विवेक तिवारी की रचनाएँ

इस धरती पर

इस धरती पर
किसी जगह
एक रंग-बिरंगी
अनन्त जिजीविषा से परिपूर्ण

कोई खुशबू
कोई मासूमियत
और कोई मुस्कान

जब अपने भीतर की जंजीरों को तोड़कर
मोगरा के फूलों की महक की तरह
दूर-दुर तक फैलती हवाओं
लहरों
और पर्वत श्रेणियों में
बिखरती-लहलहाती चली जाती

तो युग-बोध और काल-चेतना से परे
ह्रदय के भीतर
ठहरे हुए मौसमों
दस्तकों
भावों
और पुरानी आवाजों में
आज भी कुछ ऐसा लगता है
जिसे पूरी उम्र जिया जा सके ।

इस दुनिया में क्षितिज से बहुत

दूर

इस दुनिया में
क्षितिज से बहुत दूर
बसे किसी महानगर में
तुम्हारा सहजता,सौम्यता
और सादगी से
किसी रूह में प्रवेश कर जाना
कोई सपना नहीं
किसी सपनें के
पार देखने जैसा है

और फिर
उन सपनों के पार
दरख़्तों की छायाओं में
खूबसूरती का दीया जलाकर
चमकते लम्हों
गहरे जज़्बातों
और दिल में उमड़ते
ज्वारों के साथ
उन रास्तों पर मंडराती
खुशबू बिखेरती
गुजरती
एक उम्र
वहाँ तक
चली जाती है
जहाँ
आज भी
जमा होते मिलते हैं
तुम्हारी हंसी के
खूबसूरत निशान…।

इस धरती पर किसी जगह

इस धरती पर
किसी जगह
समुद्र की लहरों से
बहुत दूर

जीवन के
हर एक सुख-दुख
दर्द-बेचैनी
और अकेलेपन से बेखबर

प्रेम में सम्मोहित
ह्रदय के पन्नों पर दर्ज

तुम पर लिखी
हर एक कविता
जब तुम्हारे सामनें
फीकी लगने लगती है

तो इस दुनिया की
रंगीनियों को किनारे कर
चारो तरफ हावी होते
तुम्हारे ख्वाबों-खयालों के
ढ़ेरों-सिलसिलो के बीच
कहीं भीतर से ईजाद होती
तुम्हारे मन को
पा लेने की एक चाह

और फिर
इन आँखों में
प्रेम की गहन परछाइयों
और ख्वाबों की
फिसलन भरी नीव पर
तुम्हारी शख्सियत का
गजब सा नशा

शायद
एक सपना
कोई कोरी भावुकता
या उसके अतिरिक्त
खैर जो भी है

पर आज भी
इन युगों के अंतरालों के पार
पुराने नगरों की झूमती हरियाली के बीच
मन तो होता है
तुमसे मिलने का
और कुछ
अधूरे शब्द कहने का ।

शायद दुनिया नहीं जानती

शायद दुनिया नहीं जानती
हिमशिखरों पर रहती
उस राजकुमारी के बारे में

जिसके एक इशारे पर
बहती है हवा
बहता है जल
बदलती हैं ऋतुएं
बदलता है आकाश का रंग

और ये भी नहीं जानती
कि उसकी आँखें
उसकी हंसी
उसका चेहरा
उसके शब्द
और उसकी सादगी
कामना जगाकर
मंत्र-मुग्ध कर देती हैं मुझे

सिर्फ इतना ही नहीं
न जानें
कितने कल्पों,ऋतुओं,संवत्सरों में
गूंजता हुआ
उसको संबोधित
मेरा हर-एक विचार
हर-एक गीत
हर-एक कविता
हर-एक साहित्य
आभूषण है मेरा
उसको सजाने के लिये

हालांकि
उसके खो जाने के
तमाम डरों के बावजूद
उससे बिना-मिले
बिना-कहे
उसकी हर एक भावना से बेखबर
मैने उससे
एक रिश्ता बनाया है
एक-तरफा प्रेम का
जो शायद कभी खत्म नहीं होगा..।

धीमें-धीमें वक्त बीतता जाएगा 

धीमें-धीमें वक्त बीतता जाएगा
और समय तय कर चुकेगा
जीवन की विशाल दूरियां

जीवन के उस मोड़ पर
पता नहीं
कहाँ होगी तुम
शायद चाहकर भी
कोई झलक
कोई आवाज़
कोई खबर न मिले
पर जानता हूँ
कभी भूल नहीं पाउंगा तुम्हें

और डायरी के पन्ने
अपनी हर धड़कन में
भावुकता का सफ़र करते
स्वर लहरियां बिखेरते
जानना तो चाहेंगे ही
तुम्हारे बारे में
और पूछेंगे तो है ही
क्या आज भी

इस वक्त के तकाजे में
इतने वर्षों बाद
तुम्हारी आँखों में
उतनी ही ख़ूबसूरती
उतनी ही रंगत है।

ऐसा नहीं है

ऐसा नहीं है
कभी भूलना नहीं चाहा
हर बार सोचा
हर एक याद मिटा दूँगा
पर हर बार
ये आत्मबल
तुम्हारी यादों के सामने
एक कोरा छल साबित होता
और तुम
किसी सम्मोंहन के
विस्तार,गहराई और ऊँचाई में
इकट्ठा होते सपनों
और उमड़ती संवेदनाओं के बीच
जीती-जागती,हंसती-मुस्कुराती
ज्यों की त्यों दिखायी देती ।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र में /

दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र में
एक औरत लड़ रही है
उनके लिए
जिससे उसका
कोई संपर्क-संबंध नहीं
और जो नियति की नहीं
तानाशाही के भेंट चढ़ गये
सिर्फ इतना ही नहीं
पिछले ग्यारह वर्षों से उसे
दया,करुणा,कसक,मुआवजे,सहानभूति की नहीं
बस इंसाफ की तलाश है

पर सुनो इरोम..
इस व्यवस्था में फैले
अवरोधों,मुश्किलों,आशंकाओं,निराशाओं के घेरे में
उजाला कहीं दिखे न दिखे
पर टूटना नहीं
झुकना नहीं
हटना नहीं
हालांकि इस लोकतन्त्र में
तन्त्र और इंसाफ
तो एक लम्बा इंतजार है

आज कुछ लिख रहा हूँ

आज कुछ लिख रहा हूँ
प्रेम की किसी
बहुत गहरी भावना से वशीभूत होकर

क्या ये प्रेम की पहली कविता है ?
या मेरी जलन का कोई रहस्य ?

आज मुझे दिखती हैं
नदी में ख़ामोश तरंगें
घाटों का सूनापन
मेलों में बिखरी शान्ति
भीड़ों का अकेलापन

पर मेरी इस उदासी से
बहुत खुश है
इस आकाश का चांद

क्योंकि चला जाता है वो
सैकड़ो नदियों,झीलों,झरनों
पर्वतो और नगरों को
पार करते हुए
तुम्हारी छत तक

और बढ़ाकर मेरी बेचैनी
ताकता रहता है तुमको
आहिस्ता-आहिस्ता

और फिर लगता है
तुम्हें और चांद को छोड़कर
सिर्फ मैं ही नहीं
बल्कि ये पूरी सदी उदास है।

सच है प्यार के बाद

सच है
प्यार के बाद
बदलते मौसम की करवटों में
चाहे जितना भी वक्त गुजर जाए
पर मन की भीतरी परतों में
अहसास,उमंगों,स्मृतियों
और सपनों का संसार नहीं बदलता

और शायद यही एक वजह है
हर एक दर्द
बेचैनी
अन्तर्व्यथाओं
अधूरेपन की

पर न जाने कब
ये सब जान पाओगी तुम
………………………………..
और न जाने कब जान पाओगी
कितना चाहा है तुम्हें
कितनी मन्नते मांगी हैं
और ये दिल आज भी
भरा-पड़ा है भावनाओं से
और जीवन के हर-एक मोड़ पर
तुम्हारी ही सबसे ज्यादा जरुरत है

पर जानता हूँ
तुम कभी मिलोगी नहीं

पर फिर भी
इस जीवन की आपाधापी में
एक विशुद्ध प्रेम कि तलाश
और प्रतिबन्धों-रूढ़ियों-मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ाते
हर मौसम में हर लम्हा
हफ्तों
महीनों
सालों
तुम्हें तो पूरी उम्र जीना है ।

सच में कितना ख़ूबसूरत है 

सच में
कितना ख़ूबसूरत है
तुम्हारा नाम
कभी किसी उलझन में
मैं उसे लिखूँ न लिखूँ
पर फूलों में
रंगों में
खुशबू में
सिहरन में
हवाओं के झोंके
तो उसे लिख ही जाते हैं ।

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