विमल कुमार की रचनाएँ

दँगा — तीन कविताएँ

एक

एक दिन मैं भी मार दिया जाऊँगा किसी दँगे में

फिर बीस साल बाद ये कहा जाएगा
कि मैं मारा नहीं गया हूँ दँगे में
जैसे भूख से मरने पर
कभी नहीं कहता है जिलाधीश
कि एक आदमी की मृत्यु हुई है
क्योंकि वह भूखा था कई दिनों से

इसलिए जब आएँगे दँगाई मुझे मारने मेरे घर
तो मैं सबसे पहले उनसे यही करूँगा विनती
कि मेरी जान ले लो
पर इसका सबूत ज़रूर देकर जाना तुम
कि मैं दँगे में तुम्हारे हाथो ही मारा गया हूँ
क्योंकि अदालत को दरकार होती है इन चीज़ों की
मेरे मरने की तुम सबूत के एवज़ में
मेरे बच्चे की भी तुम जान ले सकते हो

अब मैं मारे जाने के बाद
इकट्ठा कर रहा हूँ ख़ुद ही सबूत
सबूतों को इकठ्ठा करने में भी
मैं मर गया था

जज साहब
अगर मैं दे सका कोई सबूत
आप यक़ीन तो करेंगे मुझ पर
कि मैं मारा गया हूँ दँगे में ही

अगर आपको फिर भी लगता है
कि मैं मारा नहीं गया हूँ
तो मेरा चेहरा देखिए
क्या किसी ज़िन्दा आदमी का चेहरा
ऐसा ही दीखता है आपको ?

दो

क़ातिलों के कई घर हैं यहाँ
पर यहाँ कोई क़ातिल नहीं है .

क़ातिलों की बस्ती में भी अब कितनी रौशनी है
रौनक भी है उनकी महफ़िल में आजकल

पर तुम देख नहीं सकते किसी क़ातिल को
क़ातिलों को कभी पकड़ भी नहीं सकते हो

क़ातिल अब क़ातिल नहीं रहे
उन्हें तुम क़ातिल भी नहीं कह सकते हो ।

 तीन

मेरे पास अब किसी चीज़ का कोई सबूत नहीं बचा है
बाढ़ में डूबा था मैं एक बार
तो उसका भी कोई सबूत नहीं है मेरे पास
आग जब लगाई गई थी मेरे घर में
तो उसका सबूत भी कहाँ जुटा पाया था मैं
बिना सबूत के मैं नहीं कह सकता
कि मेरी बहन के साथ बलात्कार हुआ ही था
तुम्हारे सामने ही हुए थे ये सारे हादसे मेरी ज़िन्दगी के
फिर भी तुम माँगते हो मुझसे सबूत
मैं भले ही हार जाऊँ हर बार अपना मुक़दमा
पर कम से कम इस बात का सबूत है
कि तुम्हारी तरह मैं कभी बिका नहीं था
पर तुम्हारे पास ढेर सारे सबूत होने के बाद भी
इस बात का सबूत नहीं है
कि तुम्हारे भीतर बचा है अभी भी एक आदमी

आएँगे अमरीका से अच्छे दिन 

आएँगे
अब जल्द ही आएँगे
अच्छे दिन
सीधे अमरीका से आएँगे
दे दिया गया है आर्डर उनका
पिछले दिनों
दौरे पर
एक कम्पनी बना रही है उन्हें
नई तकनीक से
जल्दी ही आएँगे
अच्छे दिन
जापान से होते हुए
फ़्लाइट से आएँगे
इन्दिरा गान्धी एअरपोर्ट पर
उतारा जाएगा उन्हें

गाजे-बाजे के साथ
आएँगे अच्छे दिन
कार्टन में भर-भर कर
ऊपर लगी होगी पन्नी रँग-बिरँगी
गुलाबी फीता भी लगा होगा
शानदार पैकेजिंग में आएँगे
इम्पोर्ट होकर आएँगे
अच्छे दिन
जब एक्सपोर्ट होगी हमारी संस्कृति
तो आएँगे अच्छे दिन
एक दिन ज़रूर
फिर क्या तुम्हें नौकरी मिलेगी
एक बँगला भी मिलेगा
वाई-फ़ाई युक्त जीवन होगा

आएँगे अच्छे दिन
अगर विमान में होती जगह
तो उनके साथ ही आ जाते
लेकिन अब तुम्हारे घर
कुरियर से आएँगे
घर पर रहना आज तुम
घण्टी बजेगी
और एक आदमी तुम्हें करेगा डिलीवर

फिर क्या
बदल जाएगा तुम्हारा जीवन
न्याय ही न्याय होगा
ख़त्म हो जाएँगे अपराध
ग़रीबी मिट जाएगी
दाख़िले में कोई दिक्क़त नहीं होगी
इलाज़ भी हो जाएगा मुफ़्त
बिजली रहेगी दिन-रात
पानी भी चौबीस घण्टे

आएँगे अच्छे दिन
भले ही तुम इन्तज़ार करते-करते मर जाओगे
अदालत का चक्कर लगाते-लगाते बूढ़े हो जाओगे
नौकरी की खोज में बन जाओगे नक्सली
मुसलमान हो तो आतँकवादी कहलाओगे

रोटी के लिए चोरी करना भी सीख जाओगे
पर आएँगे अच्छे दिन
एक दिन याद रखना
बस कम्युनिस्टों की तरह आलोचना करना बन्द कर दो
हर अच्छी शुरुआत की

आएँगे अच्छे दिन
पर सबसे पहले
अख़बार में उसका इश्तहार आएगा
टी० वी० पर होगी उसकी ब्रेकिंग न्यूज़
रात आठ बजे
टक्कर में होगी उस पर एक बड़ी बहस

फिर तुम नहीं कहना
कि अच्छे दिन नहीं आए आजतक
और वो तो सिर्फ़ एक जुमला-भर था
अच्छे दिन इस तरह आएँगे
कि तुम देखते रह जाओगे
और उन्हें ढूँढ़ भी नहीं पाओगे
अछे दिनों के साथ
एक सेल्फ़ी खींचने के लिए, बस, तरस जाओगे

क्या-क्या नहीं सीखा मैंने

क्या-क्या नहीं सीखा था मैंने
चाय बनाते-बनाते
सब से पहले यही सीखा था
मजमे लगाने की कला
फिर सीखी हाथ चमकाकर
बोलने की शैली

चाय बनाते-बनाते ही जाना था मैंने
जब पानी और चीनी में अन्तर है
तो
दो कौमों में भी है बहुत फ़र्क

अलग है भाषा और लिपि
तो वे एक कैसे हो सकते हैं
फिर ये भी सीखा
धर्म की बुनियाद से ही होगा विकास मुल्क़ का
सीखी मैंने चेहरे पर मुखौटे लगाने की कला
यह भी सीखा मैंने
ज़रूरत पड़ने पर गिरगिट की तरह रँग भी बदला जा सकता है

चाय बनाते हुए ही मैंने सीखा उसे कैसे बेचा भी जाता है
फिर पैकेजिंग की कला में निष्णात हो गया
नाम बदलकर उसे बेचने में उस्ताद हो गया

चाय बनाते-बनाते मानवता और ईमानदारी पर भाषण देना भी सीख गया
सीख लिया कि वक़्त पड़ने पर
कैसे अपना उल्लू सीधा किया जाता है
और बहुत कुछ सीखा
जिसकी एक लम्बी फेहरिस्त जारी भी की जा सकती है

चाय बनाते-बनाते देश को बेचने की तरक़ीब भी सीख गया मैं
अमीरों के विकास को
ग़रीबों के विकास की शक़्ल में पेश करना भी सीख गया

चाय बनाते हुए हिन्दी तो सीखी ही
प्रोम्टर पर अँग्रेज़ी पढ़ना भी सीख लिया मैंने
टिकट बाँटने का गुर भी सीखा
सबकुछ सीख लिया मैंने
पर एक चीज़ नहीं सीख पाया
कि जिसके कारण लोग धीरे-धीरे मेरी हकीकत जानने लगे हैं
मेरी कलई अब खुलने लगी है
पर चुनाव जीतने की कला से
मुझे नहीं कर सकता कोई वंचित
सच की तरह झूठ बोलने की महारत से
मैं बदल सकता हूँ इस देश को
जिसकी कल्पना आपने नहीं की होगी कभी
लेकिन जब तक तुम लोग करोगे इन्तज़ार
कि किस तरह उतरता है मेरा जादू
तब तक चाय की चुस्कियों में फैल चुका होगा ज़हर ।

एक जलते हुए शहर की यात्रा 

इस जलते हुए और शीशे की तरह रोज़ थोड़ा पिघलते हुए
इस मरते हुए और मरने से पहले थोड़ा पानी माँगते हुए शहर में
आपका स्वागत है।

किस तरह नुचे हैं तितलियों के पंख यहाँ
किस क़दर कुचली गई है घास पार्कों में
किस तरह ढहाई गई है दीवार
किस क़दर लगाई गई है आग
लूटा गया है यहाँ किस तरह सबका विश्वास
चीख़ते हुए पेड़ों और रोती हुई नदियों वाले शहर में
आपका स्वागत है।

कितनी अच्छी बात है
आप टूटे हुए सपने देखने आए हैं
मासूम बच्चों के आँसू पोंछने आए हैं
विलाप करती स्त्रियों को चुप कराने आए हैं
इस कत्लगाह में लाशों पर फूल खिलाने आए हैं
कौन आता था इस शहर में अब तक
कोई भी तो नहीं
कोई सैलानी
कोई फ़कीर
यही क्या कम है कि आप कम से कम राख के ढेर देखेंगे
उठती हुई लपटें और चिंगारियाँ देखेंगे
बेजुबान गलियों और घायल सड़कों की खामोशियाँ देखेंगे
मण्डराते गिद्धों और मकानों पर बैठी चीलों वाले शहर में
आपका स्वागत है।

इस आधुनिक समय में
आप गहरी असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य देखने आए हैं
क्योंकि यह सब भी अब देखने की चीज़ें हो गए हैं
सीने के अन्दर गहरे ज़ख्मों
और ज़ख्मों पर छिड़़के नमक देखने आए हैं
हमें मालूम है आप किसी की आँखों में चमक देखने आए हैं
आपका स्वागत है।

पोएट्री मिस मैनेजमेंट

कविता क्या है?

शुक्ल जी की तर्ज़ पर
सोच रहा हूँ अव ग्लोबल समय में

पोएट्री क्या है
मैनेजमेंट
या फिर मिस मैनेजमेंट

तभी पास हो गया जी० एस० टी० कल देर रात में
ख़ूब छपी ख़बर अख़बार में
कि यह ऐतिहासिक है
कहा टी० वी० के सामने मंत्री ने
यह तो बिलकुल क्लासिक है

इसी मंत्री ने सेवेन्थ पे कमीशन को भी हिस्टोरिक बताया था
अपनी सरकार को करगिल वार में हेरोइक बताया था

पोएट्री क्या है
मैं सोच ही रहा था
कि दौरा पड़ गया मुझको रास्ते में

करने लगा अजीबोग़रीब हरकतें
लिखने लगा नीद में प्रेमिकाओं को ख़तें

लेकिन एक क्रिटिक ने मुझे आलोचक बता दिया
आई० एन० जी० सी० ऐ० के सभागार में
होम मिनिस्टर के सामने एक बूढ़े लेखक के त्यौहार में
कल्चर मिनिस्टर के पास मंच पर बैठा मैं सोचता रहा

पोएट्री क्या है
मैनेजमेण्ट या मिस मैनेजमेण्ट
कि कुछ भी लिख दूँ
और हो जाऊँ फेमस
बिना किसी सम्वेदना के
निरी बौद्धिकता के
जिसमे असीम सामाजिकता हो
पर क्या यही अब लिटरेचर की वास्तविकता हो

दोष राइटर का नहीं
महिला फ़ाइटर का नहीं
जूरी का है
यानी हिन्दी कहानी के शेरशाह सूरी का है
दरअसल यह साहित्य में एक ट्रम्प कार्ड था

संयोग देखिए, अमरीका में भी एक ट्रम्प था
इलेक्शन में खड़ा था
भारत में भी एक प्रतिभाशाली शख़्स कविता के सेलेकशन में परदे के पीछे खड़ा था

पोएट्री क्या है
केवल खुन्नस तो नहीं
कोई महत्वाकांक्षा तो नहीं
सूचनाओं का रजिस्टर तो नहीं
केवल प्रदर्शन तो नहीं
चर्चित होने के लिए आमरण अनशन तो नहीं
फेसबुक पर सुबह से शाम तक घर्षण तो नहीं

मैं सोच ही रहा था
कि चैनल पर शुरू हो गया था मुक़ाबला
सतीश उपाध्याय आ ही गए थे
हमेशा की तरह विराजमान थे राकेश जी
इस बीच इन्फ़लेशन और बढ़ गया था
रुपया डॉलर के मुक़ाबले और कमज़ोर हो गया था
नीति आयोग की कोई नीति नहीं थी
रचना को देखने की उनकी दृष्टि में कोई स्फीति नहीं थी
क्योंकि समर्थक भी विकराल थे
उसमे महीपाल थे

पोएट्री क्या है
सोच ही रहा था

कि एयरफ़ोर्स का एक विमान लापता हो गया था
राष्ट्रभक्त १७२ फ़ीट तिरंगा लिए खड़े थे उना में
एच० आर० डी० मिनिस्टर अपने गुरु से मिल रहे थे पूना में

पूरा दृश्य मुल्क का पीपली लाइव था
कविता थी इण्टरनेशनल
अब उसका हाइप था
कवि भी झोला छाप नहीं था
बाकायदा आई० आई० एम० का एम० बी० ए० था

पोएर्टी क्या है
अबतक कोई जान नहीं पाया था
गूंगे का गुड़ था
या हाथी की सूँढ़ थी

सबके धारदार तर्क थे
जो अधिक चतुर थे
उनके विचित्र कुतर्क थे
कुछ लोग इस बहस में बहुत सतर्क थे

पोएट्री क्या है
मैं सोच ही रहा था
मैनेजमेण्ट
या मिस मैनेजमेण्ट
या एडिटर का जूरी के साथ निजी अरेंजमेण्ट

लेकिन यह सच है
यह एक निहायत स्त्री विरोधी वक्तव्य था
यह कविता विरोधी बयान भी था
कुण्ठित पुंसत्व से भरा हुआ

अरे भाई एक स्त्री को को लिखने दो
क्यों पीछे पड गए
उसे अभी सीखने तो दो
बहस का स्तर इतना न गिराओ
पोएट्री मैनेजमेण्ट न सही
मिस मैनेजमेण्ट तो न कहो

मिल जाए जब किसी को अवार्ड
तो मान लीजिए
कि रचना महान है

कविता की समझ नहीं आपको
नहीं मिला जो यह पुरस्कार कभी लालटेन छाप को
बन्द करें बहुत हो गया यह प्रलाप
कभी तो कुछ अच्छा भी लिखे आप….

प्रेम केवल आलिंगन नहीं है

प्रेम केवल आलिंगन नहीं है
चुम्बन नहीं हैं वह केवल
ये कहना भी प्रेम नहीं है
कि मैं तुमसे करता हूँ प्रेम

प्रेम तो सिर्फ़ एक स्मृति है
जो उस थोड़ी झुकी हुई बेंच के रूप में है दर्ज
हमारे भीतर
जहाँ कही बैठे थे हम
उन सीढ़ियों की स्मृति के रूप में
जहाँ कहीं बैठकर हमने पी थी चाय कभी
अपने अपने दुःख के बारे में बातें की थी
अपने अपने सुख को भी साझीदार बनाया था

अगर तुम्हे उस प्रेम को फिर से पाना है कहीं
तो जाओ उस बेंच के पास जाओ
जाओ उस घास के पास
उन सीढ़ियों के पास
उस मेज़ और कुर्सी के पास
उस फूल के पास जाओ
जिसे तोड़कर लगाया था कभी तुम्हारे बालों में

कहो — मैं फिर आया हूँ इस बार निपट अकेला

प्रेम केवल स्मृति में नहीं है
वो तो एक दर्द में है जो टीसता है कभी-कभी

प्रेम अगर कहीं जीवित है
तो एक ख़्वाब में है
तमाम नश्वर चीज़ों के बीच

प्रेम दरअसल अमरता में है
किसी तरह की क्षणभंगुरता में नहीं .

मेरे लिए तुम

तुम जब समुद्र से मिलना
तो मेरे लिए एक लहर ले आना

मिलना तुम जब कभी आसमान से
तो एक टुकडा बादल ही मेरे लिए ले ज़रूर ले आना

किसी शाम को फूलों से मिलकर
अपने बालों में उनकी ख़ुशबू मेरे लिए रख लेना

घुटता जा रहा है अब दम इस तरह शहर में
एक ताज़ी हवा का झोंका मेरे लिए ले आना

सोना जब तुम गहरी नींद में
तो एक सपना भी देख लेना चीज़ों को बदलने का

देखना जब चाँद को रात में चमकते हुए
उसका एक अक़्स आँखों में क़ैद कर लेना

सोचता हूँ तुम आख़िर क्या-क्या ले आओगी
सब्ज़ी और राशन के साथ उस फटे हुए झोले में …..

ज़िन्दगी भर मैं उलझा रहा इस कदर
एक चराग भी ख़रीद कर नहीं ला सका
तुम्हारे लिए इस अँधेरे में उजाले के लिए

गवाही

तुम बोलोगी नहीं
सुनोगी नहीं
जो कुछ मुझे कहना था गवाही में
मैंने इस दर्पण को कह दिया है

यही है एकमात्र गवाह
मेरे अपराधों का
पापों का
झूठ का
छल का
इससे बचकर मैं कहाँ जाता
इसलिए मुझे जो कुछ कहना था
मैंने उससे कह दिया है

मैंने अब तक तुमसे
अपने जीवन में कुछ भी नहीं लिया है
तुम्हें मैंने
बिना माँगे अपना प्यार दिया है
झूठ नहीं था उसमें रत्ती भर मिला
सच था, जितना वक़्त मैंने तुम्हारे साथ जीया है

बता दो, मेरा अपराध
फिर देना सज़ा
आख़िर मैंने क्या किया है

रसोईघर ही था मेरा दफ़्तर

रसोई घर ही था मेरा दफ़्तर
सुबह उठ कर
बर्तन धोना
किसी फ़ाईल पर जमी धूल पोछने से अधिक तकलीफ़देह था

सब्ज़ी काटने में उँगलियाँ उसी तरह कट जाती थीं कभी
जिस तरह मेरा बॉस मुझे काट खाने को दौड़ता था ।

इस दफ़्तर में मुझे नहीं थी कोई आज़ादी
खाना भी औरों की पसन्द से बनाना होता था ।
हुक़्म भी चलते थे मुझ पर
डाँट भी पड़ती थी —
आज बहुत तेज़ है नमक दाल में

इस दफ़्तर में धुआँ बहुत था
नहीं था कोई रोशनदान
दिन-रात काम करो
पर नहीं था कोई
इसका कद्रदान

रोज़ आते-जाते
मैं हो गई थी परेशान

रसोईघर ही मेरा दफ़्तर था
जो अल्ल-सुबह खुलता था
तो देर रात बन्द होता था

इसी में जीना था मुझे
इसी में दफ़्न भी होना था,

ये एक ऐसी नौकरी थी
जिसमे मुझे कभी रिटायर नहीं होना था

लेकिन इसमें कोई तनख़्वाह भी नहीं थी मुकरर्र
न कोई नियुक्ति-पत्र
पेंशन में भी
नहीं था नसीब प्रेम
फिर भी धनिए और पराँठे की ख़ुशबू में
याद कर् लेती हूँ तुम्हें

रसोईघर ही मेरा दफ़्तर है
मैं यही मिलती हूँ हर किसी से
पसीने से लथ-पथ ।
गर्मी से परेशान

यही एक झपकी भी ले लेती हूँ
बीच-बीच में कभी-कभी
यहीं एक ख़्वाब भी देख लेती हूँ

इसी रसोई में एक छोटा-सा आसमान भी बनाया है
अपने लिए मैंने
एक कोने में कहीं

उड़ रही हूँ
इसी आसमान पर अब
एक परिन्दे की तरह
चारों तरफ हवा में अपने पंख फैलाए …

मैं तुम्हें जब खोज लूँगा

मैं तुम्हे जब खोज लूँगा
अपने जीवन में कभी
तो ज़रूर चिल्लाऊँगा
कहूँगा —
आर्कीमिडिज की तरह
गली में दौड़ता हुआ

यूरेका….. यूरेका……. यूरेका………….

(कल फेसबुक पर मैंने तुमको देखा )

साथ-साथ 

जैसे मैं तुम्हारे सपने में आता हूँ
वैसे ही तुम भी आती हो मेरे सपने में

वही रंग । वही दृश्य ।
वही बिम्ब । वही विधान ।
वही रात । वही पहर ……वही सब कुछ
हू ब हू

क्या तुम्हें मालूम है

वो कौन-सा सपना
जिसे हम देखते हैं
इस बुरे वक़्त में
साथ-साथ ।

हँसी

उनको जब हँसी आई
तो आती ही चली गई
वे रुके नहीं
दिन रात हँसते रहे
पुरी दुनिया में फ़ैल गई उनकी हँसी

दूर-दूर से लोग आए, उनकी हँसी देखने
एक दिन मेरा लड़का भी गया ।
देर रात वो लौटा
तो उसे ज़ुकाम हो गया
सुबह होते ही वो मर गया ।

बिस्तर पर सात कविताएँ

1
जब तुम रात में
नहीं होती हो बिस्तर पर
चादर और तकिए दौड़ते हैं काटने को मुझको

वे अपने नुकीले दाँतों से
बना देते हैं कई ज़ख़्म
मेरे जिस्म पर

और जब बिस्तर पर रहकर
तुम बातें नहीं करती हो मुझ से
तो मेरे ज़ख़्म और हो जाते हैं गहरे

मैं तो यही चाहता हूँ
तुम बिस्तर पर रहो
हँसते हुए
कि लगे मुझे
एक चाँद हँस रहा है
हमबिस्तर भले ही न हो कभी ज़िन्दगी में

2

बिस्तर भी एक गवाह है
चश्मदीद गवाह
लेकिन नहीं बुलाया जाता
वह अदालत में कभी
कौन सुनता है उसकी गवाही
हमारे तुम्हारे बीच अनबन में

3

जब तुम हो
मेरे साथ बाँहों में
बिस्तर पर
तो मुझे लगता है
एक नदी है
जो बह रही है
मेरे भीतर ।

4

आधी रात को
यह बिस्तर भी पुकारता है
कोई ख़्वाब जगाता है.
कोई राज़ है
मेरी ज़िन्दगी का
ये तुम्हे बताता है ।

5

बिस्तर पर
इतना गुस्सा
झगड़े
ऊँची आवाज़
लो, अब नदी ने मुँह फेर लिया
बहने लगी उल्टी दिशा में

6

बहुत दिन के बाद
हमबिस्तर हुई हो
किसी ख़ुशी से तर हुई हो
उड़ती हुई एक परी हुई हो
बरसात में एक पेड़ सी हरी हुई हो ।

7

बिस्तर पर जब मैंने नदी को नाराज़ पाया
तो उस से माफ़ी माँग ली
नदी जब ख़ुश हुई
तो बिस्तर भी गाने लगा
तकिया भी मुस्कराने लगा
एक अजीब नशा
मुझ पर छाने लगा
मैं नदी में नहाने लगा

नदी और पुल

1.

पुल का एक हिस्सा अतीत में है
तो दूसरा वर्तमान में
और तीसरा भविष्य में
नदी भी डूबी है जितनी अतीत में
उतनी ही वर्तमान में
पर उससे भी कहीं ज्यादा डूबी भविष्य में पुल की तरह

समय की तलवार
दोनों के जिस्मों को काटती है
एक ही तरीके से

2.

पुल ने इतिहास को बनते हुए देखा है
नदी ने भी देखा है इतिहास को बनते हुए
लेकिन अब इतिहास ने दोनों को काफ़ी बदल दिया है
इस बदले हुए इतिहास को
गहरी पीड़ा के साथ रेत और पत्थरों ने देखा है

3.

पुल का अपना इतिहास है
तो नदी का भी अपना इतिहास है
पुल का इतिहास
मनुष्य ने बनाया है
नदी ने अपना इतिहास खुद बनाया है
इसलिए पुल नहीं दौड़ पाता है
किसी नदी की तरह

4.

पुल ने जब नदी को पुकारा
नदी बरसात में ऊपर तक चली आई
उससे मिलने
नदी ने जब पुल को पुकारा
वह चाह कर भी नीचे नहीं उतर सका
उसके दोनों पाँव थे जमे धरती में
पुल की यह बेबसी
उसे अक्सर कचोटती रहती है

5.

पुल आसमान में उड़ना चाहता है
चाहती , नदी भी है
वह दोनों उड़ नहीं पाते
दोनों के पास नहीं है कोई पंख
दोनों आसमान में उड़ती चिड़िया को देखते हैं
दोनों अगले जन्म में
चिड़िया बनना चाहते हैं
इसलिए चिड़िया भी आकर पुल पर बैठती है
और अपनी प्यास बुझाने के लिए नदी पर झुकती है

6.

एक दिन पुल उड़ गया आसमान में
उसने वहीं से चिल्ला कर कहा
बड़ा मज़ा आ रहा है मुझे
एक दिन नदी भी उड़ गई आसमान में
उसने हाथ हिला कर कहा
अब तो बादल मेरे पास है
दरअसल दोनों धरती पर थे
उनके ख्वाब उड़ा कर ले गए थे आसमान में

7.

एक रात पुल नदी पर झुक आया
उसे चूमने लगा
नदी पहले तो कसमसाई
फिर एक रात नदी ने
पुल को बाहों में भर लिया
सिर्फ चन्द्रमा था
उस दिन आसमान में
और जंगल में सियार थे
दोनों के प्रेम के साक्षी

8.

नदी ने पुल को बाहों में भरते हुए कहा
तुम कितने जर्जर हो गए हो
जब भी कोई रेल गुज़रती है तुम्हारे ऊपर से
मेरा सीना काँप उठता है
पुल ने नदी के बालों को छूते हुए कहा
तुम्हारा पानी भी तो सूखता जा रहा है
तुम रेत में धँसती जा रही हो दिन-रात
कैसे पकडूँगा अब मैं ऊपर से तुम्हारा हाथ

9.

नदी पुल के पास और क़रीब और क़रीब
आना चाहती है।
कोई गाना उसके कान में धीरे से गाना चाहती है
जितना बचा है पानी उसमें उसके संग नहाना चाहती है

10.

पुल को भरोसा था
अगर वह एक दिन गिर गया
तो नदी उसे थाम लेगी
नदी को भी यकीन था
पुल उसे दूर बहने नहीं देगा
पानी की हर बूँद को
अपनी अलग कहानी कहने नहीं देगा

11.

पुल के पास अब ढेर सारे सपने हैं
तो नदी के पास भी ख़ूब सारे ख़्वाब
पुल के पास कोई पुराना गीत है
नदी के पास भी कोई दुर्लभ राग

12.

एक दिन सिर्फ़ पुल था
नदी कहीं गायब हो गई थी
एक दिन सिर्फ़ नदी थी
पुल आसपास कहीं नहीं था
दोनों उस दिन अकेले थे
इसलिए अधूरे थे

13.

पुल के नीचे काफी अन्धेरा है
वहाँ अक्सर हत्याएँ होती रहती हैं
नदी के भीतर भी काफ़ी ख़ून है
वहाँ कोई छाया डोलती रहती है
पुल और नदी दिन रात सोचते रहते हैं
उनके जीवन में यह बुरा वक़्त कहाँ से आ गया

14.

पुल के ढेर सारे किस्से हैं
तो नदी के भी ढेर सारे किस्से हैं
पुल और नदी एक दूसरे से पूछते हैं
आख़िर किस्से हमारे लिखता है कौन ?

15.

नदी और पुल का यह पुराना किस्सा है
पता नहीं आखिर किसमें किसका कितना हिस्सा है

16.

नदी जब अपने भीतर झाँकती है
तो उसे शंख , सीपियाँ पत्थर
और मछलियाँ दिखाई देती हैं
पुल जब अपने भीतर झाँकता है
तो उसे किसी का पसीना नज़र आता है
और लोहा बनता रहता है
दोनों का यह अन्त्यावलोकन ही
बचाए हुए है उनकी सुन्दरता

17.

नदी के भीतर से रेल जा रही है
पुल के ऊपर से ट्राम जा रहा है
एक बच्चा पुल पर बैठा कुछ खा रहा है
एक आदमी नदी के किनारे गा रहा है

18.

ट्रेन के सफर में
आदमी सब कुछ भूल जाता है
पर याद रहता है पुल
यदि रहती है नदी जिन्दगी पर
दोनों पीछा करते हैं मनुष्य का मृत्यु तक

अपनी बात कहता हूँ

तुमको पसन्द हो न हो
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ
तुम कहोगी कि रहने का सलीका मुझे नहीं आता

पर जिनको आता
वह आख़िर अपनी कहानी में हमें क्या बताता
तुम कहोगे कि दीवार नहीं है, छत नहीं है
तो फिर घर कहाँ है
लेकिन मैं तो ऐसे ही किसी घर में रहता हूँ

तुमको पसन्द हो न हो
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ

सदियों से कोई दुख-दर्द
अपने भीतर सहता हूँ
नदी की कोई धारा हूँ
पत्थरों को ठेलकर
आगे बढ़ता हूँ

तुमको पसन्द हो न हो
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ।

सपने ख़त्म नहीं हुए

जो काम तुमसे हुए
वो काम मुझसे नहीं हुए
वे हुए कहीं
तो हम कहीं नहीं हुए
चलती रहेगी यह लड़ाई
दर्द कम नहीं हुए
ख़त्म हो रही है ‘दुनिया’
पर सपने ख़त्म नहीं हुए।

दया 

तुम पर बहुत दया आती है मुझे
बाथरूम में उल्टियाँ करने के बाद
अब आलोचना में भी करने लगे हो
मैं देख रहा हूँ
तुम वर्षों से बीमार हो
पीले पड़ गए हो-
खाट पर लेटे-लेटे
तुम किसी डॉक्टर को दिखाते क्यों नहीं
इस बुढ़ापे में
कहो, तो मैं तुम्हें ले चलूँ
एक डॉक्टर है मेरा परिचित
वह तुम्हारा बीमा भी करवा देगा
लड़कियाँ जब छोड़ देती हैं
बूढ़े बाप को
और लड़के ख़याल नहीं करते
तो किसी के साथ ऐसा हो सकता है
ख़ुदा करे
हमें यह दिन देखने को न मिले
मरने से पहले तुम सच कह लेना चाहते हो
पर यह तरीका नहीं है
तुम्हारी अतृप्त कामनाओं ने
तुम्हें बीमार बना दिया है, जिसको देखो
ज़माने ने तीमारदार बना दिया है।

 

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