शहपर’ रसूल की रचनाएँ

बे-इंतिहा होना है तो इस ख़ाक के हो जाओ

बे-इंतिहा होना है तो इस ख़ाक के हो जाओ
इमकाँ की मुसाफ़त करो अफ़लाक के हो जाओ

सब क़िस्सों को छोड़ो दिल-ए-सद-चाक के हो जाओ
इस दौर-ए-जुनूँ-ख़ेज में इदराक के हो जाओ

ख़ुशियों से कहाँ रब्त है हम को भी तुम्हें भी
आ जाओ इसी लम्हा-ए-नमनाक के हो जाओ

इस बाग़ में शमशीर-ए-हवा से न बचोगे
ख़ुश रंग हो जाओ किसी पोशाक के हो जाओ

बे-ज़ाएक़ा होने से यही ज़ाइक़ा अच्छा
अशजार से उतरो ख़स ओ ख़ाशाक के हो जाओ

सर-पोशी का फ़न हाथों को सिखलाओ वगरना
बे-आँख के बे-कान के बे-नाक के हो जाओ

‘शहपर’ की तरह ख़ाक से उड़ते ही फिरोगे
बनना है तो बस जाओ किसी चाक के हो जाओ

चुप गुज़र जाता हूँ हैरान भी हो जाता हूँ 

चुप गुज़र जाता हूँ हैरान भी हो जाता हूँ
और किसी दिन तो परेशान भी हो जाता हूँ

सीधा रस्ता हूँ मगर मुझ से गुज़रना मुश्किल
गुमराहों के लिए आसान भी हो जाता हूँ

फ़ाएदा मुझ को शराफ़त का भी मिल जाता है
पर कभी बाइस-ए-नुक़सान भी हो जाता हूँ

अपने ही ज़िक्र को सुनता हूँ हरीफ़ों की तरह
अपने ही नाम से अंजान भी हो जाता हूँ

रौनकें-ए-शहर बसा लेती हैं मुझ में अपना
आन की आन में सुनसान भी हो जाता हूँ

ज़िंदगी है तो बदल लेती है करवट ‘शहपर’
आदमी हूँ कभी हैवान भी हो जाता हूँ

दिल में शोला था सो आँखों में नमी बनता गया 

दिल में शोला था सो आँखों में नमी बनता गया
दर्द को बे-नाम जुगनू रौशनी बनता गया

एक आँसू अजनबियत का नदी बनता गया
एक लम्हा था तकल्लुफ़ का सदी बनता गया

क्या लबालब रोज़ ओ शब थे और क्या वहशी था मै।
ज़िंदगी से दूर हो कर आदमी बनता गया

कब जुनूँ में खिंच गई पैरों से अर्ज़-ए-एतदाल
और इक यूँही सा जज़्बा आशिक़ी बनता गया

रफ़्ता रफ़्ता तीरगी ने दश्त-ए-जाँ सर कर लिया
रौशनी का हर फ़साना अन-कही बनता गया

ज़िंदगी ने कैसे राज़ों की पिटारी खोल दी
आगही का हर तयक़्कुन गुम-रही बनता गया

शहर का चेहरा समझ कर देखते थे सब उसे
और वो ख़ुद से भी ‘शहपर’ अजनबी बनता गया

एक दिन न रोने का फ़ैसला किया मैं ने 

एक दिन न रोने का फ़ैसला किया मैं ने
और फिर बदल डाला अपना फ़ैसला मैं ने

दिल में वलवला सा कुछ चाल में अना सी कुछ
जैसे ख़ुद निकाला हो अपना रास्ता मैं ने

मुझ में अपनी ही सूरत देखने लगे हैं सब
जाने कब बना डाला ख़ुद को आईना मैं ने

उस को भी था कुछ कहना मुझ को भी था कुछ सुनना
और कुछ कहा उस ने और कुछ सुना मैं ने

कुछ ख़बर न थी मुझ को खिल रहा है कोई गुल
बस हवा का आईना देख ही लिया मैं ने

वक़्त ने हर आहट पर ख़ाक डाल दी ‘शहपर’
कर दिया अदा आख़िर जिज़्या-ए-अना मैं ने

हंसते हुए हुरूफ़ में जिस को अदा करूँ

हंसते हुए हुरूफ़ में जिस को अदा करूँ
बच्चों से किस जहाँ की कहानी कहा करूँ

या रब अज़ाब-ए-हर्फ़-ओ-तख़य्युल से दे नजात
ग़ज़लें कहा करूं न मज़ामीं लिखा करूँ

क़दमों में किस के डाल दूं ये नाम ये नसब
कुछ तो बताओ किस का क़सीदा पढ़ाक करूँ

अब तक तो अपने आप से पीछा न छुट सका
मुमकिन है कल से आप के हक़ में दुआ करूँ

कितनी नई ज़बान हो कैसा नया सुख़न
इस अहद को तो देख लूँ ‘ग़ालिब’ को क्या करूँ

‘शहपर’ मिरी हदों का तअय्युन करे कोई
आँखों से बह रहूँ कि रगों में फिरा करूँ

हमारे दर्द की जानिब इशारा करती हैं 

हमारे दर्द की जानिब इशारा करती हैं
फ़क़त कहानियाँ हम को गवारा करती हैं

ये सादगी ये नजाबत जो ऐब हैं मेरे
सुना था इन पे तो नस्लें गुज़ारा करती हैं

ख़ुद अपने सामने डट जाती हैं जो शख़्सियतें
वो जीतती हैं किसी से न हारा करती हैं

शरीफ़ लोग कि जैसे सुकूत-ए-आब-ए-रवाँ
कुछ ऐ मौजें मगर सर उभारा करती हैं

बदल गए हैं इरादे तो हसरतों में मगर
कुछ आरज़ूएँ अभी इस्तिख़ारा करती हैं

सितारे उन की चमक में समाना चाहते हैं
मगर वो आँखें फ़लक को सितारा करती हैं

बजा हैं अपने मसाइल बजा हैं अपनी हुदूद
कहीं किनारों से लहरें किनारा करती हैं

ज़बान-ए-शहर तो पैबंद-ए-ख़ाक-ए-जहल हुई
मगर वो महफ़िलें अब भी पुकारा करती हैं

हर्फ़-ए-जाँ दिल में निहाँ हर्फ़-ए-ज़बाँ शहर में था 

हर्फ़-ए-जाँ दिल में निहाँ हर्फ़-ए-ज़बाँ शहर में था
आग का नाम न था फिर भी धुआँ शहर में था

शोर सहरा का सुना शोर समंदर का सुना
शोर का नाम ही था शोर कहाँ शहर में था

बस ज़रा अक्स ही उभरा था सफ़ों में मेरा
एक हँगामा-ए-कोताह क़दाँ शहर में था

रात ही रात यक़ीं ने कई शक्लें बदलीं
जो नहीं था वही होने का गुमाँ शहर में था

आतिश ओ क़त्ल नहीं शोर नहीं चीख़ नहीं
सिर्फ़ और सिर्फ़ धुआँ सिर्फ़ धुआँ शहर में था

देखना आँख ने क्या सीख लिया था साहब
एक दो चीज़ नहीं सारा जहाँ शहर में था

मुस्तक़र किस को बनाते कहाँ रहते ‘शहपर’
गाँव में था तो कभी सर्व-ए-रवाँ शहर में था

कब चला जाता है ‘शहपर’ कोई आ के सामने 

कब चला जाता है ‘शहपर’ कोई आ के सामने
सूई का गिरना भी क्या आवाज़-ए-पा के सामने

रोज़ बे-मक़सद ख़ुशामद क़त्ल करती है उसे
रोज़ मर जाता है वो अपनी अना के सामने

कर्ब की मासूम लहरें तेज़ तर होने लगीं
रख दिया किस ने चराग़-ए-दिल हवा के सामने

क़ल्ब की गहराइयों में सिर्फ़ तेरा अक्स है
देख ले क्या कह रहा हूँ मैं ख़ुदा के सामने

रोज़ कोई आस भर जाती है इन में रंग-ए-यास
रोज़ रख लेता हूँ मैं ख़ाके बना के सामने

दूसरों के ज़ख़्म बुन कर ओढ़ना आसाँ नहीं
सब क़बाएँ हेच हैं मेरी रिदा के सामने

कोई साया न कोई हम-साया

कोई साया न कोई हम-साया
आब ओ दाना ये किस जगह लाया

दोस्त भी मेरे अच्छे अच्छे हैं
इस मुख़ालिफ़ बहुत पसंद आया

हल्का हल्का सा इक ख़याल सा कुछ
भीनी भीनी सी धूप और छाया

इक अदा थी कि राह रोती थी
इक अना थी कि जिस ने उकसाया

हम भी साहिब दलां में आते हैं
ये तिरे रूप की है सब माया

चल पड़े हैं तो चल पड़ें साईं
कोई सौदा न कोई सरमाया

उस की महफ़िल तो मेरी महफ़िल थी
बस जहाँ-दारियों से उकताया

सब ने तारीफ़ की मिरी ‘शहपर’
और मैं अहमक़ बहुत ही शर्माया

मैं एक जस्त में क़ैद-ए-अना से बाहर था

मैं एक जस्त में क़ैद-ए-अना से बाहर था
फिर उस के बाद बहुत दूर तक समंदर था

ये किस हुनर से लिखी सरगुज़िश्त-ए-जाँ उस ने
वरक़ तो ख़ुश्क था सारा ही हाशिया तर था

जो सोचता हूँ तो इक धूंद से गुज़रता हूँ
वहाँ पे कोई गली थी वहाँ कोई घर था

इक आँख ख़्वाब में इक वाक़िए में रहती थी
हद-ए-निगाह तलक झुटपुटे काम मंज़र था

उसे भुलाने में इक सानिया लगा है मुझे
वही जो लफ़्ज मिरे दोस्तों का अज़बर था

नज़र मिली तो हँसे फिर मिले मिले न मिले
किसी से अपना तअल्लुक़ बस इक नज़र भर था

इसी ख़ला को मगर देखते हैं सब ‘शहपर’
ये कौन जाने कि दिल था यहाँ कि पत्थर था

मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं

मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं
उस ने क्या कहा बात है मैं ने कहा कुछ भी नहीं

हर ज़ेहन को सौदा हुआ हर आँख ने कुछ पढ़ लिया
लेकिन सर-ए-क़िरतास-ए-जाँ मैं ने लिखा कुछ भी नहीं

दीवार-ए-शहर-ए-अस्र पर क्या क़ामते चस्पाँ हुईं
कोशिश तो कुछ मैं ने भी की लेकिन बना कुछ भी नहीं

जिस से न कहना था कभी जिस से छुपाना था सभी
सब कुछ उसी से कह दिया मुझ से कहा कुछ भी नहीं

चलना है राह-ए-ज़ीस्त में अपने ही साथ एक उम्र तक
कहने को है इक वाक़िआ और वाक़िआ कुछ भी नहीं

अब के भी इक आँधी चली अब के भी सब कुछ उड़ गया
अब के भी सब बातें हुईं लेकिन हुआ कुछ भी नहीं

दिल को बचाने के लिए जाँ को सिपर करते रहे
लोगों से आख़िर क्या कहें ‘शहपर’ बचा कुछ भी नहीं

न आँख उट्ठी किसी लफ़्ज़-ए-बे-ज़रर की तरफ़

न आँख उट्ठी किसी लफ़्ज़-ए-बे-ज़रर की तरफ़
न संग आए कभी शाख़-ए-बे-समर की तरफ़

मुझे भी लम्हा-ए-हिजरत ने कर दिया तक़सीम
निगाह घर की तरफ़ है क़दम सफ़र की तरफ़

इस एक वहम में चुप-चाप हैं सूखती शाख़ें
तुयूर लौट न आएँ कहीं शजर की तरफ़

ये मोजज़ा है कि सीने में तीर बैठ गया
अगरचे उस का निशाना था मेरे सर की तरफ़

किसी को देख के ख़ुद पर यक़ीन आया तो
उठी तो आँख किसी नक़्श-ए-बे-हुनर की तरफ़

चली ही आई बिल-आख़िर कई इरादों से
ख़बर हिसार लिए मुझ से बे-ख़बर की तरफ़

न कोई ख़्वाब न माज़ी ही मेरे हाल के पास 

न कोई ख़्वाब न माज़ी ही मेरे हाल के पास
कोई कमाल न ठहरा मिरे ज़वाल के पास

न मीठे लफ़्ज़ न लहजा ही इंदमाल के पास
जवाब का तो गुज़र भी नहीं सवाल के पास

फ़िराक़ ओ वस्ल के मानी बदल के रख देगा
तिरे ख़याल का होना मिरे ख़याल के पास

मसर्रतों के दुखों का तो ज़िक्र भी बेकार
कहाँ है कोई मुदावा किसी मलाल के पास

नहीं है कोई भी सरहद मिरे जुनूँ आगे
जहान-ए-हुस्न-ए-जहाँ है तिरे जमाल के पास

शिकारियों की उम्मीदें सँवरती रहती हैं
तुयूर घूमते फिरतें हैं ख़ूब जाल के पास

तुम्हारे लफ़्ज़ उसे खींचते तो थे ‘शहपर’
जनूब कैसे पहुँचता मगर शुमाल के पास

नींद उजड़ी तो निगाहों में मनाज़िर क्या हैं 

नींद उजड़ी तो निगाहों में मनाज़िर क्या हैं
हम कि बे-ताब किसी ख़्वाब की ख़ातिर क्या हैं

बर्ग-ए-मासूम से करते हैं ख़िज़ाँ की बातें
मौसम-ए-सब्ज़ के लम्हात भी शातिर क्या हैं

जैसे उजड़ी हुई बस्ती में इबादत का समाँ
सूखती शाख़ पे बैठे हुए ताइर क्या हैं

क्यूँ बहर-लम्हा बिखरता है यक़ीं का पैकर
तंज़ ओ तश्कीक के असबाब बिल-आख़िर क्या हैं

राह-ए-पुर-ख़ार पे ये चलते बगूले की तरह
रोज़-ए-महशर के पयामी हैं मुसाफ़िर क्या हैं

दर्द-मंदाना सदाक़त के पयम्बर ‘शहपर’
दर्द की बात समझने से भी क़ासिर क्या हैं

फिर से वही हालात हैं इमकाँ भी वही है

फिर से वही हालात हैं इमकाँ भी वही है
हम भी हैं वही मसअल-ए-जाँ भी वही है

कुछ भी नहीं बदला है यहाँ कुछ नहीं बदला
आँखें भी वह ख़्वाब-ए-परेशाँ भी वही है

ये जाल भी उस ने ही बिछाया था उसी ने
ख़ुश ख़ुश भी वही शख़्स था हैराँ भी वही है

ऐ वक़्त कहीं और नज़र डाल ये क्या है
मुद्दत के वही हाथ गिरेबाँ भी वही है

कल शाम जो आँखों से छलक आया था मेरी
तुम ख़ुश हो कि उस शाम का उनवाँ भी वही है

हर तीर उसी का है हर इक ज़ख़्म उसी का
हर ज़ख़्म पे अंगुश्त ब-दंदा भी वही है

‘शहपर’ वही भूला हुआ क़िस्सा वही फिर से
अच्छा है तिरी शान के शायाँ भी वही है

तेरी आहट पे तिरा नाम ओ निशाँ भी क्या हो /

तेरी आहट पे तिरा नाम ओ निशाँ भी क्या हो
इन फ़रेबों में हक़ीक़त का गुमाँ भी क्या हो

अश्क आएँ तो नज़ारों की तपिश से झुलसें
ऐसे मौसम में कोई गिर्या-कुनाँ भी क्या हो

मैं तो झोंका हूँ फ़ज़ाओं में ग़लत-फ़हमी का
कोई ख़ुशबू मिरी जानिब निगराँ भी क्या हो

कुछ सिसकती हुई शामें भी झुलसते दिन भी
जब वहाँ कुछ भी नहीं है तो यहाँ भी क्या हो

कौन रहता है तग़ाफुल के ख़राबे में सदा
ऐसे वीरान जज़ीरे में मकाँ भी क्या हो

दस्तकें पुश्त ख़मीदा हैं निगहों बूढ़ी
घर की तख़्ती पे कोई नाम जवाँ भी क्या हो

बुझते रहते हैं दिए यूँ तो हज़ारों ‘शहपर’
लेकिन इस क़ल्ब-ए-कुशादा में धुआँ भी क्या हो

उस की बातें क्या करते हो वो लफ़्जों का बानी था

उस की बातें क्या करते हो वो लफ़्जों का बानी था
उस के कितने लहजे थे और लहजा ला-फ़ानी था

जब मैं घर से निकला था तक ख़ुश्क ज़बाँ पर काँटे थे
और जब घर में वापस आया गर्दन गर्दन पानी था

जब कुछ मासूमों की जाँ थी हैवानों के नरग़े में
तब हर सूरत हो सकती थी हर ख़तरा इम्कानी था

नाम-ए-ख़ुदा अब भी जारी है सब की ज़बानों पर लेकिन
जिस जज़्बे ने पार लगाया वो जज़्बा शैतानी था

आज की महफ़िल में ऐ ‘शहपर’ नुक्ता-चीनी थी मुझ पर
तेरा तो कुछ ज़िक्र नहीं था तू क्यूँ पानी पानी था

ज़हर-ए-शब वीरान बिस्तर ऐ ख़ुदा

ज़हर-ए-शब वीरान बिस्तर ऐ ख़ुदा
कर्ब इक मंज़र-ब-मंज़र ऐ ख़ुदा

मैं तिरे शाहीं का ‘शहपर’ ऐ ख़ुदा
कौन है मेरे बराबर ऐ ख़ुदा

काश तू भी मुझ में आ कर देखता
डूबते सूरज का मंज़र ऐ ख़ुदा

दोस्ती और दुश्मनी के नाम से
क़ैद हूँ किस किस के अंदर ऐ ख़ुदा

ज़ेर कुछ बौने मुझे कैसे करें
इन हक़ीरों की मदद कर ऐ ख़ुदा

बीच में मासूम सा इक आदमी
हर तरफ़ साँपों के लश्कर ऐ ख़ुदा

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