विनोद दास की रचनाएँ

ईद मुबारक

ऐसी है ईद
कि नहीं जानता
कहाँ चखूँगा सेवइयाँ

कहूँगा किसे ईद मुबारक

हलक़ में घुमड़ रहा है
और जिनसे मुझे कहना है
चले गए हैं
बहुत दूर

कुछ हैं तो ऐसे
जैसे शोक में शब्द

भरोसे की चिथड़ा कमीज़ से
ढँके रहते हैं
अपनी ज़िल्लत
अपने जख़्म
अपना डर
अपनी बेचैनी

भीतर चुभती रहती है हरदम
नफ़रत की कील
मगर ऑक्सीजन की तरह
मनुष्यता की आवाज़ इतनी कम हो गई है
किसी को उनकी कराह भी सुनाई नहीं देती

इस दुश्वार समय में
छिपाए रखते हैं
अपना नाम
अपना माज़ी
अपनी मीठी ज़ुबान

यह अनायास नहीं है
कि हिन्दुस्तानी बोलते-बोलते
उनकी ज़बान पर
राष्ट्रीय हिन्दी उतर आती है

कहीं भी होता है फ़साद
गिरती है छत
टूटता है रेलपुल
हलफ़ लेकर चीख़ते हैं
मैं हूँ हिन्दुस्तानी
हां हिन्दुस्तानी

ईद की नमाज अता हो चुकी है
बच्चे चहचहा रहे हैं
इठलाकर ले रहे हैं ईदी

अदृश्य सलाख़ों के बीच
हवा में उड़ रही हैं आवाज़
ईद मुबारक ईद मुबारक
ईद मुबारक
जहाँ बधाई कम
अनकहा दुख ज़्यादा है ।

कुजात 

स्वन्त्रता दिवस के उत्तर भोर में एक कविता

आप हमें झट पहचान लेते हैं
अपने ब्रह्म भोज में
पूड़ी-बूंदी के इन्तज़ार में जमीन पर बिछे हम पत्तल हैं
परदेस में काम खोजते छूछे हाथ हैं

ईंटों की तकिया लगाए हुए
सदियों से चली आ रहीं आपकी हम दुत्कार हैं

हम प्रेम की शाश्वत भूख हैं
और आप
घृणा के आदि वंशज हैं

आपकी घृणा
हमारी रुलाई में नमक की तरह छिपी रहती है
और हमारे रक्त में घुलती रहती है धीरे-धीरे

आपके महादेश में
हमारी नागरिकता संविधान के बाहर है
मन्दिर के बाहर पड़े जूतों की तरह

अपनी पीठ पर चावल की बोरी लादे
मैं भूखा चलता वह शख्स हूँ
जिसका नाम विकृत करके हंसना
आपका निशुल्क मनोरंजन है

हमारा जन्म ही निर्वासन है
गाँव के किसी सँकरे-गन्धाते कोने में
और मृत्यु एक अदृश्य हत्या
जिसकी कभी कोई रपट थाने में नहीं लिखी जाती

हमारी टूटी छत से
होती रहती है दिन-रात घिन की बारिश
उठती रहती हैं उजड़े घर से
दुख के कीचड़ में गुँथी हुई सिसकियाँ

कौन लिखता है
हमारी नृशंस इबारत
एक जर्जर संस्कृत की किताब या वह पाखण्डी सूत की डोरी
फ़ारिग़ होने के समय
जिसे कान पर चढ़ाने से हो जाता है आदमी पवित्र

आपकी आखेटक आँखें
हमारे बास मारते घरों में खिले फूलों की ताक़ में रहती हैं
और आपका बेगार न करने पर
खेतों में पड़ी उनकी लाशों के नाखूनों में
आपकी देह से नोची त्वचा मिलती हैं

ओह ! आपको मितली आती है
जब घूरे पर हमारे नंग-धड़ंग बच्चे
सूअरों से लड़-झगड़ कर हगते हैं
और टूटी खाट की आड़ में घर के सामने
हमारी औरतें पेटीकोट उठाकर लघुशंका करती हैं

अच्छा ! आप नज़र फेर लेते हैं
जब गन्दगी के ढेर से मक्खियाँ उड़ाकर
उठा लेते हैं हम खाने का कोई फेंका हुआ टुकड़ा
और आपको कोटिश: धन्यवाद देते हैं

आशा की मैली लालटेन की रोशनी में
कबीर-रैदास के साथ जब हम रोते-गाते हैं
सहसा गुर्राने लगते हैं महाकवि तुलसीदास
पूजहू विप्र साल गुण हीना शूद्र न पूजहु वेद प्रवीना
तब आती है हमारे लिए प्रेमचन्द की क़लम
उनके फटे जूतों के साथ

आप नाराज़ हो गए न !
हमारे सरकारी आरक्षण से आपका मुँह वैसे भी सूजा रहता है
गोया किसी ज़हरीले ततैया ने आपको काट लिया हो
हमारे लिए तमाम गालियाँ आपकी ज़बान से गू की तरह बरसती रहती ही हैं
जबकि हमारी नौकरी की अर्जियाँ अक्सर आपकी फ़ाइल में दबी रहती हैं
फिर रद्द कर दी जाती हैं
योग्य पात्र न मिलने का बहाना बनाकर

इतिहास के नए व्याकरण में
हम हाशिया हैं
फिर भी हमारे ग़रीबख़ाने पर आते हैं जन प्रभु
अपने लाव-लश्कर के साथ
खुले ज़ख़्म पर भिनभिनाती मक्खियों की तरह

धोते हैं साबुन से धुले हमारे पाँव
खाते हैं हमारी रसोई में बैठकर खाना
अनगिनत कैमरे खींचते हैं हमारी तस्वीर
एक क्रूर प्रहसन की तरह

सांस लेना ही ज़िन्दगी नहीं है
यह बोलते समय भर्रा जाती है हमारी आवाज़
फटे तबले की तरह

गहरी नीन्द से जगी आँखें देख रही हैं
छल बल का साज़
हमारा वोट अमीरों का राज
हमारे दुखों की बढ़ती जा रही हैं झुर्रियाँ
हमारी नसों में भरता जा रहा है क्रोध का बारूद

सावधान ! यह कभी भी फट सकता है
मानव बम की तरह

16.08.2020

कोख

वह न तो सिर्फ खट्टी मितली है
न सिर्फ़ सूजे पाँव
न ही स्वाद की नई-नई फ़रमाइश है

वह सृष्टि की पहली ख़ुशी है
और इतनी बड़ी
कि ओढ़नी या पल्लू के पीछे भी
छिप नहीं पाती

उसका उभरा बड़ा पेट
इस कायनात का सबसे सुन्दर दृश्य है

शर्म से झुक जाती हैं मेरी आँखें
इस बड़े पेट के साथ वह फ़र्श पर पोंछा लगा रही है
बाल्टी पर झुकी कपड़े पछीट रही है
चिलचिलाती धूप में
सडक पर गिट्टियाँ कूट रही है

मेरी ग्लानि की कोई सीमा नहीं है
जीवन रचने के क्षण में
वह निराहार तारे गिन रही है

सौरी से बाहर छनकर आती
वह दरअसल पृथ्वी की सबसे करुण कराह है

सन्तान की भूख मिटाने के लिए
अपनी भूख मारने का वह अभ्यास है

बिस्तर पर टट्टी-पेशाब में लथपथ
वह ऐसा रतजगा है
जिसका मूल्य विश्व का कोई बैंक नहीं चुका सकता

ज़िन्दगी के तीसरे दौर में
कीड़े की तरह चेहरे की कुलबुलाती झुर्रियों के बीच
अब जब वह एक हिलती हुई ठोढी भर रह गई है
उसकी औलाद ने उस दन्तहीन पोपली को तज दिया है
केंचुल की तरह

वह उसके ख़त का जवाब नही देता
वह उसे मेले या स्टेशन पर अकेले भटकने के लिए छोड़ देता है
वह उसका मोबाइल नहीं उठाता
ईद दीवाली घर नहीं आता
अपने घर में उसे रखने की जगह
वह बिल्ली या कुत्ते पालता है

वह हवा में गुम उस शब्द-सा है
जो बोलने के बाद वापस लौटकर नहीं आता

पानी का इन्तज़ार करती
वह रेगिस्तान की ख़ाली बाल्टी है
मौत के लिए
माँगती भीख है

उसके पास मीठी लोरी की धुन है
पुरानी पेटी में उसके बचपन की कुछ लंगोटियाँ हैं
उन नन्हें-नन्हें पाँवों की धुँधली याद है
जो कोख में उसको धीरे-धीरे मारते थे
और उसको अनिर्वचनीय खुशी से भर देते थे

छूछे बादल सरीखी पगली सी भटकती
वह एक ऐसी अभागिन है
डॉक्टर ने निकाल दी हो जिसकी कोख
कैंसर के मरीज़ की तरह

वह अक्सर रात के तीसरे प्रहर नींद से उठती है
और अपनी बगल की ख़ाली जगह टटोलने के बाद
रसोई में रोटी बनाने लगती है
उस भूखे बेटे के लिए
जिसने दरवाज़ा खटखटाया था
अभी कुछ देर पहले
उसके सपने में

ख़ुदकुशी

यह पँखों से लटकी हुई पतली गर्दन
ट्रेन पटरियों पर बिखरी क्षत-विक्षत देह
ऊँची इमारत से गिरकर तरबूज-सा फटा सिर
कीटनाशक पीकर नीली हुई लाश
या ब्लेड से कटी हुई हाथ की कोमल कलाइयाँ
पुलिस अपनी प्राथमिकी में चाहे जो कुछ भी लिख ले
मैं इन्हें ख़ुदकुशी मानने को हर्गिज़ तैयार नहीं हूँ ।

आप बिलकुल सही समझ रहे हैं
यह सौ फ़ीसदी हत्या है
हालाँकि यह अपनी तरह से मृतक का प्रतिरोध है
इस बर्बर दुनिया की यातना के खिलाफ़
सफ़ेद कफ़न पहनकर ।

वे कायर थे
या दिमागी तौर से बीमार
यह कहना उनका अपमान होगा
ज़िन्दगी विकल्पहीन है
हर कोई ज़िन्दगी जीना चाहता है भरपूर
वह आदमी हो
मछली हो या तिलचट्टा ।

जीने के लिए आदमी भीख माँगता है
मन्दिर मस्जिद में प्रार्थनाएँ करता है
ढोंगी बाबा फ़कीरों के चरण चूमता है
ग़ुलाम बनकर अपने आतताइयों की जी हज़ूरी करता है
इलाज के लिए घरबार बेचकर
डॉक्टर से ज़िन्दगी के लिए गिड़गिड़ाता है
गुण्डे के कट्टे की डर की छाया में जी लेता है
अपना एक गुर्दा बेच देता है
अपनी जान बचाने के लिए
दूसरे आदमी की हत्या तक कर देता है ।

एक अरब से ज़्यादा की आबादी में
दरअसल उनके लिए न कोई कन्धा था
न ही आगे बढ़ा कोई हाथ
आशा भी छोड़ चुकी थी साथ
वे अपने दुख में इतने अकेले, पराजित और कातर थे
कि ज़िन्दगी की अन्तिम गली में
सिर्फ़ उनके पास बचने के लिए मृत्यु की बस थी ।

वे बच सकते थे
जैसे बच जाती है प्रदूषित हवा में थोड़ी सी ऑक्सीजन
जैसे बच जाता है दवा के बिना सरकारी अस्पताल में मरीज़
जैसे पेट पर लात मारने पर भी बच जाती है
गर्भ में लड़की
जैसे दुख के अन्तरिक्ष में बच जाता है गर्म आँसू ।

फ़र्श की पतली दरारों में चीटियों की तरह
वे इस बेरहम दुनिया में गुज़र-बसर कर लेते
अगर उनके काम माँगते, हाथ दुरदुराये नहीं जाते
गोत्र के चाक़ू से उनके प्रणय की कलाइयाँ चीरी नहीं जातीं
कर्ज़ से लदे किसानों से बैंक यदि उसी भाषा में करता बात
जो उन्हें समझ में आती
बहू लक्ष्मी होती और मोटर साइकिल की फ़रमाइश पूरी न होने पर
उसकी पीठ जलते चिमटे से दागी न जाती

हाँ ! स्थानीय अख़बार के किसी कोने में छपी इस ख़बर पर
कुछ दिन कोहराम होगा
कुछ दिन उनकी छोड़ी हुई दुनिया याद आएगी
याद आएगी कुछ दिन उनकी खुरपी, कंघी, सुरती की डिबिया
याद आएगा उनका चारख़ाने वाला लाल गमछा — घिसे तल्लेवाला जूता
याद आएगा छींटों वाला उसका दुपट्टा
गत्ते के डिब्बे में रखी गुलाबी चूड़ियाँ
सन्दूक में तहाई हुई सुहाग की साड़ी
कॉपी में रखे गुलाब के सूखे फूल
कुछ दिन धुन्धले समूह फोटो में पहचाना जाता रहेगा
जबरन मुस्कराता उनका उदास चेहरा

फिर सब उसी तरह चलने लगेगा
एक किशोरी रच रही होगी
गदोलियों में बेलबूटों वाली मेंहदी
एक युवक भर रहा होगा नौकरी का आवेदन-पत्र
किसान ला रहा होगा मण्डी से नए बीटी बीज
अभिसार की तैयारी के लिए
एक नवविवाहिता काढ़ रही होगी अपने लम्बे उलझे केश

नही होगा तो बस !
किसी के अन्त:करण में
थोड़ी सी ग्लानि न ही कोई अपराधबोध
न ही होगा कोई क्षोभ
न कोई प्रायश्चित
न ही सन्ताप
दुनिया बदलने की बात तो एकदम न होगी

इसी तरह
ख़ुदकुशी के नाम पर
हर दिन हम मारे जाते रहेंगे धीरे-धीरे
और हमें पता तक नहीं चलेगा
क्या सोचा होगा
उसने अपने अन्तिम क्षण में
मैं नहीं जानता
लेकिन मैं सोचता हूँ
कब तक इसी तरह ज़िन्दगी बनी रहेगी प्रतीक्षालय
हमारी स्थगित हत्या के लिए

चाँदी के तार

वह रोज़
एक पुराने संदूक से
नए और तह किये कपड़े निकालती

थोड़ी देर उसे हाथ से सहलाने के बाद
वह सोचती कि इसे उस दिन पहनेगी
फिर उसी संदूक में आहिस्ता से
उन कपड़ों को तहाकर रख देती

जब होती कहीं आस-पड़ोस में शादी
उसको चढ़ आता है बुख़ार
और भयकर दर्द से
उसकी देह ऐंठने लगती

वह सोने से पहले
हर रात देखती एक सजा घोड़ा
जो आकाश से उतरता था
और उसे बहुत दूर ले जाता था

एक दिन
उसने दर्पण में देखे
अपने सिर में कई चाँदी के तार
उस रात घोड़ों के टापों ने
उसे रौंद डाला।

तवा

यह लौटने का वक़्त है

एक औरत इंतज़ार करती है
चूल्हे के पास रखे तवे के साथ

तवा ठंडा है

मैं जब कोई ठंडा तवा देखता हूँ
काँप उठता हूँ
ठंडे तवे के पास फैली है
उदास ख़ामोशी

इस उदास ख़ामोशी से
मैं निपटना चाहता हूँ
तवे को मैं तपता हुआ देखना चाहता हूँ
लेकिन यह चुनौती देता रहता है
मुझे सुबह और शाम
लौटने का वक़्त हो चला है

अभी एक आदमी
कुछ बुदबुदाता आयेगा
एक गंदे झोले के साथ
थककर चूर

आग दहकेगी तवा गरम होगा
पकते हुए आटे की गंध
चारों तरफ़ फैल जायेगी
फिर तवा सो जायेगा
ठंडे चूल्हे के पास
अगले दिन आग में जलने के लिए
बिना किसी पश्चात्ताप

बलात्कृता का हलफ़नामा

नहीं,नहीं,बिल्कुल नहीं
इस समय मैं कत्तई नहीं रोऊँगी
आँसू बहाकर मैं भीगी माचिस नहीं बनना चाहती
अपनी बेतरतीबवार ज़िन्दगी की तरह
मैं कुछ बेतरतीबवार बताना चाहती हूँ

प्यार से नहीं भूल से पैदा हुई संतान के लिए
खतरा अधिकतर आसपास होता है
और इसकी शुरुआत
बहुत पहले मेरे घर से ही हो चुकी थी
अक्षर ज्ञान के पहले से ही
मैं पढ़ने लगी थी नेत्रहीनों की तरह कामातुर स्पर्श
जब मामा चाचा सौतले भाई
रिश्तों की आड़ में बन जाते थे मर्द
जलेबी,लेमनचूस या अन्धेरे के खेलों के खतरों का
मुझे तो क्या
मेरी माँ को भी तब तक पता न चलता
जब तक उल्टियाँ नहीं होतीं
या खून से लथपथ नहीं मिलता मेरा अन्तर्वस्त्र

क्या यह वासना थी
वासना क्या होती है
इतनी अल्पायु में
भला, मैं क्या जानती
जैसे नहीं जानती थी वह पागल स्त्री
जो उभरे बड़े पेट के साथ देश के हर शहर में
किसी चौराहे के पास जूठे पत्तल चाटती हुई मिल ही जाती है

बस ! जब वे छूते
तो लगता कि कोई छिपकली
मेरे अंगों पर रेंग रही है
नितम्बों पर चिकोटियां काट रही हैं चींटियाँ
बस- ट्रेन की भीड़ में
मेले-बाज़ार की धक्का मुक्की में
वे बिलबिलाते तिलचट्टे की तरह मुझे छूते
छूते सरसराते केंचुए की तरह

बलात्कार
सिर्फ़ लिंग से ही नहीं होते
आँखों से भी होते
सृष्टि में सबसे अधिक बलात्कार
कल्पना में होते

इनके अनन्त चेहरे थे
कोई गणित ट्यूटर के वेश में आता
अकवार के बहाने नोचने लगता वक्ष
तो कोई संगीत गुरु तबले की तरह
बजाने लगता मेरी देह
कोई तरक्की का झाँसा देकर
केबिन में चबा लेता होंठ
कोई अभिनेत्री बनाने की लालच देकर
खेलता देह-प्रेम का खेल

बाबा-फ़कीरों की तो बात ही अलग थी
सन्तान सुख देने के बहाने
उतार देता था अंग से पूरे वस्त्र
शौहर के बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगी
अवमानना का मुक़दमा चल जाएगा मुझ पर
न्यायालय भी देता है शौहर को बलात्कार की छूट
जलती सिगरेट के दाग की तरह
मेरी आत्मा पर हैं इनके दंश के इतने पक्के निशान
जो अन्तिम समय मेरी अस्थियों के साथ जाएँगे

ग़रीब-दलित सखियों के बारे में क्या कहूँ
काँपता है कलेजा
ये सखियाँ ऊँची जातियों के लिए हैं नाबदान
फिर भी आम की मुफ़्त चटनी से भी ज़्यादा
उन्हें लगती हैं इनकी देह चटपटी
होती है खेत-खलिहान में रौंदने के लिए केलि बिस्तर
ना- नुकुर या चूँ -चरा करने पर
बन जाती है उनके प्रतिशोध का सामान

आपके किताबी लफ्ज़ों में कहूँ
तो इनकी ख़ामोश चीख़ों से
लिखा जाता है उनके वर्चस्व और पौरुष का इतिहास
गाय से भी कम है
इनका महत्व
वह चाहे घर में झाड़ू-पोछा करती छमिया हो
या फसल काटती धनिया हो
इनकी शिकायत
अक्सर थाने के बाहर छटपटाकर तोड़ देती अपना दम

हुज़्ज़त करने पर
लॉकअप में पिटते हैं नाते रिश्तेदार
मन्द-मन्द घिनौनी मुस्कान के साथ
कचहरी में पूछते वक़ील-जज ऐसे घृणित सवाल
गोया भरी सभा में आईने के सामने
फिर से किया जा रहा हो
शाब्दिक बलात्कार

कोई इन कुलिच्छनों के साथ नहीं आता
ना पंचायत ना राजनैतिक दल
इनके लिए राजधानी की सड़कों पर
कोई मोमबत्ती मार्च भी नहीं निकालता
टीवी अख़बार के संवाददाता
महामहिम या अभिनेता के फ़ोटो शूट में रहते व्यस्त
वे सांसद भी रहतीं चुप
जो संसद में छाती पीटती थी
एक गर्भवती हथिनी के मरने पर

मैं आपको कुछ-कुछ समझने लगी हूँ
आप केवल देखना चाहते हैं
मेरी आँखों में
डर का काँपता पानी
मेरी आज़ादी
आपके डर के भीतर क़ैद है

चाहे मेरी पोशाक हो या नौकरी
या हो स्कूल का बस्ता
मन से शादी
या प्रेम का जिक्र करना
तो मेरे लिए कुफ़्र है
इसके लिए आपकी पंचायतें बाँटती ही रहती हैं
चरित्रहीनता का प्रमाणपत्र
मैं जानती हूँ
शौचालय में मेरी गन्दी-गन्दी तस्वीर बनाकर
गन्दी-गन्दी गालियाँ नवाज़कर
तोड़ना चाहते हैं आप
मेरा मनोबल
अब मैं इस डर के पार चली गई हूँ

वैसे भी आपकी नज़रों में हो गई हूँ अशुद्ध
हालाँकि ऐसी पवित्रता पर मैं थूकती हूँ
दरअसल मेरी योनि
मेरी देह का सबसे पवित्र अंग है
हर माह रक्तस्नान से होता रहता है पवित्र
जहाँ से हुआ है
इस पृथ्वी पर तुम्हारा जन्म

मेरी मौत की प्रतीक्षा करना बेकार है
जीवन बहुत सुन्दर है
मोबाइल के अश्लील विडिओ से बनी
आपकी घटिया सोच के लिए
गले में दुपट्टा बाँधकर नहीं दूँगी अपनी जान

हाँ ! आपके लिए एक और आख़िरी बात
मेरा मन एक किले जैसा दुर्भेध है
जो किसी भी आक्रमण से नहीं जीता जा सकता
लेकिन मासूम है इतना
कि एक सुन्दर फूल पेश करने पर भी हार देता है
अपना सर्वस्व

पारदर्शी किला

यह एक पारदर्शी किला है
घंटी चीख़ती है
रपटता है बीड़ी बुझाकर
बंद कमरे की तरफ़
स्टूल पर बैठा आदमी

घंटी इंतज़ार नहीं कर सकती
कर सकती है नींद हराम
बिगाड़ सकती है जीवन
देर होने पर

इस बंद कमरे में
आख़िर किस पर बहस होती है
अक्सर एक सु्न्दरी होती है वहाँ
एक पेंसिल और छोटी कॉपी के साथ
वे चाय पीते हैं हँसते हैं लगातार
स्टूल पर बैठा आदमी सोचता है
क्या हँसना इतना आसान है

स्टूल पर बैठा आदमी
हँस रहा है
पर उसके हँसने की शक़्ल
रोने से इस क़दर मिलती क्यों है

वह

वह रोज़

एक पुराने संदूक से

नए और तह किए कपड़े निकालती

और सोचती कि इसे उस दिन पहनेगी

थोड़ी देर बाद उसी संदूक में

फिर उन कपड़ों को तहा कर रख देती

जब होती कहीं पास-पड़ोस में शादी

उसे चढ़ आता बुख़ार

और दर्द से

उसकी देह ऎंठने लगती

वह सोने से पहले

हर रात देखती एक सजा घोड़ा

जो आकाश से उतरता था

और उसे दूर ले जाता था

उसने शीशे में देखे एक दिन

अपने सिर में कई पके बाल

उस रात घोड़ों की टापों ने

उसे रौंद डाला।

सिपाही

शायद ही कोई इनसे ख़ुश हो
ख़ुद इनकी अपनी आत्मा भी नहीं

घर में पत्नी नाख़ुश
और बाहर पंसारी
जो उनकी बीवी को उधार देते-देते
आ गया है आजिज़

सबको इनसे शिकायत है
किसी को कम
किसी को ज़्यादा

इन्हें देखकर
वे भी बना लेते हैं अपना विकृत चेहरा
जिनका कभी इनसे साबका नहीं पड़ा
और वे भी
जिनकी सन्तानों को इन्होंने फिरौतीबाज़ों से बचाया

संसार की कोई भी राजसत्ता
इनकी भुजाओं के बिना नहीं चलती
चाहे बीते समय की राजशाही हो
या आज का कथित लोकतंत्र

इनका इतिहास
दासता का आख्यान है

और वर्तमान भी कहाँ कुछ बदला है

ये हिंसा के मज़दूर हैं

महँगाई के विरोध में शांतिपूर्ण रैली हो
जँगल-ज़मीन बचाने की मुहिम हो
या रोज़ी-रोटी के लिए धरना
अफसर को मुआवज़े की अर्जी देनी हो
या अपने हक़ के लिए सड़क पर निकालना हो जुलूस
आँखों पर बान्धे हुए अनुशासन की पट्टी
वे दीवार की तरह हर ज़गह रहते हैं मौजूद

इनके पास इतना भी नहीं होता अवकाश
कि धो सकें बू मारती अपनी पीली बनियाइन
सूराखों भरी जुर्राबें

हुक्म पाते ही हड़बड़ी में
पहन लेते हैं चारख़ाने वाली गीली जांघिया
कसते हैं चमड़े की बेल्ट
पहुँच जाते हैं वहाँ
दुर्भाग्य से जिसे वे कहते हैं
अपनी ड्यूटी

ड्यूटी की हथकड़ियों में बँधे
वे चलाते हैं गोली-डण्डा
मारते हैं पानी की बौछार
छोड़ते है आँसू गैस

वह ड्यूटी पर थके हुए जाते हैं
और थके हुए लौटते हैं घर

जी हाँ ! आप सही सोच रहे हैं
यह अँग्रेज़ों की नहीं, हमारी अपनी पुलिस है
अपने भाई-भतीजे हैं
क़ानून व्यवस्था के नाम पर
पीटते हैं हमें दुश्मन की तरह
जैसे लूटते हैं बेईमान व्यापारी
राष्ट्रवाद के नाम पर

जरा इनकी बचपन की फ़ोटो देखिए

कितनी निर्मल और प्यार से भरी आँखें हैं इनकी
तब कटी पतंगों को लूटने के लिए
वे अदृश्य पक्षी बनकर उड़ते थे
लट्टू पर घुमाते थे सारा संसार
पाठशाला में इब्राहीम की बिरयानी बेहिचक बाँटकर खाते थे
मकई के लम्बे सफ़ेद बाल लगाकर
बनते थे सान्ताक्लॉज़

यह अब कोई रहस्य नहीं है
कि किस तरह बनाया जाता है इन्हें धीरे-धीरे क्रूर
बनाया जाता है धीरे-धीरे भ्रष्ट
थोड़ा हिन्दू-थोड़ा मुसलमान
धीरे-धीरे बनाया जाता है
बांभन ठाकुर यादव लोध पासी बाल्मीकि

धीरे-धीरे वे रह जाते हैं कम पुलिस
मनुष्य तो और भी कम

फ़िलहाल कथित मुजरिमों के
वे वैधानिक सँहारक हैं

इनसे ईमानदारी का आग्रह करना
इनके प्रति हिंसा होगी
इतनी कम मिलती है पगार

बेईमानी इनके लिए सबसे बड़ी नैतिकता है

वे अक्सर मुफ़्त चाय पीते हैं
और बदले में
होटल में बालश्रम करते बच्चे को देखकर
आँखें मून्द लेते हैं

वे अक्सर ऑटों में मुफ़्त बैठते हैं
और ऑटो चालक को
ज़्यादा सवारी बैठने की छूट देते हैं

असमय बूढ़ी हो गई इनकी बेटी से
कोई जल्दी शादी नहीं करना चाहता
कोई जल्दी अपना मकान इनको किराये पर नहीं देना चाहता

कॉलेज में उसकी मीठी फब्तियों पर
जो लड़की बिन्दास उसे कभी झिड़क देती थी
कभी फिस्स से हँस देती थी उसकी शेरो-शायरी पर
अब सड़क पर अचानक उसे वर्दी में देखकर
थर्रा कर रुन्ध जाती है उसकी आवाज़

समाज में ताक़तवर दिखते
ये हिन्दी फिल्मों के लिए मसखरे हैं

इनके लिए प्रणय एक बुरा सपना है
जैसे कर्फ्यू में खोजना नमक
स्त्रियों के सपनों में वे आते हैं
डर की तरह

जीभ की तरह
पैण्ट से निकली बाहर कमीज़
और बढ़ी तोंद से कमीज़ के खुले बटनों के लिए
इनके परिष्कार की चर्चा काग़ज़ों पर ख़ूब होती है
हालाँकि सत्ता के लिए यह बारहा स्थगित काम है

शासकों की सामन्ती दुनिया में
झूठा आश्वासन ही उनका कथ्य है
और भाषा से खेलना शिल्प

उनके लिए वह जाले भरी किसी गन्दी बैरक में
खूँटी पर टँगी एक पुरानी खाकी वर्दी है
जिस पर जमी धूल दंगों के बाद
कचहरी में संविधान की किताब की तरह
कभी-कभी झाड़ ली जाती है

अपनी पीड़ा के लॉकअप में बन्द
आपकी शरीफ़ ज़बान में
वह ठुल्ला
नशे की घूँट में घुलाता है हर चिपचिपी शाम
अपनी आत्मा पर लदा अपराधबोध
सौगात में मिली
दिन भर की घृणा और बेहिसाब डँक

लड़खड़ाते हुए
बेसुरी आवाज़ में गुनगुनाता है
पुरानी फ़िल्म का कोई उदास गाना
और घुर्र-घुर्र करते पंखें के नीचे सो जाता है बेसुध
कमर झुकी बीवी के बगल में
मौत की तरह

अपने बेरोज़गार बेटे के लिए
गालियाँ ही उसका प्यार है
अगर्चे रोज़गार के रेगिस्तान में
जब उसका बेटा भरता है सिपाही भर्ती का फॉर्म
वह चिन्दी-चिन्दी कर उसे उड़ा देता है
खिड़की के बाहर
खुली हवा में

साँस रोक कर याद करो भोपाल – 1

देखो देखो भाग रहे हैं लोग
खाँसते खखारते
आँखें मलते साफ़ करते
अपनी छाती दबाये हुये
कुहरे में भाग रहे हैं लोग
न जाने किस ओर
एक-दूसरे से बेख़बर

लोग भाग रहे हैं
और पकड़े नहीं है
किसी का हाथ

क्यों भाग रहे हैं लोग
क्या जल्दी है
आश्चर्य है
उन्होंने ताले भी नहीं लगाये
अपने घरों में
वे सिर्फ भाग रहे है
बेतहाशा छोड़कर होशो-हवास

उनके पास कोई नहीं है सामान

सिर्फ़ हवा है
और पैरों तले ज़मीन
कुछ ही क्षणों में
हवा ने दे दी दग़ा
और वे ख़ाली शीशियों की तरह
लुढ़क गये ज़मीन पर
फड़फड़ाते हुए

उस सुबह
फिर हमारी आँखें ही नहीं
पत्थर, पत्तियाँ और ज़मीन भी गीली थीं

साँस रोक कर याद करो भोपाल – 2

अजीब दृश्य है

इस शहर में चारों तरफ़ आँखें ही आँखें हैं
चलती फिरती
गहरी सुर्ख़ आँखें
या खुली फैली निश्चल आँखें

फैली निश्चल आँखों को देखकर
मुझे लगता है
जैसे वे विनती कर रहे हों
अभी और दुनिया देखने की

थोड़ी दूरी पर
बकरी इस कदर सुन्दर लग रही है
कि मैं अपने आपको रोक नहीं पाता हूँ
मैं उसकी पूँछ छूता हूँ
उसके शरीर में कोई हरकत नहीं होती है
उमेठता हूँ कान
उसके शरीर में कोई हरकत नहीं होती है
मैं अपनी आँखों पर डालता हूँ ज़ोर
और हैरानगी से फेरता हूँ
उसकी त्वचा पर हाथ

उसकी त्वचा
न तो पत्थर की है
और न ही रबड़ की
उसकी त्वचा सिर्फ़ बकरी की त्वचा है
शत प्रतिशत बकरी की त्वचा
सिर्फ़ उसमें वह कंपन नहीं है
जिससे आ जाती
हथेलियों में गर्माहट

डरा हुआ
जब मैं सोचता हूँ
लोगों की आँखें फैली क्यों हैं
वे हिलती-डुलती क्यों नहीं
लोगों को छूने से
मेरी हथेलियों में क्यों नहीं आती गर्माहट

मेरा शरीर झनझनाने लगता है

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