शतदल की रचनाएँ

एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं

एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा ।

गंध डूबा हुआ एक मीठा सपन
कर गया प्रार्थना के समय आचमन
जब कभी गुनगुनाने लगे बांसवन
और भी बढ़ गया प्यास का आयतन

पीठ पर काँच के घर उठाए हुए
कौन किसके लिए पर्वतों पर चढ़ा ।

जब कभी नाम देना पड़ा प्यास को
मौन ठहरे हुए नील आकाश को
कौन संकेत देता रहा क्या पता
होंठ गाते रहे सिर्फ़ आभास को

मोम के मंच पर अग्नि की भूमिका
एक नाटक यही तो समय ने गढ़ा ।

एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा ।

एक सपना उगा

एक सपना उगा जो नयन में कभी
आँसुओं से धुला और बादल हुआ!

धूप में छाँव बनकर अचानक मिला,
था अकेला मगर बन गया काफ़िला ।
चाहते हैं कि हम भूल जाएँ मगर,
स्वप्न से है जुड़ा स्वप्न का सिलसिला ।

एक पल दीप की भूमिका में जिया,
आँज लो आँख में नेह काजल हुआ ।

कल अचानक

कल अचानक गुनगुनाते चीड़-वन जलने लगे
और उनके पाँव से लिपटी नदी बहती रही ।

है नदी के पास भी अपनी सुलगती पीर है,
दोपहर की धूप में जलते पड़ावों पर
आग झरते जंगलों की गोद में तक़दीर है ।

कौन सुनता है किसी का दर्द इस माहौल में
पर नदी कल-कल विकल अपनी कथा कहती रही ।

धूप के अपने कथानक भी यहाँ पर हैं बड़े,
क्या करें सब विवश होकर थरथराते बाँचते
ये सुहाने वृक्ष ऊँचे पर्वतों पर जो खड़े ।

क्षीण-काया अग्निवीणा पर छिड़े संगीत का
मीड़ थऱ-थऱ काँपती सहती रही,
और फिर भी यह नदी बहती रही ।

कल अचानक गुनगुनाते चीड़-वन जलने लगे
और उनके पाँव से लिपटी नदी बहती रही ।

कौड़ी-कौड़ी माया

कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी ।
बादल देख गगरिया छोड़ी ।।

सागर की चादर तानी थी,
चादर जो पानी-पानी थी ।

चादर ने ही समझाया फिर,
बेमतलब है भागा-दौड़ी ।।

अधरों-अधरों खेल-तमाशे,
पानी आगे पीछे प्यासे ।

साँसों की जंजीर हवा की,
आखिर इक दिन सबने तोड़ी ।।

झूठे-सच्चे सपन दिखाए,
कठपुतली-सा नाच नचाए ।

उम्र मिली थी कितनी थोड़ी-
वह भी रही न साथ निगोड़ी ।।

जितनी भी जिनगानी पाई,
हँसते-रोते खेल-बिताई ।

उसका नाच नाच दुनिया में,
जिसने तुझ से डोरी जोड़ी ।।

तेरी प्यास अमोल

बटोही, तेरी प्यास अमोल,
तेरी प्यास अमोल !
नदियों के तट पर तू अपने
प्यासे अधर न खोल,
बटोही, तेरी प्यास अमोल !

जो कुछ तुझे मिला वह सारा
नाखूनों पर ठहरा पारा,
मर्म समझ ले इस दुनिया का
सिर्फ़ वही जीता जो हारा ।

सागर के घर से दो आँसू-
का मिलना क्या मोल ।

जल की गोद रहा जीवन भर
जैसे पात हरे पुरइन के
प्यास निगोड़ी जादूगरनी
जल से बुझे न जाए अगिन से ।

जल में आग आग में पानी
और न ज़्यादा घोल !
बटोही, तेरी प्यास अमोल,
तेरी प्यास अमोल!

नैन मिले अनमोल

जोगन, नैन मिले अनमोल,
ओस कनों से कोमल सपने
पलकों-पलकों तौल !
जोगन, नैन मिले अनमोल !

इन सपनों की बात निराली,
दिन-दिन होली, रात दिवाली ।

इनसे माँग नदी-झरनों के
मीठे-मीठे बोल !
जोगन, नैन मिले अनमोल !

सपनों का क्या ठौर-ठिकाना,
जाने कब आना, कब जाना ।

नयन झरोखों से तू अपनी
दुनिया में रस घोल,
जोगन, नैन मिले अनमोल ।

मौसम के फूल 

गंध के धनुष खींचे आ गए
मौसम के फूल ।

फूल जो लुभाते हैं,
प्राण तक चुराते हैं ।

कानों में मंत्र गीत गा गए
मौसम के फूल ।

रंग के कथानक हैं,
उत्सव के मानक हैं ।

दिशा-दिशा में कैसे छा गए
मौसम के फूल,
गंध के धनुष खींचे आ गए
मौसम के फूल !

एक सपना दिए का जिएँ 

     एक सपना दिए का जिएँ
हम अँधेरा समय का पिएँ

दीप बालो, हृदय में धरो!
हर दिशा में, उजाला करो!
दीप की बात इतनी सुनो;
रोशनी के दुशाले बुनो;

        एक पल के लिए ही सही-
दिन गिनो, रात को भी गुनो;

ज़िंदगी के अंधेरे हरो!
हर दिशा में उजाला करो!
दीप बालो, हृदय में धरो!

        ज्योति अपनी कथाएँ कहे;
वह किसी रूप में भी रहे;
रोशनी का यही धर्म है-
हर गली, गाँव-घर में बहे;

दीप के पर्व इतना करो!
आज घर-घर उजाला भरो!
दीप बोलो, हृदय में धरो!

        दीप ने गीत ऐसा लिखा;
वह मिला तो सभी कुछ दिखा;
भूमिका दीप की है कठिन
तुम करो तो सही एक दिन

बस यही भूमिकाएँ करो!
हर दिशा में उजाला करो!
दीप बालो, हृदय में धरो!

पाँच खिडकियों वाले घर

दर्पण में
जन्मी छाया से
मैंने अपनी कथा कही ।

बहुत बढ़ाकर
कहने पर भी
कथा रही
ढाई आखर की
गूँज उठी
सारी दीवारें
पाँच खिड़कियों
वाले घर की

एक प्रहर
युग-युग जीने की
सच पूछो तो प्रथा यही ।

तुम तो बोलो

मैंने कहा
दृगों से अपने
अधर मौन हैं
तुम तो बोलो ।

वैसे आँखों,
अधरों में
कोई भी अनुबन्ध नहीं है
मन लेकिन
कह सका न इनसे
मेरा कुछ सम्बन्ध नहीं है ।

ऐसे में
कोई यह बोला
मेरे बन्द
किवाड़ न खोलो ।

ग़ज़लें

वो जो थोड़ी मुश्किलों से हो के आजिज मर गए

वो जो थोड़ी मुश्किलों से हो के आजिज मर गए ।
उनसे क्या उम्मीद थी और देखिए क्या कर गए ?

उस इमारत को भला पुख़्ता इमारत क्या कहें
नींव में जिसकी लगाए मोम के पत्थर गए ।

उम्र भर अन्धी गुफ़ाओं में रहे दरअसल हम
इसलिए कल धूप में साए से अपने डर गए ।

फूल खिलते हैं बड़ी उम्मीद से, देखो इन्हें
उम्र थोड़ी मुस्करा कर डालियों से झर गए ।

बँट रहा है तेल मिट्टी का किसी ने जब कहा
छोड़ कर बच्चे मदरसा अपने-अपने घर गए ।

हम किसी को क्या समझ पाते कि करते एहतराम
हम तो अपने वक़्त से पहले ही यारो! मर गए ।

यही जो आज इस बस्ती के लोगों को खले होंगे 

यही जो आज इस बस्ती के लोगों को खले होंगे ।
ये आदमख़ोर जंगल में नहीं घर में पले होंगे ।

बरहना द्रौपदी के नाम महलों से गुफ़ाओं तक
उसी तहजीब के भूखे करोड़ों सिलसिले होंगे ।

जिन्हें हम भक्ति से जाकर चढ़ा आए शिवालों में
वो सिक्के खूब कोठों पर खनाखन-खन चले होंगे ।

तुम्हारे आईनों में शक़्ल क्या हमको दिखे अपनी
कि इनकी आदतों में हुस्न के सब चोंचले होंगे ।

हमारी कौम ने जो बाग़ सींचे थे लहू देकर
तुम्हारी हद में वो बेसाख़्ता फूले-फले होंगे ।

हमारे पास थोड़े लफ्ज़ हैं कहना बहुत कुछ है
हवन में हाथ औरों के भी मुमकिन है जले होंगे ।

यह भी अजब तमाशा है

यह भी अजब तमाशा है ।
जिसको देखो प्यासा है ।

प्यार तुम्हारा क्या कहने
पानी-धुला बताशा है ।

फूलों और बारुदों की
अपनी-अपनी भाषा है ।

मुखिया मेरी बस्ती का
बना गोगियापाशा है ।

जिस सिम्त नज़र जाए, वो मुझको नज़र आए

जिस सिम्त नज़र जाए, वो मुझको नज़र आए ।
हसरत है कि अब यूँ ही, ये उम्र गुज़र जाए ।

आसार हैं बारिश के, तूफाँ का अंदेशा है
मौसम का तकाज़ा है, अब कोई न घर जाए ।

तामीरों-तरक्की का, ये दौर तो है लेकिन,
ये सोच के डरता हूँ, एहसास न मर जाए ।

हो जिसका जो हक ले-ले, गुलशन में बहारों से
ये मौसमे-गुल यारों, कल जाने किधर जाए ?

मैंने जो बात कही थी कभी बरसों पहले 

मैंने जो बात कही थी कभी बरसों पहले
चाहता हूँ कि मेरा दिल वही फिर से कह ले

प्यार इक लफ्ज़ है मानी है समंदर जैसा
और लफ्ज़ों से कोई शख़्स कहाँ तक बह ले

डूबना है तो फिर दरया कि समंदर क्या है
हाँ, ज़रूरी है मिले ख़ुद से इज़ाज़त पहले

लहरें आती हैं मेरे पाँव भिगो जाती हैं
और कहती हैं मेरे साथ में तू भी रह ले

वक़्त क़े खेल-तमाशों को बूझिए साहब
ताकि सहने न पड़ें नहलों पे झूठे दहले

ये जो कुछ लोग चले जाते हैं चेहरे ले कर
तू तो इंसान है ‘शतदल’ इन्हें हँस कर सह ले

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