शम्भु बादल की रचनाएँ

खुली खिड़की

तुम्हारी खुली खिड़की से
देश लुट जाए
तुम्हें आनन्द है

तुम्हारी खुली खिड़की से
किसी का घर प्रकाशित हो
तुम्हें क्यों एतराज है ?

मौत के नाखून

मौत के कितने नाख़ून
कितनी गहराई तक
धँसे हैं मेरे सीने में !

दर्द की कैसी-कैसी नदियाँ
टहल रही हैं होंठों पर
अपने तमाम मगरमच्छों के साथ !

और तुम
अपनी हँसी की तलाश में
मेरा चेहरा रौंद रहे हो ! ?

पत्थर 

वह पत्थर पूजता है
मोम नहीं

इसलिए कि अन्दर का मोम
पिघले नहीं
पत्थर बने

और वह
शिकार खेलता रहे
इसी वन में

तुम्हारी पुस्तक पढ़ी है 

एक बात बताऊँ ?
तुम्हारी पुस्तक पढ़ी है
उसके तो शब्द-शब्द
झूठे अर्थ के दबाव से
फूट-फूटकर रोते हुए
बिखर जाते हैं

फिर नये लोभ से
नए-नए शब्द
बुलबुले की तरह उगते
युवा होते
बुढ़ाते
मरते चले जाते हैं

सम्मेलन 

सम्मेलन लाया गया है
शहर छोटा है
सम्मेलन बहुत बड़ा
सो छलक-छलक पड़ता है

कविता-कहानी-साहित्य-संस्कृति
शोषण-ग़रीबी-सर्वहारा पर
बड़े-बड़े विचार हैं
वातानुकूलित सम्मेलन के पास

रंग-बिरंगी साड़ियों में महिलाएँ
चहकती युवतियाँ
सपनीले युवक
खेतों-खदानों के लोग
सड़कों-फ़ुटपाथों के जीव
सभी आँखें फाड़-फाड़ देखते हैं
कान खड़े कर-कर सुनते हैं
उनकी ही बात
कैसे-कैसे लोग
कैसे-कैसे कहते हैं !

मुर्गों की टाँगें बड़ी प्यारी हैं
सो मुर्गे फड़फड़ा रहे हैं टाँग-रहित
सम्मेलन के बाहर
अब मुर्गे बाँग नहीं देंगे
लोगों की टूटेगी नींद कैसे
इस गँवई शहर में ! ?

काँटे

कंकड़-पत्थर
हम साफ़ कर रहे हैं
रास्तों पर कालीन
बिछा रहे हैं
घबराओ नहीं
जनता को लुभा लेंगे
छोटे व्यवसाय
सरकारी उद्योग
लोक-कल्याणकारी रूप
समाप्त करेंगे
कच्चा माल बेचेंगे
अपना सब कुछ बेचेंगे
सस्ते में ही बेचेंगे
तुम्हें सारी सुविधाएँ देंगे

अन्दर काफ़ी रस है
आओ हमारे बाबा !
आओ हमारे दादा !

आफ़ द रिकार्ड :
एक विनती है
एक आरजू है
ऐ बाघ !
कुछ गुप्त-राशि

फ़ण्ड में चुपके से
ज़रूर दे देना

आ बाघ

आ बाघ !
इस तरह से आ
हमें अच्छा लगे
किसी सुन्दर आवरण में आ
बस, पंजे छिपा ले हमारे दादा !
दाँत ढक ले हमारे आक़ा !

आ-आ
आ हमारे बाबा !
हाथ जोड़ते हैं
पाँव पड़ते हैं

सच नहीं बोलना है
मत बोल
कुछ बोल
झूठ ही सही
कुछ बोलते रह
लगे कि नया-नया
बहुत कुछ होने जा रहा है
हम भी तुम्हारे साथ
कुछ-कुछ बोलते रहेंगे
हवाई सपनों की खुमारी में
सबको डुबोए रखेंगे
अपने विपक्षी
कुछ नहीं करेंगे
विश्वास करो दादा !
यक़ीन रखो बाबा !

सूर्य और तारे चंदा

सुबह-सुबह
सूर्य ने
तारों को
चंदा को
उजाले के कमरे में
बन्द किया

शाम बीतते ही
तारों ने
चंदा ने
दरवाज़े तोड़
मुक्ति की साँस ले
सूर्य को फाँस लिया
अँधेरे और
चाँदनी के
कमरे में
क़ैद किया

सपनों से बनते हैं सपने

हम कन्धों-भर लाते हैं सपने
जंगल से
गाँव
शहर
नगर
महानगर
अन्तरिक्ष से

छाया में
धूप में, सूखाते हैं
पानी खिलाते हैं
जाड़ा सहाते हैं
सपने हो जाते हैं सीजण्ड

हम दुनिया को देखते हैं
सपनों के हाथ लिए
ज़मीन से
आकाश से
अँधेरे
उजाले में

हमारे सपनों से बनते हैं सपने
गली-गली
सपने रोप
ख़ुद भी
सपनों का जीवन बन
सपने बचा रखते हैं ।

वह 

वह पत्थर पूजता है
मोम नहीं
इसलिए कि अन्दर का मोम
पिघले नहीं
पत्थर बने

वह निराकार मानता है
रूप नहीं
इसलिए कि असली रूप
दिखे नहीं
अदृश्य बने

और वह
शिकार खेलता रहे
इसी वन में

कवि की आवाज़ 

कवि की सघन आवाज़ की
उफ़नती परतें उठा कर देखो
तुम्हें बहुत कुछ मिलेंगे :
चाँद के रूप
मेघों के रंग
आग-हवा-पानी के पैर
मिट्टी-पत्थर-काँटों के हाथ
पौधों के गीत
कम्प्यूटर की महक
मोबाइल के दृश्य
अन्तरिक्ष के रहस्य
आत्मा के बोल
जीभ

जीभ घायल है
अपने ही दाँतों से

चहकती चिड़िया 

एक दिन
चहकती चिड़िया
आ गई मेरे पास
बड़ी ख़ूबसूरत थी चिडि़या

मैंने एक-एक अंग
बड़े गौर से देखा
सुन्दरता की ज्योति
कहाँ से आई ?
मैं समझ न सका

चिड़िया की कोमल चोंच में
तिनका था
चिड़िया ने बडे़ यत्न से
बड़े प्रेम से
एक घोंसला बनाया
हम दोनों साथ-साथ
घोंसले में रहने लगे
सुबह हुई-न-हुई
चिड़िया
उड़ गई
देखते-ही-देखते
आकाश में दूर
बादलों से आगे
चाँद-तारों के उस पार
गुम हो गई चिड़िया

रह गई चिड़िया की छवि
रह गया घोंसला
खाली, उदास

लोगों की नज़र
जब घोंसले पर पड़ती है
चिड़िया याद में चहकती है

बहेलिये

बहेलिए !
क्या बताओगे
हिमालय के आँचल में
विश्राम करते देवदारों की
उदार भव्यता और
उनके शीर्ष पर
मचलने वाली चिडि़यों के
गीतों की मोहकता
तेरे मन के
किसी छोर को क्यों नहीं छूतीं ?

नदी में कोई कंकड़ न डाले

नदी बहती है
इतिहास रचती है
उसकी कल‍-कल धारा का
गीत होता है
गीत कोई अवरुद्ध न करे

सुबह से शाम तक
शाम से सुबह तक
नदी
सूर्य को
चाँद.तारों को
धरती को
सीने से लगाए
लगातार चलती है
पथरीले पथ पर
पाँवों में पड़ते छाले का
ग़म नहीं

हमारे गाँव की
एक नदी है
अनन्त काल की नदी
कहाँ से आती है ?
कहाँ जाती है ?

हम नहीं जानते
सिर्फ़ इतना जानते हैं
यह तटों के बीच से
तटों के पार जाती है
नये तट बनाती है
प्यासों की तृप्ति में
फ़सलों की हँसी में
इसकी मुस्कान रहती है

पहाड़ी सीने का दर्द
पत्ती- टहनी की कहानी
पक्षी की पंख-कथा
गाय-बाघ के पग-चिह्न
कुल्हाड़ी की धार
हमारे मन का कसैलापन
गोलियों की तड़प
बमों के खण्डहर
ख़ूनी हाथों की दुर्गन्ध
जीवन-मृत्यु के नाटक
बहुत कुछ लिए-दिए
चल रही है नदी

ध्यान रखना
नदी में कोई कंकड़ न डाले

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