शहंशाह आलम की रचनाएँ

अभी-अभी 

अभी-अभी
एक शब्द जनमा
उस बच्चे के मुँह से
माँ से जनमी
एक पूरी भाषा समृद्ध

अभी-अभी
यह समय था तुम्हारा
अब हुआ किसी अन्य का

अभी-अभी
वह दरख़्त हुआ
उस चिड़िया का
एकदम अपना

अभी-अभी
एक पूरा युद्ध लड़ा गया
खुरपी से
हंसिया से
कुदाल से
लाठी से

अभी-अभी
खुली एक ट्रेन
कि दूसरी आ लगी झट से

अभी-अभी
रसोईघर से निकल
फैली इस पृथ्वी पर
लहसुन की गंध अनोखी

अभी-अभी
यह देह हुई उसकी
यह बीज
यह कामना
यह शोर
यह एकांत हुआ उसी का

अभी-अभी
आग हुई मेरी
फाग हुआ मेरा
राग हुआ मेरा

अभी-अभी
वहां था सूर्यास्त
अब दिखता था
सूर्योदय वहीं पर

अभी-अभी
जो भूल गया था
रास्ता अपने घर का
बता रहा था
किसी अन्य को
उसके घर का रास्ता

अभी-अभी
वह मटका था खाली
अब भरा था
मीठे जल से

अभी-अभी
एक लड़का कूदा पानी में
बहा धार में
एक दूसरे लड़के ने लाँघा
अपने ही अंदर के पुरुष को

अभी-अभी
जलतरंग बजाया उसने अद्भुत
ओझल को प्रकट किया उसी ने

अभी-अभी
मैं धँसा तुम्हारी ही धमक में
तुम धँसी मुझ में
सन्नाटे को चीर

(वितान)

शब्द थे

हमारे पास सिफारिशें नहीं थीं चाटुकारों की
न झूठ न दिखावा न फूंक कोई अनोखी
बल्कि चुस्त-फुर्तीले शब्द थे विश्वसनीय

हमारी आंखों में नींद नहीं थी
बेफिक्री की गुलामी की
बल्कि रतजगे थे विनम्र और दिलचस्प

हमारी कविता दुख बतियाती
उनकी होती सुनियोजित
सीधे देवलोक से उतरी हुई
इस जलमग्न पृथ्वी के
शासकों का पक्ष लेती हुई

हमारी आदतें होतीं बेतरतीब
कमाल की सबसे अलहदा

हमारा मुख्य दरवाज़ा रहता खुला हमेशा
खिड़कियां खुली हुईं परिंदों के वास्ते

बच्चे खेलते लुका-छिपी का खेल
रंग मनचाहे थे इर्द-गिर्द हमारे
सुबह बिलकुल नई थी रोज़
हमारी क्रियाएं थीं अनुभवों से भरी
हम करते थे प्रेम पूरे यक़ीन से
बजाते थे माउथआर्गन सघन बरसात में
गाते थे पुरानी फ़िल्मों के गाने
जीते थे एकदम आत्मीय करोड़ों बरस से

चूंकि हम लड़ते थे और जीतते थे
चूंकि हम जीते थे एक-एक रात एक-एक दिन
इसीलिए हम मनुष्य नहीं
थे बस इस सदी के आश्चर्य
अपने शत्रुओं के लिए।

कारीगर

तुम्हारे ही हुनरमंद हाथ
हमें दिखते हैं सपनों में
हज़ार-हज़ार वर्षों से

तुम्हारी ही नफासत
तुम्हारा ही समर्पण
तुम्हारी ही समझदारी
तुम्हारी ही कला
तुम्हारी ही चिंता
झलकती है
इस रहस्यलोक में

शहर के शहर गिरते हैं
फिर तुम्हारे ही हाथों
होते हैं खड़े रंगों से सजे

तुम्हारे ही हाथों बने रास्ते हैं
यहां से वहां सार्थक दूब से भरे

हमें पता है
तुम न कोई पैग़म्बर हो
न कोई देवता
न सप्तर्षि
न कोई जादूगर-वादूगर
बिलकुल हमारे पिता की तरह हो

तुम हो इसीलिए
ख़्वाबे-दरो-दीवार है
और यह पृथ्वी है
घरों से भरी हुई।

जाड़ा : पांच कविताएं

एक

कहां थी वह झील सूर्य को
अपने ऊपर उगाती-चमकाती
कहां थी वह पगडंडी सुबह वाली
कहां थीं स्वप्न वाली तितलियां
और तट पर लगी वह नाव
रहस्यमयी करोड़ों बरस से

कहां थीं वे स्त्रियां जो निकलती थीं
गंगा-स्नान के लिए रोज़
अपने-अपने दलों के साथ लोकगीत गाती हुईं

आज तैरते थे बस बर्फ के टुकड़े
हमारी देह में पूरी चतुराई से

दो

यह एक युग का था आरंभ या अंत
या यूं ही गुज़र जाने वाला
दिवस कोई शापित

बजता है न मालूम क्या-क्या अनोखा
समुद्र के भीतर उस लड़की के बेहद पास

अभी-अभी परन्तु चिड़ियों का
एक जोड़ा उतरा हमारी छत पर
गाता जीवन के सारे छन्दों को एकाग्र

तीन

स्थापित सुसज्जित उत्तेजित
उत्साहित और दृश्यमान
उसकी नाभि का सब कुछ सब कुछ

पृथ्वी थी रौशन उसी के प्रेम में
मृत्यु को भगाती इस कालखंड से

स्तब्ध् अटका मैं भी तन्मय
इन्हीं दृश्यों इन्हीं बिंबों में मंत्रबिद्ध

चार

आज सबसे अधिक क्रोधित हुआ वह गूंगा
सबसे अधिक गुस्साई वह औरत
सबसे अधिक झल्लाया वह रिक्शेवाला

आज हड्डियां बजती थीं उनकी चतुर्दिक

आज अचानक सब
सिर्फ क्रोधित हुए
सिर्फ गुस्साए
सिर्फ झल्लाए
इस शिविर में
इस भूखंड पर

पांच

इस जाड़े में हमारे गुणों का गुणगान नहीं होगा
किसी सर्कस में जादूगर के यहां या मदारी के घर

इस बार घात पर घात होगा दसों दिशाओं में

इस बार तोते नहीं उचारेंगे ऋषियों और सूफियों के शब्द

इस बार सुबह होगी हमसे बाहर और अंधेरा भीतर

इस बार जीत होगी शत्रुओं की प्रतिष्ठा भी उन्हीं की
इतिहास भी उन्हीं का भूगोल भी उन्हीं का होगा इस बार।

भादों में लगातार भीगते हुए 

भादो में लगातार भीगते हुए
अपने शरीर को लेकर
हम शर्मिंदा नहीं हैं
इसलिए कि ऋतुओं ने ही
हमें जि़ंदा रहना सिखाया है

हम शर्मिंदा नहीं हैं कि हमने
बाज़ार लगाने वालों की बजाय
अन्न उपजाने वालों के लिए गीत लिखे
हमने विरोध की रोज़ नई कलाएं
विकसित कीं आकाश के नीचे धरती पर

हम तुम्हारी क्रूरता की कथाओं पर नहीं
प्रेमिका की देह की मिट्टी पर
चमत्कृत हुए रोमांचित हुए

हम दिल्ली की संसद नहीं गए देखने
बल्कि घूम आए कलकत्ते का
विक्टोरिया मेमोरियल
दुख और दुर्दिन को भुलाकर

हम शब्दों की फिक्र किए
हम वाक्यों की फिक्र किए
हम छन्दों की फिक्र किए
हम ने जब भी गाया जत्थों में गाया
हम ने जब भी सोचा जत्थों में सोचा
तुम रहे एकांतप्रिय लोहे तांबे से डरे
तुम रहे भयानक विचारों में मुस्तैद

तुम ने तोड़े घर हमारे रास्ते हमारे स्वप्न हमारे
हम ने तोड़े सन्नाटे और भय और झूठ
और उस तानाशाह के विचार पूरी ताक़त से।

जहां तुम देह पर बैठी धूल उतारोगे

तुम फिर एक नए देश
तुम फिर एक नई दुनिया
तुम फिर एक नए घर में
प्रवेश करने जा रहे हो
जहां कि तुम यात्रा की थकान
रास्ते के अचरज विस्मय
देह पर की धूल उतारोगे
धुंधलके को छोड़ोगे

तुम्हारे साथ इस रहस्यनगर की
अनंत कथा अनंत कविता और प्रेम
मित्रों की जीवंत हंसी
शत्रुओं की चालबाज़ी
इच्छा-अनिच्छा
बसंत पतझड़ झुटपुटे
दूब की नोक पर अटकी बूंद
शिखरों को घेरते हुए बादल
तुम्हारे अंगों को छूता नदीजल
और देवताओं के छल भी तो हैं
तुम्हारे साथ

सिपाही : पांच कविताएं 

एक

तुम हो तो
भय भागा हुआ है
दूर किसी घाटी में समुद्र में

तुम हो तो
सच्चाई है बची हुई
अच्छाई है बची हुई

तुम हो तो
यह देह यह शरीर है
कई-कई ख़तरों
कई-कई संकटों में भी
सही-साबुत पूरी तरह

दो

मुझे इस अज्ञात अनजान नगर-महानगर में
जानते हो तो तुम्हीं जानते हो
मैं भी तुम्हें ही जानता हूं
पूरी तरह आमंत्रित
तुम्हीं दिखाते हो
मेरे परिचित का रास्ता
और घर और इतिहास

तुम्हीं भरते हो साहस
मुझ में मित्र बनकर
जैसे कोई अपना बनकर

तीन

हम फंसते हैं बुराइयों में
किसी दुर्घटना में
बाढ़ प्रलय संकट में

हम फंसते हैं बारहा
अपराधियों के बीच

हम फंसते हैं करोड़ों बरस से
अपने ही भीतर की
कमज़ोरियों में अक्सर

अंततः तुम्हें ही पुकारते हैं करोड़ों बरस से

अंततः अंततः अंततः
तुम्हीं निकालते हो
भय की बुराई की नदी से बाहर हमें

चार

दिन और रात
पृथ्वी और ब्रह्माण्ड
शब्द की चुप्पी तक को
करते हो मुखरित
अपने छन्दों से तुम्हीं

पांच

लड़की सपने में
डरती है बेतरह
डरकर पानी हो जाती है

कुछ बच्चे स्कूल से लौटते हुए
सड़क पार नहीं कर पाते

चोर और अपहरणकर्ता
लकड़ी काट ले जाते हैं
मेरी-तुम्हारी नींद से

तुम्हीं लौटाते हो
लड़की को सुन्दर सपने
पार कराते हो बच्चों को
सड़क सुरक्षित अभयभीत

हमारी नींद में
तुम्हीं भरते हो
हरे पेड़ हरे मैदान हरी घाटियां

तोतों से और फलों से और उजालों से
भरते हो इस पृथ्वी की चुप्पी को

भरते हो जल को नाव से पक्षियों से
बरसात को अपनी लय से।

माँ : दो कविताएं

एक

जब घरों में खिड़कियां नहीं थीं
किवाड़ नहीं थे अनंत विशाल
राजा नहीं थे मंत्री नहीं थे
भयावहता नहीं थी
इतिहास नहीं था
माँ थीं

नानबाई ने रोटियां
लकड़हारे ने आरियां
कश्तीवान ने कश्तियां
नाटककार ने दृश्यावलियां
मज़दूरों ने बस्तियां
दर्शकों ने तालियां
गणितज्ञ ने दिन मास साल सदियां
वैज्ञानिकों ने अंतरिक्षयान उड़नतश्तरियां
समुंदर ने सीपियां
माँ ने इस धरा को
और हमें किया परिपूर्ण

माँ पृथ्वी पर सबसे चर्चित महिला होतीं
अगर हमारे भीतर का पुरुष
कि़ले चहारदीवारी घर के अंधेरे में
उन्हें क़ैद करके नहीं रखता
माँ अब तक की सबसे लंबी कविता हैं

दो

माँ सहेजकर रखती हैं दियासलाई
दियासलाई के पास मां का पता तब से है
जब से दियासलाई ईजाद हुई है

घर की बेकार वस्तुएं
माँ को मुकम्मल तरीक़े से जानती हैं
माँ के कारीगर हाथों की बदौलत
बेकार वस्तुएं नए-नए रूप धरकर
फिर से हमारी ज़िंदगी में शामिल हो लेती हैं

माँ के मरने के बाद
माँ नहीं होंगी
दियासलाई की आंच होगी
और बेकार वस्तुओं के ज़िंदा रूप होंगे।

इसे विडंबना ही कहिए

इसे विडंबना ही कहिए
जो वाक्य मेरे द्वारा बोले गए
वो मेरे वाक्य नहीं हैं
जो कुछ आपके द्वारा बोला जा रहा है
वह आपका बोला हुआ नहीं है

वह ड्राइवर जो मुस्कुरा रहा है
उसकी मुस्कुराहट अपनी नहीं है

सिनेमाघर से तीन औरतें
प्रसन्नचित्त निकल रही हैं
उनकी प्रसन्नता उनकी हंसी
उनकी अपनी नहीं है सदियों से

सायकिल पूरी गति से चला रहे
लड़के की गति भी उसकी नहीं है
न ही नेपाली चैकीदार का डंडा
उसका अपना डंडा है

हमारा क्या-क्या है इस लोकतंत्र में
हम पूछना चाहेंगे अपने आक़ाओं से
तो हमारे-आपके मालूम नहीं
कितने घण्टे बर्बाद हो जाएंगे

कुछ वस्तुएं हैं जो हमारी हो सकती हैं
हम इतने सरकश हैं कि
अपने हिस्से की वस्तुएं छीन ले सकते हैं
लेकिन अक्सर हमारे पिता को
हांफने की बीमारी होती है
और पिता की बीमारी के पीछे भागते-भागते
हम ख़ुद हांफ रहे होते हैं इस वितान में

हमारा समय और साहस पिसता रहता है
ऐसे ही दुखों के दुर्जेय रथों के नीचे

ऐसे ही दुखों में शामिल हैं
वाक्य मेरे
आपका कहा हुआ
ड्राइवर की मुस्कुराहट
औरतों की प्रसन्नता हंसी
लड़के की गति
चैकीदार का डंडा
और हम सबका लोकतंत्र

एक बच्चा रो रहा है अनुभवहीनता से
उसका रोआ-रोहट उसका नहीं है
न ही अनुभवहीनता उसकी अपनी है

एक दृश्य जो हमें प्रभावित करता है
वह भी झपट ले जाता है
कोई तीसरा या चौथा
हमारे हैं छेद सिर्फ छेद
जो बनियान गंजी और शर्ट
सभी में देखे जा सकते हैं
हमारा है हतप्रभ रहना

हमारा ही पंचभूत है जो
भागता है इस दिशा से उस दिशा
नामालूम कौन-सी दिशा पाने के लिए

जबकि हमारे हिस्से का सारा बढि़या कर लिया है
शक्तिशाली राष्ट्रों के शक्तिशाली राष्ट्रपतियों ने
अपने हिस्से में अपने वितान में
जैसे मोनिका लेविंस्की का मुख-मैथुन
उनके हिस्से में आया
अफग़ानिस्तान सूडान के हिस्से में आए हमले

उन्होंने एकांत
उन्होंने अचरज
उन्होंने शोहरत
उन्होंने बदनामी
उन्होंने दूब और वृक्ष
उन्होंने जल और क्षितिज
उन्होंने नगर और गांव
सब कुछ तो कर लिया है
अपने हिस्से में

हमारा कुछ भी नहीं है
न अलादीन का चिराग़
न तिलस्मे-होशरूबा
न तोता-मैना की कहानी
न चिडि़यों की अलिफ लैला
न विस्मय आश्चर्य विचित्रता

हमारी है आपाधापी करोड़ों बरस की
हमारी है महंगाई
और शत्रु हैं ख़ूब सारे
और हमारी आत्माओं को मिला है
बस रुदन
बस बेचैनी
बस घना जंगल
बस उत्कट अंधकार
इसलिए कि न जाने
कितनों का ऋण चढ़ा हुआ है हमारे ही सिर।

जुलाई की तिथि में आज दूसरे हफ़्ते का वृहस्पत है 

जुलाई की तिथि में आज दूसरे हफ्ते का वृहस्पत है
और वे छहों लड़ पड़े हैं बुरी तरह से ज़रा-सी बात पर
अच्छा है अच्छा है, ऐसे ही लड़ो ऐसे ही मरो

यह शत्रुओं का एक भरा-पूरा क़स्बा है
पहले यहां बजट प्रस्तुत किए जाने वाले महीने में
आत्माएं लड़ा करती थीं जो कि सदेह होती थीं
अब ये आत्माएं जुलाई में ही लड़ने लगीं
पिछले नवंबर में भी तो लड़ बैठी थीं ये आत्माएं

सच ही तो है कौन बैठना चाहेगा यूं ही बेकार
इस क़स्बे में इस संसद में इस लोक में इस आश्चर्य में
कौन नहीं चाहेगा अश्व और गज पर बैठकर सैर करना
कौन नहीं चाहेगा महंगी गाडि़यों पर बौखना वायुयान पर उड़ना

और कौन नहीं चाहेगा बीमार योजनाएं हम पर लादना

कोणार्क चौक से बलात्कार की ख़बर भी मिली है
रात्रि पौने सात बजे ही इस ख़त्म होती शताब्दी में
इतना गहरा अंधेरा हमारे समय के आवरण पर
जबकि दिसंबर का जाड़ा है अभी कोसों दूर
जब एक सरकार गिरा दी जाती है
तब पूरा देश ग़रीबी के दलदल में थोड़ा और धंस जाता है
जब एक औरत बलात्कार का शिकार होती है
तब एक पूरा वसंत सुख के दिनों से दूर कहीं चला जाता है
जब किसी की हत्या कर दी जाती है
तब एक पूरा हरा बढि़या पेड़ सूख जाता है वितान का

जितनी इस पृथ्वी ब्रह्माण्ड में घटनाएं घटती हैं
मंगल और शुक्र के चहल-पहल वाले दिनों भी मेरे कमरे में
अजब-ग़ज़ब सन्नाटा रहता है छाया निरंतर

जितनी मात्रा में आत्माएं देह त्यागेंगी
जितनी मात्रा में बच्चे काम पर लगाए जाएंगे
जितनी मात्रा में असफलता और घबराहट के समाचार मिलेंगे
जितनी मात्रा में बदबूदार वस्तुओं का आतंक बढ़ेगा
मेरे कमरे में अजब-ग़ज़ब सन्नाटा बढ़ता ही जाएगा।

कोहिमा 

सब कुछ नष्ट हो रहा है यहां
शब्द और वाक्य
दुकानें और कमरे
अनुभव और स्मृतियां
दूब और पेड़ और प्रेम

सब कुछ नष्ट हो रहा है यहां
गोधूलि का समय
ख़ूबसूरती की कथाएं
वन-प्रांतर के क़िस्से
आकाश के नक्षत्र बादल
पत्तों पर की बारिश की बूंदें और ओस

पूर्वोत्तर के प्रांतों में घूमते हुए
यात्री खोजेगा ईश्वर को
वन-संध्या में गाढ़ी होती रात्रि
वन-प्रांतर में गाढ़े होते दुखों के बारे में पूछेगा

उस पिता के नेत्रों में
यात्री तलाशेगा खोजेगा
नामालूम कौन-सा देवता
जिसका कि जवान बेटा
मार डाला गया

उस अधेड़ और सुंदर शिक्षिका के यहां
चाय पीते हुए
यात्री पाना चाहेगा थोड़ा-सा सुकून
अपनी थकान मिटाने के वास्ते

यहां के बाशिंदों से
यात्री सुनना पसंद करेगा
कोई पवित्र लोकगीत

बिलकुल पास से बहती नदी को छुएगा यात्री
और क़ैद कर लेगा अपने कैमरे में आह्लादित

सब कुछ नष्ट हो रहा है यहां
लेकिन सब कुछ नष्ट नहीं होने देगा यात्री
रक्त की बरसात सह लेगा
कोहिमा की पीड़ाओं से
प्रसन्नता और उम्मीद चुराकर लौटेगा
यहां की औरतों और बच्चों
युवतम लड़कियों और लड़कों से बातचीत कर
अगली यात्रा की तैयारी करेगा।

सड़कों पर बौखता हूं 

सड़कों पर बौखता हूं
करोड़ों बरस से इसलिए कि
मैं सड़कों पर बौख सकता हूं बेफिक्र

ऐसा नहीं है
सड़कों पर बौखते हुए
गलियों में घूमते हुए
मैं भूल चुका होता हूं कि
घूमती हैं कई-कई दुष्टात्माएं
मेरी ही फिराक़ में
या मैं भूल चुका होता हूं
दफ्तर पहुंचने का रास्ता
या घर भूल चुका होता हूं
दोस्त-अहबाब के चेहरे खो चुका होता हूं

बल्कि मेरे स्मरण में यह भी रहता है कि
मेरे हाथ में घड़ी है
जो बताती है
मुझे समय पर पहुंचना है दफ्तर
समय पर पहुंचना है काव्यपाठ में
समय पर लौटना है अपने किराए के मकान में
चिडि़यों के लिए चींटियों के लिए
खाने के लिए चीज़ें रखनी हैं

मेरे स्मरण में यह भी रहता है कि
मेरे साथ मेरी सायकिल है
जिसके पहिये के नीचे दूब को वनस्पतियों को
आने से बचाना है पूरी हिफाज़त से

मैं सड़कों पर बौखता हूं
ताकि सड़कों पर बौखते हुए तलाश सकूं
अपने क़स्बे की सड़कें
अपने क़स्बे की गलियां
जहां कि घूमते हुए
पहुंच जाता था उस लड़की के पास
जिस लड़की से मैंने प्रेम किया
और उसने मुझ से

पहुंच जाता था मित्रों के यहां अचानक
वो खिल उठते थे कठिन से कठिन दिनों में

जिस लड़की से मैंने प्यार किया
वह अपनी क्लास छोड़ देती थी उस रोज़
और हम निकल पड़ते थे
शरद के दिनों को सार्थक करने
किसी एकांत के वितान में

मुझे हैरत हो रही है इस राजधानी में रहते हुए
मुझे विस्मय हो रहा है यहां अपने दिन गुज़ारते हुए
अपनी रातों को जीते हुए कि
हमारी मासूम इच्छाएं यहां पूरी नहीं हो सकतीं
किसी अनजाने मुसाफिर से हंसा-बतियाया
नहीं जा सकता यहां इस जीवन में
इस राजधानी में समझाया जाता है कि
इस या उस व्यक्ति पर कविता लिखने का अर्थ
अपनी प्रतिबद्धता को खोना है
इस या उस व्यक्ति से मिलने का मतलब
एक महत्वपूर्ण कवि का मापदंड भंग करना है

महामात्य के बारे में लिखने का मतलब
वज़ीरे आज़म पर विनोद करने का मतलब
अपने को कमज़ोर घोषित करना है

जबकि वे हैं बड़े गुणी बड़े मार्क्सवादी
इतने गुणी इतने मार्क्सवादी कि
सिर्फ उन्हीं के शब्द बन सकते थे ए के सैंतालीस
सिर्फ वे ही इस्तेमाल कर सकते थे
शब्दों को औज़ार की तरह

उन्हें एक नास्तिक का कथन भर लगेगा
मेरा यह कथन मुझे मालूम है

जबकि मैं क़स्बे का कवि बनकर रहना चाहता हूं
इस राजधानी में बचाए रखना चाहता हूं
अपने क़स्बे की धूसर छवि और अनुभव

अपनी इच्छा से जीना चाहता हूं
प्रेम करना चाहता हूं अपनी इच्छा से
लड़ाई लड़ना चाहता हूं अपनी इच्छा से।

सड़कों पर बौखता हूं 

सड़कों पर बौखता हूं
करोड़ों बरस से इसलिए कि
मैं सड़कों पर बौख सकता हूं बेफिक्र

ऐसा नहीं है
सड़कों पर बौखते हुए
गलियों में घूमते हुए
मैं भूल चुका होता हूं कि
घूमती हैं कई-कई दुष्टात्माएं
मेरी ही फिराक़ में
या मैं भूल चुका होता हूं
दफ्तर पहुंचने का रास्ता
या घर भूल चुका होता हूं
दोस्त-अहबाब के चेहरे खो चुका होता हूं

बल्कि मेरे स्मरण में यह भी रहता है कि
मेरे हाथ में घड़ी है
जो बताती है
मुझे समय पर पहुंचना है दफ्तर
समय पर पहुंचना है काव्यपाठ में
समय पर लौटना है अपने किराए के मकान में
चिडि़यों के लिए चींटियों के लिए
खाने के लिए चीज़ें रखनी हैं

मेरे स्मरण में यह भी रहता है कि
मेरे साथ मेरी सायकिल है
जिसके पहिये के नीचे दूब को वनस्पतियों को
आने से बचाना है पूरी हिफाज़त से

मैं सड़कों पर बौखता हूं
ताकि सड़कों पर बौखते हुए तलाश सकूं
अपने क़स्बे की सड़कें
अपने क़स्बे की गलियां
जहां कि घूमते हुए
पहुंच जाता था उस लड़की के पास
जिस लड़की से मैंने प्रेम किया
और उसने मुझ से

पहुंच जाता था मित्रों के यहां अचानक
वो खिल उठते थे कठिन से कठिन दिनों में

जिस लड़की से मैंने प्यार किया
वह अपनी क्लास छोड़ देती थी उस रोज़
और हम निकल पड़ते थे
शरद के दिनों को सार्थक करने
किसी एकांत के वितान में

मुझे हैरत हो रही है इस राजधानी में रहते हुए
मुझे विस्मय हो रहा है यहां अपने दिन गुज़ारते हुए
अपनी रातों को जीते हुए कि
हमारी मासूम इच्छाएं यहां पूरी नहीं हो सकतीं
किसी अनजाने मुसाफिर से हंसा-बतियाया
नहीं जा सकता यहां इस जीवन में
इस राजधानी में समझाया जाता है कि
इस या उस व्यक्ति पर कविता लिखने का अर्थ
अपनी प्रतिबद्धता को खोना है
इस या उस व्यक्ति से मिलने का मतलब
एक महत्वपूर्ण कवि का मापदंड भंग करना है

महामात्य के बारे में लिखने का मतलब
वज़ीरे आज़म पर विनोद करने का मतलब
अपने को कमज़ोर घोषित करना है

जबकि वे हैं बड़े गुणी बड़े मार्क्सवादी
इतने गुणी इतने मार्क्सवादी कि
सिर्फ उन्हीं के शब्द बन सकते थे ए के सैंतालीस
सिर्फ वे ही इस्तेमाल कर सकते थे
शब्दों को औज़ार की तरह

उन्हें एक नास्तिक का कथन भर लगेगा
मेरा यह कथन मुझे मालूम है

जबकि मैं क़स्बे का कवि बनकर रहना चाहता हूं
इस राजधानी में बचाए रखना चाहता हूं
अपने क़स्बे की धूसर छवि और अनुभव

अपनी इच्छा से जीना चाहता हूं
प्रेम करना चाहता हूं अपनी इच्छा से
लड़ाई लड़ना चाहता हूं अपनी इच्छा से।

अकारण दुख नहीं झलक रहा

अकारण दुख नहीं झलक रहा
पुल के इस ओर और उस तरफ

मालूम नहीं किस तरह की गांठ लगाई गई है
एक-दूसरे से मिलने के लिए
भीड़ इकट्ठी नहीं हो रही कहीं पर
ताकि संवाद विस्तार पा सके
फैल सके दसों दिशाओं में सार्थक

एकांत में पड़ा और खड़ा पेड़
एक अनोखे दर्द में मुब्तला हो रहा है
टोली-टोली सांप टोली-टोली डायनासॉर
जंगल से हमारे घर का रुख कर रहे हैं

प्रेम नहीं किया जा रहा इस छोर से उस छोर
प्यार में झगड़ा भी नहीं किया जा रहा इन दिनों
पुरातत्व विभाग की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा कि
क्यों नदी में तैरते हैं शव और सिर्फ शव

फिर भी घृणा नहीं कर रही है पृथ्वी
कहती है कि लिखते रहो हंसी के शब्द
हो सके तो रचो रोज़ एक कविता युवा हत्याओं के विरुद्ध
जैसे गर्भिणी स्त्रियां बुनती हैं स्वेटर
अनदेखे उजाले बटोरती हैं अंधेरे गर्भ से
तुम भी बटोरो इस पूरे युग से

इन दिनों दिल धड़कता है बुरी तरह
इन दिनों उदास-उदास-सी आती है सुबह

समझाना चाहता है मछलीमार कि
अजायब से भरी होती हैं यात्राएं

हमारे पिता तक कहते हैं
अकारण दुख नहीं झलक रहा
नित्य-प्रति खाया जा रहा है धोखा
बेवकूफ समझा और कहा जा रहा है हमें
खुशियों की रात की आरजूएं हमसे छीन ली गई हैं

वेश्यालयों से रोज़ निर्मम आवाज़ें उठती हैं
और पीछा करती हैं रास्ता भटके हुओं का
और हम आ जाते हैं दीमकों की चपेट में
मचलते हैं हमारे शत्रु हमारे हत्यारे कि
अभी उन्हीं के दिन हैं रातें भी उन्हीं की हैं।

जितनी देर में बनती है एक उम्मीद

जितनी देर में बनती है एक उम्मीद
पृथ्वी पर फ़रिश्ते नहीं हत्यारे उतरते हैं
हमारी पसंद की मिट्टी के मकान तोड़ दिए जाते हैं
हमारे ओहदे और ख़िताब ले जाता है कोई दूसरा
पतंगें कट-कटकर गिरती हैं धड़धड़ धड़धड़ धड़धड़
छिन जाता है हमसे हरी घास पर बैठना
मारे जाते हैं मासूम बच्चे इस नाबीना शहर में

जितनी देर में बनती है एक उम्मीद
काट लिए जाते हैं बहुत सारे दरख़्त
डूब जाती हैं कितनी-कितनी नावें
शिकार कर लिए जाते हैं चीतल
और प्रवासी पक्षी और बाघ

हमसे हमारी रुत और बहारें और करोड़ों बरस
हमसे हमारे सारे अचम्भे चोरी चले जाते हैं

जितनी देर में बनती है एक उम्मीद
ढा दिये जाते हैं ढांचे कई
तोड़ लिया जाता है सबसे सुंदर फूल
जला दी जाती हैं दुकानें
बरहना लाशें मिलती हैं गली-कूचों में
कबड्डी खेलना भूल जाते हैं लड़के-लड़कियां

जितनी देर में बनती है एक उम्मीद
आग लेकर भाग चुका होता है धनछूहा
दिल बुझ चुका होता है यारों का
फट चुकी होती है किसी की नई क़मीज़
किसी का बटुआ मार ले जाता है बटमार
चोरी चला जाता है पिता का छाता
दुःस्वप्न छेंक लेता है हमको
दसों दिशाओं से आकर
सभागार का सन्नाटा काटने दौड़ता है सबको

जितनी देर में बनती है एक उम्मीद
शादी के इंतज़ार में बैठी नम्मू उस्ताद की बेटी
आत्महत्या कर चुकी होती है
हांफता-कांपता कबीर-सा दिखने वाला वह आदमी
कबीरवाणी गा-गाकर अपनी आवाज़ें खो चुका होता है
जबकि महानागरिक हमारी उम्मीदों को नष्ट होते देख
खिलखिला-खिलखिलाकर हंसता है हा हा हा।

हमारे लिए भेजे गए दादी के चिउड़े

सायकिलें रोज़ चोरी हो रही हैं
पिता का आदिम भरोसा
हर मोड़ हर चैराहे पर
हर इतिहास में
हिचकियां ले रहा है
जितनी बुरी ख़बरें हैं
जंगल की तरफ़ से दौड़ी आती हैं

महान नेता और महान मसख़रे
सबको एक चिंता ने घेर रखा है
क़त्लगाहों से निकलने वाली चीख़ों को
अद्भुत बनकर सुना जा रहा है

कोने अंतरों में सपने
उस कुछ बड़े कुछ चौड़े
दुपट्टे वाली लड़की की प्रतीक्षा कर रहे हैं
जबकि लड़की को छेंक रखा है
मरुस्थल की भयानक आवाज़ों ने

जिस तरह सायकिलें रोज़ चोरी हो रही हैं
जिस तरह लाखों हाथ कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं
जिस तरह बच्चों के सिक्के खो रहे हैं
जिस तरह हमारी अपनी शिनाख़्त ख़त्म हो रही है
जिस तरह अम्मा आध कोस चलकर थक जा रही हैं
जिस तरह शिकारी और तिलचट्टे हंस रहे हैं

हमारे लिए भेजे गए दादी के चिउड़े भी
घर पहुंचने से पहले ग़ायब हो रहे हैं

दिन भर की सब्जि़यां रसोई घर से ग़ायब हो रही हैं
चीनी हो रही इतनी महंगी कि
हम ख़रीद ही न सकें न खा सकें

हवा और पानी में
माहुर मिला दिए गए हैं
पेड़ दिनोंदिन कम हो रहे हैं

सर्कस के बाघ हाथी और अन्य चौपाए और जोकर
अपनी गिरती सेहत को लेकर फ़िक्रमंद हुए जा रहे हैं

किसी भी देश के
किसी भी महामहिम राष्ट्रपति के लिए
एक साथ इतना कुछ होना
और इतना कुछ घटना
मेरा विश्वास है
कोई मायने नहीं रखता होगा।

यही दृश्य 

रद्दी से रद्दी मौसम में
उकडूं बैठना चाहता है जब आदमी
कुछ तय करना चाहता है
क़रीब ही पड़ा होता है तेज़ हथियार

निर्णय लिया जा चुका होता है
आदमी के विरुद्ध किसी अंधेरे हिस्से में
पृथ्वी पर अंतरिक्ष की
फालतू चीज़ें गिरती हैं हज़ार

सुदूर प्रदेश से आने वाली चिडि़यां
गमकता है जिनका आस पास अनूठे प्रेम से
सबसे बढि़या पेड़ हाथ लगता है
कठफोड़वा को
सबसे लंबी नदी हाथ लगती है
शिकारी बगुले को
जबकि उन्मादी छींटकर रखते हैं
उनके लिए दाना और आदमियों के लिए
कुछ डराने वाले तिलचट्टे
कुछ डराने वाले एलियन

स्थगित कर देते हैं हत्यारे
अपने सारे सैर-सपाटे
हम पर फिदा होते हैं बेतरह
मेज़ें सजाते हैं
फिल्में दिखाते हैं
डरावने बनाकर नहीं रखते
अपने चेहरे को उस समय

जब तक आदमी उनके भरोसे के क़ाबिल बना हुआ है
बना हुआ है हमख़्याल हमसफर हमक़दम
दे रहा है उनको अपना ख़ून पीने के लिए

देते हैं वे आदमी को तब तक
बीड़ी पीने के लिए ताड़ी

देते हैं वे हमको आश्वासन
बना रहेगा तुम्हारे नाम राशनकार्ड
बना रहेगा तुम्हारे नाम तुम्हारा घर

रहेंगे तुम्हारे माल-असबाब तुम्हारे ही
अगर कहना मानते रहे हमारा
अगर तुम करते रहे हमारे लिए सभाएं
और गोष्ठियां भी करते रहे

ऐसे ही आश्वासन देंगे हमारे अपहरणकर्ता हमारे बलात्कारी
तैयार रखेंगे अपने हाथों में ख़ंजर

यही दृश्य हम देख रहे हैं शताब्दियों से
हमारे पास वाले
तेज़ हंसिए को भुलाकर।

चाहिए था 

हमें जन्म से लेकर अब तक
कुछ भी नहीं मिला था
हमें जो-जो कुछ नहीं मिला था
वो सब याददाश्त में था हमारी
और हमारी याददाश्त से
हमारे रहनुमा बहुत घबराते थे

चाहिए था हमें हमारा भोलापन
और बांकपन और सादगी भी

चाहिए था हमारी त्वचा को
एक मुलायम स्पर्श
ताकि जन्म ले पौधा
फिर आए वसंत उस पर

चाहिए था शब्द
चाहिए था स्वर
चाहिए था चेहरा
चाहिए था अनुभव
चाहिए था वाक्य
चाहिए था वितान

चाहिए था भरा हुआ कनस्तर
अनाज से वस्तुओं से

धनछूहों का भय नहीं
कठफोड़वों की ठुक-ठुक नहीं
बाघों की गुर्राहट भी नहीं

चाहिए थी ऐसी नदी ऐसा जंगल
जिसमें शिकार वर्जित हो

आंख खुले तो सामने सेब का वृक्ष चाहिए था
स्वस्थ केले का गाछ चाहिए था

चाहिए था प्रेम सघन
और प्रेम के लिए सन्नाटा

अदृश्य में भी दृश्य चाहिए था।

हम कोई नया जंगल

पता है कि दरिंदे हमारे पीछे
लगाए जा चुके हैं
हमारे शुभचिंतक हमारी ही टोह में लगे हैं

हम कोई नया जंगल बोना नहीं चाहते
न अपनी दिलचस्पियों में
कोई नया इज़ाफ़ा करना चाहते हैं

हम तो इतना भर चाहते हैं कि
बचे रहें मुहब्बत करने के सारे इम्कानात
बची रहे देह में ज़िंदा रहने की इच्छा
बचा रहे चीज़ों का स्वाद
और भाई-बहन यार-दोस्त की
मुस्कुराहट-खिलखिलाहट भी बची रहे

पता है, उनके लौटने की उम्मीद में
हम मूसीक़ी सुनते हैं
तो किसी को बहुत बुरा लगता है
इत्ता बुरा कि नाइट शो देखकर लौटते समय
वह हम पर पीछे से हमला कर देता है

हमलावरों की तरफ से यह अंतिम वार नहीं है

अंतरिक्ष की ओर जाने वाली पतंगें और चिडि़यां
और कुछ नए उपकरण
हमें ख़बरदार करते रहेंगे
हम पर आने वाले ख़तरों के बारे में

हम बचते रहेंगे
हमलावरों के हमलों से
इसलिए कि हम मूसीक़ी सुनना
और प्यार करना छोड़ेंगे नहीं

हम कोई नया जंगल

पता है कि दरिंदे हमारे पीछे
लगाए जा चुके हैं
हमारे शुभचिंतक हमारी ही टोह में लगे हैं

हम कोई नया जंगल बोना नहीं चाहते
न अपनी दिलचस्पियों में
कोई नया इज़ाफ़ा करना चाहते हैं

हम तो इतना भर चाहते हैं कि
बचे रहें मुहब्बत करने के सारे इम्कानात
बची रहे देह में ज़िंदा रहने की इच्छा
बचा रहे चीज़ों का स्वाद
और भाई-बहन यार-दोस्त की
मुस्कुराहट-खिलखिलाहट भी बची रहे

पता है, उनके लौटने की उम्मीद में
हम मूसीक़ी सुनते हैं
तो किसी को बहुत बुरा लगता है
इत्ता बुरा कि नाइट शो देखकर लौटते समय
वह हम पर पीछे से हमला कर देता है

हमलावरों की तरफ से यह अंतिम वार नहीं है

अंतरिक्ष की ओर जाने वाली पतंगें और चिडि़यां
और कुछ नए उपकरण
हमें ख़बरदार करते रहेंगे
हम पर आने वाले ख़तरों के बारे में

हम बचते रहेंगे
हमलावरों के हमलों से
इसलिए कि हम मूसीक़ी सुनना
और प्यार करना छोड़ेंगे नहीं।

मैं भी कहूंगा

मैं भी कहूंगा, वंदे मातरम

जैसे कि कहती हैं लता मंगेश्कर

जैसे कि कहते हैं ए.आर. रहमान

किसी गृहमंत्री

किसी सरसंघ चालक

किसी पार्टी अध्यक्ष

के कहने से नहीं कहूंगा मैं

वंदे मातरम!

धार्मिक विचारों को लेकर

वो साधु थे और कहाँ-कहाँ से

नहीं आए थे

वो मौलवी थे और न मालूम

कितने धूल-धक्कड़ खाकर इकट्ठे हुए थे

दोनों ने कहा बिल्कुल निरापद

न्यायाधीश की तरह :

धर्मयुद्ध की समप्ति के बाद

हमीं तो बचेंगे

हमीं तो भोगेंगे

तमाम आसाइशें

धर्मयुद्ध में मारे जाएंगे

सारे भक्तगण

भारत शक उन्नीस सौ तेईस : पांच कविताएं 

एक

सच में बिलकुल सच में
यहां आधी रात के बाद आत्माएं भटकती हैं
बेचैन अपने को प्रकाशित करती हुईं

हत्या के बाद आत्माएं कहावतों और दंतकथाओं में
अप्रत्याशित जीवित हो उठती हैं लेकिन
आधी रात के बाद भटकती हुई ये आत्माएं
पुनर्जन्म नहीं चाहतीं पृथ्वी नहीं चाहतीं
कहावतों और दंतकथाओं तक में नहीं

इसलिए मैं, भारत का आम नागरिक
आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष 2
विक्रम 2058 को घोषित करता हूं
मैं अयोध्या में ही पैदा हुआ
मैं अयोध्या में ही मारा गया

अब मैं भी शामिल हुआ अप्रत्याशित
हत्या के लोकगीतों से गुज़रता हुआ
आधी रात के बाद भटकती हुई आत्माओं में
(इस पंक्ति के लिए कथाकार असग़र वजाहत का आभार)

दो

उन्होंने कथा सुनाई गुजरात की
गुजरात के राजा की प्रजा की
हत्यारे के पक्ष में खड़े न्यायाधीश की
उनके बूचड़ख़ाने की उनके पुरातन की
इनके और उनके मनुष्यता को नष्ट करने वाले मज़हब की
उनके पुरस्कृत नाटक की और दर्शकगण की
कथा सुनाई उन्होंने विस्तृत

उन्होंने किसी कुशल गाइड की तरह
हमें चकित-विस्मित करते हुए बताया कि
यहां पर पूरी तरह बसी बस्ती हुआ करती थी कभी
यहां सुबहें और शामें हुआ करती थीं अनोखी
यहां पर बच्चे क्रिकेट खेलते थे
युवा लड़के माउथऑर्गन बजाते थे
युवतम लड़कियां नायिका बनने का उपक्रम करती थीं निरापद

यहां उस कोने में बढ़ई औज़ार रखते थे अपने
वहां उस ताखे पर दर्जी अपनी सूई और धागे

यहां पर शब्द बजते थे निरंतर
गाई जाती थीं लिपियां गीत की तरह

क्षितिज के क्षितिज अनन्त के अनन्त
तर्क के तर्क विचार के विचार वितान के वितान
कुछ भी तो दिखाई नहीं देते यहां अब

हे सूत्रधार, आप सच से भी सच बोलते हैं

तीन

कुछ चालीस-पैंतालीस पार औरतों ने
सप्रेम भेंट किया कुछ पुरुषों को
एक चर्चित पत्रिका का
यौन विशेषांक

क्षमा करें कथानायक, क्षमा करें
उन स्त्रियों ने सार्थक किया
आपके पौरुष को
इस नपुंसक समय में

चार

महामात्य का बयान राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय
चैनेलों पर दिखाया और सुनाया गया

उनके बयान के कई अर्थ थे
अर्थ के भी अर्थ थे

महामात्य बोलते और बोलते हुए
उनके होंठ क्षणों और मिनटों बन्द हो जाते

जबकि कई मारे गए हत्यारे के हाथों
चश्मदीद गवाह थे तो महामात्य थे

जबकि महामात्य के बयान के बाद फिर
चाकू घुसेड़ा गया मेरे शरीर में
मेरी हत्या के निमित्त

पांच

पहली दफा सुना कि मिसरी खाकर
उनका मुंह कड़वा हो गया एकदम से

पहली दफा सुना कि वो बुद्ध की तरह मुस्कुराए
और इस घर की बची हुई चीज़ें सड़ गईं

पहली दफा सुना कि सुबह की प्रार्थना उन्होंने की
चिडि़यां पृथ्वी अनन्त क्षितिज सब भूल गईं

पहली दफा सुना कि लड़कियों को उन्होंने छुआ
लड़कियों से उनके पहाड़ दरख़्त कश्ती
उनकी शायरी उनके शब्द उनकी लिपियां
और उनसे उनका प्रेम खो गया

पहली दफा सुना कि उन्होंने ‘ईश्वर’ शब्द का
किसी मंत्र की तरह जाप किया
फिर वो ईश्वर की पीठ से उतरे
फिर उन्होंने सिर्फ़ एक ही हत्या की
सिर्फ़ एक का घर जलाया

इस अयोध्या में : तीन कविताएं

(‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव के लिए)

एक

यह अयोध्या हमारे समय की
अयोध्या थी
यह अयोध्या एकदम विचित्र
अयोध्या थी

इस अयोध्या के सपने में गिद्ध आते थे
सांस्कृतिक संकट बनकर

यह पूर्व घोषित था और पहले ही कहा जा चुका था
गहरे काले रंग का चश्मा पहने राजेन्द्र यादव नामक
भयानक जीव को सौ गालियां सुननी थीं
उसके शरीर में सैकड़ों त्रिशूल घोंपे जाने थे इस अयोध्या में

यह मोटी बात उसकी मोटी बु्द्धि में घुसेड़ना
उनके लिए बड़ा कठिन सिद्ध हो रहा था इन दिनों

इन दिनों असल में राजेन्द्र यादव को समझाया जाना था कि
यह अयोध्या है और यह अयोध्या
किसी राम की अयोध्या नहीं है बल्कि
यह अयोध्या मक्कार धर्माधिराज की अयोध्या है
जिसके इर्द-गिर्द हत्यारे बैठे थे संत बनकर

पहले ही कहा जा चुका है
तमाम हत्यारों के बचाव में वे निकालेंगे ‘गौरव-यात्रा’
वर्तमान के अमात्य-महामात्य और गृहमंत्री
ऐसे ही प्रसन्न होते थे अपने भक्तों पर
और ऐसे ही सौंपते थे सत्ता की कृतज्ञता

इन दिनों असल में
राजेन्द्र यादव को यह भी समझाया जाना था कि
अंसारी रोड, दरियागंज में उसके कम्यूनिज़्म की
या गुजरात के बहाने उस जैसे रामसेवक की
आत्म-स्वीकृतियों की ज़रूरत नहीं है
इस अयोध्या के निमित्त

असल में, राजेन्द्र यादव नामक जीव
बड़ा अहमक़ जीव था
बड़ा बुड़बक जीव था
इतना अहमक़ इतना बुड़बक कि
वह रोज़ उनके विरुद्ध खड़ा होता
रोज़ उनके फासीवाद को गरियाता
बड़े बेसुरे बड़े भद्दे स्वर में

जबकि वे राजेन्द्र यादव को सस्वर गीत सुनाते:
तुम तो ढिंढोरची हो अल्पसंख्यकों के
तुम तो ढिंढोरची हो दलितों के
तुम तो ढिंढोरची हो स्त्रियों के

यह गीत वे ही गा सकते थे
इसलिए कि इस अयोध्या के कवि शासक के घुटनों में
बड़ा भारी दर्द पाया जा रहा था
और मरे हुओं की आत्माएं कुछ अधिक ही
परेशान कर रही थीं उन्हें इन दिनों

दो

इस अयोध्या के राजा और राजा के
सहयोगियों की क्रूरताओं के क़िस्से
पूरी दुनिया में सुने जा सकते थे इन दिनों

यह अयोध्या अब किसी अजायबघर में
तब्दील होती जा रही थी
इस अयोध्या में बस लाशें ही लाशें थीं सजी हुईं
आतंकवादी हमले में
सांप्रदायिक दंगे में
बाढ़ और सुखाड़ में
भूख और बेरोज़गारी में
मरे हुए लोगों को
बाज़ाब्ता विज्ञापित किया जा रहा था
पोस्टरों में छापकर
टेलीविज़न पर दिखाकर
या राजा की क्रूर मुस्कुराहटों में
या राजा की ठूंठ कविताओं में

आदिकालीन समयों को सार्थक करते हुए
वृक्षों चिडि़यों तक के सपने छीनते हुए
हमारी प्रसन्नताओं को विसर्जित करते हुए
बेशर्म अतीत को सही ठहराते हुए
राजा कर रहे थे ईश्वर बनने का ढोंग

मैं सोचता हूं, राजा जो कह रहे थे
मैं सोचता हूं, राजा जो कर रहे थे
क्या वही सत्य है अंतिम सत्य

राजा घात लगाए बैठे हैं पत्तों के पीछे
किसी तेंदुए की तरह हमारी ही ताक में

मैं भारतीय नागरिक भौंचक हूं
इस अयोध्या में आप
पाश हैं
सफ़दर हाशमी हैं
मान बहादुर सिंह हैं

आप मक़बूल फ़िदा हुसेन हैं
आप राजेन्द्र यादव हैं
आप मेधा पाटकर हैं
आप शाहबानो हैं

आप हिंदू हैं
आप मुसलमान हैं

आप स्त्री हैं
आप दलित हैं

इस अयोध्या में आप इंसान हैं
तो आप जीवित नहीं बचेंगे
आप मारे जाएंगे इस पूरे इतिहास में

किसी न किसी ईश्वरीय संगठन के
कुशल हाथों से मारे जाएंगे
किसी न किसी अपवित्र हाथों से तारे जाएंगे

तीन

अभी कल की घटना थी बिलकुल कल की
(उनके लिए कोई असाधरण घटना नहीं थी)
उधर सूरज निकला था
इधर असंख्य-असंख्य ईश्वरभक्त
हथियार चलाने की क्लास से लौटते हुए
धर्म की ध्वजा को मज़बूती से संभाले हुए
गहन चिंतन-विमर्श का बखान करते हुए
सारी हत्याओं को सांस्कृतिक हत्या बताते हुए
कह रहे थे:
शिक्षा में ज्योतिष-गणित परम आवश्यक है
इससे भी आवश्यक है नरेंद्र मोदी जैसों को बचाना
और फिर बंधु चुनाव आयोग ने तो… राम-राम

यह सब कोई गहनतम संकेत था हमारे हिन्दुस्तान के लिए
या कुछ और या कोई भयानक वास्तविकता

जबकि ‘पुनर्लेखन अभ्यास’ में सिर्फ़
इतिहास के पुनर्लेखन की तैयारी नहीं चल रही थी
तैयारी चल रही थी पुरानी खीझ को सत्य साबित करने की
तैयारी चल रही थी घमंडी अमेरिका और इज़राइल बनने की

इस अयोध्या में अब वे राम भरोसे बैठे रहना नहीं चाहते
खांसते नहीं रहना चाहते किसी पुराने मर्ज़ में
न तिलचट्टों की अस्थियों को लेकर
बौखते रहना चाहते थे यहां और वहां

बहरहाल कितनी अजब बात है
बहरहाल कितनी ग़ज़ब बात है
वे ‘ग्लोबल विलेज’ को लेकर परेशान नहीं थे
युद्ध के माहौल को लेकर परेशान नहीं थे
हवाला पेट्रोल पम्प ताबूत घोटाले को लेकर परेशान नहीं थे

वे सिर्फ़ और सिर्फ़ सत्ता की छीना-झपटी और उसी के लिए
भागमभाग में परेशान थे इन दिनों और इस समय।

सब्ज़ी बेचने वाली औरतों की कविता 

कौन सहता रहेगा
ग्राहकों के इतने दांव-पेच
कठिन है स्पष्ट कहना

कौन अपने चहकने के दिनों को
कौन अपने महकने के दिनों को
कौन अपने धड़कने के दिनों को
कौन अपने चिडि़यों तितलियों-से उड़ने के दिनों को
हवाले कर देना चाहेगा इस वध-स्थल को
सौंप देना चाहेगा पृथ्वी की
इस विस्मयकारी सब्ज़ीमंडी को

सोचे जाने की तरह सोचो
तुम्हारे सोचने तक वो ले आएंगी
हरी और ताज़ा सब्जि़यां
(पृथ्वी का हरा सारा, और
ताज़ा सारा उन्हीं का तो है
जुलाई की आधी रात को
इसे तुम भी महसूस कर सकते हो!)
और उनके अश्व दौड़ेंगे
दिन भर ऐसे ही

वो सब्ज़ी बेचने वाली
जवान स्त्रियां हैं
जो बालपन से निकलकर
युवापन में प्रवेश करती हुईं
कुंवारी ही स्त्री बन जाती हैं
ऊपर से शासकों द्वारा
पढ़े जाने वाले मंत्रों से
अस्वीकृत की हुई होती हैं सो अलग

ऊपर से उनका संसार वज्रपात का
मारा हुआ संसार होता है
ऊपर से ऐसे-ऐसे
ग्रहों-नक्षत्रों में जन्मी होती हैं कि
उनका शरीर समय से पूर्व
अपना वैभव खो चुका होता हैं

सब्ज़ी बेचने वाली जवान स्त्रियां
तुम्हारे समय के सबसे नंगेपन में
ढिठाई के साथ
सब्ज़ियां बेच रही हैं
यह उन्हीं का दमखम है
जबकि तुम विनम्र बने रहने का
दिखावा कर रहे हो
और सब्ज़ियां खरीदते हुए
अजब-ग़ज़ब मुस्कान फेंक रहे हो उनकी देह पर

अमावस के गहरे-काले अंधेरे में
जवानी की बरसात का
जवानी के वसन्त का
जवानी की अल्पना-सोहर का
जवानी की जन्माष्टमी शरद पूर्णिमा का मतलब
जवानी की ईद-बक़रीद का मतलब
उनके लिए बेमानी था
बेमानी था उनके लिए सूर्य-चन्द्र
पृथ्वी-अनंत बेमानी था
बेमानी थे उनके लिए वाक्य और विन्यास
सौन्दर्य-सामग्री का अर्थ बेमानी था
बेमानी था किसी के इंतज़ार में
खिड़कियों के पास खड़े रहना

वर्षों से करोड़ों वर्षों से
पुलिसिया क़िस्म के लोग
कोतवाली के ठीक क़रीब सब्जीमंडी में
सब्ज़ी बेचने वाली जवान स्त्रियों से
नित्यप्रति बहुत-थोड़ी सब्ज़ियां
डांट-डपटकर लेते ही आ रहे थे
और विश्वहित राष्ट्रहित लोकहित में
सहयोग करते ही आ रहे थे इस तरह

चंद ग्राहक
जो कि चेहरे से फूहड़ क़िस्म के लगते थे
लकवाग्रस्त वाक्यों शब्दों
मृत्युग्रस्त अदाओं के सहारे
पैसे कम करा ही रहे थे
और अत्यधिक प्रसन्न हो रहे थे
इस अनंतता में
(इस तरह वे ज़ाहिर करते थे कि
इतिहास के पन्नों से इसी क्षण
बाहर निकले हैं
सब्ज़ियां लेकर पुनः-पुनः उन्हीं पन्नों में
लौट जाएंगे वापस!)

जबकि सब्ज़ी बेचने वाली जवान स्त्रियां
महसूस करती रही थीं कि
मार्च में दिसंबर की ठण्ड बढ़ गई है

तुम नर्म-मुलायम बिस्तर पर लेटकर अथवा
पत्नी से प्रेमिका से चाय बनवाकर
ठण्ड को सार्थक करोगे ही करोगे
जबकि सब्ज़ी बेचने वाली जवान स्त्रियां
अपने विश्वासों को तौलती रहेंगी सुबह दोपहर सांझ
तुम्हारे ही आस पास
तुम्हारे ही पुरातन तुम्हारे ही नवीन में

तुम्हारी पुत्रियां अपने लंबे-घने बालों को
लिक्विड प्रोटीन देंगी
वो तड़प-तड़प रह जाएंगी
(आप घड़ी देख लें
आपके बौखलाने का समय हो गया शायद
जबकि उन्हें तो रोना है अभी साहब!)
पूरे अनगढ़पन से कोसने भी लग जाएंगी
अपने काल के पहाड़ को

एक दिन पृथ्वी अपना हरापन भूल जाएगी
माएं बहनें पत्नियां प्रेमिकाएं
अपनी हंसी और अदाएं भूल जाएंगी
पिता और भाई अपना बांकपन खो चुकेंगे
क्योंकि सब्ज़ी बेचने वाली जवान स्त्रियां
हज़ार बरस में करोड़ बरस में आने वाले
किसी महामहत्वपूर्ण महापर्व के दिन
गर्दआलूद आईने के सामने खड़ी होंगी तो महसूसेंगी
उनके उरोज पर्वतों वाली उठान भूल चुके हैं
उनके शरीर के सारे अश्व थक चुके हैं

जाड़ा जाते महीने के अंतिम दिनों में
समझा जा सकता था कि
सब्ज़ी बेचने वाली जवान स्त्रियां
फिर-फिर प्रकट होती रहेंगी
बार-बार जन्म लेती रहेंगी
संसार की गतियों में
बाज़ार के दृश्यों में वस्तुओं में
पृथ्वी के हरेपन में स्मृतियों में
इसलिए कि दुख अभी
पूरी तरह से भागा नहीं है
इस वितान से
इस पृथ्वी से।

मेरा सौंपा हुआ

मैं तुम्हें एक खिड़की सौंपता हूं तारों भरी
मैं तुम्हें आकाश इंद्रधनुष नदीतट तैरतीं मछलियां
मैं तुम्हें आवारा और श्री चार सौ बीस के गाने सौंपता हूं
अदृश्य नहीं दृश्य सौंपता हूं हर बार
और कोमलतम संसार सौंपता हूं सार्थक

वृक्षों पर छाए अंधेरे के लिए
पहाड़ पर की धूप
तुम अपने ख़्वाबों के अफसाने सुना सको
इसके लिए परियां बाघ रहस्य सौंपता हूं
और बचा सको अपने हिस्से के वसंत को
इसके लिए इक हसरते-ताबीर सौंपता हूं

तुम्हारे पीछे छूटते जा रहे बिंबों को
संभाले रखने के लिए कुम्हार का चका
तुम्हारे इर्द-गिर्द के एकांत को भगाने के लिए
अपनी सारी शायरी सारी नज़्में अपने सारे अफसाने
तुम्हारी उदासी को भगाने के लिए
बढ़ई का रंदा सौंपता हूं बहुमूल्य
और अपने दुखों से उबरने के लिए बुद्ध सौंपता हूं

मेरा सौंपा हुआ रहेगा यहीं कुम्हार और बढ़ई के घरों में
जो बचाए रखेगा
कुम्हार का चका
बढ़ई का रंदा
वन और बाघ

जो बचाए रखेगा
तुम्हारा आकाश
तुम्हारा समय
तुम्हारा वितान

बचाए रखेगा उसे भी बचाए रखने की सारी विधियों के साथ
जो तुम्हारे भीतर फूटने के लिए दरअस्ल बेचैन है
किसी भाषा की तरह किसी कोंपल की तरह
और लांघ लेना चाहता है पौ फटने के वक्त तक को।

ख़ानाबदोश लड़कियां

सारा शहर प्रतीक्षारत था कि
ख़ानाबदोश लड़कियां लौटेंगी
नए तमाशे दिखाएंगी
नए मंज़र रचेंगी सवेरे-सवेरे

शहर में दिन अच्छे थे
धूप भी रोज़ निकल रही थी
आंखों में ख़ूबसूरत ख़्वाब भी
झलक रहे थे
फिल्म देखकर लौट रहीं लड़कियों की
वनों की तरफ जाते नौउम्र लड़कों की

कस्तूरी-सी महकने वाली
ख़ानाबदोश लड़कियां नहीं लौटीं
इस वसंत में इस शहर

जिसका कोई देश न हो
वो क्यों लौटकर आएंगी
फिर-फिर आपके दे

ख़ानाबदोश लड़कियां

सारा शहर प्रतीक्षारत था कि
ख़ानाबदोश लड़कियां लौटेंगी
नए तमाशे दिखाएंगी
नए मंज़र रचेंगी सवेरे-सवेरे

शहर में दिन अच्छे थे
धूप भी रोज़ निकल रही थी
आंखों में ख़ूबसूरत ख़्वाब भी
झलक रहे थे
फिल्म देखकर लौट रहीं लड़कियों की
वनों की तरफ जाते नौउम्र लड़कों की

कस्तूरी-सी महकने वाली
ख़ानाबदोश लड़कियां नहीं लौटीं
इस वसंत में इस शहर

जिसका कोई देश न हो
वो क्यों लौटकर आएंगी
फिर-फिर आपके देश।

आचरण : पांच कविताएं

एक

इतना शिष्ट था वह इतना विनम्र इतना हंसोड़
इतना आचारवान अद्वितीय रोग-मुक्त कि
वह रखता था सदी के महत्त्वपूर्ण
कवियों कथाकारों आलोचकों संपादकों को
अपनी जेबी में हर क्षण हर सुबह दोपहर शाम कि
वह केवल बकता था गालियां
अपने ही मित्रों समकालीनों अग्रजों को
गाली देने की सारी विशिष्ट कलाओं के साथ

आत्मा तो थी उसकी डरी और मरी हुई बिलकुल

समृद्ध करता था वह ऐसे ही स्वयं को
संतापित करता था वह ऐसे ही
अपनी आलोचना की भाषा को
अपनी वाणी का रस बांटता था वह सबको ऐसे ही

अद्वितीय था वह जन्म से कमोबेश
पुनर्जन्म में भी होगा अद्वितीय अद्भुत
कर जाता वह अनजाने ही अक्सर
अनजाने ही इस सत्य को दृश्यमान

दो

सभा रोज़ होती थी इस महानगर में
मंच रोज़ सजते थे अर्थों और विचारों से भरे हुए
यहां और वहां इधर और उधर

उपस्थित रहता वह सदेह हर सभा हर मंच की अगली पंक्ति में
साहित्य-इतिहास की सबसे भ्रष्ट समझ के साथ

सभा और गोष्ठी के आयोजनकर्ता-कार्यकर्ता
नहीं जानते न ही समझ पाते
उसके सभ्य इस तंत्र को
उसके सभ्य इस बीज को
उसके सभ्य इस गुण को
उसके सभ्य इस दृश्य-अदृश्य को कि
उसका अनोखा यह रूप कि
उसका अनोखा यह शब्द-प्रेम
कला और साहित्य की शिष्टता-विशिष्टता में नहीं
बल्कि उन रुपयों के कौतूहल में था
जो वह वसूल करेगा समारोह की रपट छपवाने के एवज़
ठगी के सारे ख़ूनी खेल खेलता हुआ

तीन

उसे रामचंद्र शुक्ल अथवा नामवर सिंह के नहीं
लालकृष्ण आडवाणी अथवा नरेंद्र मोदी के विचार अच्छे लगते

उसे पाब्लो नेरूदा अथवा केदारनाथ सिंह की नहीं
अटल बिहारी वाजपेयी की कविताएं
अपने पूर्वजों के शब्द अर्थ और मधुर कंठ लगतीं

उसे नदी समुद्र वन-प्रांतर जलवनस्पतियां सपने दोपहर
मक़बूल फ़िदा हुसेन के चित्र इंद्रध्नुष के रंग छाता गमछा घास
छपाक्-छपाक् तैरते हुए लड़के कुहुक-कुहुक के स्वर नहीं
प्रेमिका की निश्चलता-व्याकुलता भी नहीं
न दुर्लभ दिवस कोई न कथाचित्र कोई
बल्कि उस युवा पत्रकार की हताशा-निराशा पसंद थी
जो चूक गया था रह गया था नाकाम इस मगध में
मिल गई थी सफलता उसी को प्रपंच से
किसी साधु प्रवृत्ति वाले सत्ताधीश के हाथों

संभवतः सबसे सफल सबसे रचनात्मक था वह इसलिए
संभवतः अपनी सफलता के इसी दंभ में इसी विस्फोट में
सीमाहीन हो-होकर सिर उठाता वह बार-बार
अपने सांस्कृतिक होने की नित्य नई शैली विकसित करता
तन्मय-तन्मय एकदम तन्मय होकर

चार

हा हा हा वह हंसता बारिश के दिनों पर फूलों पत्तियों पर
हा हा हा वह हंसता मज़दूर पिता पर किसान पर
हा हा हा वह हंसता समुद्र पर उसमें बनते हुए नमक पर
हा हा हा वह हंसता आकाश पर पृथ्वी पर समय पर
हा हा हा वह हंसता भित्ति-चित्र पांडुलिपियों पर

हा हा हा वह हंसता हमारी विधियों पर
हा हा हा वह हंसता हमारे निवेदन हमारे जीवन की आत्मकथा पर
हा हा हा वह हंसता जन्म पर मृत्यु पर तुम्हारे-हमारे विश्वास पर

हा हा हा वह हंसता व्यतीत वर्तमान पर
हा हा हा वह हंसता उन पर आनंदित
जिन्होंने उसे आशीष दिया प्रार्थना के शब्द दिए

हा हा हा वह हंसता उन पर विचित्र स्वरों में
जिन्होंने उसे धरती पर नर्म बिस्तर दिए

हा हा हा वह हंसता उन पर अनायास-अजीवंत
जिन्होंने उसे महत्वाकांक्षाएं दीं अर्थ दिए क्रियाएं दीं

हा हा हा वह हंसता हरे हो रहे दरख़्तों पर
हा हा हा वह हंसता जीवित हो उठीं नदियों पर

हा हा हा वह हंसता क्षितिज पर हमारे सपनों पर
हा हा हा वह हंसता शून्य पर सूक्ष्म पर मूल्य पर

हा हा हा वह हंसता भाषा के भेद-अभेद पर
हा हा हा वह हंसता काव्यप्रक्रिया पर हर बार

हा हा हा वह हंसता मुझ पर मुझ पर मुझ पर कि
मैं उसी की मानिंद क्यों नहीं सोचता
क्यों नहीं रहता उसी के नियंत्रण-अनुशासन में
क्यों नहीं हो जाता उसकी जड़ वृत्ति उसकी हिंसा में शामिल

हा हा हा वह हंसता सिर्फ़ एकरस
हा हा हा वह हंसता ही जाता सिर्फ़ उत्पीड़ित
उड़ती हुई पतंग पर खेल के मैदान पर मछुआरों पर पुरखों पर
आकाश में बढ़ रहे तारों पर उड़ रहे अंतरिक्षयान पर
बेआवाज़ प्रेम पर मौन पर सहज स्मृतियों पर

पांच

एक स्त्री को वह बुलाता नदी के किनारे
एक को मंदिर के एकांत में टापू के सन्नाटे में
दूसरी-तीसरी को किसी गार्डेन किसी होटल किसी घर में
चैथी को किसी भव्य सभा-स्थल पर
पांचवी को पत्नी-सा ऐश्वर्य देने के नाम पर
छठी को किसी बलात्कार-गृह में अकेले

वह स्थापित-शापित था सदैव ऐसे ही कार्यों के लिए
संभवतः यही था उसका स्वप्न यही था उसका यथार्थ
यही था उसका विचार संपूर्ण यही था उसका व्यापार

सावधान! सावधान!! बस यही है उसकी दिनचर्या
यही है उसका ध्येय यही है उसका इहलोक और परलोक
बस यही है उसके जीवन का काला और सफेद
बस इतना ही है उसका प्रतिक्षण ज़िंदगी का कारोबार।

मुझे ले जाया गया

मुझे ले जाया गया निर्जन उस मठ के कोने में
मुझे ले जाया गया बदरंग उस क़िले के सन्नाटे में

मुझे बुलाया गया समुद्र की गर्जनाओं के बीच
एकदम अकेले हथियारों के बिना
बस निहत्थे

मुझे बुलाया गया पृथ्वी के उस हिस्से में
जहां थे सांपों के झुंड विषधर
जहां थी डायनासॉरों की भीड़ भयानक
जहां थी हरी घास बिलकुल ही नहीं बची हुई
जहां थे राक्षस असंख्य भूखे इधर-उधर घूमते

वहां न प्रार्थनाएं थीं न कोई मंत्रोच्चार पवित्र
न कोई किताब गद्य अथवा पद्य की
न जीवन की संभावनाएं प्रस्फुटित होती हुईं

मुझे जहां-जहां ले जाया गया जिन दशकों में
मुझे जहां-जहां बुलाया गया जिन नीरवताओं में
वहां पर थे सिर्फ़ औरतों के बलात्कारी
बच्चों के सीरियल किलर
क़ब्र खोदने वालों की मंडलियां अभ्यस्त

मुझे ले जाया गया दुर्गन्धित वध-स्थलों में
जहां पर थीं चीख़ें ही चीख़ें मनुष्यों की
जहां पर थी खीझ ही खीझ संतों की
जहां पर थी गूंज वीभत्स भयातुर आत्माओं की
जहां पर थे संगीत के उपकरण ख़ून से सने हुए

इस संसार में बचता हुआ दिखाई देता था
बस यही दृश्य
यही गुपचुप स्वर बोझिल
बस यही असंगत परिस्थिति
यही अलक्षित वायुमंडल

मुझे ले जाया गया बार-बार बारंबार
जहां पर थीं बेशुमार दंतकथाएं मृत्यु की हमारी ही

तस्लीमा नसरीन : दो कविताएं 

एक

झुंड की झुंड लड़कियां हिंसक खुरों का शिकार हुई हैं
आदिम गिद्धों ने नोचा है उनकी देहों से मांस
ढेरों बार उनकी खाल निकाल ली गई है
शुभाशंका ने बहुत तंग किया है उनको
धर्मगुरुओं ने बार-बार जारी किया है फतवा
उनके ख़िलाफ करोड़ों-करोड़ बार

एक बार फिर सारी यातनाएं एक साथ
हमलावर होने के लिए बेक़रार हो रही हैं

जहां वो काम करती हैं संभव-असंभव
जिस रास्ते होकर वो रोज़ काम पर से लौटती हैं
जिस रास्ते होकर वो बाज़ार जाती हैं
उन रास्तों में उन गलियों में
लगातार अवरोध पैदा किया जाता रहा है
लगातार उलझनें पैदा की जाती रही हैं

लड़कियां बहुत कम मक़बूल होती हैं या कि
उन्हें मक़बूल होने नहीं दिया जाता तस्लीमा नसरीन

अक्सर लड़कियां अपनी नाजुक अदाओं के लिए
या मिस वर्ल्ड चुनी जाने के लिए मक़बूल कर दी जाती हैं
या फिर प्रार्थनाओं का नया शिल्प विकसित करने के लिए
लज़ीज़ खाना बनाने के लिए भी मक़बूल हो जाती हैं लड़कियां

बताओ तस्लीमा नसरीन ज़रूर बताओ
तुम्हारे टेलीफ़ोन के तार में उड़नतश्तरी कभी नहीं अटकी
तुम्हारी छत पर कोई अंतरिक्ष यान नहीं उतरा
तुम्हारे यहां बड़े अधिकारी मंत्री नहीं पहुंचे
फिर भी तुम मक़बूल क्यों हो गईं कि
अफरा तफरी-सी होने लगी पृथ्वी के विस्तार में

तस्लीमा नसरीन
लो लुटिया भर शुद्ध पानी तुम भी
कर लो वजू हो जाओ पाक-साफ़
घर चहारदीवारी में क़ैद होकर
मांग लो स्वस्थ सार्थक सभ्य
कहे जाने वाले समाज के शक्तिवानों
और इबादतगाहों के रखवालों से मुआफ़ी

हो सके तो तुम भी अपनी नाजुक अदाओं के लिए
मक़बूल होने का जतन करो
हो सके तो पांचों वक्त नमाज़ पढ़ो सिर्फ
और शादी करके शौहर की ख़िदमत में लग जाओ
पा लो जन्नत पा लो मन्नत

हो सके तो ऐसा लिखो सिर्फ़
जिससे उन्हें ‘लज्जा’ न आए
और वे पुरुष बने रहें शताब्दियों तक

दो

वह पृथ्वी को रहने योग्य बनाना चाहती है
वह प्रेम के वितान में भटकना चाहती है
और नदी की निस्तब्धता में मछलियां भर देना चाहती है

उसके अंतस में कुछ भी अनाप-शनाप छिपा नहीं है
उसकी आंखें बाघिन की अलसाई हुई आंखों की तरह नहीं लगतीं
किसी तरह का कोई भेद कोई कृत्रिम अंतरीप
नहीं मिलता है वहां न तपती दोपहर
न बर्बर अक्षर न भय पैदा करने वाले ग्रह-नक्षत्र

हवा उसको बांधना चाहती है
पानी उसको आहत करना चाहता है
दुश्मन नाविक उसको समुद्र की गहराई में डाल देना चाहता है
जंगल उसको अपने अंधकार में लपेट लेना चाहता है

लेकिन अभी बहुत कुछ लिखा जाना है उसकी क़लम से
याद करनी हैं उसको बहुत सारी नज़्में
नज़्मों में छिपे रहस्यों को उजागर करने हैं
अभी पूरा का पूरा इतिहास बदलना है उसे
बचाने हैं अन्न और शब्द और जीवन बचाना है उसे

शायद इसीलिए शायद इसीलिए
उसकी जीवंत धडकनों से बहुतों को ख़ौफ होता है

शायद इसलिए भी कि
उसके एजेंडे में विद्रोह के स्वर
डायनासॉर बनकर आते हैं
और पृथ्वी रुकी हुई नहीं लगती।

ले उड़े कोई जल्दी

बेतरह खांस रही है शताब्दी
कई-कई भयों कई-कई दुखों में
सीमेन्ट की बोरियां गिर रही हैं
धड़ाधड़-धड़ाधड़ काल-अकाल के बीच
ऋतुएं सब उलट-पुलट हो गई हैं
छायाएं ग़ायब हो रही हैं

बार-बार विशेषज्ञ डाक्टरों के यहां
जाना पड़ रहा है मनुष्यों को पशुओं को
चारपाई ख़ाली पड़ी है नए आगंतुक की प्रतीक्षा में

कितनी ख़राब कितनी बदसूरत गुज़र रही है शताब्दी
कुछ नहीं के बीच गेहूं के बिना

ले उड़े कोई जल्दी बहुत जल्दी
इस बेतरह खांस रही शताब्दी को

ऐसे ले उड़े कोई कि आने वाली शताब्दियां
संपूर्ण रूपों में स्वस्थ हों
चिड़ियों शिशुओं से भरी हों
पेड़ से भरी हों अनाज से भरी हों
बचा रहे जीवन जीवन की तरह
तक़लीफ़ और दुख न हों
आने वाली शताब्दियों

कौवे के बारे में

कौवे रोज़ घर की मुंडेर पर आते हैं
जैसे नातेदारों के आने की ख़बरें लाते हैं

कौवे को अमरत्व प्राप्त है ऐसा नहीं है क़तई

कौवे जितने दिल्ली में पाए जाते हैं
उतने ही वे बंगाल बिहार उत्तरप्रदेश
महाराष्ट्र में पाए जाते हैं
उतने ही अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में

कौवे रोज़ शालीनता से चुनौती देते हैं कि
हम जित्ते तेज़ हैं, आप नहीं हो

कौवे की चीख़-चिल्लाहट से भागमभाग से
बेचारे कबूतरों की नींद कोसों दूर भाग चुकी है
कौवे अब फिल्मों में कबूतरों की जगह
लेना चाहते हैं सारी दुविधाओं को भगाते हुए

अपने होने की जटिलताओं से अनभिज्ञ नहीं होते कौवे
न इससे कि इनके कड़ख़ स्वभाव से संपूर्ण स्वस्थ तत्व
लगातार कम पड़ते जा रहे हैं अंतरिक्ष के

जबकि पृथ्वी की उदासी जड़ से समाप्त करने का
दावा करते रहे हैं वाचाल कौवे
कौवे ज़िद्दीपन की हद तक ज़िद्दी होते हैं
प्रधानमंत्री राष्ट्रपति गृहमंत्री और वित्तमंत्री से लेकर
तमाम दूसरे ओहदेदारों पहरेदारों
दालान पर चढ़ीं लड़कियों का मुंह चिढ़ाते हैं

ऐसा नहीं है कि कौवे प्रेमपत्र नहीं लिखते
अथवा अच्छी संभावनाओं पर ज़िक्र नहीं करते
वे बेहतर इम्कानात के लिए सपने भी देखते हैं
इस बिम्ब में इस वितान में

कौवे के प्रेम करने के बारे में
और शोर करने के बारे में
ढेर सारा लिखा गया है लेकिन
कौवे के मुंह चिढ़ाने के बारे में
किसी ने नहीं लिखा किसी भाषा में

यह कौवे द्वारा मुंह चिढ़ाए जाने का अंतिम समय नहीं है

कौवे हर मौसम में तड़के उठ जाते हैं
और मुंह चिढ़ाने का काम आरंभ कर देते हैं पूरे इस समय का

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