शशिकान्त गीते की रचनाएँ

गूलर के फूल

कथित रामप्यारे ने देखे
सपने में गूलर के फूल।

स्वर्ण महल में पाया ख़ुद को
रेशम के वस्त्रों में लकदक
रत्नजड़ित झूले पर झूलें
बीबी- बच्चे उजले झक
दुख- दर्दों के पर्वत सारे
नष्ट हो गए हैं सहमूल।

देशी और विदेशी व्यंजन
ढेरों फल, रोटी-तरकारी
दूध-दही की नदियाँ आँगन
दरवज्जे मोटर सरकारी
क़दम- क़दम पर अफ़सर नौकर
जबरन सेवा में मशगूल।

इसी बीच बच्चे रोए तो
सुन्दर- सुन्दर सपना टूटा
भीतर- बाहर वैसा ही था
जैसा अर्धरात में छूटा
गुदड़ी में उग आए ढेरों
पोर- पोर में चुभे बबूल।

ख़ुद देखें या लोग दिखाएँ
सपने तो केवल सपने हैं
संसद में भी बुने गए जो
कागज- पत्तर ही छपने हैं
सोच- समझकर मिल को निकला
उत्तर दिशि में थूकी भूल।

जादू-कथा

भैया रे ! ओ भैया रे !
है दुनिया जादू-मन्तर की.

पार समन्दर का जादूगर
मीठा मन्तर मारे
पड़े चाँदनी काली, होते
मीठे सोते खारे
बढ़ी-बढ़ी जाती गहराई
उथली धरती, खन्तर की ।

अपनी खाते-पीते ऐसा
करे टोटका-टोना
कौर हाथ से छूटे, मिट्टी
होता सारा सोना
एक खोखले भय से दुर्गत
ठाँय लुकुम हर अन्तर की ।

उर्वर धरती पर तामस है
बीज तमेसर बोए
अहं-ब्रह्म दुर्गन्धित कालिख
दूध-नदी में धोए
दिग-दिगन्त अनुगूँजें हैं मन
काले-काले कन्तर की ।

पाँच पहाड़ी, पाँच पींजरे
हर पिंजरे में सुग्गा
रक्त समय का पीते
लेते हैं बारूदी चुग्गा
इनकी उमर, उमर जादूगर
जादू-कथा निरन्तर की ।

लोक अपना

आग पानी में
लगाने का इरादा
क्या हुआ ?

वे तने मुठ्ठी कसे थे
हाथ सारे
तालियों तब्दील कैसे हो गए
जलती मशालों से उछलते
हौंसले भी
राजपथ की रोशनी में खो गए
और रोशनदान से
गुपचुप अन्धेरा
है चुआ ।

चट्टान- से संकल्प कल्पित
बर्फ़ वाले ढेंकुले-से
हैं अचानक गल बहे
और शिखरों पार से आती
हवाओं के भरोसे
ध्वज बिना फहरे रहे
लोक अपना
स्वप्न बनकर
रह गया फिर अनछुआ ।

ओ मेरे मन 

ओ मेरे मन !
सागर से मन !
हिरना मत बन ।

नेह नदी ढूँढ़े
दो बून्दें ही भारी
रेतीले रिश्तों की
छवियाँ रतनारी
उकसाए प्यास
रचे, पाँव-पाँव
कोरी भटकन ।

मरूथल में तूने जो
दूब- बीज बोए
बादल से, खोने का
रोना मत रोए
हर युग में
श्रम से आबाद हुए
ऊसर, निर्जन ।

समय की शान 

दुक्ख- सुख अपने कहें किससे
नहीं सुनता कोई
लोग कहते हैं कभी
दीवार के भी कान होते थे।

हम खुले पन्नों सरीखे
देख लेते हैं सभी पर
बाँचकर गुनता नहीं कोई
विजय-पुष्पों से पड़े हैं
राजपथ के श्लथ किनारों
धूल से चुनता नहीं कोई
पारदर्शी सदानीरा में
सिराये दीप- से हम
लोग कहते हैं कभी
धर्मों धरा की आन होते थे।

इतिहास के दोहक, नियामक
दोहते हमको, हमारे विगत को
ताज़ा कहानी से
हम रहे संघर्षरत हैं
सर्वदा बहती नदी के
सर्वथा निर्दोष पानी से
ठग रहे उजला समय
ज्योतित अँधेरे अन्यथा
लोग कहते हैं कभी
हम ही समय की शान होते थे।

बचपन के दिन 

बचपन के दिन
और गाँव के
जाते नहीं भुलाए ।

सरना काका की दुकान के
पेड़े, सेंव, जलेबी गुड़ की
बाड़ी वाले पीरू चाचा
बेर बीन देती वह बड़की
वह नरेन्द्र, वह भागचन्द
चंचल सरोज और संध्य़ा निर्मल
गुल्ली- डण्डा, गड़ा- गेन्द की
अब तो मीठी यादें केवल
कांक्रीटों के जंगल के यह
केवल बहुत सताए ।

छकड़े में या पैदल-पैदल
रेवा-तट बड़केश्वर जाना
माँ की उँगली पकड़ नहाना
रेती में कुदड़ाना, खाना
नीम तले खटरा मोटर का
युगों-युगों-सा रस्ता तकना
और निराशा की झाड़ी में
मीठे बेर यक-ब-यक पकना
ख़ुशियों का यह
चरम लौटकर
फिर आए न आए ।

शोहरत है शाह की 

ईसा के हाथ कटे
शोहरत है शाह की ।

बने खूब ताजमहल
राजसी अहं के
अन्तहीन रात सघन
ठाठ हुए तम के
अर्थहीन दीप शब्द
भाषाएँ सलाह की ।

शब्द आज बन बैठा
अर्थ का दरबारी
आत्मबोध करता क्यों
स्वयं से किनारी ?
सत्य को ज़रुरत सच
आ पड़ी पनाह की ?

भटके श्रम भूखा ही
धूर्त फले- फूले
मरुथल में नाच रहे
रेत के बगूले
किसे पड़ी प्यासे की
आह की, कराह की।

एक नपुंसक चुप्पी 

किस से शिकायत गूंगा,
बहरा और अपाहिज काजी ।

हमने अपने छोटे- छोटे
खेतों धूप-चाँदनी बोई
जरा नज़र चूकी, अधकचरी
फ़सलें काट ले गया कोई
शंकित नज़रों के उत्तर अब
शब्द चीख़ते वाजी ! वाजी !

कुछ रोटी, कुछ सुविधा के भ्रम
उजलों ने राशन पर बाँटे
सरेआम ठेकेदारों ने
प्रजातन्त्र को मारे चाँटे
एक नपुंसक चुप्पी कहती
मियाँ और बीबी हैं राजी ।

दिन हुआ बूढ़ा हलाकू

हो गया है
इन दिनों क्यों
बेवज़ह मौसम लड़ाकू ।

हो चली है
ख़त्म सारी
मान्यताएँ सुबह की
चल पड़ी हैं आँधियाँ
सर्द औ’
गूँगी ज़िबह की
सड़क पर दौड़ता
पागल समय
ले हाथ में चाकू ।

ढल गई है
दोपहर
अपनी छिपाए प्रौढ़ता
सूर्य
ठण्डी धूप का
आँचल नहीं है छोड़ता
साँझ के चिन्ह
चेहरे पर
दिन हुआ बूढ़ा हलाकू ।

महानगर 

महानगर के मेरे भैया
बड़े अजब हैं ढंग

ठुँसे वाहनों लोग, रोग हैं
जाने क्या-क्या पहने
भरी अटैची-बैग हाथ में
लुटे हुए हैं गहने

रंग-बिरंगी सुबह, शाम तक
हो जाती बदरंग

धुआँ कसैला रोके सांसें
गला दबाती रोटी
गिद्ध-बाज ज़िन्दा लाशों की
नोचें बोटी-बोटी

जीवन टुकड़े, हर टुकड़े की
अपनी-अपनी जंग

दिन उलझाए रखते तन-मन
झकझोरे हैं रातें
और उमस में घुट दम तोड़े
थकी-डरी-सी बातें

विकृत हवा यहाँ हो जाती
इसके-उसके संग

रोते-रोते हँस देता है
हंसते-हंसते रोता
सतत् जागता पगलाया-सा
कोलाहल है ढोता

मन, मस्तिष्क, हृदय पथराए
लगता पड़ा अपंग

नदी रोशनी की बहती है
अन्धियारे में कूल
चिकनी सड़कों पाँव फिसलते
चुभते मन में शूल

बार-बार गाते बाउल का
स्वर हो जाता भंग

इक राजा था, इक रानी थी

इक राजा था, इक रानी थी

राजा-रानी अपनी सोचें
मंत्री-सैनिक परजा नोचें
लूटमपाट-डकैती-चोरी
और करों की मनमानी थी

भूखी-प्यासी खालिस परजा
गिरवी सांसें, भारी करजा
ढोर- डांगरों को भी मुश्किल
सूखी कड़बी औ’ सानी थी

बस्ती-वन रेती के सूबे
सरकारी रोगों में डूबे
राज-समाज मूल्य जर्जर पर
राज-काज को क्या हानि थी

अन्त सबुर का बन्धन टूटा
चुप्पी भीतर लावा फूटा
डूब मरे सब खल मंसूबे
और महल में वीरानी थी

राजा-रानी नहीं रहे पर
सबकुछ वैसा भीतर-बाहर
रुग्ण व्यवस्था में न आ सकी
जो बदलावट आनी थी

आसमान गुमसुम रहता है

आसमान गुमसुम
रहता है ।

सूरज के बिगड़े घोड़ों की
भारी-भारी टापें
जिनकी धमकों से औरों के
रोएँ-रोएँ काँपें
ऐसी विकट
जुल्म की सत्ता
छाती पर चुप-चुप
सहता है ।

मन्दिर-मस्जिद का बुनियादी
पत्थर-पत्थर गलना
पर्वत-पर्वत से कतरा
नदियों का
राह बदलना
देख विवश टिम-टिम आँखों से
बिन बोले क्या-क्या
कहता है ।

एक टुकड़ा धूप 

एक टुकडा़ धूप ने ही
अर्थ मुझको दे दिया ।

जागरण का भ्रम धरे मैं
दरअसल सोता रहा
गहरे अहं में डूबकर
क्या न क्या खोता रहा?
शेष है कितना समय
ओह मैने क्या किया ?

स्वप्न- सृष्टा चान्दनी के
मोह- पाशों से निकल
आज ही मैंने जिए हैं
दो पलाशी- पल असल
आज मैंने क्या गरल के
पात्र में अमृत पिया ?

कम्प्यूटर-रोबोट

हम रिमोट से चलने वाले
कम्प्यूटर-रोबोट।

धरती पर है पाँव
और मन
अन्तरिक्ष में खोए
रठराए हैं
स्वस्थ बीज, नव-
उपग्रह पर बोए
कहाँ समय जो ढूँढ़े कोई
आख़िर किसमें खोट।

चुकी बैटरी,
ध्वनियाँ मद्धिम,
सी० पी० यू० गतिहीन
किसी तहलका
डॉट काम पर
भूखे हैं तल्लीन
आँखें सहमी फटी-फटी-सी
और सिले हैं होंठ।

उनके खेल,
ज़रूरत जितनी
उतनी विद्युत धारा
उनकी ही
मरज़ी पर निर्भर
अपना जीवन सारा
बटन दबे औ’ हम तो छापें
पट-पट अपने वोट।

धार समय की

ऋषिकेश में गंगा जैसी
बहुत तेज़ है धार समय की

शंख-सीपियाँ, मूँगे-मोती
बह जाते हैं
कुहरे डूबे, कटे किनारे
रह जाते हैं
पत्थर टुकडे़-टुकडे़ होते
बहुत बुरी है मार समय की

गतियों के सारे भ्रम
टूट, डूब जाते हैं
दुस्साहस के हाथों
बुझे अहम आते हैं
भग्न किलों से भी जाना है
जीत हुई हर बार समय की

अम्मा चली गई 

पूजा-घर का दीप बुझा है
अम्मा चली गई।

अन्त समय के लिए सहेजा
गंगा-जल भी नहीं पिया
कितनी तो इच्छा थी लेकिन
कोई तीरथ नहीं किया
बेटों पर विश्वास बड़ा था
आख़िर छली गई।

लोहे की सन्दूक खुली
भाभी ने लुगडे छाँट लिए
औ’ सुनार से वज़न कराकर
सबने गहने बाँट लिए
फिर उजले संघर्षो पर भी
कालिख मली गई।

रिश्तेदारों की पंचायत
घर की फाँके, चटखारे
उसकी इच्छाओं, हिदायतों
सपनों पर फेरे आरे
देख न पाती बिखरे घर को
अम्मा ! भली गई।

माँ के सपने

माँ के सपने, केवल अपने
सुख-दुख भी तो
होते होंगे ।

सूख गई
हैं फ़सलें सारी
खरपतवारों के आने से
जुगनू निकल न पाए बाहर
अन्धकार के
तहख़ाने से
कोई सिसकी नहीं सुनी पर
क़ैदी चुप-चुप
रोते होंगे ।

अमरित
चाहें देव भयाकुल
विष चाहें, विश्वासी योगी
नीलकण्ठ-सी
सिद्ध-साधना
केवल साधक माँ की होगी
सारे बोझे ढोती जैसे
शेष धरा को
ढोते होंगे ।

राखी धागा सूत का

राखी धागा सूत का, पक्का जैसे तार
पावनता निस्सीम है, दुनिया भर का प्यार।

घड़ी देख कर ताकती, बहना अपलक द्वार
भैया चाहे व्यस्त हों, आएँगे इस बार।

अम्मा-बापू चल बसे, भैया का परिवार
भौजी ने बदला सभी, मैके का व्यवहार।

जात-पात, छोटा-बड़ा, नहीं धरम अरु नेम
सिखा हुमायूँ भी गया, बहन-भ्रात का प्रेम।

बहना प्यारी मित्र है, है माँ का प्रतिरूप
गरमी में छाया घनी, सरदी में है धूप।

बूँदों ने क्या छुआ देह को

बूँदों ने क्या छुआ देह को
जले ठूँठ हरियाए ।

महक उठी धरती
सारंग के
लगे नाचने पाँव
रास नहीं आएगा किसको
भला, भला बदलाव

अँकुराए आँखों में अनगिन
सपने दूध नहाए
बूँदों ने क्या छुआ देह को
जले ठूँठ हरियाए ।

मीठी- मीठी हवा
पुलक उठते हैं
मरियल पात
देर हुई पर मौसम ने दी
क्या प्यारी सौगात

जैसे बरसों बाद किसी
प्रिय का प्यारा खत आए
बूँदों ने क्या छुआ देह को
जले ठूँठ हरियाए ।

मस्ती के फाग

डाल कर के
पेट में महुए की आग
खेलते हैं कोरकू मस्ती के फाग

भूल कर
भूख के हैं, सारे लफड़े
पहनकर सूद के ये मोटे कपड़े
निचुड़ी योजना के
छेड़े हैं राग

फागुन
के रंग रंगे सूखे पलाश
धरती पर पाँव धरे आँखों आकाश
अपनी चादरिया लें
औरौं के दाग़

भूत न
भविष्यत ही रखें आसपास
कल थे कल फिर से हों शायद उदास
बेफ़िकरे ना आगे ना
पीछे लाग

ताँगे वाला घोड़ा 

जीवन नहीं बन्धुवर मेरे
ताँगे वाला घोड़ा ।

आगे-आगे रहे देखते
हाँफे, भागे, फेन फेंकते
मन से रुके नहीं पल भर को
सोच न पाए थोड़ा ।

केवल नभ पर धूल उड़ाई
और समय की चाबुक खाई
मुड़े इशारों पर लगाम ने
जैसे चाहा मोड़ा

पेट भरा हो या हो ख़ाली
नहीं किसी को दी है गाली
औरों के सपनों को ढोकर
ठाँव-ठिये पर छोड़ा ।

समय को नाथ

नाथ !
समय को नाथ !

रस्सी छोड़ें
सरपट घोडे़
बदल रहे हैं
पाथ !

कीला टूटा
पहिया छूटा
नहीं
कैकयी साथ !

जीत कठिन है
बडा़ जिन्न है
झुका न ऐसे
माथ !

मुए केंचुए

बदला मौसम नई हवाएँ
कैसे-कैसे रोग

मंन्दिर-मस्जिद अगड़े-पिछड़े
रोज़-रोज़ के बलवे-झगड़े
रोटी कहीं छिपी दम साधे
भूखे दुर्बल लोग

पृथक प्रदेश देश के नारे
नक्सल, आतंकी बंजारे
संकट विकट कोढ़-खुजली का
प्राणांतक संजोग

वादे करते स्वप्न बाँटते
प्रश्न घेरते थूक चाटते
मुए केंचुए ख़ूब जानते
शब्दों का उपयोग

एक टिम-टिम लौ

रात मावस की, हठीली
एक टिम-टिम लौ।

हवाएँ घात करती हैं
तिमिर के कान भरती हैं
जानती हैं पर-अकाजी
रोज़ फटती पौ।

झिलमिलाते आँख तारे
हैं अकेले ढेर सारे
भूल बैठे थी कभी ली
एकता की सौ।

सूर्य का अनुभव-कथन है
ज़िन्दगी केवल हवन है
जले हाथों देखिए
फिर-फिर मिलेगी जौ।

दूर अभी मंज़िल है

दूर अभी मंज़िल है
मन माँगे ठौर।

जला रही धूप, छाँव
छल रही मंसूबे
रेतीली नदी, स्वप्न
शर्म है कि डूबे
अभी नहीं हारे है
शेष कई दौर।

नदिया के होठों पर
सुलगती है प्यास
दोपहरी माँग रही
चुटकी भर उजास
जंगल में बिखरा है
मायावी शोर।

आँवे से दिन जलते
पत्थरों के देश
डरी-डरी यात्राएँ
लपटों के उपनिवेष
तप कर ही निखरेंगे
स्वर्ण-प्राण और।

फूलों की घाटी में 

फूलों की घाटी में बजता
कानफोड़ सन्नाटा ।

बीच-बीच में यहाँ-वहाँ से
उभर डूबती चीख़ें
डस लेती लिप्सा की नागिन
जो पराग पल दीखें

आदमक़द आकाश का
होता जाता नाटा ।

नदियों-झीलों-झरनों में जा
डूब मरीं मुस्कानें
शोक-धुनों में बदल रही हैं
उत्सव- धर्मी तानें

सन्तूरी सम्मोहन टूटा
चुभता बनकर काँटा ।

भैंस सुनती बांसुरी 

बुर्ज ऊपर,
बहुत ऊपर
और चढ़ना भी ज़रूरी

सीढ़ियाँ मलबा,
बगल घाटी पड़ी
रस्सियाँ टूटी हुई
मुश्किल बड़ी
लौह से संकल्प पल-पल
हो रही बट्टी कपूरी

कौन खोजे हल,
छिड़ीं हैं गर्म बहसें
भैंस सुनती
बांसुरी
रोएँ हंसें
कुछ अपाहिज जन्म से
कर रहे बातें खजूरी

रूप, रस, गन्धों वाले दिन 

लौट आए भटके-भूले
रूप, रस,
गन्धों वाले दिन।

फूल गाते हैं मीठे गीत
नदी का मधुर, सुगम संगीत
हवा के मनमोहक हैं नृत्य
महकते छन्दों
वाले दिन।

रूप, रस,
गन्धों वाले दिन।

धूप की नज़रें उट्ठी आज
बनी हैं बातें बिन आवाज़
गले से ऊपर सब डूबे
नए अनुबन्धों
वाले दिन

रूप, रस,
गन्धों वाले दिन।

चाँदनी तिरछे करती होंठ
चाँद के मन को रही कचोट
युगों की मरजादों से दूर
टूटते बन्धों
वाले दिन।

रूप, रस,
गन्धों वाले दिन।

रोटी से एटम-बम प्यारा

नहीं जुड़ा
क्या रजधानी से
प्यारे! तेरे घर का रस्ता?

क्यों पनघट
पर चक्कर मारे,
क्यों गुठान पर ढोर गेरता?
नई सदी की चरखी में क्यों,
अदिम युग के स्वप्न पेरता?
दुनिया भरी साधनों-सुख से
तेरी कैसे हालत खस्ता?

डरा रहा है बॉंध बिजूके
उड़ा रहा गोफ़न से चिड़ियॉं
पेट पकड़ कर हंसता रहता
देख भागते बोदा पड़ियॉं
उत्तर अधुनातनता से भी
थोड़ा-सा ही, रह बावस्ता।

कुछ दिन पहले नहीं सुने हैं,
क्या तूने परमाणु धमाके?
तू गचकुण्डी में ही ख़ुश है,
देख ज़रा-सा बाहर आ के!
रोटी से एटम-बम प्यारा
कितना अहम और है सस्ता।

स्लेट लिखें शब्दों के

स्लेट लिखे शब्दों को
गुमसुम क्यों बैठे हो
मन कोरी लाग लिए ।

बांसों के वन गाते
अन्तर में आग लिए
अन्तर में आग, चपल
दृष्टि हो काग-सी
ज़िन्दगी रहे न महज
सागर के झाग-सी
संयम हो बन्ध नहीं
दामन में दाग लिए ।

मौसम कब रोक सका
कोयल का कूकना
ऋतुओं की सीख नहीं
अपने से चूकना
नदियाँ भी राह तकें
मधुर-मधुर राग लिए ।

उतनी ही सृष्टि नहीं
जितनी हम सोच रहे
स्लेट लिखे शब्दों को
पोते से पोंछ रहे
हल करते जीवन, ऋण,
जोड़, गुणा, भाग लिए ।

Share