विनोद भारद्वाज की रचनाएँ

रज़ा के रंग

रंगों के जिस जादुई वक्तव्य की तुम
बात करते हो
एक प्राचीन ऋषि की तरह
सफ़ेद रंग में चन्द्रमा की पवित्रता
और हीरे की चमक तुम खोजते हो
मैं उस दुनिया में चुपचाप चिन्तन के लिए
चले जाना चाहता हूँ
लेकिन किसी भयावह सपने की तरह
एक तस्वीर मेरा पीछा कर रही है
बजरंग दल का एक बदरंग योद्धा
जलते हुए शहर में नंगी तलवार लिए
खड़ा है

आउटलुक पत्रिका में उसका कवर छपता है
मेरे भीतर की कोमल भावनाओं की
क़ब्र बनाता हुआ
मैं घबराया हुआ-सा
बदहवास भोपाल स्टेशन पर उतरता हूँ
चारों तरफ़ नगाड़ों का भयंकर शोर है
यह किसका स्वागत किया जा रहा है
कौन राजकुमार
आज स्टेशन पर उतर रहा है
युवकों की एक भीड़
मेरी आत्मा, मेरे शरीर को

कुचलती हुई चली जा रही है
असंख्य फूल-मालाओं के बीच मैं सहमा हुआ
इस भव्य स्वागत की
भयानक यातना से गुजरता हूँ
कौन है यह राजकुमार?
कोई जवाब नहीं मिल पा रहा
धूल में गेंदे के फूल कुचले पड़े हैं
बड़ी देर बाद पता चलता है
आज शहर में यूथ कांग्रेस क्यों इतनी ख़ुश है?
इसने आज क्या पा लिया है?
बजरंग दल के योद्धा क्यों
रक्त से लथपथ
अग्निपथ में धरती के सारे रंगों को ख़त्म कर रहे हैं

इस माहौल में
रज़ा के रंग मुझे बचाते हैं
वे मेरे पास आते हैं
अमीर ख़ान की हंसध्वनि मुझमें
चन्द्रमा की रोशनी भर देती है
बाबा का मैहर बैण्ड मुझे जैसे
किसी लोरी से जगाता है
शहनाई के शिखर पर पहुँचकर
बूढ़े बिस्मिल्लाह ख़ान का
बच्चों जैसा चेहरा मुझे बचाता है
सरोद पर अली अकबर ख़ान का दुर्गेश्वरी
राग मुझमें ताक़त पैदा करता है

हटाओ! मेरे सामने से हटाओ!
उस तस्वीर को
ख़ून को, तलवार को
वह क्यों लगातार और रंगीन और
रसीली होती जा रही है
अपने नेता का स्वागत करने आए
इन युवकों के भयंकर शोर से मुझे बचाओ

रज़ा के रंग
मुझे एक अद्वितीय प्रार्थनाघर में ले जाते हैं
कौन कहता है कि
कला में कोई ताक़त नहीं है
वहशी भीड़ के सामने
यह ताक़त कभी-कभी कमज़ोर होने का
भ्रम ज़रूर पैदा करती है

मुझे ले जाओ
रज़ा के 1948 के कश्मीर में
विभाजन के पहले की उन रसीली
सब्ज़ियों की दुकानों में
रज़ा के राजस्थान में
मध्यप्रदेश के घने जंगलों में
अन्धेरे से डर के बाद सुबह की
प्रशान्ति में

ख़बरदार
मेरा कोई नाम नहीं है
धर्म नहीं है
मेरी प्रार्थना की कोई भाषा नहीं है
सुन्दरता क्या इस दुनिया को बचाएगी?
पर यह सुन्दरता कहाँ है
तुम व्यर्थ में खोज रहे थे इसे ऐश्वर्या राय में

ये रंग बचाएँगे इस दुनिया को
लन्दन में टेट गैलरी में मार्क रोथको की
तस्वीरों के बीच मैं प्रार्थना में झुका हू~म
रज़ा के रंगों का एक संग्रहालय
मुझ जैसे नास्तिक को भक्ति के लिए
प्रेरित कर रहा है
ओ कला की समस्त सुन्दरताओ
इस वहशी भीड़ से मुझे बचाओ
मुझे शर्म आती है यह कहते हुए कि
वे मेरे देश के लोग हैं
तुम मुझे रंगों के और करीब लाओ।

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