शहाब सफ़दर की रचनाएँ

बीनाओं को पलकों से हटाने की पड़ी है

बीनाओं को पलकों से हटाने की पड़ी है
शहकार पे जो गर्द ज़माने की पड़ी है

आसाँ हुआ सच कहना तो बोलेगा मुअरिख़
फ़िलहाल उसे जान बचाने की पड़ी है

छोटा सा परिंदा है मगर सई तो देखो
जंगल से बड़ी आग बुझाने की पड़ी है

छलनी हुआ जाता है इधर अपना कलेजा
यारों को उधर ठीक निशाने की पड़ी है

हालात ‘शहाब’ आँख उठाने कीनहीं देते
बच्चों को मगर ईद मनाने की पड़ी है

मिस्मार हूँ कि ख़ुद को उठाने लगा था मैं

मिस्मार हूँ कि ख़ुद को उठाने लगा था मैं
मिट्टी से आसमान बनाने लगा था मैं

बे-इख़्तियार आँखों में आँसू निकल पड़े
तस्वीर से ग़ुबार हटाने लगा था मैं

आवाज़ दे के रोक लिया उस ने जिस घड़ी
मायूस हो के लौट के जाने लगा था मैं

भटका ज़रा जो ध्यान मिरे हाथ जल गए
बोसिदा काग़ज़ात जलाने लगा था मैं

अफसोस ख़्वाब-ए-मर्ग ने मोहलत न दी ‘शहाब’
सोया हुआ नसीब जगाने लगा था मैं

मौत टलती है तो दिल दुखता है

मौत टलती है तो दिल दुखता है
जाँ सँभलती है तो दिल दुखता है

ख़्वाब झड़ जाते हैं पत्तों की तरह
रूत बदलती है तो दिल दुखता है

ख़ाक होने का सिला ख़ाक नहीं
शमअ् जलती है तो दिल दुखता है

चल चलाओ की हैं ज़द पर सारे
साँस चलती है तो दिल दुखता है

चाँद इक मांद हुआ जब से ‘शहाब’
रात ढलती है तो दिल दुखता है

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