विपुल कुमार की रचनाएँ

खेल-खिलौने

जन्म-दिवस पर मिले खिलौने,
मुझको लगते बड़े सलोने।
पास हैं मेरे दो मृगछौने,
ढम-ढम ढोल बजाते बौने।
ठुम्मक-ठुम्मक नाचे बाला,
एक सिपाही पकडे़ भाला।
धुआँ छोड़ता भालू काला,
नाचे बंदर चाबी बाला।
नन्हा पिल्ला प्यारा-प्यारा,
अप्पू हाथी सबसे न्यारा।
छुट्टी में तो ता-रा-रा-रा,
वक्त खेल में बीता सारा।
कहीं पे चलती छुक-छुक रेल,
कहीं दिखाता जोकर खेल।
सबके बीच बढ़ाते मे,
खेल-खिलौने रेलम-पेल।

सर्कस 

एक दिन मैं पापा के साथ
गया देखने सर्कस,
कुछ मत पूछो सर्कस में,
मजा आ गया था बस।
रिंग मास्टर पहले आया
पिंजरा फिर लगवाया,
हाथों में चाबुक लेकर
शेरों का खेल दिखाया।
फिर आई एक लड़की
हिप्पो जी के संग,
हाथी को फुटबाल खेलते
देख हुआ मैं दंग।
भालू जी तो खूब मजे से
चला रहे थे रेल,
तोते जी ने भी दिखलाए
तरह-तरह के खेल।
जोकर ने आते ही कुछ
ऐसा रंग जमाया
अपनी अजब अदा से
सबको खूब हँसाया।
ऊपर लटके झूलों पर कुछ
कलाबाज़ फिर आए,
साँस थम गई सबकी-
कुछ ऐसे करतब दिखलाए!
खत्म हुआ शो सर्कस का-
उठकर घर था जाना,
पर सर्कस कहता थ मानो
दोबारा फिर आना।

साभार: नंदन, अक्तूबर 1996, 30

Share