विश्वनाथप्रसाद तिवारी की रचनाएँ

मनुष्यता का दुःख 

पहली बार नहीं देखा था इसे बुद्ध ने

इसकी कथा अनन्त है

कोई नहीं कह सका इसे पूरी तरह

कोई नहीं लिख सका संपूर्ण

किसी भी धर्म में, किसी भी पोथी में

अँट नहीं सका यह पूरी तरह

हर रूप में कितने-कितने रूप

कितना-कितना बाहर

और कितना-कितना भीतर

क्या तुम देखने चले हो दुःख

नहीं जाना है किसी भविष्यवक्ता के पास

न अस्पताल न शहर न गाँव न जंगल

जहाँ तुम खड़े हो

देख सकते हो वहीं

पानी की तरह राह बनाता नीचे

और नीचे

आग की तरह लपलपाता

समुद्र-सा फुफकारता दुःख

कोई पंथ कोई संघ

कोई हथियार नहीं

कोई राजा कोई संसद

कोई इश्तिहार नहीं

तुम

हाँ हाँ तुम

सिर्फ़ हथेली से उदह हो

तो चुल्लू भर कम हो सकता है

मनुष्यता का दुःख ।

मंजिल 

सूरज डूब रहा है
और अँधेरा घिरने वाला है

मेरे आगे जो रास्ता है
काँटे बिखरे हैं उस पर
क्या करूँ मैं ?

बचा कर निकल जाऊँ इन्हें, बगल से
या चला जाऊँ छलाँग, इनके पार
क्या करूँ मैं ?

शायद आख़िरी यात्री हूँ
आज की साँझ
संभव है कोई आ रहा हो
मेरे भी बाद
उसे दिखेंगे नहीं अँधेरे में, ये काँटे
क्या करूँ मैं ?

रुक जाऊँ काँटो के पहले
सचेत करने के लिए आने वालों को
या चुन कर हटा दूँ राह से इन्हें
क्या करूँ मैं ?

मेरी मंज़िल दूर है, प्रभु
मगर
क्या यह मेरी मंज़िल नहीं ?

कहाँ देखा है इसे

याद नहीं आता
कहाँ देखा है इसे

प्रेम पत्र लिखते
या शिशु को स्तन पान कराते
कोणार्क या खजुराहो
किन पत्थरों में बहती
यह स्त्रोतस्विनी
किन लहरों पर उड़ते हुए
पहुँची है यहाँ तक

देखा है इसे अफ़वाहों के बीच
जब इसका पेट उठ रहा था ऊपर
और शरीर पीला हो रहा था
जिसे छिपाने की कोशिश में
यह स्वयं हो गई थी अदृश्य
हाथ पसारे मिली थी यह एक दिन
एक अनाम टीसन पर
बूढ़े बाप की ताड़ी के जुगाड़ के लिए

लपलपाती जीभों के बीच
एक दिन पड़ी थी अज्ञात
यह नितम्बवती उरोजवती
चेतनाशून्य सड़क पर

यही है
जो महारथियों के बीच नंगी होती
करती अगिन अस्नान
धरती में समाती रही युगों-युगों से
लोक मर्यादा के लिए

यही है
जिसे इतनी बार देखा है
कि याद नहीं आता
कहाँ देखा है इसे ।

प्रतिबद्धता 

गहराई बहुत थी
झाँक नहीं सकता था भीतर

भागा मैं बाहर
हाँफता हिनहिनाता गाज फेंकता

जाना नहीं था
फिर भी गया

रुकना नहीं था
फिर भी रुका

बोलना नहीं था
फिर भी बोला

झुकना नहीं था
फिर भी झुका

रास्ते थे ख़तरनाक
डरावनी आवाज़ें थीं

निर्मल नहीं था सरोवर
अमराई थी पिंजरे की तरह

सच की ओर देखने की कोशिश ज़रूर की
मगर झुलस गईं बरौनियाँ
मुश्किल था बचना
फिर भी निकल आया
प्रशिक्षित कुत्ते की तरह
आवाजें अकनता
दिशाओं को सूँघता

ऊँचे-ऊँचे विचार उठते थे भीतर
मगर मेरे पाठक !
सोचता हूँ
यदि सचमुच प्रतिबद्ध होता
तो कैसे पूरे कर पाता
जीवन के साठ बरस ?

स्त्री की तीर्थ-यात्रा /

सवेरे सवेरे
उसने बर्तन साफ़ किए
घर-भर के जूठे बर्तन
झाड़ू-पोंछे के बाद
बेटियों को सँवार कर
स्कूल रवाना किया
सबके लिए बनाई चाय

जब वह छोटा बच्चा ज़ोर-ज़ोर रोने लगा
वह बीच में उठी पूजा छोड़कर
उसका सू-सू साफ़ किया

दोपहर भोजन के आख़िरी दौर में
आ गए एक मेहमान
दाल में पानी मिला कर
किया उसने अतिथि-सत्कार
और बैठ गई चटनी के साथ
बची हुई रोटी लेकर

क्षण-भर चाहती थी वह आराम
कि आ गईं बेटियाँ स्कूल से मुरझाई हुईं
उनके टंट-घंट में जुटी
फिर जुटी संझा की रसोई में

रात में सबके बाद खाने बैठी
अबकी रोटी के साथ थी सब्ज़ी भी
जिसे पति ने अपनी रुचि से ख़रीदा था

बिस्तर पर गिरने से पहले
वह अकेले में थोड़ी देर रोई
अपने स्वर्गीय बाबा की याद में

फिर पति की बाँहों में
सोचते-सोचते बेटियों के ब्याह के बारे में
ग़ायब हो गई सपनों की दुनिया में
और नींद में ही पूरी कर ली उसने
सभी तीर्थों की यात्रा ।

आखिर

भूल जाती हैं कितनी दंतकथाएँ
सूख जाती हैं कितनी सदानीराएँ

उड़ जाता है कैसा भी रंग
छूट जाते हैं कैसे भी हिमवंत

खत्म हो जाती है कलम की स्याही
टूट जाती है तानाशाह की तलवार

सह्य हो जाती है कैसी भी पी़ड़ा
कट जाता है कितना भी एकांत

पूँजी

चुटकी भर मिट्टी
चोंच भर पानी
चिलम भर आग
दम भर हवा

पूँजी है यह
खाने
और लेकर
परदेश जाने के लिए।

बेड़ियों के विरुद्ध

(संदर्भ वियतनाम)

वे हमेशा बेरहम होते हैं
दूसरों का आकाश अपनी मुट्ठियों में बंद करने वाले
निचोड़ लेते हैं होंठों की मुस्कान
घनहर खेतों में सुरंगें बिछा देते हैं।

कोई भी नाम दे लो
उनकी व्यवस्था में कोई संवेदना नहीं होती।
तुम भाग्यवान हो जो महसूस कर सकते हो
गो उनकी व्यवस्था सबसे पहले संवेदना को भोथर करती है
फिर धीरे-धीरे जातीय यादों को धुँधली कर देती है।

तुम महसूस कर सकते हो
कि दिन तुम्हारी चमड़ी में
इतना कभी नहीं चुभा था
तुम महसूस कर सकते हो
कि रातें इतनी लंबी कभी नहीं हुई थीं
तुम देख सकते हो इस अँधेरे मौसम में
उफनती नदियों को रेत होते
खामोश पहाड़ों – जंगलों को काँपते
और इसके पहले कि बंद आकाश
धुएँ में घुटने लगे
और इस बदनसीब बस्ती में शोलों की बारिश शुरू हो
तुम चाहो तो नली सीधी कर सकते हो
चाहो तो कविता में साँस ले सकते हो
यह वह समय है
जब तुम इंतजार नहीं कर सकते।
वे एक बर्बर कानून बनाते हैं
स्कूल की जगह खोलते चले जाते हैं
देशी रक्त में विदेशी शराब मिलाकर
हड्डियों से चूसते रहते हैं धरती की संपदाएँ

और एक निश्चित समय के बाद
तुम्हें ऐसी सुनसान पगडंडी पर छोड़ देते हैं
जहाँ कोई विकल्प नहीं होता
ऐसे मौसम में
जब कि मरी हुई आत्माएँ अपना हक माँग रही हों
और बेड़ियाँ बढ़ी आ रही हों जकड़ लेने के लिए
तुम न आत्मसमर्पण कर सकते हो
न आत्महत्या।
और तुम क्या कर सकते हो सिवा इसके
कि झाड़ियों-जंगलों में छिपते रेंगते रहो
पीठ और हथेलियों पर लिए हुए अपनी जिंदगी?

बंदूकों में ढूँढ़ते हैं किसान अपनी अस्मिता
स्त्रियाँ बच्चों की आँखों में टटोलती हैं अपना भविष्य
जवानी के दिन उन्हें याद नहीं आते
बच्चे भूल चुके हैं ककहरे।

हवाबाजों से कहो उनका गणित गलत साबित होगा
इस वक्त कोई भी ग्रह अपनी धुरी पर
सही सलामत नहीं रह सकता
आदमी अपनी धुरी पर दृढ़ हो गया है
और यह वक्त है
तुम वापस कर दो हमारा आकाश
हमारी मिट्टी
हमारी शिनाख्त।

मुझे संतोष है 

बची है धरती में जन्म देने की शक्ति
बचा हई बादलों में भूरा रंग
मुझे संतोष है

बची है लकड़ी में आग
बचा है नींद में स्वप्न
मुझे संतोष है

बच गई हो
ओस की बूँद की तरह
बच्चे की जिद की तरह
मुझमें थोड़ा-सा तुम
मुझे संतोष है।

शब्द के लिए बुरा वक्त

बहुत बुरा वक्त है यह शब्द के लिए

मैं अपने लाल-लाल शब्दों के साथ
पहुँचना चाहता हूँ धमनियों के रक्त तक

मैं अपने उजले-उजले शब्दों के साथ
पहुँचना चाहता हूँ स्तनों के दूध तक

रास्ते में मिलते हैं बटमार
जो शब्दों को कर देते हैं
निष्पंद और बेकार
बहुत बुरा वक्त है यह शब्द के लिए

मैं चाहता हूँ
कि जब मैं कहूँ ‘आग’
तो जलने लगे शहर
जब मैं कहूँ ‘प्यार’
तो बच्चे सटा दें अपने नर्म-नर्म गाल
मेरे होंठों से

कैसे संभव होगा यह
मैं नहीं जानता
मगर मेरे कवि मित्रो
सोचो इस पर
कि कैसे संभव होगा यह

शुरुआत

शुरू करो क ख ग से।
भाषा जो बोलते हैं उनकी है।

बेतों के जंगल में
कुछ भूखे-नंगे लोग
दूसरों के लिए कुर्सियाँ बीन रहे हैं।

तुम क्या होना चाहते थे
और वह क्या है
जिसने तुम्हें वह नहीं होने दिया?

स्त्री बच्चा
रोटी बिस्तर
या और कुछ?

तुम यहाँ जैसे आए थे
क्या वैसे ही रह गए हो?

शुरू करो क ख ग से।
भाषा अर्थहीन हो गई है
लौटो और देखो।
कुछ लोग अब भी खड़े हैं।
लाख ढकेलने के बावजूद
ढहे नहीं हैं।
बता दो पुलिस को
अँधेरे को, सन्नाटे को
अट्टहास करती, मुँह बिराती
मशीनों को, चीजों को
वे अभी हैं,
हैं और ढहे नहीं हैं।

सड़क पर एक लंबा आदमी

आज अचानक दीख गया
सड़क पर एक लंबा आदमी

लोग अपनी-अपनी दुकानों से
उचक-उचक कर घूर रहे थे उसे
बच्चे नाच रहे थे तालियाँ बजाकर

हवलदार फुसफुसा रहा था –
‘हुजूर, हवालात के दरवाजे से भी
ऊँचा है यह आदमी’

मसखरे हिनहिना रहे थे
जहाँपनाह, आप की कुर्सी से भी
बड़ा है यह आदमी

चौराहे का सिपाही आँखें फाड़े देख रहा था
बाप रे, सड़क पर इतना लंबा आदमी !
सीधा तना चल रहा था वह
राजपथ पर दृढ़
विनम्र और बेपरवाह

शहर में आग की तरह फैल गई थी
यह खबर
निकल पड़े थे अपने-अपने घरों से
बौने लोग
चौकन्ने हो गए थे अखबार
सेना कर दी गई थी सतर्क
मंत्रिपरिषद में चल रहा था विचार

एक बुढ़िया
अपने पोते-पोतियों को जुटाकर
दिखा रही थी
कि सतयुग में होते थे
ऐसे ही लंबे आदमी।

भवसागर

इसी में बोना है अमर बीज
इसी में पाना है खोना है प्यार

भवसागर है यह सन्तों का

इसी में ढूँढ़ना है
निकलने का द्वार ।

आखर अनन्त 

मैंने नहीं छोड़े
तानाशाह के जन्मदिन पर पटाखे
मुझे सन्तोष है

मुझे सन्तोष है
मैंने सपने देखे
जो पूरे नहीं हुए

मैंने प्रेम किए इकतरफ़े
मुझे सन्तोष है

मुझे सन्तोष है
मैंने चुराए कुछ अमर बीज
और छींट दिए काग़ज़ पर
आखर अनन्त ।

उन आँखों में

पृथ्वी जल में
जल ज्योति में
ज्योति वायु में
वायु आकाश में
और आकाश
समा गया था
उन आँखों में

आख़िर 

भूल जाती हैं कितनी दन्तकथाएँ
सूख जाती हैं कितनी सदानीराएँ

उड़ जाता है कैसा भी रंग
छूट जाते हैं कैसे भी हिमवंत

ख़त्म हो जाती है क़लम की स्याही
टूट जाती है तानाशाह की तलवार

सह्य हो जाती है कैसी भी पी़ड़ा
कट जाता है कितना भी एकान्त

मुझे सन्तोष है

बची है धरती में जन्म देने की शक्ति
बचा हई बादलों में भूरा रंग
मुझे सन्तोष है

बची है लकड़ी में आग
बचा है नींद में स्वप्न
मुझे सन्तोष है

बच गई हो
ओस की बूंद की तरह
बच्चे की ज़िद की तरह
मुझमें थोड़ा-सा तुम
मुझे सन्तोष है ।

चुनौती

फिर से एक बार ज़िनगी
शुरू करना चाहता हूँ

फिर से इकट्ठे कर रहा हूँ तिनके

यह जो सूखी हुई गुठली से
फूट रहा है अँखुआ
इसी में लटकाऊंगा
मैं अपना संसार

ओ समुद्री तूफ़ानो !
ओ रेतीली आंधियो !
ओ बर्फ़ीली हवाओ !

फिर चुनौती देना चाहता हूँ
तुम्हें इसी डाल से ।

मिट्टी की काया

इसी में बहती है
मन्दाकिनी अलकनन्दा

इसी में चमकते हैं
कैलाश नीलकण्ठ

इसी में खिलते हैं
ब्रह्मकमल

इसी में फड़फड़ाते हैं
मानसर के हंस

मिट्टी की काया है यह

इसी में छिपती है
ब्रह्माण्ड की वेदना।

कैसे लोग थे हम 

गेहूँ की बाली में लगते रहे कीड़े
हम ख़ामोश रहे
सफ़ेद कपड़ों से काँपते रहे गाँव
हम ख़ामोश रहे
समुद्र में तूफ़ान आया
हम ख़ामोश रहे
ज्वालामुखी विस्फोट हुए
हम ख़ामोश रहे
बादलों से आग की वर्षा हुई
हम ख़ामोश रहे
उसने खींच ली म्यान से तलवार
हम ख़ामोश रहे

कैसे लोग थे हम
हमें बोलने की छूट दी गई
हम ख़ामोश रहे ।

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