शंकरानंद की रचनाएँ

बच्चे की ज़िद

वे कहीं भी रहेंगे तो बोल देंगे
उनका होना
छिप नहीं सकता किसी रहस्य की तरह
किसी जादू की तरह
या किसी भ्रम की तरह

वे इस पृथ्वी पर एक तारा हैं
या उगती हुई धूप
जो तमाम वर्जित जगहों पर पड़ती है
उसी अनुसार बराबर

वे पवित्र ओस हैं पारदर्शी
या किसी भी ऋतु में बारिश का पानी
या नरम हरी घास हैं वे
जिन्हें हर पाबन्दी खल जाती है

वे एक पक्षी हैं
जिन्हें हर बँटवारे से इनकार है और
हर दीवार से घृणा

इस हिंसा द्वेष घृणा और युद्ध से भरी दुनिया में
अब जो आशा है
उन्हीं से है केवल ।

भरोसा

कोई अगर आँख बन्द किए
चल रहा है हाथ पकड़कर
तो उसके रास्ते के पत्थर देखना
सम्भालना गिरने से पहले

जब भी वह कुछ कहे तो सुनना
देखना कि
उसकी आँखें क्या देखना चाहती हैं

सुनना उसकी हर आवाज़
जो कहने से पहले
रुक जाए कण्ठ में

बहुत मुश्किल से मिलता है वह कन्धा
जिस पर सिर टिकाया जाए तो
ग्लानि नहीं हो
सुकून मिले ।

कठिन जीवन

पानी में गुन्धे हुए आटे का दिन
ख़त्म होता है
चूल्हे की तेज़ आग पर सीझने के बाद

नमी भाप की तरह उड़ जाती है
हासिल होती है पकने की तसल्ली

यह पूरी पृथ्वी कठिन जीवन का मानचित्र है
कोई विकल्प नहीं इस हौसले का

उठता हुआ धुआँ फैलता है तो
तमाशा देखते तमाम लोग
उम्मीद से भर जाते हैं

वे इत्मीनान से जीने वाले लोग हैं
जिन्हें पता है कि
पेट की आग
न जाने कितनों को राख बना देती है ।

उम्मीद 

अगर रोज़ सुबह होती है तो
यह उम्मीद के लिए एक नया दिन है
कल की अधूरी बातें
आधी रंगी हुई काग़ज़ पर फुलवारी
छूटी हुई ज़मीन
सुनने के लिए बचे हुए बीज

कल के सूने दरवाज़े
सब उम्मीद से जागे हुए हैं

कहीं भी कोई खटखटाता है तो
यही लगता है कि
कोई खड़ा है चौखट पर

वह हो या नहीं
इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता
बस, आँखों की चमक का
बरकरार रहना ज़रूरी है ।

टूटे हुए खिलौने

बच्चे खेल रहे थे उन खिलौनों से
जो न जाने कब से टूटे हुए थे
उनका हर टुकड़ा अलग हो चुका था
फिर भी वे उन्हें समेटते
उनकी पेंच कसते
और उन्हें नया कर देते थे हर बार

उन खिलौनों के लिए यह नई बात नहीं थी
नई बात उन बच्चों के लिए थी
जो जान चुके थे कि
चीज़ों को इस तरह भी बचाया जा सकता है ।

टूटे हुए खिलौने

बच्चे खेल रहे थे उन खिलौनों से
जो न जाने कब से टूटे हुए थे
उनका हर टुकड़ा अलग हो चुका था
फिर भी वे उन्हें समेटते
उनकी पेंच कसते
और उन्हें नया कर देते थे हर बार

उन खिलौनों के लिए यह नई बात नहीं थी
नई बात उन बच्चों के लिए थी
जो जान चुके थे कि
चीज़ों को इस तरह भी बचाया जा सकता है ।

पता पूछना

जब भी मैं जाता हूँ अनजान जगहों पर
भूल जाना चाहता हूँ वे तमाम कहानियाँ
जो भय पैदा करती हैं

वे कहानियाँ जो पता नहीं कब सुनी थी
वे हर वक़्त घूमती रहती हैं दिमाग में और
मन सिहर जाता है

किसी अख़बार की कोई ख़बर कौन्ध जाती है
कोई किरदार याद आ जाता है —
मुश्किल में फँसा हुआ
मैं उन्हें याद करने से इनकार करता हूँ
मैं उन्हें भूल जाना चाहता हूँ

अगर कहीं रास्ता भटक जाता हूँ तो
बिना कोई सँकोच किए
पूछ लेता हूँ पता

जानता हूँ कि
सही रास्ता बताने वालों की कहानियांँ
कोई नहीं सुनाएगा ।

पृथ्वी सोच रही है

ये जो चारों तरफ़ की हवा है
भर गई है उन पैरों की धूल से
जो इस पृथ्वी पर सबसे अकेले हो गए हैं

वे असँख्य लोग हैं
जो हार गए अपनी ही ज़िद से
जीने की लालसा लिए
वे दर-दर भटकते हुए
खोजते रहे
सूखते कण्ठ के लिए बून्द-भर पानी
बैठने के लिए बित्ते-भर का आसरा

हद है कि वह पानी
न घर में मिला
न हज़ारों मील दूर
किसी चमकदार शहर में

जहाँ समुद्र का किनारा था
जहाँ छल-छल नदी बहती थी
जहाँ सबसे अमीर लोग रहते थे
जहाँ इस देश की संसद थी

वहाँ वे सबसे ग़रीब बनकर
बस, जी लेना चाहते थे
तब तक
जब तक कि मौत की हवा
वसन्त में नहीं बदल जाती
हद है कि इतना मौक़ा भी उन्हें नहीं दिया गया

वे कुछ नहीं बचा सके
जो अपनी दुनिया
कन्धे पर लादकर
चलने का हौसला रखते थे
जो जानते थे
पत्थर और लोहे को तोड़ने की अचूक कला
वे मनुष्य होकर भी हार गए मनुष्य से

उनके लिए
हर दीवार सबसे मजबूत सीमेण्ट से बनी है
हर दरवाज़ा सबसे मजबूत लोहे का
खिड़कियों से झाँकता है अन्धेरा
जो देखना चाहता है तसल्ली के लिए
कि बस वे चले जाएँ

ये समय इतिहास का सबसे भयानक समय है
जब एक मनुष्य
दूसरे मनुष्य के बच जाने के लिए प्रार्थना नहीं करता
उन्हें मौत के मुँह में जाते देखता है
ठीक उसी तरह जैसे कोई फ़िल्म चल रही हो
जैसे कोई तमाशा शुरू हुआ हो
और ताली बजने वाली हो

ये पृथ्वी अब सोच रही है कि
मैं आख़िर घूम किसके लिए रही हूँ ।

पसीने की गन्ध

कुछ बातें देर तक गूँजती हैं
बिना पहाड़ और दीवार से टकराए
शोर में वह
चुपके से अपनी जगह बना लेती हैं और
बच जाती हैं हमेशा के लिए

बहुत से खर-पतवार के बीच
ऐसे ही पलता है
कोई अनजान मगर ज़रूरी पौधा
किसी फूल के लिए
किसी दाने के लिए
किसी छाया के लिए

हमें जिसकी प्रतीक्षा थी
वह ऐसे ही
एक-एक क़दम बढ़ाकर
पहुँचा है हमारे पास
धीरे-धीरे

कोई कन्धा मैं खोज रहा था
अपना सिर टिकाने के लिए
तब हिसाब लगा रहा था कि
मैंने किसी को
धकेल तो नहीं दिया आधी नीन्द में
अपने कन्धे से

यही होता है हर बार कि
अगर मैं स्वप्न देखता हूँ तो
सोचता हूँ कि
वे भी मेरे पसीने की गन्ध से भरे हुए हों ।

गुल्लक में धूप

दिन के खाते में
धूप सिक्के की तरह जमा है

खन-खन बजती दोपहर
बताती है कि
गुल्लक में चमक लबालब है

ख़र्च करने को
बाक़ी है अभी
न जाने कितनी सांस

न जाने कितनी रातें
इस आस में गुज़रीं
कि कल उड़ जाऊँगा
किसी पँख वाले पक्षी की तरह

न जाने कितने तारे देखकर
भूला हूँ तमाम दुस्वप्नों को
और बचा हुआ हूँ
गिलास की अन्तिम बून्द की तरह

सिक्के होते अगर तो
एक समय के बाद
चलन से बाहर हो जाते
मैं धूप जमा कर रहा हूँ ।

रोटी की तस्वीर

यूँ तो रोटी किसी भी रूप में हो
सुन्दर लगती है
उसके पीछे की आग
चूल्हे की गन्ध और
बनाने वाले की छाप दिखाई नहीं देती
लेकिन होती हमेशा रोटी के साथ है

वह थाली में हो
हाथ में हो
मुँह में हो
या किसी बर्तन में हो तो
उसका दिखना उम्मीद की तरह चमक जाता है

लेकिन यह कितना दर्दनाक है कि
रोटी पटरी पर है और
उसे खाने वाले टुकड़ों में बिखर गए हैं
वे वही लोग हैं जो
उसी रोटी के लिए दर-दर की ठोकरें खाते हुए
रोज जीते रहे, मरते रहे
अपने घर से हज़ारों मील दूर
लेकिन कभी पता नहीं चलने दिया
कि इस रोटी तक पहुँचना कितना मुश्किल है

आज जब वे नहीं हैं तब उनकी यातना सामने आई है
ये महज रोटी नहीं जिसकी तारीफ़ में कसीदे गढ़े जाएँ
ये इस बर्बर समय की ज़िन्दा गवाही है
जो बता रही है कि
वे कौन लोग थे जिन्हें इस हाल में पहुँचा दिया गया

वे भूखे थे या खा चुके थे ये कोई नहीं जानता
लेकिन इतना जरूर है कि उन्होंने रोटी
पटरी पर बिखरने के लिए तो बिल्कुल नहीं बनाई होगी

इस खाई-अघाई दुनिया के मुँह पर
ये सबसे बड़ा तमाचा है
लहू से सनी उनकी रोटियाँ दुनिया देख रही है ।

बल्ब

इतनी बड़ी दुनिया है कि
एक कोने में बल्ब जलता है तो
दूसरा कोना अन्धेरे में डूब जाता है

एक हाथ अन्धेरे में हिलता है तो
दूूसरा चमकता है रोशनी में
कभी भी पूरी दुनिया
एक साथ उजाले का मुँह नहीं देख पाती

एक तरफ़ रोने की आवाज़ गूँजती है तो
दूसरी तरफ़ कहकहे लगते हैं
पेट भर भोजन के बाद

जिधर बल्ब है उधर ही सबकुछ है
इतना साहस भी कि
अपने हिस्से का अन्धेरा
दूसरी तरफ़ धकेल दिया जाता है

एक कोने में बल्ब जलता है तो
दूसरा कोना सुलगता है उजाले के लिए दिन रात ।

घड़ी 

सब कुछ इसके सामने होता है

इसका टिकटिकाना देर तक गूँजता है
यही इसकी पुकार है चुप्पी में
यही इसका विरोध

सब कुछ देखने वाली घड़ी
कभी गवाही नहीं देती ।

बेघर लोग

वे जहाँ बसते हैं
नहीं सोचते कि इस बार फिर बेघर होंगे
बड़ी मुश्किल से बसते हैं वे इस तरह उजड़-उजड़ कर
जी तोड़ मेहनत से बनाते है वीराने को रहने लायक
उनकी थकान भी नहीं मिटती कि
फिर उजाड़ दिए जाते हैं वे ।

2.

जब भी गोली चलेगी
वे बच नहीं पाएँगे
जब भी बम गिरेगा
उड़ेंगे उनके चीथड़े
कभी उन्हें छिपने की जगह नहीं मिलेगी
कोई उन्हें अपने घर नहीं बुलाएगा
आँधी में वे पत्तों की तरह उड़ा करते हैं ।

सिक्के का मूल्य 

आज जो सिक्का चमक रहा है
वह सिक्का
पता नहीं कल बाज़ार में चले भी या नहीं

यह भी ज़रूरी नहीं कि कल
लोग इसके लिए पसीना बहाएँ
अपना जीवन खर्च करें और
एक दिन इन्हीं सिक्कों की ख़ातिर
खदान में मृत पाए जाएँ।

तुम रोशनी

न ओस की बूंदें सिहरन से भरती हैं
न ठण्डी हवा जमाती है बर्फ़ की तरह

चाँद फूल की तरह खिलने लगता है
तारे छितराने लगते हैं अपना रंग

तुम पास हो और कहीं अन्धेरा नहीं उदासी नहीं चुप्पी नहीं

ये फूल बिना मौसम के भी खिल रहे हैं और
इनका रंग हद से ज्यादा गाढ़ा हो रहा है

तुमने तो मौसम को बदल दिया है
चुपके-चुपके बिना बताए ।

ओ किसान 

तुम नहीं रोपो बीज धरती के गर्भ में
नहीं जोतो खेत
अब मत बहाओ पसीना
ये तुम्हारे दुश्मन हैं
कुछ और सोचो जो तुम्हें ज़िन्दा रहने का मौक़ा देगा
तुम कुछ और करो जो दो वक़्त की रोटी दे तुम्हें
ये लोकतन्त्र है
जिसके सामने रोओगे
वही उठ कर चल देगा
जिससे माँगोगे मदद
वही सादे काग़ज पर अँगूठा लगवा लेगा
तुम जिस पौधे को रोपोगे विदर्भ में
वह दिल्ली में पेड़ बन कर खड़ा मिलेगा
वह सबको छाँह देगा और तुम्हें धूप में जलना पड़ेगा
तुम्हें ध्यान खींचने के लिए
उसी पेड़ की टहनी में फाँसी लगा कर मरना पड़ेगा
भरी सभा में हज़ारों लोगों के बीच
और सब इसे तमाशे की तरह देखेंगे
इसलिए कहता हूँ कि मत रोपो बीज ।

तब 

असंख्य बार मैंने गिनना चाहा
लेकिन तारे कभी उँगली पर नहीं आए

हमेशा बाहर रहे और उनका टिमटिमाना
धूल ने भी अपने पानी में देखा

बच्चे जब-जब थके
बैठ गए अगली रात के इंतज़ार में और
फिर निराश हुए
ये तारे फिर नहीं गिने गए

ये तारे जहाँ रहे
कभी झाँसे में नहीं आए किसी के

वरना जिनके पास ताक़त है
उनकी जेबों में टिमटिमाते रहते ।

भाव 

सबसे सस्ता खेत
सबसे सस्ता अन्न
सबसे सस्ता बीज
सबसे सस्ती फ़सल
और उससे बढ़कर भी सस्ता किसान

जिसके मरने से किसी को जेल नहीं होता
जिसके आत्महत्या करने से किसी को फाँसी नहीं होती ।

मैं मज़दूर

अपने जीवन में एक घर नहीं बना सका छत का
जो भी बहाया पसीना
उसके बदले ज़मीन खरीदी
और फूस लिया पेट काट कर

जैसे-तैसे गुज़र रहा जीवन
इसी से दाल के दाने चुनता हूँ
ईंट के चूल्हे पर पकाता हूँ रोटियाँ
अपने घर से हज़ारों कोस दूर

दूर देश में जहाँ पाँच हाथ ज़मीन है मेरे नाम
उस पर भी सबकी नज़र लगी हुई है

वर्षों बेघर रहने के बाद अब सोचता हूँ कि
फूस का ही घर बना लूँ

लेकिन डर लगता है कि
कहीं कोई उसमें भी रातों-रात तीली न लगा दे ।

लापता लोग

लापता लोग अब लापता हैं
कितने बेबस हैं कितने लाचार
वे किस ग़लती की सज़ा भुगत रहे हैं कि
अपने हिस्से का जीवन भी उन्हें नसीब नहीं

लापता लोगों की रिपोर्ट थाने में दर्ज होकर सड़ जाती है
आखिर ऐसा क्यों होता है कि
उनका शव भी बरामद नहीं होता

आज तक जितने लोग लापता हुए
अगर सबको मिला दिया जाए तो
उनसे एक देश बन सकता है — ऐसा कहते हैं आँकड़े

इतनी बड़ी आबादी का लापता होना पता नहीं चलता
उनका कोई सबूत नहीं कोई गवाह नहीं

वे सब सिर्फ़ एक नागरिक नहीं थे
किसी की माँ, किसी का पिता, किसी के बच्चे, किसी की बहन
किसी के भाई थे वे और वे लापता हो गए

इस तरह कि अब कभी उनकी वापसी नहीं होगी
वे अब मृतक हैं पर
मृतकों की सूची से बाहर ।

अनशन 

घेरे के अन्दर सरकार अपने काम में लगी है ऑफ़िस में
बाहर चबूतरे पर भूख हड़ताल कर रहे हैं लोग
अनशन का आज सातवाँ दिन है

अधिकारी सामने से गुज़रते हैं और बगलें नहीं झाँकतें
सारे हुक़्मरान का रास्ता इधर से ही है
लेकिन कोई बात करने नहीं आया अब तक

लोग नारा लगाते हैं भाषण देते हैं
दुहराते हैं अपनी माँग और अन्धेरा होने पर
मोमबत्ती जलाते हैं और बैठ कर गुज़ारते हैं रात खुले में

इनमें कुछ की हालत गम्भीर है अब
अनशन का आज सातवाँ दिन है और
कोई मिलने भी नहीं आया है अब तक

घेरे के अन्दर सरकार अपने काम में लगी है ।

जहाज़

नदी के किनारे खड़ा है जहाज़ जर्जर
पानी के छींटे दौड़-दौड़ कर इसके पास जाते हैं
वे बुलाते हैं फिर से चलने के लिए
पर अब ये संभव नहींं ।

वर्षों से ये जहाज ऐसे ही है
इसके भीतर चिड़िया का घोंसला है मकड़ियाँ है जाले हैं
रेंगता है साँप जहाज़ के फ़र्श पर
कुल मिला कर हालत यह है कि कोई भी
जहाज़ के भीतर नहीं जाना चाहता डर से

लोग कहते हैं कि यह एक समुद्री जहाज़ है
वर्षों पहले इससे व्यापारी अपना व्यापार करते थे
वे दुनिया के दूसरे देशों से सामान की ख़रीद बिक्री करते थे
और मुनाफ़ा कमाते थे
हो सकता है ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अन्य जहाज़ों की तरह यह भी एक जहाज़
हो और बेकार होने पर इसे छोड़ दिया गया हो

फिलहाल यह देश की सबसे लम्बी नदी के किनारे खड़ा है
इसकी मुण्डेर पर है घास ही घास ।

मैं मज़दूर

अपने जीवन में एक घर नहीं बना सका छत का
जो भी बहाया पसीना
उसके बदले ज़मीन खरीदी
और फूस लिया पेट काट कर

जैसे-तैसे गुज़र रहा जीवन
इसी से दाल के दाने चुनता हूँ
ईंट के चूल्हे पर पकाता हूँ रोटियाँ
अपने घर से हज़ारों कोस दूर

दूर देश में जहाँ पाँच हाथ ज़मीन है मेरे नाम
उस पर भी सबकी नज़र लगी हुई है

वर्षों बेघर रहने के बाद अब सोचता हूँ कि
फूस का ही घर बना लूँ

लेकिन डर लगता है कि
कहीं कोई उसमें भी रातों-रात तीली न लगा दे ।

खिलौना 

ग़ायब होते बचपन के बीच
मेले भी अब ग़ायब हो रहे हैं
मेले में भी अब कम दिखते हैं खिलौने
कम ही ख़रीदते हैं इसे बच्चे
अब इससे खेलने का युग बीत गया

अब वे प्लास्टिक कपड़े और मिट्टी के खिलौने
धीरे-धीरे इतिहास में शमिल हो रहे हैं
धीरे-धीरे उनके चित्र क़िताबों में छपने लगेंगे

सालों बाद बच्चे पूछेंगे कि
आखिर ये रंग-बिरंगी तस्वीर कैसी है
कौन सी चीज़ है यह

उन्हें बताया जाएगा कि इसे खिलौना कहते हैं ।

रोशनी

जब कहीं अन्धेरा देखता हूँ तो वह बूढ़ा याद आता है
जो दिन ढलते दरवाज़े पर लालटेन जलाकर टाँग देता था
वह जानता था कि अन्धेरे में कुछ नहीं सूझेगा

इसीलिए यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा था
जिससे कि सड़क पर चलने वालों को दिक़्क़त न हो

मैंने देखा कि कई बार पत्नी उसे डाँटती थी कि
घर में अन्धेरा है और सड़क पर क्यो टँगी है लालटेन
तब बूढ़ा चुप हो जाता था
वर्षों तक यही चलता रहा तब गाँव में बिजली नहीं थी

अब सब कुछ बदल गया है और लालटेन भी बन्द है
पता नहीं उस बूढ़े का क्या हुआ जो रोशनी में जीना चाहता था

अब बिजली के तार हर गली में है
जगह -गह बल्ब लगा है पर जलता नहीं
हर गली में अन्धेरा है हर चौराहे पर सन्नाटा
अब कोई राहगीरों की परवाह नहीं करता

अपना तेल जला कर दूसरों के लिए रोशनी करना सबके वश की बात नहीं
अगर वह बूढ़ा होता तो लालटेन दरवाज़े पर अब भी टाँगता ज़रूर।

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