रेत में सफेद जर्रे
और खुले दिल की तरह आसमान में
जाने कितने टिमटिमाते तारे ।

अब मेरे लिए
प्यार एक ऐसा महकता लम्हा है
जो ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक बार
और सिर्फ़ किसी एक को ही
नसीब होता है
इसका रास्ता सीधा-सादा नहीं है
तुम ख़याल रखो
वसन्त के पहले
पतझर आता है
और दरख़्त को
अपनी हर पत्ती उसे
दे देनी पड़ती है ।

यही तो वह खूबी है
जो जड़ें उस से
अपनी घुटन की
कोई शिकायत नहीं करतीं
आगे कोई सीधा रास्ता नहीं है
मोड़ भी नहीं हैं
और सीधी चढ़ने को चट्टानें हैं

तुम शयद नहीं जानती
मौसमों ने हमारे प्यार से
जो अपने डैने रंगे थे
वे अब धुल चुके हैं
यह अभी भी नहीं समझ पाया
यह कील सी क्या चुभ रही है
दर्द मुझे ही सहना है ।

उसके बताने के लिए
मेरे पास न अलफ़ाज़ हैं
और न वह ताक़त
क्योंकि जब भी चाहा कहना
कह ही नहीं पाया
और किस से क्यों कहूँ
जिसे उसमें कोई दिलचस्पी ही नहीं
 
काश ! तुम इसे
समझ पाती
तो तुम्हे अपने ‘होने’ का भी
नया एहसास होता ।

कवि

मेरे लिए कविता रचने का
कोई खास क्षण नहीं ।
मैं कोई गौरय्या नहीं
जो सूर्योदय और सूर्यास्त पर
घौंसले के लिए
चहचहाना शुरू कर दूँ ।

समय ही ऐसा है
कि मैं जीवन की लय बदलूँ-
छंद और रूपक भी
एक मुक्त संवाद-
आत्मीय क्षणों में कविता ही है
जहाँ मैं-
तुम से कुछ छिपाऊँ नहीं।
सुन्दर चीज़ों को अमरता प्राप्त हो
यही मेरी कामना है
जबकि मनुष्य उच्च लक्ष्य के लिए
प्रेरित रहें !

हर बार मुझे तो खोना ही खोना है
क्योंकि कविता को जीवित रखना
कोई आसान काम नहीं
सिवाय जीवन तप के ।

जो कुछ कविता में छूटता है
मैंने चाहा कि उसे
रंग, बुनावट, रेखाओं और दृश्य-बिंबों में
रच सकूँ ।

धरती उर्वर है
हवा उसकी गंध को धारण कर
मेरे लिए वरदार !

गाओ, गाओ-ओ कवि ऐसा,
जिससे टूटे और निराश लोग
जीवन को जीने योग्य समझें ।

हृदय से उमड़े हुए शब्द
आत्मा का उजास कहते हैं ।

शिखर की ओर 

जब भी मैंने देखा
शिखर की ओर
तुमने त्यौंरियाँ बदलीं
जब मैं चढ़ा
तुम ने चट्टानों के खण्ड
मेरी तरफ़ ढकेले ।

कई बार मैं गिरा
और पीछे हटा
कई बार टूटा और रोया
कई बार फिर प्रयत्न किए
कि चट्टानी लहरों का
कर सकूँ सामना ।

समय हर क्षण-
मेरी परीक्षा लेता रहा ।
मेरे पंख कहाँ
जो आकाश में उडूँ
ऊबड़-खाबड़
पृथ्वी चल कर ही
चढूँगा पहाड़ और मँगरियाँ
ओ दैत्य-
हर बार तू मुझे
धकेलेगा नीचे

जीवन ही है सतत् चढना-
और मेरे जीवन में
कभी नहीं हो सकती
अंतिम चढ़ाई ।

टी-पार्टी की शाम

दोस्त ने बड़े जोश से कहा
आज मिस कुसुम की
टी-पार्टी में चलना है न
मैं चुप रहा

उसने फिर देाहराया
वहाँ बहुत लोग आएँगे
कुछ सुनाएँगे नई बातें
कुछ नाच गाएँगे
मिलना-जुलना होगा
चलोगे न
मैं फिर भी चुप रहा

मन ही मन
ख़ुद को कोसता रहा
अन्दर की चोट में
चोट लगती रही
समय मुझ से उछट के भागेगा
मुझ में भी क्या कभी
सर्वहारा का विद्रोही जागेगा
वहाँ लोग सच को
चटकीले से लिबास से ढकेंगे
लोग पार्टी को कम
मिस कुसुम को लखेंगे

मेरा उससे न राग है
न विराग है
जितना निर्जन
फिर कहता फाग है
प्लास्टिक के फूलों-सी दिखेगी ताज़गी
मिठाइयाँ चखेंगे
लेंगे सिप की बानगी
गहरे रँगे होंगे होठ
अधेड़ों के भी होंगे बाल काले
ऐंठ में मुँह पै पड़ेंगे ताले

कोई ऐसा न होगा
जिसे कविता में रचाऊँ
होंगे जयपुर के मशहूर मर्द
स्त्रियाँ नामचीन
कैसे उनका भीतरला
रंगों में उतारूँ
समझो इसे, समझो मेरे कवि

आधे अधूरे फनकार
जो भी आएँगे-आएँगी
होंगे-होंगी — सब एक जैसे-जैसी
मेरे मनचले मन की
होगी ऐसी तैसी
कीमती लिपिस्टिक की होगी बहार
चेहरे पै बेहद विज्ञापित क्रीम-पाउडर
बोझा ढोने को होंगे कहार
इस्प्रे होगा एकदम नया
होंगे सजावटी नकली गहने
अपने श्रम से ही
कितना सुंदर घोंसला
बनाती है बया

उनमें जीवन का वो कल्पतरु कहाँ
गेहूँ की लामनी करती ग्रामिन
हो जैसे खेत में वहाँ
सब में बजेगा खली कनस्तर
हर जगह दिखेगा
जहाँ-तहाँ उखड़ा पलस्तर
पेड़ों में पेड़ खजूर की होगी बू
हेगा हाथी ताँतों का ढर्रा
एक ढही हवेली की फिजा
उधारी की होंगी मुस्कराहटें बेदम
दिक् का न आँक होगा
न काल का मौसम

कहता है मुझ से मेरा ही अपना कोई
लिखता हूँ कविता खतिहरों को
मजूरों को, लकड़हारों को
बुनकरों सिकलीगरों को
तुम दिखाते हो जिन्हें कविता में
न वे कभी पढ़ पाएँगे
न सुन पाएँगे
दबे हैं इतना अधिक
दबंगों के ही गीत गाएँगे
तुम्हारी किताब भी
ख़रीदेगा कौन
अंत में सराहोगे कपट मन का मौन

मैं जानता हूँ जिन्हें दिखाता हूँ कविता में
उन्हें लगेंगे बदसूरत, गंदे, फूहड़
भड़कीले कपड़ों से जिस्म ढका जा सकता है
नहीं ढक पाओगे आँच और भूभड़

बिल्कुल नई जगह 

यह जगह बिल्कुल नई है
सबसे मज़ेदार बात
मैं यहाँ पहली बार आया हूँ
आस-पास कुछ बुनकर हैं
कुछ लकड़हारे कुछ
धुनकर हैं
अधिक हैं ग़रीब-गुर्बा
न कोई असर है
न रुतबा

फूस की झोपड़ियाँ
बहुतों का फूस उड़ गया है
बहुत है कचरा हर तरफ
अंदर जैसे सबकुछ
सड़ गया है
सोचता रहा
ये भाव मेरे अपने हो जाएँ
गुनता रहा नया रूप पाएँ

कैसे रह लेते हैं
इन अँधेरी कोत कोठरियों में
कैसे उफनता है धन
अँधेरी तिजोरियों में
न ताज़ी हवा है
न खुला-निखरा उजाला
लगता है सब काला-काला
पूरा परिवार गुज़र करता है
मेरे लिए भव्य-भवन भी
कोत पड़ता है

छप्पर के नीचे
मिट्टी की कच्ची दीवारें हैं
बीच-बीच में दरकी
काले विवरों से
झाँकता-सा डर है
ये मौत से भी नहीं डरते
सुकर हैं
सहते हैं जाने कैसे
विषबुझी बीमारियों के डंक
सहते हैं अटल
शतदल को खिलाता है पंक

न होते हैं चल-विचल आघातों से
कठिनाइयों की चट्टानें टूट-टूट
गिरती हैं उन पर
न बदलते हैं इरादे
आगे लड़ने के
मैं तनिक असुविधा में
लगता हूँ हाँफने
थोड़े से शीत में काँपने

क्या कभी सोचा है
यह फर्क क्यों है
मेरे खून का रंग
उनसे भिन्न क्यों है?

(दिसम्बर, 2012, जयपुर)

मेरी एक और धरती 

 
मेरी एक और धरती भी है
उपजाऊ
सदा अन्नमय
सुंदर और शान्त ऋतुओं के बीज
जहाँ होती हैं अँधेरे की
सघन छायाएँ विश्रान्त
हिलती हैं टहनियाँ
समय की अतुकान्त
टपकती हैं बूँदें अरुणोदय की
पवित्र निष्काम

घास के हरे तिनकों पर
अशा का मत करो कभी तिरस्कार
कैसे हो गए हैं वन
उदास धुँधलके भरे
बिना बिरखा के
मेरे भीतर है
एक और क्षितिज
तुम्हारी कामकाजी आँखों से ओझल

अभी-अभी हुआ है
उदित इंद्रधनु
अंकुरित बिरवों को छूता हुआ
कभी नहीं देखा तुम्हारी तरह
पेड़ को उदास
फूलों के झरन पर भी
वह रहता है मेरी ओर विहँसता
अगले दिन की खिलावट से
क्यों परेशान है अँधेरा

पोदनी चिड़ियाँ
तितलियाँ
मधुमक्खियाँ
ले जाती हैं फूलों को पराग
बिना पूछे ही पेड़ से
शब्द के जन्म से ही
पैदा हुई है आँच वाणी की
बिजली की कौंध से
थरथराती है हवा

अदेह हँसी की गूँजों में भी
छिपा रहता है
दर्द का उफनता लहरा
क्या करूँगा देख कर
अपनी परछाई गँदले पानी में ।

(दिस

सीप

अन्त की ललौंही लहक में
छिपी हे सीप-छवि
कितनी तरंग-मालाएँ चली गईं
उसे छोड़ कर निर्जन तट पर
दिक् एक स्थिति है
एक बंदिश
एक सूरत
मेरे अंकुरित हो कर उगने की

दिन की खिली पँखुड़ी ने
मुझे जगाया बरौनियों पै छू कर
गुड़हल के फूल की छवि से जाना
पूरा खिलने को चाहिए निरभ्र-समय
सुने हैं मैंने फुँफकारते सागर तट पर
लहरों के विषधर
चट्टानी तटों पर छूटा पड़ा
अँधेरे का टूटा जाल

डर का ठण्डा पत्थर हुआ है और सख्त
ऋतुएँ जो छोड़ आईं पीछे अपनी परछाएँ
वह मेरा अतीत नहीं
वह भरा है असंख्य निष्कंप रुदन से
उनके थके-हारे गान से
इस टहनी से उड़ कर अभी अभी जो पिण्डुक
गई है घने झुरमुट में
छोड़ गई है धूप के बीज उगने को

संगीत की मंजरियाँ गमकती हैं
अँधेरे कोनों में
कितना गहरा है नासूर
उसकी पीड़ा की गहनतम आँच
संशय का जहर खाता है
मेरे शतदल को

ओह कैसे भूल पाऊँगा
देखा जो अरुणोदय अरावली के पीछे
रक्त परिधान पहनने को आतुर !

(दिसम्बर, 2012, जयपुर)

हर नई फुनग

हर नई फुनग
पुराने पत्ते से बेहतर नहीं होती

मेरी आँखें बदल जाती हैं
उँगलियों की बंदिश भी
कान पकड़ते हैं ध्वनियाँ
अपनी तरह
विषबुझी लपटों से गुज़र कर ही
कविता का स्थापत्य उभरा है

भावों के मेहराब
बिंबों के बहिर्मुख गवाक्ष
जो लगता है विनम्र
सफ़ेद कपड़ों से
मंद-मंद मुस्कान से सहोदर
नेजे छिपे होते हैं मुठ्ठियों में

दाँत और नाख़ून भले न हों मेरे से
दिल होता है भूखे भेड़िए का
क्या तुमने देखा है ख़ून से बना गारा
काँपती हुई धरती के वक्ष पै
माथे के पसीने में दमकती अन्न की आभा
तुम तो हो लाखों-करोड़ों-करोड़
फिर क्यों मुठ्ठी भर
बना देते हैं तुम्हें गूँगा, बहरा और अपंग

मैं सहता रहूँगा तुम्हारे आघात
जब तक मेरी जड़ें मुझे न छोड़ें
तुम्हें देखने न दूँगा अपने आँसू
पत्थर पर उकेरे गए रेखाचित्रों में
तुम्हें दिखने लगेंगी
अपनी मृत्यु की सुर्ख जीभें

जिन हड्डियों पर खड़ी है
यह भव्य इमारत
सुनो उसमें कराहटों की साँसें
जीवन के मुरझाए पत्तों की झरन

(दिसम्बर, 2012, जयपुर)

 

 

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