शरद चन्द्र गौड़ की रचनाएँ

प्यासी इंद्रावती

नीर विहीन
इंद्रावती
बहती है मेरे घर के तीर
कभी छूता था उसका जल
मेरे घर की चौखट को
बरसात में
चौखट भी अब कहती
मै हो गई अब नीर विहीन

मेरे तट पर बजती
महादेव की घण्टियाँ
मेरे जल से
बुझती
लोगों की प्यास
मेरे तट पर
मिलती है
मृत आत्माओं को ‘शांति’
मेरे जल में झिलमिलाते हैं
आस्था के दीप
धुलते हुए गंदे कपड़े
नंग-धड़ंग उछलते-कूदते
नहाते बच्चे मेरे जल में
मैं किस के पास जाकर गाऊँ
अपना दुखड़ा
मैं भी तो हूँ अब नीर विहीन

मेरा जल चोरी हो गया
मैं हो गई अपहृत
मेरी ही सहयोगिनी ने
मुझे लील लिया या
मुझे जबर
उसके हलक में
उड़ेल दिया
ये तो जोरा ही जाने

काला हाण्डी मेरा मायका
वहीं जन्मी मैं
बस्तर में पली बड़ी
जगदलपुर और चित्रकूट
का स्नेह मिला
गोदावरी मेरी ससुराल
जहाँ मेरे नाम का
अस्तित्व हो गया विलीन
और मैं बन गयी गोदावरी
जोरा ने मुझे चुरा लिया
मेरा साथ मेरे मायके ने
ही नहीं दिया
गोरियाबहार और नारंगी नदी
ने दिया मुझे सहारा

जन-जन की प्यास बुझाने वाली
मैं खुद प्यासी हूँ
इस आस में
हाथ उठेंगे जन-जन के
बुझाने मेरी प्यास, बस्तर की प्यास
आस्था की प्यास, विश्वास की प्यास
मुझे है विश्वास, मुझे है विश्वास

जल अब तो आजा

कुंभी के अब नहीं
होते दर्शन
तालाब उदास खग-विहीन

शंख, कमल, तरंग
अब दिखते नाही
टोंटी भी है जल-विहीन

शहर उठा है आस लगाए
गुण्डी, धड़ा, मटका लिए
लड़ते रहते
बात-बात पर
करते तू..तू, मैं..मैं
टोंटी उनको खूब निहारती
मैं अब तक हूँ नीर विहीन

मछली ने अब चलना सीख लिया
जीना सीख लिया
जल-विहीन
अब तो आजा अब तो आ जा
टोंटी भी अब आस लगाती
पानी आजा पानी आजा

नोनी की नेनो

काम वाली बाई ने
अपनी बच्ची को
नोनी कहकर बुलाया
नोनी सरपट भाग कर आई
मुझे लगा कहीं यह
टाटा की नेनों तो नहीं

‘‘बस्तर’’ में छोटी बच्ची को
कहते हैं नोनी
अँग्रेज़ी में छोटा-कण कहलाता है
नेनो
इस असाधारण समानता ने
मानों दो भाषाओं का
संगम बना दिया
नोनी को नेनो और
नेनो को नोनी बना दिया

नोनी भी चुलबुली और चंचल है
सरपट भागती है तो लोग उसे देखते हैं
नेनो को देखने के लिए भी
लोग तरसते हैं

पूरे चेनलो में
नेनो की बहार है
मानो नेनो को देखकर ही पेट भर जाएगा
फिर नोनी की भूख कोन मिटाएगा

लाख रूपये का कोई मायने नहीं रहा
नेनो चलाने वाला भी गरीब कहलाएगा

नई सुबह आएगी

धूल के गुबार से भरा शहर
एक नई सुबह तो आएगी
आशावान है ये कवि

गिरती दीवारें, टूटती सड़कें
गड्ढों पर उछलती गाड़ियाँ

नुक्कड़ पर पड़ा कचरे का ढेर
आवारा पशुओं का सड़क पर बसेरा
उजड़ते आशियाँ को निहारती
टुकुर-टुकुर आँखें
भविष्य की चिंता में
वर्तमान की चिता को दहकता देख

एक मद्धिम सी रोशनी की आस में…….
एक नई सुबह तो आएगी
आशावान है यह कवि…

कचरे का डब्बा

मेरे घर की पहचान
कचरे का डब्बा
मेरे घर का पता
कचरे के डब्बे वाली गली
मुझे नमस्ते करता
कचरे का डब्बा
दादी से रोज़ मिलता
बतियाता और आँखे दिखाता
कचरे का डब्बा

सोचता हूँ
कचरे का डब्बा ना होता तो
मामाजी को घर नहीं मिलता
जानवरों को ढोर नहीं मिलता
कचरे के डब्बे ने
लगाम लगा दी
तेज़ रफ़्तार से आने वाले
वाहनों पर
सामने आ खड़ा हुआ
सीना तान
कचरे का डब्बा

कचरे के डब्बे के
इतने फ़ायदे हैं
कि अब तो
उसकी बदबू भी भीनी खुशबू
लगती है
बेख़ौफ़
मोहल्ले के लड़के
सड़क पर खेलते हैं
क्योंकि
बेतरतीब फैले कचरे ने
रास्ता रोक
सड़क को मैदान बना दिया है

सफ़ाई को मुँह चिढ़ाता
कचरे का डब्बा
शहर के सौन्दर्यकरण
से ख़फ़ा
कचरे का डब्बा
मेरे घर की पहचान
कचरे का डब्बा

मैं पानी हूँ 

मैं पानी हूँ
आपकी आँखों का पानी
प्यासे की प्यास
बुझाने वाला पानी
रंगहीन, गंधहीन पानी
झील नदी नालों
पोखरों
तालाब और कुँए का पानी
वर्षा का पानी
ओस का पानी
समुन्दर का लहलहाता
इठलाता बलखाता पानी
बर्फ़ का जमा
बादलों का वाष्पित पानी

नदियों में बहता
तालाब पोखरों में बँधता
बादलों में आसमान छूता
उड़ता बरसता
फिर बहता
मैं रूकता नहीं
मैं चलता रहता हूँ
अपनी मंज़िल की ओर
सारा जहाँ मेरी मंज़िल

समंदर मेरा अन्तिम पड़ाव
जहाँ पर भी
मैं मारता हिलोरे
और उड़ जाता
बादल बन कर

मेरे बिना जीवन नहीं
मेरे बिना जग नहीं
मैं ना गिरूँ तो
पड़ जाता सूखा
मैं बरस पड़़ूँ
तो आ जाती बाढ़

मेरे जीवन चक्र
को मत रोको
मैं अनमोल हूँ
मुझे सहेजो

कुम्हार का घड़ा

आज मैने घड़़ा बनाया
घूमते हुए चाक पर
गीली मिट्टी को चढ़ा
अपनी हथेलियों और
अँगुलियों से सहेजकर

चाक पर चढ़ी
मेरे हाथों से घूमती मिट्टी
मुझ से पूछ रही थी
मेरा क्या बनाओगे
जो भी बनाओं
घड़ा या सुराही
दिया या ढक्कन
बस बेडौल नहीं बनाना

घबराहट में वह
इधर-उधर गिर जाती
और ताकती
बूढ़े कुम्हार की ओर
ये तुमने
किसे बिठा दिया चाक पर
मेरा रूप बनाने
नौसीखिये हाथों में
ढलती मिट्टी
चिन्तित है अपने भविष्य पर
मैनें भी देखा
बूढ़े कुम्हार की ओर आस से
वह मेरी मंशा समझ गया
और उसने अपना हाथ
लगा
सम्हाला मिट्टी को चॉक पर
मिट्टी में भी जीने
की आस बंधी
और संभल गई वह चॉक पर

एक सुन्दर सा घड़ा बन गया
आज मेरे हाथ से
घूमते हुए चाक पर

जगदलपुर का वीरान प्लेटफार्म

मैं वीरान प्लेटफार्म
जगदलपुर रेलवे स्टेशन का
इंतज़ार में
एक मात्र पैसेन्जर का
पलकें बिछाए
जीवित हो उठता हूँ मैं
जब आती है पैसेन्जर
मुसाफ़िरों का कोलाहल
चढ़ते-उतरते यात्री
फिर आती है
सीटी की आवाज़
और चली जाती है पैसेन्जर
मुझे फिर वीरान कर
कब्रिस्तान सा सन्नाटा
सूई के गिरने की आवाज़
भी गोली चलने-सी लगे

मैं के०के० लाईन का
महत्त्वपूर्ण प्लेटफार्म
मेरे सामने से चली जाती है
धड़धड़ाती मालगाड़ियाँ
लोहा भरकर
मुझे बिना छुए
और मैं उनको ताकता
ठगा-सा महसूस करता
रोता हूँ अपने भाग्य पर

हीराकुण्ड और समलेश्वरी
ने भी
मेरी सुध नहीं ली
रायपुर-दुर्ग की
गाड़ियाँ भी मैं
ना देख सका

मेरे सीने पर तनी है
एक मात्र चाय की दुकान
अपने भाग्य पर रोती
मुसाफ़िरों के इंतज़ार में

मैं देखता हूँ
उस टिकिट की खिड़की को
रोज़
जहाँ कभी मुसाफ़िरों को
टिकट लेने
लाईन में नहीं
लगना पड़ता

बाहर खड़े
इक्का-दुक्का रिक्शे ऑटो वालों
का इंतज़ार अब ख़त्म
नही होगा
क्योंकि
एक मात्र पेसेन्जर आज कैंसिल है

मेरा रिजर्वेशन काउंटर
सबसे आबाद
राजधानी हो या छत्तीसगढ़
गोंडवाना हो या समता
हीराकुण्ड हो या समलेश्वरी
दिल्ली के मुसाफ़िर हों या
कोलकाता के
मुम्बई के राही हों या बेंगलोर के
सब यहाँ मिलते
और मुझे चिढ़ाते
लेकिन मेरी
ख़ामोशी को
ये ही पी जाते
इस इंतज़ार में
कब वो चढ़ेंगे
यहाँ से
अपने गंतव्य को

मै वीरान प्लेटफार्म
देखता रहता
उनको टुकुर-टुकुर

बसंत ऋतु के बासंती पौधे 

ऋतु बदली
आया बसंत

बसंती चादर से
सुशोभित वसुंधरा
सूखे पत्ते उड़ते
इधर-उधर
दरख़्तों पर सुशोभित
बासंती कोमल पत्तियाँ

आम बौरा गए
हो गए बासंती
मधुर सुगन्ध से
सुगन्धित वसुन्धरा
साड़ी में लिपटी
बलखाती, मुस्काती
लकदक यौवन के
मद में मदमाती नवयौवना

धूल के गुबार
उड़ते पत्तों का बवंडर
सबको चिढ़ाते
‘शान से इठलाते
बासन्ती पत्तों से लिपटे दरख़्त

ऋतु बदली आया बसन्त

इंद्रावती की यात्रा 

कल कल करता मेरा पानी
वींणा की मधुर झंकार सुनाता

महादेव घाट के मंदिर मुझको
आस्था की घण्टियाँ सुनवाते

मेरे मीठे पानी से पशु-पक्षी-मनु
अपनी प्यास बुझाते

दूर देश के लोग मेरे
जल-प्रपात के दर्शन पाते
इंद्रधनुषी चित्रकोट की
सुन्दरता में खो-खो जाते

मैने देखे क़दम-क़दम पर
नई-नई भाषा बोलने वाले
गोरे काले साँवले
नाटे ऊँचे तरह-तरह के लोग

मैने देखी डगर-डगर पर
नित नई जाति अलग-अलग
और देखे अलग-अलग
मज़हब को मानने वाले

मैने जीती मेराथन
कालाहाण्डी से भद्रकाली
मैने पिया छोटी-बड़ी नदी
नालों का पानी

मेरे हाथों पर
खड़े हुए है, छोटे-बड़े पुल-पुलिए
मेरी रेती से खेलकर छोटे बच्चे
बड़े हुए

मैनें कभी किया नहीं मना
अपना पानी पीने से
मैने किसी को टोका नहीं
कपड़ा धोने और नहाने से
मेरे मीठे पानी ने
कभी किसी से कुछ नहीं माँगा
फिर भी मुझे चुराने
क्यों हृदय मनु का नहीं सकुचाया

मेरा पानी गिरकर बिजली बन जाता
रोशन करता झोंपड़-पट्टी
और खुशियाली लाता
ना जाने कितने जीव-जन्तु
मुझमें जीवन बसर करते
मुझको जीवन देते और लोगों का
उदर भरते

मैं मरणासन्न मेरी साँसे
धीरे-धीरे चलती हैं
स्टेथस्कोप गले में टाँगे
डॉक्टर के लिए आँखें तरसती हैं

ऐसा लगता मानों
अस्पताल में पड़ी मरीज़ हूँ
मुझे देखने आए पर्यटक
मानों विजिटर बनकर आए है
मेरी पतली धारा देख,
सिर पीट खिसियाए हैं
यादें ताज़ा करते वे
मेरे कल-कल पानी की
चौड़ाई में बहती थी में
इंद्रधनुषी छटा लिए
अब तो ताकती एकटक
उड़ते बादल आसमाँ में
कब बरसेंगे-कब बरसेंगे

और ताकती उन ’गेटों’ को
जिनने मुझको बन्द किया
और ताकती उस नाले को
जिसने मुझको चुरा लिया
मेरी यात्रा जारी है
चाहे जितनी बाधा आए
चाहे जितनी बाधा आए

मृग-मरीचिका 

मैं मृग-मरीचिका
प्यासे को पानी का आभास दिलाती
मैं पानी का मोल बताती
मैं पानी को अनमोल बनाती
मैं मृग-मरीचिका

रेगिस्तान में उठती
गरम हवा की लहर हूँ मै
मानों शांत पानी में
किसी नें कंकड़
मार दिया हो

मैं पानी की एक-एक
बूँद को तरसते
मरूस्थल की पहचान हूँ
कभी मेरी छाती पर
मारता था हिलोरे
समन्दर का पानी
उसी पानी की आस में हूँ मैं

मैं मीठे पानी के
स्त्रोत का
रास्ता जानती हूँ
मैं हारे-थके प्यासे
काफ़िले में
जीने की आस बँधाती हूँ

अनमोल पानी का
झरना नहीं हूँ मै
कुँए और सरोवर का
मीठा पानी भी नहीं हूँ मैं
मैनें तो पानी को
कभी छुआ तक नहीं
मुझे तो पानी कभी दिखा ही नहीं
मैं तो बस
प्यासे की प्यास हूँ
मैं तो बस
पानी का अहसास हूँ

तरस 

मुझे उसकी बुद्धि , पर तरस आता है
चाँद पर जो थूकने निकला
उसकी अक्ल पर तरस आता है

चाँद पर गर थूकोगे तो
थूक तुम्हारे ऊपर ही गिरेगा

चाँद पर गर थूकना है तो
सितारे बन जाओ
अपनी चमक से
जग को चमकाओ
झिलमिलाओ टिमटिमाओ

मत थूको चाँद पर
उसे रहने दो चाँद
गटक जाओ अपने थूक को
पी जाओ अपने क्रोध को
प्यार से किसी को गले लगाओ
तुम चाँदनी बन जाओ
तुम चाँदनी बन जाओ

उजाले की ओर

गुम हो जाते हैं उजाले
गहरी अँधेरी रातों में
एक दिया तो जलाओ

भटक जाते हैं मुसाफ़िर
अनजानी राहों में
एक हम-सफ़र तो बनाओ

जंग लगी नौकर-शाही का
भ्रष्टाचार देखकर
ऐ क़लम के सिपाही
क़लम तो उठाओ

बहाते हैं ख़ून, बेगुनाहों का
साम्यवाद-माओवाद के नाम पर
कोई कार्ल मार्क्स का एक रूक्का
इनको पढ़ कर तो सुनाओ

उजड़ी माँग, बिलखती माँ, यतीम बच्चे
कोई इन्हे इन्सानियत तो सिखाओ
कोई इन्हे इन्सानियत तो सिखाओ

गधा कम्प्यूटर

मैं हमेशा दौड़ में
पिछड़ जाता
हैंग हो जाता, स्लो हो जाता
हर प्रकार के वायरस मुझे सताते
मुझे चलाने वाले
हाथ से काम कर
मुझ से आगे निकल जाते
मैं गधा कम्प्यूटर
मेरी विंडो खुलने के पहले
क्लोज हो जाती
मेरी मदर बोर्ड मुझे सताती
मेरा प्रिंटर
एक घण्टे में
एक प्रिंट निकालता
मैं गधा कम्प्यूटर

मुझे चलाने वाला
रोज़ झल्लाता
माऊस टेबल पर पटकता
और खाम-खा
की-बोर्ड के बटन
खटखटाता
कुर्सी पर पीछे झुकता
माऊस से
मिनीमाईज-मेक्सीमाईज करता
सी०पी०यू० के डब्बे को
हाथ से ठक…ठकाता
यू०पी०एस० के तारों को
निकालकर पुनः लगाता
अपनी क़िस्मत को कोसता
और पुनः
की-बोर्ड के बटन
खटखटाता
मैं गधा कम्प्यूटर

मेरा एंटी-वायरस
खुद वायरस से
इन्फेक्टेड हो जाता
अपग्रेड करने के लिए
रोज संदेश पढ़ाता
वायरस मेरे साथ
गुल्ली-डंडा खेलते
मेरे कहने पर कि
मैं एण्टी-वायरस हूँ
मुँह टेढ़ा कर जीभ चिढ़ाते
मैं हैरान-परेशान
ताकता अपने चलाने वाले को
और सोचता
मैं हूँ गधा कम्प्यूटर

बस्तर– बदलते रूप ज़िन्दा परम्पराएँ 

आँखों पर चश्मा
सिर पर साफ़ा, कमर में लुंगी बाँध
चल पड़े
अपनी मंज़िल की ओर
साईकिल के पैडलों पर
ज़ोर लगाते
पीछे अपनी पत्नी को बिठा

उल्लासित, प्रसन्न
अपनी मस्ती में मस्त इंतज़ार में
‘दी घर का
नगाड़ों की आवाज़
हल्दी की महक
महुए की मंद (मदिरा) की तीखी ख़ुशबू
मदहोश करती, मस्त करती
मस्ती में सरोबार करती
परम्पराओं का निर्वहन
संस्कृति का संवहन करती

चक्रव्यूह 

ना जाने
किस चक्रव्यूह में
फँस गया हूँ मैं
होऊँगा कब आज़ाद
किस तरह कुछ पता नहीं

याद है
मुझे वो दिन
जब गया था में
शिकार पर
पंछी फड़-फड़ा रहा था
मेरे बिछाए जाल में
कुछ मेरी ही तरह

मुझे मिल गई
मेरी मंज़िल
मेरे बिछाए जाल में
मैं किस की मंज़िल हूँ
कुछ पता नहीं

ज़िंदगी को चाहे जितना सँवार लो
किसने देखी हे क़ब्र खोद कर
ना जाने कब से आँखे क्यों जल रही
लगता है मंज़िल क़रीब है सोने के लिए

बचपन 

लड़ते-झगड़ते
और शिकायत करते
ये छोटे-छोटे बच्चे
फिर मिल जाते
क्षण भर में
खेलते-कूदत
किलकारियाँ भरते
ये छोटे-छोटे बच्चे

इनको खेलता देख
जी उठता हूँ मैं
इनको झगड़ता देख
बचपन की यादों में
खो जाता हूँ मैं
इनकी निश्छल हँसी
कराती है मुझे
मंदिर का-सा अहसास

काश समय का चक्र
उलटा घूम जाता
और मुझे
अपना बचपन पुनः मिल पाता

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