शहनाज़ नूर की रचनाएँ

हम-सफ़र ज़ीस्त का सूरज को बनाए रक्खा

हम-सफ़र ज़ीस्त का सूरज को बनाए रक्खा
अपने साए से ही क़द अपना बढ़ाए रक्खा

शोला-ए-याद को लिपटाए रखा दामन से
इस बहाने से तुझे अपना बनाए रक्खा

लोग आँखों से ही अंदाज़ा-ए-ग़म करते हैं
हम ने आँखों में तिरा वस्ल सजाए रक्खा

इक यही तो मेरा हमराज़ था तन्हाई का
दर्द को दिल की हवेली में छुपाए रक्खा

अपना अंदाज़-ए-सफ़र सब से जुदागाना रहा
आँखों में शौक़-ए-सफ़र दिल को सराए रक्खा

हवा के हौसले जंज़ीर करना चाहता है

हवा के हौसले जंज़ीर करना चाहता है
वो मेरी ख़्वाहिशें तस्वीर करना चाहता है

नज़र जिस से चुरा कर मैं गुज़रना चाहती हूँ
वो मौसम ही मुझे तस्ख़ीर करना चाहता हूँ

विसाल-ए-दीद को आँखें छुपाना चाहती हैं
मगर दिल वाक़िआ तहरीर करना चाहता है

मिज़ाज-ए-बाद-ओ-बाराँ आश्ना है शौक़ लेकिन
नए दीवार-ओ-दर तामीर करना चाहता है

मिरे सारे सवाल उस की नज़र के मुंतज़िर हैं
वो दानिस्ता मगर ताख़िर करना चाहता है

कभी जो मअरका ख़्वाबों से रत-जगों का हुआ

कभी जो मअरका ख़्वाबों से रत-जगों का हुआ
अजीब सिलसिला आँखों से आँसुओं का हुआ

जला के छोड़ गया था जो ताक़-ए-दिल में कभी
किसी ने पूछा न क्या हाल उन दियों का हुआ

लिखा गया है मिरा नाम दुश्मनों में सदा
शुमार जब भी कभी मेरे दोस्तों का हुआ

मज़ाक़ उड़ाते थे आँधी से पहले सब मेरा
जो मेरे घर का था फिर हाल सब घरों का हुआ

बदल रही हैं मिरे हाथ की लकीरें फिर
कहा न अब के भी शायद नजूमियों का हुआ

वफ़ा-शिआर तबीअत का ये सिला है ‘नूर’
मेरी हयात का हर लम्हा दूसरों का हुआ

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