विनय सिद्धार्थ

कहाँ हो सुदर्शन चक्रधारी

उन्होंने मासूमों की ज़िन्दगी बेकार कर डाला।
उन निर्दोषों पर चाकुओं से वार कर डाला।

गिरे इतना गिरे वह कि हम सोच न पाए,
कि उन्होंने दरिंदगी की हद को भी पार कर डाला।

न मिलती शान्ति पृथ्वी पर चाहे जिधर जाओ।
कहाँ हो सुदर्शन चक्रधारी पृथ्वी पर उतर आओ।

टिप्पणी कर-कर मजा वह नीच लेते हैं।
सभी यह देख करके भी आँखे मीच लेते हैं।

इन लोगों ने शरीफों का जीना दुष्वार कर रखा,
चलते हुए सड़कों पर दुपट्टा खींच लेते हैं।

है अधर्म फैला पृथ्वी पर आ करके इसको मिटाओ।
कहाँ हो सुदर्शन चक्रधारी पृथ्वी पर उतर आओ।

था जब एक दु: शासन पृथ्वी पर तब जल्दी चले आये।
अब फैले हैं जो लाखों में तो हो क्यों देर लगाए।

दिन प्रतिदिन यहाँ राक्षस राज बढ़ता है,
कहीं ऐसा न हो भगवन अधर्म का राज छा जाए।

इन सबका नाश कर भगवन सभी की लाज बचाओ।
कहाँ हो सुदर्शन चक्रधारी पृथ्वी पर उतर आओ।

ओ गंगा

ओ गंगा तट की भोर सुनहरी,
स्वर्ण वर्ण बरसाने वाली।
शीतल बाँहे फैला करके,
सबको पास बुलाने वाली।
तन्हा को भी पास बिठाकर,
तुम खुशियों से भर देती हो।

अरे! बताओ, ऐसा भी क्या जादू टोना कर देती हो।

सूर्य देव का आलिंगन कर,
जब तुम लाली बरसाती हो।
सही बतायें! यार कसम से
दिल पर मेरे छा जाती हो।
क्यों इतना तुम महका करती?
क्या केसर से नहा के आती?
या फिर कोई तरल सुगन्धित
तन पर तुम अपने छिड़काती।
आते ही तुम मन को मेरे,
मधुरिम गंधों से भर देती हो।
अरे! बताओ, ऐसा भी क्या जादू टोना कर देती हो।

अच्छा छोड़ो! यह बतलाओ,
लटें क्यों अपनी बिखराती हो।
सारे जग को मोह लिया है
और अभी तुम क्या चाहती हो।
तुम भी न, बहुत हो नटखट,
सारे जग को बहकाती हो!
अरे बताओ हमसे भी।

क्यों इतना तुम शरमाती हो!

चिंताओं को दूर भगाकर शांतिमयी एक घर देती हो।
अरे! बताओ, ऐसा भी क्या जादू टोना कर देती हो।
कुछ भी हो…लेकिन तुम इंसानों से तो अच्छी हो।
तन के गोरे मन के काले शैतानों से तो अच्छी हो।
कुछ यादों के स्वर्णिम तन पर
चन्दन लेप मला देती हो।
एक प्रभावहीन न होता,
दूजा मन्त्र चला देती हो।
कुछ अतीत के सुन्दर लम्हों से
तुम मन को भर देती हो।

अरे! बताओ, ऐसा भी क्या जादू टोना कर देती हो।
अरे! बताओ, ऐसा भी क्या जादू टोना कर देती हो।

लिखो कि तुममें क्षमताएँ हैं

तुम लिखो कि तुममें क्षमताएँ हैं।
लिखो कि तुममें शक्ति अपार है।
लिखो प्रबल तुम चट्टानों सी,
लिखो समय की भी पुकार है।
लिखो वर्ण तुम धवल चाँदनी,
लिखो सूर्य धूमिल हो जाये।
लिखो कि जो भी घटित हो रहा,

लिखो काल की चिर गाथायें।
लिखो कि दुनिया शैतानों की,
सहज मनुजता का शिकार है।
लिखो कि तुममें क्षमताएँ हैं।
लिखो कि तुममें शक्ति अपार है

तू बहुत ही खूबसूरत है

कभी थोड़ा हँसाती है,
कभी थोड़ा रुलाती है।
मैं समझूँ किस कदर तुझको,
समझ में भी न आती है।

मगर कुछ याद आता है कि,
रौशनी की ख़ातिर अँधेरे की भी ज़रूरत है।
बहुत ही करीब से देखा है तुझको,
तू बहुत ही खूबसूरत है।

कभी चंचल-सी लगती है,
कभी मासूम लगती है।
कभी लगती गुलाबी सी,
कभी महरून लगती है।

तुझे देखा हर रंगों में,
तेरी अद्भुत-सी सूरत है।
बहुत ही करीब से देखा है तुझको,
तू बहुत ही ख़ूब।

कहीं पर बेवफ़ा भी है,
कहीं पर बावफ़ा भी है।
कहीं तू ख़ुशनुमा लगती,
कहीं मुझसे ख़फ़ा भी है।

हमने देखा है

खामोश निगाहों में हमने हलचल भी पलते देखा है।
पानी से लोगों के हमने हाथ भी जलते देखा है।
बहुत ज़्यादा गुरूर है, उन्हें अपनी रौशनी पर,
मगर बुझते चरागों को, सूरज को ढलते देखा है।
सब कहते हैं नामुमकिन है ऐसा हो नहीं सकता,
मगर दिन में भी छत पर हमने चाँद निकलते देखा है।
मेरे सामने वह कहते हैं कि तुम जान हो मेरी,
दूर जाते ही लोगों को अक्सर बदलते देखा है।
बहुत मुश्किल है “विनय” किसको क्या कहा जाये,
अंधेरों को भी हमने उजाले निगलते देखा है।

उम्मीद-ए-वफ़ा

मानता हूँ जमाना खूँखार बहुत है।
पर ज़िन्दगी भी अपनी लाचार बहुत है।

तीर तमंचा न तलवार चाहिए,
जान लेने के लिए दो लफ्जों का वार बहुत है।

देखा है हँसते हुए मिरी बेबसी पर उनको,
जो कहते थे हमें तुमसे प्यार बहुत है।

किससे करें ‘विनय’ उम्मीद-ए-वफ़ा,
यार ही जब अपने गद्दार बहुत हैं।

वात्सल्य

मन में उमंग लिए पुत्र को वह संग लिए खुशियों के रंग लिए झूमती चली गई
मेले में त्यौहार में ममता कि धार में पुत्र के प्यार में वह डूबती चली गई
थैला वह साथ लिए पुत्र को भी हाथ लिए रुक-रुक बैठ-बैठ घूमती चली गई
सूर्य के प्रचंड को वह कर के खंड-खंड उसे ममता कि छांव में वह चूमती चली गई

पहली मुलाकात

बदली के संग आई वर्षा मृदंग लाई बिजुरी के जैसी अदा भी साथ-साथ में
मनवा में झूम-झूम बिजुरी-सी घूम-घूम इतरा रही थी वह बात बिना बात में
जाने क्या हो गया मैं सपनों में खो गया भीगता देख उसे बरसात में
रात और प्रभात में न अंतर जान पड़े सुधि बुधि खो गई पहली मुलाकात में

जिधर देखो उधर हर राह में

जिधर देखो उधर हर राह में अब लाश जलती है।
यहाँ हर शब्द घायल है कलम भी खूँ उगलती है।
यहाँ मंदिर और मस्जिद में इन्सानियत परेशां है,
मगर वहशत है कि दिल में यहाँ बेख़ौफ़ पलती है।
कब और किसकी कहाँ पर लाश गिर जाए,
पुलिस की गोलियाँ भी तो यहाँ बेफिक्र चलती हैं।
ज़माना है ये पूरा गिरगिटी अन्दाज़ में एकदम,
चलो देखें कहाँ किस रंग में सूरत बदलती है।
बहुत मुश्किल है “विनय” किसको क्या कहा जाये,
यहाँ तो प्यास भी लोगों की बस खूँ से ही बुझती है।

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