विश्वरंजन की रचनाएँ

रात की बात

बहुत अंदर छुपा पड़ा हादसों का आंतक
एक जादू-सा जग पड़ता है सहसा
और रात की परछाईयों के साथ करता है नृत्य
एक सूखी बच्ची फिर से रोती है
एक नंगी और और सिकुड़ जाती है पुलिस के नीचे
मंगरू का बूढ़ा बाप चीखता है और
खाँसता है एक तपेदिक खाँसी

गावे लागे द्वीप

बात
छन्दो में हो सकेला ओतना माकूल
दावा जेतना के करेला
ऊँच वर्ग के लोग
बकिर, भारी होला
छन्द जगावल मन के भीतर।
कलम बान्हल
छींटा देहल
आ राह देखल अँगड़ाई के
जिनगी जब जागेला
पर्दा हिले लागे जइसे
दूर भविष्य के घरे।
छिछला होके नदी
राह देवे लागेला
द्वीप के।
पनी के पातर चादर से झाँक
कुछ कहे खातिर
आकुल जइसन ऊ।
पीठ पर लाद कास के जंगल
गुन-गुन-गुन-गुन गावे लागेला द्वीप
खरहा के फुदकन में जइसे
जगे लागेला सपना।
एह सुनसान में
झोंपड़ी बान्ह
रात बितावेवाला
साँप-गोजर से दिन-रात जूझेवाला
जानेला
जिनगी के बहेला बयार

टटात परछाईं

अउरो सब मौसम त दोसरा के नाम बा
बाकिर, अँसुआइल जे, ऊहे हमार ह।
अइसन अन्हरिया चितकबरी बा आँखि में
बासमती चाँदनी उबीछ दीं त कइसे
सूखल बबूल के टटात परछाईं हम
बास उड़ल फुलवा के लाश पड़ल जइसे
गदराइल बेरा त तोहरे दुआर बा
डेउढ़ी विदुराइल जे, ऊहे हमार ह।
सपना के रात बड़ा साजल जे रहे मीत
ईथर के अइसन उड़ गइल बिना कहले
कोढ़िया के काया जस आगे के दिन लागे
सगरे संसार अब लउकेला ढहले
दुनिया में देखे के राग-रंग केतना बा
दर्द से रंगाइल जे, ऊहे हमार ह।

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