शक्ति बारैठ की रचनाएँ

रोता है इस अँधेरे में इक रोशनियों का शहर

रोता है इस अँधेरे में
इक रोशनियों का शहर
जहाँ धुप नहीं उगती
जहाँ शाम नहीं होती।

कोहरे की मर्र्मत होती है,
जहाँ काले पर्दे धुलते है
रंग अंधेरों का रोजाना
दो बार पुताया जाता है।

आंसू के पीपे तारकोल में
तब तक मिलवाये जाते है
जब तक की कोई पिघल पड़े
दो आँसू और मिलाने को।

टोपी वाले जोकर से
तमगे लगवाये जाते है
कोवों की खालें बीनकर के
कुर्ते सिलवाए जाते है
वो शहरे दीवानें ऐसे है
जहाँ काले दीप जलाये जाते है
अब शहर-ए-फिजां कुछ ऐसी है
जहाँ धूप नहीं उगती
जहाँ शाम नहीं होती।

कोई ऐसा जहाँ बताओ तुम

उदय हुआ है, जहाँ अंधेरा
वहाँ की बातें लाओ तुम
पोशाकों के जिस्म ओढ़कर
काली मल्हारें गाओ तुम।
जन्मा ना हो अब तक राजा
ना कोई पीर हो रंक, महाजन हो
देह की राख़ नगरभर डोले
वो आग ढूँढ़कर लाओ तुम।
मस्ताने जोगी के मस्तक पर
कोई, चिन्ह नया ढाला हो
नए भेश में नया देवता
और पीठ के पीछे भाला हो,
करतब जहाँ पर दिखे मौज के
भूखे के हाथ निवाला हो
पांवो में,बन्दर जेसे मुँह वालों के
घुँघरू जेसी माला हो,
हो नगरवधुएं राज महल में
पंडित का मुह काला हो
सात सिंधु के अष्ठ घाट हो
फिर गंगा से पाला हो,
दूर रात जब सूरज निकले
उसके पार शिवाला हो।

कैसे उतार पाए तुम ख्वाबों को ज़मीन पर

केसे उतार पाए तुम ख्वाबों को ज़मीन पर
बताओ मुझे, मैं सदियों से दुविधा में हूँ
मैंने बहुत लिखा
बहुत गया भी,
बंजर थी जमीं,
पर घुटने रखकर खूब रोया
चीखा, चिल्लाया
हँसी की छांह में
आँसुओं को उगाया भी
पर अनंत छोर की तमाम यात्रायें
अंतहीन ही रही,
मैं पराजित नहीं हुआ
मैंने पूछना शुरू किया
साधुओं से, फकीर, जोगी, सन्यासियों से
और देखो,तुम तक पहुँच ही गया
अब तो कहो
केसे उतार पाए तुम ख्वाबों को ज़मीन पर?

हम भी तुम भी और पुराने रस्ते ढूँढे शहरों को

मैं अकेला ही चला था,
तुम्हारी और, तुम्हारा साथ लेकर
दौर गुजरे, दिन गुजरे और
हाथ छुड़ा बैठा,
तुम उस और निकले,
मैं इस और,
मालूम था वहाँ कुछ नहीं
तुम भी नहीं, सिर्फ सफ़र था
और इधर
ऊँचे दरख्तों के निचे से गुजरने वाले तंग रस्ते
नदियों के भटकाव खाते किनारे
समन्दरों में हर लहर के साथ डूबती रेत
बंद पड़े रेलों के इंजन
और उनकी छाँव में बरसों से भीगती, सूखती
और डूबती पटरियाँ,
तंगहाल शहर, उजड़ते, बनते, बिखरते गाँव,
हँसी आती है,
हाथ तुमने छुड़ाया,
भटका में
समय के पार पहुँच गया,
देखों, वहाँ, तुम्हारी दुनिया में अब कुछ भी नहीं
तुम भी नहीं,
मैं भी नहीं
और वो,
वो भी नहीं।

मिज़ाज बदल जायेगा

मेरा कल बदले ना बदले, तेरा आज बदल जायेगा
बदल कर देख आइना, ये मिज़ाज बदल जायेगा

ये मौसम ये बहार ये शहर के बाशिन्दे भी हंस पड़ेंगे
हया के बादल हटा, हम दरिंदो का साज बदल जायेगा

तेरे बाद बहुत आएंगे पता पूछने मेरा, कहाँ रहता है
कहना चाँद पर गया, आशिकी का परवाज बदल जायेगा

इस हिन्द उस पाक के रहनुमा गजब हंसते है, सुना है
मुझे मौका दे कर देख़, हँसने का अंदाज बदल जायेगा

बस गुनगुनाता हूं मैं गाता नहीं हूं, मगर वो चीखा क्यों
मुसकरा मत, ये बेबसी में चीखने का राज बदल जायेगा

और जहाँ ये दुनियां खत्म हो, जा वहाँ जाकर छुप जा
फ़ैसला दिल से करता हूँ, आज का आज बदल जायेगा

ऐ मेरे हमनफस, ज़रा दूर से मिला कर मुझसे,
अकेला रहता हूँ, तेरा तो कोई भी हमराज बदल जायेगा।

तारों की गणना 

तारों की गणना कहती है
तुम्हें स्वर्ण रथ लेकर सृष्टि की परिक्रमा पर निकल जाना चाहिये
अन्यथा असलाई निंद्रा में
आत्मबोध की प्रतिछाया
तुम्हारे भव्य अभिषेक के इंतजार में है,
यह विधान तुमनें रचे
अम्रत तुमसे, कालकूट तुम्हारा
केसरिया ध्वज, ऊँचे मचान और आसमानी तीरगी
पर मंडराते गिद्ध तुम्हारे प्राणों का स्पन्दन
यह अविजित पाखंड तुम्हारे तुम्हीं जानों,
मगर सच जो था साश्वत रहेगा
अजर होना अमर होना
शरणार्थी होकर सृष्टि में महाप्रलय की गूंज
तुमने उठाई, तुमने मिटाया हर तिनका जो अभिमानी था
तुमने मुझे लगाया गले, और डर गए तुम ही
अब यह
मंद मंद मुस्कुराहट
चुप्पी ख़ामोशी, और गला काट लेना
में नतमस्तक मेरे ईश्वर
मुझे झुकाया, मुझे जमीदोज किया
इन कर्मो का फल भोगना होगा तुम्हें,
तुम्हीं थे जो कहते थे
मैं नश्वर, मैं अस्त मैं तुम और तुम से मैं हूँ,
भेंट ग्रहण करो
बारह अश्वो का रथ, अकाल में जूझते कदम
प्यास का संकट, सूखे पेड़, अथाह सागर
धरती-आकाश –बैकुंठधाम
देवी-देवता, नर-नारी-किन्नर,
दैत्य-दानव, पशु-पक्षी,
सब कुछ कुछ तुम्हारे
मैं राक्षस होने को हूँ
महाप्रलय मेरा रास्ता नहीं रोक सकती
आँधियों का आगाज में सुन चुका हूँ
मैं देता हूँ तुम्हें अचूक मन्त्र शक्ति
निकल जाओ, अज्ञातवास की और
जहाँ मैं तुम्हें तब ढूंढता हुआ पहुँचू
जब मेरा श्राप पूर्ण हो,
पहरेदार सो चुके है, चाँद मद्धम है
हे ईश्वर, तारों की गणना कहती है
तुम्हें स्वर्ण रथ लेकर सृष्टि की परिक्रमा पर निकल जाना चाहिये।

पैमानों की शराब

एक वो जिसकी दीद में गुजरी शब-औ-रातें तमाम थी
आज किसी की हशरतों में गुजरते दिन तमाम है
हर इक निगाह ख़ुमार-ऐ-शब से रंगीन आती थी
हर इक तरफ खाक-ऐ-नशी पिन्हा नज़र आती थी

तरशती सोखियों पर क़यामत उतर आई तमाम थी
आज राहतों पर इतराते नकाहतों का हुजूम तमाम है
वो उन दिनों हुश्न को भी गरज नज़र आती थी
जहाँ भी था में बस रहगुजर पर नज़र जाती थी

नियाज-ऐ-इश्क में नमीं-ऐ-गुफ्तार की सदाएँ तमाम थी
मगर जुबां-ऐ-इजहार के बाबस्ता शर्मो-हया तमाम है
उसकी आदाओ में शराफत दिलफेंक नज़र आती थी
मगर पैमानों की शराब सीधा हलक से उतर जाती थी

ख़ामोशी से उतर जानें दे

इन बेबस क़रीबी अलगाव रातों को ख़ामोशी से उतर जाने दे
शोख़ के जख्म गहरे हैं अभी कुछ घाव और भर जाने दे
यूँ ना पूछ मेरे हमराह किस किस ने फ़रेब किया मुझसे
कुछ अपने ही सड़कों पर उतर आये है उन्हें लौट कर घर जाने दे

आँसू मेरे वजूद-ऐ-मंजिलों का पता देंगे जरा गौर से सुनना
रात जो घहरा कर आई उतर गई, जरा इन बादलों को भी मर जाने दे
मेरे सितारे गर्त में है और गर्त में है मजिलें मंजर कुछ खुमारियां भी
शाम-ऐ-तन्हाई बीत गई है, बेपरवाह रात के बाद की सहर आने दे

में चला रेगिस्ता उजाड़ था, बाद में उजड़ा कुछ मुझे उजाड़ कर उजड़े
ये गहरे कूवे ये गहरी नदियाँ ये अथाह समन्दर बस इनसे तर जाने दे
माहौल ने कम आवारगी के सबब ने सिखाया उन्हें की मुझे ख़ामोश रखें
मुझे चुपचाप कहीं महबूब-ऐ-दामन से बिछे इन पत्तों पे पसर जाने दे।

आप यूँ ना आया भी करिये

आप,
यूँ ना आया भी करिये
गुमनाम से होकर
यूँ ना जाया भी करिये
लोग कहते है, में झूंट लिखता हूँ
और लिखता क्या हूँ
घसीटता हूँ शब्दों को
बिना बात, बे अर्थ, बे-तर्क,
समझते हो ग़र इन सब बातों को
तो हुज़ूर
दूसरों को ज़रा बताया भी करिये।
शर्म आती होगी जब वो पढ़ते होंगे
की किस बात का ग़म है जो
अक़्सर छापने लगता हूँ,
लगता होगा की बड़प्पन दिखाता हूं
कभी चाँद, कभी तारे कभी सड़क
कभी उबले अंडे आलू छुआरे
कभी मेहबूब कभी आशिक़
रश्क इज्ज़त आदमी औरत
तराजु तकिये ताज़िये मशान बर्तन भांडे
माशूक महोब्बत आरजुएं
अल्हड़ लफंडरपन दारू
साधक साकी सिगरेट शराब
ना जाने क्या क्या, और क्यों,
ना समझ हो तो किसे फ़िक्र है
समझदार हो हुज़ूर
तो कभी जताया भी तो करिये।
और क्या कहूँ
ये कोई कविता तो नहीं,
मगर दिमाग से बाहर निकालकर
दिल को भी
सताया तो करिये।

हम बात करेंगे साथी

हम बात करेंगे साथी
कल जरूर बात करेंगे
लेकिन आज मुझे वक़्त नहीं
की तुम्हें जब वक़्त मिले, तब तक
में इंतज़ार करता रहूँ ।
चीलम देखी ही होगी
तम्बाकू भरा होता है जिसमें
एक मटमैली साफी लिपटी होती है जिसके
दो खुरदरे हाथ चिपके होते हैं जिसपे
ख़ासियत होती है उसकी
की रखा एक कोयला औऱ सारे सुर
एक धुन में बज उठते है,
साफी का चटचट करके सुखना,
तम्बाकू का जलना
हाथों की रगड़, हथेलियों में धुंवे की पकड़
और अंत में अचानक उठा
बेशुमार ख़ालीपन ..
बस वो ख़ालीपन मिल जाये मुझे
तब बात करेंगे साथी
आज मुझे इतना वक्त नहीं की
तुम्हें कब वक्त मिले, इसके इंतज़ार मेँ
इंतज़ार करता रहूँ।

तुम ईश्वर नहीं

ढह गया ना देखो दम्भ का दुर्ग
धवस्त हो गया ना अभैद किला
तुम कुछ भी तो नहीं रहै ना अब
गर बचा है फिर भी कुछ, तो कहो
समय का चक्र है,
निरंतर चलेगा !
अब आकाशवाणियां नहीं होती
अब भविष्य नहीं होता
अब तुम खुदा: नहीं
अब तुम तब तक तुम हो
जब तक मान नहीं लेतै की
तुम कुछ भी नहीं हो।
हड्डियों पर चढीं मांस की परत
और नशों में दौडता लाल पानी
दस उंगलियाँ,
एक सिर और बदजात दिमाग
बस इतना ही।
तुम बीज नहीं हो
की पौधे बनों
फल लगै
और फिर कहो की हाँ में भूख मिटाता हूँ,
छायां दैता हूँ
आसरा भी।
तुम ईश्वर नहीं हो„
चुप करो
वरना दूर रहो।

मैंने डाली पर बैठा एक कौवा उठाया

मेने उठाया एक डाली पर बैठा कौवा
और रख़ दिया कविता की पहली पंक्ति के
चौथे शब्द पर,
एक उड़ता बाज़ पकड़ा
एक घोंसला बनाती चिड़िया पकड़ी
और रख़ दिया दोनों को एक साथ एक ही जगह,
मज़दूर को उठाया सड़क खोदते हुए
कवि को पकड़ा बस में चढ़ते हुए
विचारक को सुट्टा मारते हुए,
वहीं पास ही कैफ़े की बेंच पर पेंटर भी मिल गया
पास ही के पार्क में मुंह को गमछे सी छिपाकर
सोया हुआ ऑटो ड्राइवर भी,
अब मेने एक मोगरी ली और
प्याऊ की बूढी अम्मा के दरारों भरे हाथों से
इन सब पर हथेली भर पानी छिडकवा दिया,
कूट कूट कर चटनी बनाई और
चाँद सितारों का छोंका मार दिया,
और हो गई शानदार जबरदस्त बिकाऊ रेसिपी तैयार,
मगर यह क्या,
पता नहीं क्यों सब ने मिलकर मुझपे मानवाधिकार हनन का मुकदमा दायर कर दिया।
वो सब कह रहे है जज साहब से कि
मेने उनका बिलबिलाता मजदूर उठा लिया
उदास चिड़िया उठा ली, ऑटो ड्राइवर उठा लिया,
आशिक लोग निजी स्वतंत्रता हनन की बात कह रहे है
की उनको उनका चाँद वहीँ का वहीं चाहिए,
सारे लोगों को सब कुछ ठीक ठीक वैसा ही चाहिए
मगर किसी को भी ना कवि चाहिए
ना सामाजिक मूल्यों पर खरी उतरती कविता चाहिए,
उनको पेंटर भी वहीँ का वहीँ चाहिए
में अब इस कसैले काढ़े का क्या करूँ
जज साहब ने कहाँ है इसको पीकर तुम अपनी कौम के साथ सामूहिक आत्महत्या कर लो,
यह सिस्टम और न्यायपालिका की
गरिमा का सवाल है,
और सुनो
वो बस वाला कंटेंट पर सफेद पट्टी चलाओ
और जहाँ कवी शब्द इस्तेमाल हुआ है
वहाँ बीप की आवाज डाल दो।

माथे पर सिकन हाथों में गुनाह

बहेड़े ने केवडे से कहा
वो देख कहाँ उग गया बियाबान रेगिस्तां का राजा
बीहड़ों के खानदान का, लाल केसरिया रोहिड़ा,
परजा की जड़ें औरतों की खाट है
फिर क्यों माथे के सहारे की खातिर,
पहाड़ों पर बरगद नहीं होते
मगर बारामूला का लेखक लिखता जरूर है,
ढहते मक़ान, जंग लगे ताले
क़बीले की बैठकें, चौपाल पर मंडे बुजुर्गों के
पाँवों के निशान
उँगलियों पर गिनी जा सकने वाली
साँझ की शांति,
कौन ले उड़ा, कालांतर की अंधेरी कन्दराओं की और, बहुत दूर।
तिब्बत का मंदिर, ढाका की रिवायतें,
शहर सा फीकापन, आदमियत सा कसैला कड़वा घूंट,
अधजला लहसुन में लिपटा मांस,
पके चावल, थैली में मुर्दे का माथा, और दिल मे फ़रेबी का मरा हिरन कुलांचें क्यों मारने लगता है .
कद्दावर देह, चमड़ी पर बरसे ओलों के निशान
छोटी आँखों में जागता ख़ौफ़, डर, कुटिलता,
माथे पर शिकन हाथों में गुनाह के राक्षशों सा नाचता अपराध,
सो ही नहीं पाता कभी, चीर गहन निंद्रा में ।
पहाड़ के पेड़ पनाह नहीं देते
ठीक रेगिस्तां की दीवारें सुकून नहीं देती,
खुले केश, झाड़ियां, झरने, हरा पानी और अदबी
डूबती खेलती उछलती मछलियां, लड़कियां
तकते सियार, मगरमच्छ, लाल माटी, सांपों का
अथक निश्वार्थ इंतेज़ार
हरड़ चिड़ियां, काँधे पर बंदूक, सफेंद जांघिया,
गश्त धरपकड़ हड़बड़ाहट और छुप जाना
झुरमुरों की ओट में,
चिड़ियों तो कभी लड़कियों का, हिरणों का
झुरमुटों की ओट में।
सीटियां बज रही है, साड़ियां निचोड़ी जाती रही
बरामदे में गुहाल की छान गिर पड़ी,
फूलती सांसे, आग भरी छातियाँ, कसते सिकंजे
सिकुड़ती उँगलियाँ, रेंते गये गले, उखाड़ी गई जड़ें,
तोड़े गये जबड़े, कोहनियां, उखाड़े गये पंख, जलाई गई गाड़ी, फेंक दी गई मंडराते बाजों को
गांव का नायक खिलखिला उठा,
ओहदों की सलामी लगी, कोपीन पर पुराना कौट आ गया,
माथे पर पगड़ी,
आपके मस्तिष्क सीतल रहें आपकी जवानी अमर रहे
आप डौम हुए, ओरण-ए-पहाड के नए डोम,
सब झूंट
सब निरर्थक, सब कलंकित, सब खत्म, सब झूठ
आग की छाया होती
तो दिखती मेरी भी कविता के यथार्थ की परछाई
जैसे पहाड़ों पर बरगद नहीं होते
मगर समंदर किनारे रेत तो हुआ ही करती है।

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