विद्यावती कोकिल की रचनाएँ

मुझको तेरी अस्ति छू गई 

मुझको तेरी अस्ति छू गई है
अब न भार से विथकित होती हूँ
अब न ताप से विगलित होती हूँ
अब न शाप से विचलित होती हूँ
जैसे सब स्वीकार बन गया हो।
मुझको तेरी अस्ति छू गई है।

पर्वत का हित मुझको जड़ न बनाता
प्रकृति हृदय का तम न मुझको ढँक पाता
आज उदधि का ज्वार न मुझे डुबोता
जैसे सब शृंगार बन गया हो।
मुझको तेरी अस्ति छू गई है।

दरिद्रता का यह मतवाला नर्तन
पीड़ाओं का उसमें आशिष-वर्षन
तेरी चितवन का जो मूक प्रदर्शन
तेरी मुख-अनुहार बन गया हो।
मुझको तेरी अस्ति छू गई है।

कौन गाता जा रहा है 

कौन गाता जा रहा है?
मौनता को शब्द देकर
शब्द में जीवन सँजोकर
कौन बन्दी भावना के
पर लगाता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?

घोर तम में जी रहे जो
घाव पर भी घाव लेकर
कौन मति के इन अपंगों
को चलाता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?

कौन बिछुड़े मन मिलाता
और उजड़े घर बसाता
संकुचित परिवार का
नाता बढ़ाता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?

मृत्तिका में आज फिर
निर्माण का सन्देश भर कर
खंडहरों के गिरे साहस
को उठाता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?

फटा बनकर ज्योति-स्रावक
जोकि हिमगिरी की शिखा-सा
कौन गंगाधर-सा
अविरोध बहता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?

निंदिया बहुत ललन को प्यारी

अपने प्राणों को दीपक कर, जीवन को कर बाती,
सिरहाने बैठी-बैठी हूं कब से उसे जगाती,
भभक उठी है छाती मेरी, आंखें हैं कुछ भारी।
निंदिया बहुत ललन को प्यारी।
कभी हंसाने से न हंसा वह ऐसा असमझ भोरा,
सोते-सोते हंसा नींद में, मेरा कौन निहोरा,
प्रतिदिन मन मारे रह जाती कितनी उत्सुकता री।
निंदिया बहुत ललन को प्यारी।
कौन कथा कहकर न जाने परियां उसे हंसातीं,
मेरी कथा लड़खड़ाती-सी चुंबन में रह जाती।
मैं रह जाती हूं कहने को मन ही मन कुछ हारी।
निंदिया बहुत ललन को प्यारी।

चिड़ियाँ क्यों उड़ जाती हैं 

मुझको आता हुआ देखकर
चिड़ियाँ क्यों उड़ जाती हैं?

मेरे सींचे हुए आम की
इन बौराई डालों पर,
कठिन गगन-यात्रा से थककर
पहर-पहर सुस्ताती हैं।

मेरे कर से मेवा-मिश्री
लेने में शरमा जातीं,
स्वयं उतरकर रूखा-सूखा
दाना चुगने आती हैं।

मेरे मखमल के गद्दों से-
है कितना वैराग्य उन्हें,
पत्तों के मचान पर बैठी
पर दिन-दिन भर गाती हैं।

सोने के सुखमय पिंजरे पर
आता उनको मोह नहीं,
दिन भर तिनके बीन घोंसला
अपना दूर बनाती हैं।

यहीं पेड़ के नीचे अपनी
शाला नित्य लगाऊँगा,
ताकूँगा गूँगे फूलों पर
क्यों इतना पतियाती हैं!

-साभार: बालसखा, मई 1940, प्रथम पृष्ठ

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